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Shahid Ajnabi
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दरकता लोकतंत्र
    आप जो हर रोज़ लोकतंत्र - लोकतंत्र कहते हैं मुझे समझ नहीं आता. आप मुझे अजीब कह सकते हैं .आपके पास हक़ है, अधिकार है. बिल्कुल कहिये. किसी भी विचारधारा को मान सकते हैं आप लेकिन दूसरी धाराओं को पढ़ लेने में कोई बुराई नहीं है. इनसे दिमाग के दरवाजे खुलते हैं और ...
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कोई लौटा दे वो नोटबन्दी वाले दिन ......
   तुम्हें याद हो कि न याद
हो, उस दिन हम दिल्ली से सफ़र करके थक के चूर हो गए थे l पूरे देश में अफरा – तफरी और
हड़बड़ी मची हुई थी l पांच सौ और हजार के नोट न हो गए हों, कोई घर का कबाड़ हो जिसे
हम जल्दी से कबाड़ी को दे देना चाहते हों l    याद है, लेकिन हम सुकून में...
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Senior Poet Dr. Hari Mohan Gupta With Shahid Ajnabi
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- इबारत हक़ीकत की

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जब थकके सो जाती है माँ
मौत की आगोश में , जब थकके सो जाती है माँ तब कहीं जाकर "रज़ा" थोडा
सुकूँ पाती है माँ   फ़िक्र में बच्चों की
कुछ इस तरह घुल जाती है माँ नौजवां होते हुए बूढी नज़र आती है माँ   कब ज़रूरत हो मेरी
बच्चों को इतना सोचकर जागती रहती हैं आँखें और सो जाती है माँ पहले बच्चो...
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