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सज्जन धर्मेन्द्र
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लघुकथा : लोकतंत्र
एक गाँव में कुछ लोग ऐसे थे जो देख नहीं पाते थे, कुछ ऐसे थे जो सुन नहीं पाते थे, कुछ ऐसे थे जो बोल नहीं पाते थे और कुछ ऐसे भी थे जो चल नहीं पाते थे। उस गाँव में केवल एक ऐसा आदमी था जो देखने, सुनने, बोलने के अलावा दौड़ भी लेता था। एक दिन ग्रामवासियों ने अपना न...
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कविता : शून्य बटा शून्य
मैंने कहा आप बिल्कुल गलत कह रहे हैं उसने लिखा 20-20=30-30 फिर लिखा 2(10-10)=3(10-10) फिर लिखा 2=3(10-10)/(10-10) फिर लिखा 2=3 मैंने कहा शून्य बटा शून्य अपरिभाषित है आपने शून्य बटा शून्य को एक मान लिया है उसने कहा ईश्वर भी अपरिभाषित है मगर उसे भी एक माना जात...
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कविता : शून्य बटा शून्य
मैंने कहा आप बिल्कुल गलत कह रहे हैं उसने लिखा 20-20=30-30 फिर लिखा 2(10-10)=3(10-10) फिर लिखा 2=3(10-10)/(10-10) फिर लिखा 2=3 मैंने कहा शून्य बटा शून्य अपरिभाषित है आपने शून्य बटा शून्य को एक मान लिया है उसने कहा ईश्वर भी अपरिभाषित है मगर उसे भी एक माना जात...
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ग़ज़ल: कब तक ऐसे राज करेगा तेरी ऐसी की तैसी
कब तक ऐसे राज करेगा तेरी ऐसी की तैसी तू केवल पूँजी का चमचा तेरी ऐसी की तैसी पाँच साल होने को हैं अब घर घर जाकर देखेगा करती है कैसे ये जनता तेरी ऐसी की तैसी खाता भर भर देने का वादा करने वाले तूने खा डाला जो खाते में था तेरी ऐसी की तैसी बापू का नाखून नहीं तू ...
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