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Vimalendu Dwivedi
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हिन्दी सिनेमा में होली के रंग
होली और ईद, भारत के दो ऐसे धार्मिक पर्व हैं, जिनमें धार्मिक आग्रह
बहुत कम, और उल्लास एवं कुंठाओं के निरसन का भाव ज्यादा होता है। होली के साथ
प्रहलाद-होलिका की कथा को अगर हम धर्म-तत्व से जोड़ कर देखें तो भी होली की पहचान
इस कथा से नहीं बल्कि उसके रंगों से है...

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ज़िन्दगी लाइव: फंतासी झूठ नहीं, संभावना है !
उपन्यास - कला पर मिलान कुन्देरा
ने एक जगह लिखा है- “ उपन्यास यथार्थ का नहीं, अस्तित्व का परीक्षण करता है। अस्तित्व, घटित का
नहीं होता, वह मानवीय संभावनाओं का आभास है। जो मनुष्य हो सकता है, जिसके लिए वह
सक्षम है। उपन्यास-लेखक खोज के जरिए मानवीय संभावनाओं के ...

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मीडिया और नंगा राजा
आपको वह कहानी याद होगी जिसमें एक सनकी राजा नंगा होकर नगर की गलियों
से गुजरते हुए प्रजा से पूछता है कि उसके कपड़े कैसे है ! लोग जवाब देते हैं-
अद्भुत ! तभी कोई बच्चा बोल देता है- राजा नंगा है !  राजा नंगा है !  राजा के सिपाही बच्चे को पकड़ कर कैदखाने में
डाल...

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नास्तिकों से कौन डरे है !
हमारे देश में नास्तिकता पर बात करना जितना
आसान है, नास्तिकों की पहचान उतना ही कठिन है. यह कठिनाई  नास्तिकता की परिभाषा और
उसके लोक-प्रचलित अर्थ में विभेद के कारण पैदा होती है. आमतौर पर स व्यक्ति को
नास्तिक माना जाता है जो ईश्वर को नहीं मानता और उससे संबन्धि...

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मैं कवियों में प्रिंट मीडिया का कवि हूँ !
[ योगेश्वर बोले ही चले जा रहे थे---- मैं प्रकाशों में सूर्य हूँ। वेदों में सामवेद, देवों में इन्द्र, रुद्रों में शिव हूँ। पर्वतों में मेरु, पुरोहितों में बृहस्पति, वाणी में ओंकार, वृक्षों में अश्वत्थ, देवर्षियों में नारद, घोडों में उच्चैःश्रवा, हाथियों में ...

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' बदनाम औरतों के नाम प्रेमपत्र '
                 1. रात गये     इनकी देह में फूलता है हरसिंगार जो सुबह एक उदास सफेद चादर में तब्दील हो जाता है. इनके तहखानों में पनाह लेते हैं उन कुलीन औरतों के स्वप्न-पुरुष जिनकी बद् दुआओं को अपने रक्त से पोषती हैं ये. इनकी कमर और पिण्डलियों में कभी दर्द न...

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ई पुस्तक-मेला बड़ा इनफीरियारिटी दे रहा है केशव !!
[ धर्मयुद्ध का पांचवाँ दिन । अर्जुन को उरई (बैलों को हाँकने वाली नुकीली छड़ी) से ठेलते-ठालते, श्रीकृष्ण फिर ले आए कुरुक्षेत्र में लड़ाने । दोनों ओर की सेनाएँ पहले ही पहुँच चुकी थी । युद्ध आरंभ होने में विलंब होता देख, अधिकांश योद्धा, साथ लाई पुस्तकें उलट-पल...

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आवाज़ भी एक ज़गह है...!
मंगलेश डबराल की कविता ‘ छुपम-छुपाई ‘ की एक पंक्ति है— “ आवाज़ भी एक ज़गह है, जहां छुपा जा सकता
है..... ” . एक साल पहले जब जगजीत का गाना हमेशा के लिए बन्द
हो गया तब से यह पंक्ति लगातार ज़हन में बनी हुई है. लगातार ये लगता रहा कि जगजीत
अपनी ही आवाज़ के पीछे कह...

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तुम दूर भी उतनी ही हो..
वैसे तुम मुझसे दूर भी उतनी ही हो जितनी आँखो से दूर होती है नींद जितना पृथ्वी से दूर है चन्द्रमा. जितना बीज से दूर होता है पेड़ जितनी घंटियों से दूर है उनकी गूँज जितना जहाज़ से दूर है तट. जितनी आँगन से दूर है गौरैया जितनी होठों से दूर है मुस्कान जितनी हीरे स...
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