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Digamber Naswa
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जागती आँखों से स्वप्न देखना मेरी फितरत है.
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आज भीड़ द्वारा लगाईं गयी है इसलिए इसे आपातकाल नहीं मानते ...
बहुत खूब है रचना ...

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गिरती पड़ती लहरों के सहारे
जाना चाहता हूं समय की चट्टान के उस पार
जुड़ती है सीमा नए आकाश की जहाँ
स्वार्थ से अलग, प्रेम से जुदा
गढ़ सकूँ जहाँ अपने लिए नई दुनिया
के जीना चाहता हूं कुछ पल सुकून के
जंगली गुलाब की यादों से अलग ...

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सुन्दर फोटो और बहुत अच्छी जानकारी करणी माता मंदिर की ...

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अनगिनत यादों के काफिले गुज़र गए इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर
जाने कब छिल गयी घर जाने वाली सड़क की बजरी
पर बाकी है, धूल उड़ाती पगडण्डी अभी
कैसे मान लूं की रिश्ता टूट गया ...

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मन से मन को समझाते हुए ... खंडित से अखंड की और ले जाते हुए भाव ... और हो भी क्यों न ... आखिरकार मन को खुद ही समझाना होता है ... इस अवसाद से बाहर आना होता है ... सुन्दर रचना है ...

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जीवन माया है ... सब और फैली लुभावनी माया खींचेगी अपनी तरफ पर इस तन्द्रा से खुद को तोड़ना होगा मुसाफिर तुझे, जागना होगा इस निद्रा से तुझे ... आह्वान करती है स्वयं से रचना ... सत्य को देखने की और प्रेरित करती है ... बहुत भावपूर्ण ध्रुव जी ...

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प्यार भी दुश्वार है दुनियाँ की नजर में
साहिल पे बहुत शोर है चल बीच भंवर में ... वाह ... धमाकेदार मतला ... ग़ज़ल की टोन सेट कर दी इस शुरूआती शेर ने ही ... प्यार को दुनिया ने न समझा है न समझेगी ... बीच भंवर ही जा के ये पेवान चढ़ता है ... दुनिया साहिल पे खड़े रह कर बस शोर मचाती है ...

इक शख़्स अपनी हार से इतना ख़फा हुआ
कहता है जहर और दे कश्कोले-जहर में .... हार कई बार दूभर हो जाती है सहनी ... और जो अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाता अक्सर गहरे अँधेरे में चला जाता है और न चाहते हुए भी जहर में डूब जाता है ...

सोचता था तेरे नाम का एक शेर लिखूंगा
आज तक उलझा रहा ग़ज़लों के बहर में ... वाह क्या बात कही है ... ये सच है अक्सर बंधनों में अपने आपको बाँध कर उसी में फंस के रह जाते हैं लोग ... उलझ जाते हैं ओपचारिकता के बंधन में और भूल जाते हैं की क्या करना चाहते थे ... ये मैंने भी अक्सर महसूस किया है अपने ग़ज़ल के शुरूआती सफर में ... और अपने आपसे विवाद करता था की जो कहना चाहता हूँ वही कहूँगा चाहे बहर में हो या नहीं ... जिंदाबाद ... जिंदाबाद ...

लौट के आना था सो मैं आ गया मगर
मेरी रूह तड़पती है मुकद्दर के शहर में ... मजबूरियाँ कई बार सबसे हसीन लम्हों के पास से भी दूर खींच के ले आती हैं ... पर दिल का क्या करें वो तो वहीं रह जाता है ... उस मुकद्दर के शहर में ... लाजवाब शेर ग़ज़ल का ....

हम सब को लूट कर वो विलायत चला गया
अक़्सर दिखाई देता है दुनियां की ख़बर में ... गज़ब ... ये व्यंग की तेज़ धार है छोटा सा उलाहना ... पर जैसे मासूम दिल की आह है ... जो दुनिया का है आज सबका है हमारा चितचोर है ... प्रतीकात्मक शेर पर कमाल के भाव जगाता है ...

पत्थर चलाये जा रहे एक दूसरे पे सब
सूझता है कुछ नहीं जुल्मत के कहर में ...जुल्म का आतंक जब चलता है तो कुछ कहाँ दिखाई देता है ... अपने पराये का फर्क भी नज़र नहीं आता और सब उस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं ... इस कहर को बाखूबी बयान करता हुआ शेर है राजेश जी ...

मुतमइन हूँ बादशाह के हर फैसले से मैं
एक उम्मीद दिख रही है पैगामे-शजर में ... आशा और उम्मीद के भाव लिए इस आखरी शेर के क्या कहने ... यही उम्मीद है जो प्रेरित करती है नए फैंसले लेने को ... सकारात्मक सोच का आइना है ये शेर ... बहुत हो लाजवाब शेर ...

इस खूबसूरत ग़ज़ल की बहुत बहुत बधाई राजेश जी ... नए प्रतिबिम्ब की खोज करते शेर बहुत देर तक ज़हन में घूमते रहते हैं .... दिल से दाद कबूल करें इस मुकम्मल ग़ज़ल पर ...

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धीरे धीरे इंसान पर किसी को दर्द दे रहा है ... प्राकृति के साथ खेल रहा है ...

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भावमय ... माँ के ह्रदय में भावनाएं ही रहती हैं अपने बच्चों के लिए ... हर पल दुआएं मानती है माँ ... सुन्दर रचना ...

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जो चीज मिल जाती है उसका महत्त्व कम और फिर खत्म भी हो जाता है ... इंसान जहाँ नहीं होता वाही जगह जाना चाहता अहि और अच्छी लगती है ... फिर बच्चे तो बच्चे हैं माँ बाप, घर भाई बहन से कहाँ दूर रह पाते हैं ...
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