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धीरज झा
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प्यारे
आ पको क्या लगता है, अंधे कौन होते हैं ? क्या जिनकी आँखें नहीं होतीं ? नहीं आप गलत हैं या यूँ कहूँ कि मेरी सोच आपसे अलग है । मैं मानता हूँ नेत्रहीन केवल संसारिक सौंदर्य को देखने में असक्षम होता है किंतु जिस मानस के मन मस्तिष्क पर क्रोध ईर्षा अथवा घृणा काले घ...
प्यारे
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जीवन एक बेहतरीन कवि है
जी वन एक बेहतरीन कवि है और हर लम्हा उसकी बेहतरीन कविता ज़रूरी नहीं बेहतरीन कविताएं खुद में सिर्फ प्रेम ही समेट कर रखें यहाँ शब्दों में हो सकती है मुस्कुराहटें, रुदन, हर्ष, विषाद, मिलन, विरह जैसा कि मैंने कहा जीवन एक बेहतरीन कवि है और कवि होते हैं मनमौजी मन ...
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तिला सक्रांति
"अ म्मा ई क्या कर रही हो ?" स्कूल से लौटे गुड्डू ने माँ को तिल धोते देख कर पूछा । "दिखता नहीं तिल धो रहे हैं ।" काम से थकी हुई माँ ने गुड्डू के बेतुके सवाल का थोड़ा गुस्सा कर उत्तर दिया "धो कर क्या करोगी इसका ।" "देख गुड्डू सुबह से काम करते करते हमारा माथा झ...
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उक्रिम
रजेसबा अपना बाबू को बड़ा मानता था. तभी तो पढ़ाई लिखाई छोड़ बम्बई चला गया था दू ढेऊआ कमाने के लिए जिससे वो अपने बाबू का करजा उतार सके. एतना कर्जा था सतरोहन मालिक का रजेसबा के बाबू के मूड़ी पर की एक दिन त रजेसबा के बाबू गरफसरी लगा लिये , ऊ त भला हो रमसेबका के...
उक्रिम
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पापा सफ़र शुरू हो चुका है...
'6 जनवरी की शाम' जब मेरी गूंगी कहानियाँ खुशी से चिल्लाने लगीं मेरी कहानियाँ अमूक रही हैं । हमेशा ये इसी उलझन में पड़ी रहीं कि इन्होंने अपने शब्दों के भीतर जिन संवेदनाओं, प्रेम, विरह, ठिठोली जैसे अहसासों को समेट कर रखा है वो सभी अहसास किसी पाठक के मन पर अपनी ...
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मैं चोर ही हूँ
दा रोगा मूलचंद बड़े ही ख़तरनाक पुलिस अफ्सर थे और अपराधी उनका नाम सुन कर ऐसे कांपते थे जैसे मलेरिया का मरीज़ कांपता है । ऐसा उन्हें लगता था । मगर सचाई तो कुछ और ही थी । अपराधी उनकी रत्ती भर भी परवाह नहीं करते थे । उनको पता था कि वो मूलचंद के सामने से चोरी कर ...
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आपने ही तो सिखाया है
"है साबास, ई है असली सेर । साला जो बोलेगा मार के गाँड़ झाड़ दिया जाएगा । पहिला जमाना अब खतम । गर्ब है तुम पर हमको सेर । हम तुम्हरे साथ हैं ।" आँखों पर लटके चश्में से फोन पर टकटकी लगाये हुए शोभाकांत बच्चे की तरह खुशी से उछल रहे थे । तभी उनके मित्र जनक जी आ गये...
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लक्की भईया (एक कहनी सच्ची दोस्ती वाली)
“ऐ साधो जी, इहें बईठे रहिएगा का. चलिए गर्ल कॉलेज का एक ठो राउंड मार आया जाए. आपकी भाभी की प्यारी प्यारी अखियाँ थकावट के मार से कुहंर रही होंगी, वो भी सोच रही होंगी कि आखिर आज बलमा जी किधर रह गए.” “का लक्की भईया कितना फेंकते हैं आपहुं. करिसमा आपको देखती भी न...
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वोडाफोन वाली मैडम को हमारे मिलन की चौथी वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं
उ स दिन जालंधर से पटना जा रहा था मैं, 48 सीट नं था, मतलब साईड अपर बर्थ । अपनी आदत के उनुसार उसी सीट पर पसरा पड़ा था । हाथ में थी धरमवीर भारती जी की गुनाहों का देवता । बड़ा नाम सुना था किताब का तो स्टेशन से खरीद ली थी । उसी की कहानी में उलझ कर अपनी एक कहानी रच...
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आइये आज जानते हैं उस इंसान के बारे में जिसने उस समय में अपने क़दमों से आधी दुनिया नाप दी जिस समय में ना लोग इतने समृद्ध थे ना ही आज की तरह आवागमन के संसाधन....आपको बता दूँ कि ये वही बतूता हैं जिनका जूता चुर्रर्रर्र करता था...roar.media पर पढ़िए मेरा लेख और जानिए इब्न बतूता के बारे में....
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