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सज्जन धर्मेन्द्र
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सज्जन धर्मेन्द्र's posts

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ग़ज़ल : जिस घड़ी बाज़ू मेरे चप्पू नज़र आने लगे
बह्र : फायलातुन फायलातुन फायलातुन फायलुन ---------- जिस घड़ी बाज़ू मेरे चप्पू नज़र आने लगे। झील सागर ताल सब चुल्लू नज़र आने लगे। ज़िंदगी के बोझ से हम झुक गये थे क्या ज़रा, लाट साहब को निरे टट्टू नज़र आने लगे। हर पुलिस वाला अहिंसक हो गया अब देश में, पाँच सौ के नोट ...

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ग़ज़ल : मिल नगर से न फिर वो नदी रह गई।
मिल नगर से न फिर वो नदी रह गई। लुट गया शुद्ध जल, गंदगी रह गई। लाल जोड़ा पहन साँझ बिछड़ी जहाँ, साँस दिन की वहीं पर थमी रह गई। कुछ पलों में मिटी बिजलियों की तपिश, हो के घायल हवा चीखती रह गई। रात ने दर्द-ए-दिल को छुपाया मगर, दूब की शाख़ पर कुछ नमी रह गई। करके जूठ...

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प्रेमगीत : बिना तुम्हारे, हे मेरी तुम, सब आधा है
बिना तुम्हारे हे मेरी तुम सब आधा है सूरज आधा, चाँद अधूरा आधे हैं ग्रह सारे दिन हैं आधे, रातें आधी आधे हैं सब तारे धरती आधी सृष्टि अधूरी रब आधा है आधा नगर, डगर है आधी आधे हैं घर, आँगन कलम अधूरी, आधा काग़ज़ आधा मेरा तन-मन भाव अधूरे कविता का मतलब आधा है फागुन आध...

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लघुकथा : कथा लिखो
महाबुद्ध से शिष्य ने पूछा, “भगवन! समाज में असत्य का रोग फैलता ही जा रहा है। अब तो इसने बच्चों को भी अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है। आप सत्य की दवा से इसे ठीक क्यों नहीं कर देते?” महाबुद्ध ने शिष्य को एक गोली दी और कहा, “शीघ्र एवं सम्पूर्ण असर के लिये ...

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ग़ज़ल : है अंग अंग तेरा सौ गीत सौ ग़ज़ल
बह्र : मफऊलु फायलातुन मफऊलु फायलुन (221 2122 221 212) है अंग अंग तेरा सौ गीत सौ ग़ज़ल पढ़ता हूँ कर अँधेरा सौ गीत सौ ग़ज़ल देखा है तुझको जबसे मेरे मन के आसपास, डाले हुए हैं डेरा सौ गीत सौ ग़ज़ल। अलफ़ाज़ तेरा लब छू अश’आर बन रहे, कर दे बदन ये मेरा सौ गीत सौ ग़ज़ल। नागिन ...

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नवगीत : ये दुनिया है भूलभुलैया
ये दुनिया है भूलभुलैया रची भेड़ियों ने भेड़ों की खातिर पढ़े लिखे चालाक भेड़िये गाइड बने हुए हैं इसके ओढ़ भेड़ की खाल जिन भेड़ों की स्मृति अच्छी है उन सबको बागी घोषित कर रंग दिया है लाल फिर भी कोई राह न पाये इस डर के मारे छोड़ रखे मुखबिर भेड़ समझती अपने तन पर खून पसी...

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ग़ज़ल : जो करा रहा है पूजा बस उसी का फ़ायदा है
बह्र : ११२१ २१२२ ११२१ २१२२ जो करा रहा है पूजा बस उसी का फ़ायदा है न यहाँ तेरा भला है न वहाँ तेरा भला है अभी तक तो आइना सब को दिखा रहा था सच ही लगा अंडबंड बकने ये स्वयं से जब मिला है न कोई पहुँच सका है किसी एक राह पर चल वही सच तलक है पहुँचा जो सभी पे चल सका ह...

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नवगीता : नव वर्ष ऐसा हो
है यही विनती प्रभो नव वर्ष ऐसा हो एक डॉलर के बराबर एक पैसा हो ऊसरों में धान हो पैदा रूपया दे पाव भर मैदा हर नदी को तू रवानी दे हर कुँआ तालाब पानी दे लौट आए गाँव शहरों से हों न शहरी लोग बहरों से खूब ढोरों के लिये चोकर व भूसा हो कैद हो आतंक का दानव और सब दानव...

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ग़ज़ल : दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए
बह्र : 2122 1122 1122 22 दिल के जख्मों को चलो ऐसे सम्हाला जाए इसकी आहों से कोई शे’र निकाला जाए अब तो ये बात भी संसद ही बताएगी हमें कौन मस्जिद को चले कौन शिवाला जाए आजकल हाल बुजुर्गों का हुआ है ऐसा दिल ये करता है के अब साँप ही पाला जाए दिल दिवाना है दिवाने क...
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