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Srijan Shilpi
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कहते हैं कि एक चित्र हजार शब्दों के बराबर अभिव्यक्ति करने में सक्षम होता है। मगर जब वह चित्र मौन को अभिव्यक्त करे तो …? उसके बराबर अभिव्यक्ति की क्षमता कितने शब्दों में होगी? अपनी कुछ पोस्टों में मैंने मौन को समझने और अभिव्यक्त करने के प्रयास किए हैं। लेकिन यदि आप अक्षय के इन चित्रों को देखें तो पता चलेगा कि शब्दों के बनिस्पत चित्र उसे कितने बेहतर अभिव्यक्त कर सकते हैं:

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आज, जबकि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाने वाले लोग भी अपने-अपने ट्रस्ट और एनजीओ में फंड के हेर-फेर के मामले में कई तरह के सवालों के घेरे में आ रहे हैं, यह और भी जरूरी हो जाता है कि हम ट्रस्टीशिप के एक ऐसे मॉडल पर विमर्श करें, जो गांधीजी के आदर्शों के अनुरूप हो और वर्तमान दौर के लिए व्यावहारिक भी हो।

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“The truth is that power resides in the people and it is entrusted for the time being to those whom they may choose as their representatives. Parliaments have no power or even existence independently of the people. Civil Disobedience is the storehouse of power.” गांधीजी के इस कथन से सरकार सहमत नहीं है, पर क्यों, यह बताने के लिए वह तैयार नहीं है।
A.G. NOORANI warns us of being “unsafe and unhistorical to cite the Gandhian precedent before independence” (“Gandhi's no to satyagraha”,Frontline, August 26).My rejoinder (Satyagraha) to this has been published in the current issue of Frontline (link given below)

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