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anand jha
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der raat- subah ki taiyaari mein
तल्ख़ इमरोज़ और हर दिन वही हारा मैदान थकन और नींद के बीच सुकू की मौज़ के थपेड़ों में मेरे साथ बहो जाना ये रवानगी ये दरिया बहते लम्हों का ये शोर जो डूब रहा है सूरज के साथ तुम कहाँ हो जाना के मैंने रोक रक्खी है वो एक मौज जो आ कर रुकी है साहिल पर एक उम्र की तल्खिय...
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Varis
दश्त का वारिस हूँ मैं मेरा काम याद रखना है उस लम्हे से जब ये तय हो चला था कि  हर शहर उजाड़ होगा बसेगा एक जैसे लोगों का एक जैसा शहर ---- कुछ वो जुड़े जिन्हे ख़ुशी थी किसी और के घर के जलने की और कि उन्होंने नहीं किया ये घिनौना काम बस करवाया फिर उनके घर की बारी आ...
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हम गुलशन में लाशों की फसल देख रहे हैं  जो उग रही है  हमारी आखों में  मोतियाबिंद की तरह  गुज़र जायेगा ये वक़्त  नफरतों की दो सुईओं पर नाचता  और हम खड़े होंगे  ये सोचते हुए  के हुआ क्या 
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muhabbat-6
कितनी एक तरफ़ा मुहब्बतों की कब्रगाह हूँ मैं और ऐसी कितनी कब्रगाहों में हूँ मैं दफ़न काश एक शाल में लिपटे होते अपनी आरज़ूओं के हाथ थामे एक सब्ज़ दरख़्त के नीचे ओढ़ कर पश्मीने का कफ़न इश्क़ में तड़पा करो तुम सारी जनम मेरे अश्कों की प्यास लेकर अपने होठों पर मेरे आवारा ...
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khat
ये वो जगह है जहाँ से चुप्पी और चुप्पी के बीच बहती हुई एक नदी है आवाज़ के बाहर अलफ़ाज़ के बाहर सांस और छुअन की यातनाएं हैं देखना और देखा जाना है चलना है बगल -बगल खाना है खुशबू है और अनगिनत भाषाएं रची बसी हैं कर दो दस्तखत इस चुप्पी की वादी में निगाहों से चुप चाप...
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muhabbat -5
एक बेचैन सी चुप्पी के दोनों तरफ हमारी अपनी अपनी कयनातें हैं तुम्हारे पास हैं सैलाब सवालों के कई मेरे पास गए दिन की वारदातें हैं ज़ाया किये गए कई महफिलों के प्याले हैं अनपढ़ी चिट्ठियां है ख्यालों के पुलिंदों में दफ़न दिल एक टूटे light house सा जज़्बातों के समंदर...
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Dilli-1
इस शहर में अफसानों का धुआं अब भी है इमारतों के बीच फंसा आसमां अब भी है 
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हर नयी रात का कायदा है कुछ भूल जाना फिर मिलना अगली सुबह से याददाश्त के उसी चौखट पर जहाँ न जाने की हज़ार मिन्नतें की थी ख़राब होता है वक़्त के साथ आदमी पुर्ज़ा है जंग खाता है याददाश्त की चट्टानों से रोज़ घिसकर टूट जाता है
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रोज़ लड़ता हूँ रोज़ थकता हूँ रोज़ अपने गुस्से से कहता हूँ बस कुछ और रोज़ इसके बाद एक नयी सुबह एक मुक्कमल आज़ाद फलक और रोज़ मेरा गुस्सा कहता है देख इस झूठ के बाहर का सच
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Ba-har- haal
वो मिल गया  वो खयाल था  वो नहीं रहा  ये मलाल था  वो ख्वाबों का मेरा गुलमोहर  उसे छोड़ घूमा कई शहर  जब थक गया  तब रुक गया  उस छाँव में  जो सराब था  ये गुरेज़ का एक तिलस्म था  जो उगता था मुझसे बाहर  अपनी जड़ें  गहरी डालता  मेरे अंदर  मैं अपने डरों की मिटटी हूँ  ...
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