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Ram Bansal
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The Only One to Understand Vedic Sanskrit and Interpret Vedic Scriptures
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My Mission & Vision

In the year 1992, there arose an idea of a new mission - It is being said that Vaidic scriptures contain very important and useful knowledge but none has brougt to light that knowledge. Therefore, these scriptures are merely revered for the last 2000 years. I decided either I bring out that knowledge for common use or dump these scriptures forever. After researches of a few years, I realized that these scriptures truly contain important knowledge scripted in Vaidic Sanskrit.

Whosoever tried to work on these scriptures, they translated these based modern Sanskrit and misguided people to run their illicit business of religion and spirituality. None tried to discover Vaidic Sanskrit. Hence, the first part of my mission came to be the understanding of Vaidic Sanskrit.

About 5 years back, I realized that these very scriptures contain coded information on Vaidic Sanskrit too apart from their principal subject matter. Important scripture of this type which have come to my notice are Shreemadbhagawadgeetaa, Shreemadbhaagawat, Vishnupuraana, Bhaavaprakaash, Arthashaastra, etc.

Many misleading translations of Bhaavaprakaash are in circulation presently, and these are being used as foundation for currently practiced Aayurveda. As my investigations go, 70 percent of such translations are defective, hence the currently practiced Aayurveda too is erroneous. So much so that many harmful and poisonous materials are being prescribed to people as foods and medicines.

In accordance to knowledge provided in Bhaavaprakaasha, a person can live active and healthy for about 300 years. Hence, I am too desirous of living for about 250 years active and healthy using prescriptions of Bhaavaprakaasha. Today, I am fully confident of achieving my target.

Today, I have finished the first phase of my work on Bhaavaprakaasha, under which first half of original text of Bhaavaprakaasha inde 48 sections has been published on the Internet as a reference source for all those interested in the subject. This may be reached using this link -
https://vaidicscriptures.blogspot.in/p/bhavaprakasha-contents.html

Soon, a vast alphabetic word index of Bhaavaprakaasha would be published on the same blog. A dictionary containing word-meaning of Vaidic Sanskrit shall also be published here. In the next phase of my mission, Hindi and English translations of Bhaavaprakaash section would be published in form of Books.

Ram Bansal

सन 1992 में एक मिशन पर कार्य करने का विचार उदय हुआ था - कहा जाता रहा है कि वेद-शास्त्रों में अत्यधिक महत्वपूर्ण ज्ञान समाहित है, किन्तु कहीं भी किसी ने भी उस ज्ञान को प्रकाशित नहीं किया। इसलिए विगत लगभग 2000 वर्षों से इन ग्रंथों पर केवल फूल-मालाएं चढ़ाई जाती रही हैं. मैंने निश्चय किया कि या तो इनके वास्तविक ज्ञान को प्रकाशित करूँ या फिर इन्हें सदा के लिए कूड़ेदान में फेंक दूँ. कुछ वर्षों के अनुसंधानों से आभास हुआ की वेदों और शास्त्रों में वास्तविक वैज्ञानिक ज्ञान प्रदान किया गया जो वैदिक संस्कृत भाषा में लिखे गए थे.

जिन्होंने इस दिशा में कुछ किया वे इन ग्रंथों के भ्रांत अनुवाद आधुनिक संस्कृत के आधार पर करते रहे और अपने धर्म एवं आध्यात्मिक धंधे चलाते रहे हैं. इन ग्रंथों की मूल भाषा वैदिक संस्कृत का किसी ने भी अन्वेषण नहीं किया. अतः मेरे मिशन का प्रथम चरण वैदिक संस्कृत का अन्वेषण बन गया.

लगभग ५ वर्ष पूर्व इन्ही ग्रंथों से वैदिक संस्कृत के मूल तत्त्वों का आभास मिला. जो प्रमुख ग्रन्थ मेरे संज्ञान में आये हैं उनमें श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, विष्णुपुराण, भावप्रकाश, अर्थशास्त्र, आदि हैं. स्वास्थ्य का विषय इन सभी में प्रमुख रूप से प्रदत्त है किन्तु भावप्रकाश इस विषय की वैज्ञानिक एवं सटीक प्रस्तुति है. मेरे मिशन में भावप्रकाश का सटीक अनुवाद प्राथमिकता के रूप में सम्मिलित है.

भावप्रकाश के अनेक अनुवाद प्रचलित हैं जिन्हें वर्तमान आयुर्वेद के आधार के रूप में उपयोग किया जा रहा है. मेरे अन्वेषणों के अनुसार ये अनुवाद लगभग ७० प्रतिशत दोषपूर्ण हैं अतः वर्तमान आयुर्वेद व्यवहार भी दोषपूर्ण है. यहां तक कि अनेक विषमय द्रव्यों को भोजन एवं औषधियों के रूप में लोगों को खिलाया जा रहा है.

भावप्रकाश में समाहित आयुर्वेद विषयक ज्ञान के अनुसार मनुष्य ३०० वर्षों तक स्वस्थ एवं सक्रिय जीवन जी सकता है. इसी ज्ञान का अनुपालन कर मैं भी लगभग २५० वर्ष तक सक्रिय एवं स्वस्थ जीवन की अभिलाषा रखता हूँ एवं इसमें सफल होने के आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा हूँ.

भावप्रकाश पर कार्य का प्रथम चरण आज पूरा किया है. जिसके अंतर्गत इस विशाल ग्रन्थ के प्रथमार्द्ध भाग के मूल पाठ्य को एक स्रोत सामग्री के रूप में इंटरनेट पर प्रकाशित कर दिया है, जो 48 भागों में विभाजित है. इसे अधोलिखित लिंक के माध्यम से पाया जा सकता है - https://vaidicscriptures.blogspot.in/p/bhavaprakasha-contents.html

शीघ्र ही भावप्रकाश का विशाल शब्द संग्रह वर्णमाला क्रम में इसी ब्लॉग पर प्रकाशित किया जाएगा। वैदिक संस्कृत शब्दकोष भी यहीं प्रकाशित होगा. आगे के चरणों में भावप्रकाश के भागों के हिंदी एवं इंग्लिश अनुवाद पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किये जायेंगे.

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