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Kulbhushan Singhal (कुल भूषण सिंघल)
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बुध गृह है या उपग्रह? पुराणिक विज्ञान भी इसका स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाया
पुराण बिना दिनांक का पृथ्वी, सौर्यमंडल के विकास का विज्ञानिक और आरंभिक इतिहास भी है | इसके अतिरिक्त पुराण अनेक जानकारी भूविज्ञान से सम्बंधित भी देते हैं | किसी भी खनिज/रसायन, धातु/गैस में कब किसको ‘सुर’ मानना है, किसको ‘असुर’ इस विषय में विस्तृत ज्ञान भी दे...
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SATYUG IS WORST YUG FOR HUMANITY IF RECONSTRUCTED STRICTLY AS PER PURAANS
PURAANS are history with a difference.  They contain all the facts including scietific informatiin of the evolution of our solar system but in a coded language, which is called SUTRS (सूत्र). No one has any idea, why this was preferred, but that is how it i...
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सौर्यमंडल की उत्पत्ति के बाद तथा दक्ष के समय तक पृथ्वी की विकास यात्रा
पुराण पूरी तरह से विज्ञान है, और यह बात हर संस्कृत ज्ञानी जानता भी है | लकिन सत्य बोलने से तो हिन्दू समाज सशक्त हो जाएगा, इसलिए पूरी बेशर्मी से झूट बोला जाता है कि पुराण ’पूजा भक्ति के लिए देवी-देवताओ की कथा है’| और फिर ‘धर्मात्मा’ लोग हिन्दू समाज का शोषण क...
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गुरुकुल शिक्षा से गलत सूचना देकर विद्वानों ने जो धृष्टता दिखाई अशोभनीये है
सबकुछ माफ़ करा जा सकता है,  लकिन शिक्षा में शोषण हेतु गलत सूचना ;  कभी माफ़ नहीं करी जा सकती !  कोइ भी मानक का प्रयोग करलो, यह सामाजिक , धार्मिक दोनों दृष्टि से दंडनीय अपराध है ! गुरुकुल शिक्षा से, समाज के शोषण हेतु , गलत सूचना दी गयी, जिस्मे प्रमुख कुछ यह है...
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सीता आँख में पट्टी बांधे, तराजू लिए, न्यायदेवी हैं और इसके प्रमाण हैं
http://awara32.blogspot.com/2015/05/sita-devi-of-justice.html

अनेक बार आपने आँख मैं पट्टी बांधे और तराजू लिए हुए न्यायदेवी की तस्वीर देखी होगी, लकिन यह न्यायदेवी कौन है, कोइ नहीं बताता | यूरोप के कुछ देशो मैं इस विषय पर कथाएँ हैं, जो स्वाभाविक भी है , लकिन फिर से इसका मर्म और भेद प्राचीनता मैं कही लुप्त हो गया है | क्या मानक होने चाहीये कि माता सीता या और कोइ और देवी न्यायदेवी कहलाएं और ‘क़ानून अँधा होता है’ इसको दर्शाने के लिए आँख मैं पट्टी बांधे और दुसरे हाथ मैं तराजू उठाए की न्याय में भी, तराजू की तरह, एकदम उचित हिसाब होगा |

प्रश्न कोइ मुश्किल नहीं है, मानक तो ‘आँख मैं पट्टी बांधे और तराजू लिए हुए’ न्यायदेवी ही निर्धारित कर दे रही हैं , जिसको यहाँ संशिप्त मैं बता रहा हूँ | आँख मैं पट्टी बंधे हुए का अर्थ एकदम साफ़ है , न्याय वही देखेगा, जो की उसके सामने प्रस्तुत करा जाएगा | न्यायधीश अपनी व्यक्तिगत सूचना और भावनाओं का प्रयोग बिलकुल नहीं करेंगे | और तराजू न्याय की व्यवस्था मैं न्याय देते समय समानता और निष्पक्षता दर्शाती है |

