Profile cover photo
Profile photo
Priyambara Buxi
65 followers -
तवंगरी बदिलस्त न बमाल, बुजुर्गी बअकलस्त न बसाल।
तवंगरी बदिलस्त न बमाल, बुजुर्गी बअकलस्त न बसाल।

65 followers
About
Priyambara's posts

Post has attachment
वक़्त की क़ैद में ज़िन्दगी है मगर...
राह कंटीली और पथरीली, हौस’ला टूट रहा है, जिस्म-रूह-अहसास-बंधन,सबकुछ छूट रहा है। सुर्ख सपने और फूल सुनहरे, ये तो बीती बातें हैं, कथा-कहानी, खेल पुराने, खो गई ये सौगातें हैं। मौत लगे है अब रूमानी, आँखों से न गिरता पानी। दुःख-चिंता से टूटा नाता, राग-रंग अब कुछ...

Post has attachment
‘आई ऍम फैन युसु’
  इ सी साल अप्रैल में चीन की फैन युसु चर्चा में आयी। आत्मकथात्मक निबंध ‘आई ऍम फैन युसु’ के ऑनलाइन प्रकाशन के साथ ही इसकी लेखिका फैन युसु रातोरात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँच गयी हैं। ये घटना इसी वर्ष अप्रैल की है, जब घरेलु सहायिका के तौर पर कार्य करने वाली फै...

Post has attachment
ख्वाहिशें !
ह र रोज़ कानों में फूँक देते हो अनगिनत ख्वाहिशें  ! कहाँ से लाऊँ वो जादुई छड़ी - जो पूरी कर सके तुम्हारे सारे ख्वाब जो रात के अँधेरे को बदल दे भोर की पहली किरण में सूखे पेड़ में फिर से जान फूँक दे  तपते सूरज को भी शीतलता की छाँव दे दे खामोश होती गौरैयों को फिर...

Post has attachment
मनुष्य एक सामाजिक नहीं सामूहिक प्राणी है!
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी नहीं बल्कि मनुष्य एक सामूहिक प्राणी है। पहले जाति विशेष का समूह, फिर धर्म विशेष, फिर गाँव विशेष, शहर विशेष, क्षेत्र विशेष, राज्य विशेष, भाषा विशेष, देश विशेष, विचारधारा विशेष- सुविधानुसार हम सब अपने-अपने समूह में शामिल रहते हैं। इतन...

Post has attachment
सपने ही तो हैं...
इन दिनों अक्सर कुछ अजीब सा सपना आता है। कभी उन सपनों में राजस्थान की तंग गलियों में लोगों से रास्ता पूछते हुए खुद को नंगे पाँव अकेले चलते हुए देखती हूँ, तो कभी ऐसी जगह खुद को देखती हूँ, जहां चारों ओर सिर्फ बर्फ है। उस दौरान मैं अपने ऊपर गिरते बर्फ के फाहों ...

Post has attachment

Post has attachment
कहानी 'समानांतर' का प्रकाशन
आज ये कहानी भी मिल गई, जिसने मेरे अंदर ये आत्मविश्वास जगाया कि मेरा लिखा प्रकाशन योग्य है...प्रथम कहानी जिसके प्रकाशन पर मेहनताना भी मिला था.... http://www.grihshobha.in/parallel-1998 © 2008-09 सर्वाधिकार सुरक्षित!

Post has attachment
प्रकाशित कहानी 'सीलन'
संपादक का धन्यवाद... http://www.sarita.in/story/seelan कोई भीड़ नहीं, ना हीं कोई कारवाँ, धीमी गति से अग्रसर हूँ...कदम दर कदम😊😊...कहानी लेखन के लिए जिसने ज़ोर दिया था, प्रेरित किया था, अचानक गायब हो गया, सोची थी अब लिख नहीं पाऊँगी कभी, लेकिन लेखन अब भी जारी ...

Post has attachment
यादें...
उन दिनों भी सकरात के बाद ऐसी ही धूप हुआ करती। हम बच्चे छत पर धमा चौकड़ी करते। मम्मी और पड़ोस की चाचियाँ छत पर बैठ कर या तो आचार के लिए निम्बू घिसती या फिर साग तोड़ती। निम्बू घिसने के चलते आस पास का हिस्सा पीला पड़ जाता था।हमें भी कहा जाता पर हम बचपन से ही कामचो...

Post has attachment
मृगमरीचिका
एक दिन- फूल बेरंग होंगे और बारिश सूखी चिड़ियाँ नहीं सुनाएंगी गीत कोई गिलहरी मुझसे नहीं बतियाएगी पौधे मुझे देखकर झूमेंगे नहीं । वितृष्णा से गुज़रते हुए तब, मैं गढ़ लूँगी अपनी दुनिया- तुम्हारी तरह । करुँगी सबसे बातें कि जैसे कर रही हूँ मैं बातें, खुद से। वहाँ हर...
Wait while more posts are being loaded