माता सीता का अपहरण रावण द्वारा हुआ था, स्वंम जटायु ने यह बात श्री राम को बताई थी, फिर सुग्रीव ने भी बताई थी, और वैसे भी श्री विष्णु के अवतार श्री राम और माँ लक्ष्मी की अवतार माता सीता कोइ अलग तो हैं नहीं , उनको सब मालूम था, और है |

अब संशिप्त मैं पूरी कथा इस संधर्भ मैं कि माता सीता ही न्यायदेवी हैं:-

1. सीता अपहरण उपरान्त राम रावन युद्ध हुआ, जिसमें राम विजई हुए, और फिर उस समय की अपहरण हुई स्त्री के लिए धार्मिक मर्यादा/नियम के अनुसार सीता ने अग्नि परीक्षा दी, सफल हुई, और फिर अयोध्या पहुच कर महारानी बनी|

2. ब्राह्मणों द्वारा राम का विरोध हो रहा था, वे जनता को सीता के विरुद्ध भड़का रहे थे, यह कह कर कि सीता का अपहरण तो हुआ ही नहीं था, वोह तो स्वेच्छा से रावण के साथ गयी थी | अंत मैं राम ने अपनी अध्यक्षता मैं एक न्याय पीठ का गठन करा जिसमें सीता के वकीलों को उसकी बात कहने का मौका मिलेगा, और जनता को अपनी |

3. इस न्यायपीठ के सामने सीता कोइ भी ऐसा प्रमाण नहीं प्रस्तुत कर पाई जो यह प्रमाणित करे कि सीता स्वेच्छा से रावण के साथ नहीं गयी थी |ध्यान दे राम और सीता दोनों एक दुसरे को बहुत प्यार करते थे, पूर्ण विश्वास था, और दोनों को यह भी व्यक्तिगत सूचना के आधार पर मालूम था कि सीता का अपहरण हुआ था |लकिन यहाँ ‘अंधे क़ानून’ की बात हो रही है , और माता सीता न्याय देवी क्यूँ है, इस विषय पर चर्चा है |

4. सीता की और से, अपनी पवित्रता के प्रमाण मैं, धार्मिक मान्यता प्राप्त अग्नि परीक्षा का उल्लेख करा गया जो सबके सामने हुआ था, लकिन राम ने अग्नि परीक्षा के परिणाम को निरस्त कर दिया यह कह कर की सफल अग्नि परीक्षा के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है, ना की पवित्रता की, तथा भविष्य मैं अग्नि परीक्षा को अधर्म और दंडिनीय अपराध घोषित कर दिया |

5. चुकी न्यायपीठ के समक्ष सीता कोइ भी भौतिक प्रमाण अपने अपहरण का नहीं प्रस्तुत कर पाई, राम ने सीता को त्याग दिया, तथा उनको स्वतंत्र कर दिया कि वे जहाँ चाहें जाए और रहें |

तो यह है सबसे बड़ा प्रमाण कि क़ानून अँधा होता है| श्री राम माता सीता पर पूरा विश्वास करते थे, उनको मालूम था कि अपहरण हुआ है, लकिन यह धर्म भी स्थापित करना आवश्यक था कि ‘क़ानून अँधा होता है’|

ध्यान रहे धार्मिक मान्यता प्राप्त अग्नि परीक्षा को निरस्त करना और न्याय मूर्ति के लिए सिद्धांत कि ‘‘क़ानून अँधा होता है’, दोनों आवश्यक धर्म है , वोह बात दूसरी है कि संस्कृत विद्वान और धर्म गुरुजनों ने निजी स्वार्थ और समाज शोषण के लिए सब कुछ गलत बता दिया |

आप बत्ताएं कि क्या माता सीता के अतिरिक्त और कोइ देवी ने इतनी स्पष्टा से न्याय देवी के आचरण को परिभाषित करा है?

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http://awara32.blogspot.com/2015/05/sita-devi-of-justice.html

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सीता आँख में पट्टी बांधे, तराजू लिए, न्यायदेवी हैं और इसके प्रमाण हैं
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अनेक बार आपने आँख मैं पट्टी बांधे और तराजू लिए हुए न्यायदेवी की तस्वीर देखी होगी, लकिन यह न्यायदेवी कौन है, कोइ नहीं बताता | यूरोप के कुछ देशो मैं इस विषय पर कथाएँ हैं, जो स्वाभाविक भी है , लकिन फिर से इसका मर्म और भेद प्राचीनता मैं कही लुप्त हो गया है | क्या मानक होने चाहीये कि माता सीता या और कोइ और देवी न्यायदेवी कहलाएं और ‘क़ानून अँधा होता है’ इसको दर्शाने के लिए आँख मैं पट्टी बांधे और दुसरे हाथ मैं तराजू उठाए की न्याय में भी, तराजू की तरह, एकदम उचित हिसाब होगा |

प्रश्न कोइ मुश्किल नहीं है, मानक तो ‘आँख मैं पट्टी बांधे और तराजू लिए हुए’ न्यायदेवी ही निर्धारित कर दे रही हैं , जिसको यहाँ संशिप्त मैं बता रहा हूँ | आँख मैं पट्टी बंधे हुए का अर्थ एकदम साफ़ है , न्याय वही देखेगा, जो की उसके सामने प्रस्तुत करा जाएगा | न्यायधीश अपनी व्यक्तिगत सूचना और भावनाओं का प्रयोग बिलकुल नहीं करेंगे | और तराजू न्याय की व्यवस्था मैं न्याय देते समय समानता और निष्पक्षता दर्शाती है |

माता सीता का अपहरण रावण द्वारा हुआ था, स्वंम जटायु ने यह बात श्री राम को बताई थी, फिर सुग्रीव ने भी बताई थी, और वैसे भी श्री विष्णु के अवतार श्री राम और माँ लक्ष्मी की अवतार माता सीता कोइ अलग तो हैं नहीं , उनको सब मालूम था, और है |

अब संशिप्त मैं पूरी कथा इस संधर्भ मैं कि माता सीता ही न्यायदेवी हैं:-

1. सीता अपहरण उपरान्त राम रावन युद्ध हुआ, जिसमें राम विजई हुए, और फिर उस समय की अपहरण हुई स्त्री के लिए धार्मिक मर्यादा/नियम के अनुसार सीता ने अग्नि परीक्षा दी, सफल हुई, और फिर अयोध्या पहुच कर महारानी बनी|

2. ब्राह्मणों द्वारा राम का विरोध हो रहा था, वे जनता को सीता के विरुद्ध भड़का रहे थे, यह कह कर कि सीता का अपहरण तो हुआ ही नहीं था, वोह तो स्वेच्छा से रावण के साथ गयी थी | अंत मैं राम ने अपनी अध्यक्षता मैं एक न्याय पीठ का गठन करा जिसमें सीता के वकीलों को उसकी बात कहने का मौका मिलेगा, और जनता को अपनी |

3. इस न्यायपीठ के सामने सीता कोइ भी ऐसा प्रमाण नहीं प्रस्तुत कर पाई जो यह प्रमाणित करे कि सीता स्वेच्छा से रावण के साथ नहीं गयी थी |ध्यान दे राम और सीता दोनों एक दुसरे को बहुत प्यार करते थे, पूर्ण विश्वास था, और दोनों को यह भी व्यक्तिगत सूचना के आधार पर मालूम था कि सीता का अपहरण हुआ था |लकिन यहाँ ‘अंधे क़ानून’ की बात हो रही है , और माता सीता न्याय देवी क्यूँ है, इस विषय पर चर्चा है |

4. सीता की और से, अपनी पवित्रता के प्रमाण मैं, धार्मिक मान्यता प्राप्त अग्नि परीक्षा का उल्लेख करा गया जो सबके सामने हुआ था, लकिन राम ने अग्नि परीक्षा के परिणाम को निरस्त कर दिया यह कह कर की सफल अग्नि परीक्षा के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है, ना की पवित्रता की, तथा भविष्य मैं अग्नि परीक्षा को अधर्म और दंडिनीय अपराध घोषित कर दिया |

5. चुकी न्यायपीठ के समक्ष सीता कोइ भी भौतिक प्रमाण अपने अपहरण का नहीं प्रस्तुत कर पाई, राम ने सीता को त्याग दिया, तथा उनको स्वतंत्र कर दिया कि वे जहाँ चाहें जाए और रहें |

तो यह है सबसे बड़ा प्रमाण कि क़ानून अँधा होता है| श्री राम माता सीता पर पूरा विश्वास करते थे, उनको मालूम था कि अपहरण हुआ है, लकिन यह धर्म भी स्थापित करना आवश्यक था कि ‘क़ानून अँधा होता है’|

ध्यान रहे धार्मिक मान्यता प्राप्त अग्नि परीक्षा को निरस्त करना और न्याय मूर्ति के लिए सिद्धांत कि ‘‘क़ानून अँधा होता है’, दोनों आवश्यक धर्म है , वोह बात दूसरी है कि संस्कृत विद्वान और धर्म गुरुजनों ने निजी स्वार्थ और समाज शोषण के लिए सब कुछ गलत बता दिया |

आप बत्ताएं कि क्या माता सीता के अतिरिक्त और कोइ देवी ने इतनी स्पष्टा से न्याय देवी के आचरण को परिभाषित करा है?

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अनेक बार आपने आँख मैं पट्टी बांधे और तराजू लिए हुए न्यायदेवी की तस्वीर देखी होगी, लकिन यह न्यायदेवी कौन है, कोइ नहीं बताता | यूरोप के कुछ देशो मैं इस विषय पर कथाएँ हैं, जो स्वाभाविक भी है , लकिन फिर से इसका मर्म और भेद प्राचीनता मैं कही लुप्त हो गया है | क्या मानक होने चाहीये कि माता सीता या और कोइ और देवी न्यायदेवी कहलाएं और ‘क़ानून अँधा होता है’ इसको दर्शाने के लिए आँख मैं पट्टी बांधे और दुसरे हाथ मैं तराजू उठाए की न्याय में भी, तराजू की तरह, एकदम उचित हिसाब होगा |

प्रश्न कोइ मुश्किल नहीं है, मानक तो ‘आँख मैं पट्टी बांधे और तराजू लिए हुए’ न्यायदेवी ही निर्धारित कर दे रही हैं , जिसको यहाँ संशिप्त मैं बता रहा हूँ | आँख मैं पट्टी बंधे हुए का अर्थ एकदम साफ़ है , न्याय वही देखेगा, जो की उसके सामने प्रस्तुत करा जाएगा | न्यायधीश अपनी व्यक्तिगत सूचना और भावनाओं का प्रयोग बिलकुल नहीं करेंगे | और तराजू न्याय की व्यवस्था मैं न्याय देते समय समानता और निष्पक्षता दर्शाती है |

माता सीता का अपहरण रावण द्वारा हुआ था, स्वंम जटायु ने यह बात श्री राम को बताई थी, फिर सुग्रीव ने भी बताई थी, और वैसे भी श्री विष्णु के अवतार श्री राम और माँ लक्ष्मी की अवतार माता सीता कोइ अलग तो हैं नहीं , उनको सब मालूम था, और है |

अब संशिप्त मैं पूरी कथा इस संधर्भ मैं कि माता सीता ही न्यायदेवी हैं:-

1. सीता अपहरण उपरान्त राम रावन युद्ध हुआ, जिसमें राम विजई हुए, और फिर उस समय की अपहरण हुई स्त्री के लिए धार्मिक मर्यादा/नियम के अनुसार सीता ने अग्नि परीक्षा दी, सफल हुई, और फिर अयोध्या पहुच कर महारानी बनी|

2. ब्राह्मणों द्वारा राम का विरोध हो रहा था, वे जनता को सीता के विरुद्ध भड़का रहे थे, यह कह कर कि सीता का अपहरण तो हुआ ही नहीं था, वोह तो स्वेच्छा से रावण के साथ गयी थी | अंत मैं राम ने अपनी अध्यक्षता मैं एक न्याय पीठ का गठन करा जिसमें सीता के वकीलों को उसकी बात कहने का मौका मिलेगा, और जनता को अपनी |

3. इस न्यायपीठ के सामने सीता कोइ भी ऐसा प्रमाण नहीं प्रस्तुत कर पाई जो यह प्रमाणित करे कि सीता स्वेच्छा से रावण के साथ नहीं गयी थी |ध्यान दे राम और सीता दोनों एक दुसरे को बहुत प्यार करते थे, पूर्ण विश्वास था, और दोनों को यह भी व्यक्तिगत सूचना के आधार पर मालूम था कि सीता का अपहरण हुआ था |लकिन यहाँ ‘अंधे क़ानून’ की बात हो रही है , और माता सीता न्याय देवी क्यूँ है, इस विषय पर चर्चा है |

4. सीता की और से, अपनी पवित्रता के प्रमाण मैं, धार्मिक मान्यता प्राप्त अग्नि परीक्षा का उल्लेख करा गया जो सबके सामने हुआ था, लकिन राम ने अग्नि परीक्षा के परिणाम को निरस्त कर दिया यह कह कर की सफल अग्नि परीक्षा के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है, ना की पवित्रता की, तथा भविष्य मैं अग्नि परीक्षा को अधर्म और दंडिनीय अपराध घोषित कर दिया |

5. चुकी न्यायपीठ के समक्ष सीता कोइ भी भौतिक प्रमाण अपने अपहरण का नहीं प्रस्तुत कर पाई, राम ने सीता को त्याग दिया, तथा उनको स्वतंत्र कर दिया कि वे जहाँ चाहें जाए और रहें |

तो यह है सबसे बड़ा प्रमाण कि क़ानून अँधा होता है| श्री राम माता सीता पर पूरा विश्वास करते थे, उनको मालूम था कि अपहरण हुआ है, लकिन यह धर्म भी स्थापित करना आवश्यक था कि ‘क़ानून अँधा होता है’|

ध्यान रहे धार्मिक मान्यता प्राप्त अग्नि परीक्षा को निरस्त करना और न्याय मूर्ति के लिए सिद्धांत कि ‘‘क़ानून अँधा होता है’, दोनों आवश्यक धर्म है , वोह बात दूसरी है कि संस्कृत विद्वान और धर्म गुरुजनों ने निजी स्वार्थ और समाज शोषण के लिए सब कुछ गलत बता दिया |

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समाधान(SOLUTION); चमत्कार, कर्महीनता से हिन्दू समाज को छुटकारा कैसे मिलेगा?
THIS IS NOT AN ORIGINAL POST BUT CONTAINS CONTENT FROM THE FOLLOWING TWO POSTS : हिन्दू को कर्महीन से कर्मठ बनाने के कार्यक्रम सेजुड़े, दूसरा विकल्प है नहीं समाज को कर्मठ बनाना है तो पुराण प्रभु के अवतरण को इतिहास मानो कथा नहीं Q 1. प्रश्न ...>>> बार बार, इस...
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हिन्दू को कर्महीन से कर्मठ बनाने के कार्यक्रम सेजुड़े, दूसरा विकल्प है नहीं
बार बार, इस बात को दुहराया जा रहा है कि जब तक हिन्दू कर्मठ नहीं होगा, समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला | क्या अंतर है, कर्महीन और कर्मठ में, समझते हैं : // कर्म, भावना के अनुपात में अंतर होता है // //The difference is in the ratio of KARM and BHAVNA // कर्...
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नीचे दिए तथ्यों के आधार पर निर्णय आप स्वंम करें कि क्या धर्म व्यक्तिगत है?
क्या धर्म व्यक्तिगत है? उत्तर : बिलकुल नहीं , सिर्फ पूजा पाठ और विधि व्यक्तिगत है | धर्म सिर्फ सनातन में ही नहीं, पूरे विश्व में व्यक्तिगत नहीं है , और ना ही हो सकता | नीचे दिए तथ्यों के आधार पर निर्णय आप स्वंम करें ! सिर्फ समाज को बेवकूफ बनाने के लिए और शो...
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