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रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-07-2017) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in/"> "अद्भुत अपना देश" (चर्चा अंक 2680) </a> पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-07-2017) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in/"> "अद्भुत अपना देश" (चर्चा अंक 2680) </a> पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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गुरुवार, 27 जुलाई 2017
दोहे "नागपंचमी-अद्भुत अपना देश"

श्रावण शुक्ला पञ्चमी, बहुत खास त्यौहार।
नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार।१।
--
महादेव ने गले में, धारण करके नाग।
विषधर कण्ठ लगाय कर, प्रकट किया अनुराग।२।
--
दुनिया को अमृत दिया, किया गरल का पान।
जो करते कल्याण को, उनका होता मान।३।
--
अद्भुत अपनी सभ्यता, अद्भुत अपना देश।
दया-धर्म के साथ में, सजा हुआ परिवेश।४।
--
खग-मृग, हिल-मिल कर रहे, दुनिया रहे निरोग।
नागदेव रक्षा करें, निर्भय हों सब लोग।५।
--
पूरी निष्ठा से करो, अपने-अपने कर्म।
जीवों पर करना दया, सिखलाता है धर्म।६।
--
मन्दिर-मस्जिद-चर्च की, नहीं हमें दरकार।
पंडित-मुल्ला-पादरी, बने न ठेकेदार।७।
--
जो कण-कण में रम रहा, वो है मालिक एक।
धर्मपरायण सब रहें, बने रहें सब नेक।।
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मन में कभी न लाइए, ऊँच-नीच का भेद।
नौका में करना नहीं, जान-बूझ कर छेद।८।
--
वैज्ञानिकता से भरा, पर्वों का विन्यास।
ये देते हैं ऊर्जा, लाते हैं उल्लास।९।
--
http://uchcharan.blogspot.in/2017/07/blog-post_90.html 

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दोहे "नागपंचमी-अद्भुत अपना देश"
श्रावण शुक्ला पञ्चमी, बहुत खास त्यौहार। नागपञ्चमी आज भी, श्रद्धा का आधार।१। -- महादेव ने गले में, धारण करके नाग। विषधर कण्ठ लगाय कर, प्रकट किया अनुराग।२। -- दुनिया को अमृत दिया, किया गरल का पान। जो करते कल्याण को, उनका होता मान।३। -- अद्भुत अपनी सभ्यता, अद्...

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गुरुवार, 27 जुलाई 2017
दोहे "बन बैठे अधिराज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहयोगी करने लगें, जब कुछ ओछे कर्म।
पल्ला उनसे झाड़ना, सबसे अच्छा कर्म।।

हो जाये जब भुनन में, तारा ताराधीश।
तब विवेक से काम को, करता है नीतीश।।

तेजस्वी का बन गया, घोटाला नैमित्त।
एक चाल से ही किया, लालू जी को चित्त।।

सत्ता पाने के लिए, किया पुराना काज।
फिर से पाला बदल कर, बन बैठे अधिराज।।

जनमत की किसको यहाँ, रहती है परवाह।
राजनीति के मूल में, कुरसी की है चाह।।
--
http://uchcharan.blogspot.in/2017/07/blog-post_27.html
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गुरुवार, 27 जुलाई 2017
दोहे "बन बैठे अधिराज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सहयोगी करने लगें, जब कुछ ओछे कर्म।
पल्ला उनसे झाड़ना, सबसे अच्छा कर्म।।

हो जाये जब भुनन में, तारा ताराधीश।
तब विवेक से काम को, करता है नीतीश।।

तेजस्वी का बन गया, घोटाला नैमित्त।
एक चाल से ही किया, लालू जी को चित्त।।

सत्ता पाने के लिए, किया पुराना काज।
फिर से पाला बदल कर, बन बैठे अधिराज।।

जनमत की किसको यहाँ, रहती है परवाह।
राजनीति के मूल में, कुरसी की है चाह।।
--
http://uchcharan.blogspot.in/2017/07/blog-post_27.html 

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दोहे "बन बैठे अधिराज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सहयोगी करने लगें, जब कुछ ओछे कर्म। पल्ला उनसे झाड़ना, सबसे अच्छा कर्म।। हो जाये जब भुनन में, तारा ताराधीश। तब विवेक से काम को, करता है नीतीश।। तेजस्वी का बन गया, घोटाला नैमित्त। एक चाल से ही किया, लालू जी को चित्त।। सत्ता पाने के लिए, किया पुराना काज। फिर स...

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बुधवार, 26 जुलाई 2017
गीत "झंझावातों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मानव दानव बन बैठा है, जग के झंझावातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

होड़ लगी आगे बढ़ने की, मची हुई आपा-धापी,
मुख में राम बगल में चाकू, मनवा है कितना पापी,
दिवस-रैन उलझा रहता है, घातों में प्रतिघातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

जीने का अन्दाज जगत में, कितना नया निराला है,
ठोकर पर ठोकर खाकर भी, खुद को नही संभाला है,
ज्ञान-पुंज से ध्यान हटाकर, लिपटा गन्दी बातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

मित्र, पड़ोसी, और भाई, भाई के शोणित का प्यासा,
भूल चुके हैं सीधी-सादी, सम्बन्धों की परिभाषा।
विष के पादप उगे बाग में, जहर भरा है नातों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।

एक चमन में रहते-सहते, जटिल-कुटिल मतभेद हुए,
बाँट लिया गुलशन को, लेकिन दूर न मन के भेद हुए,
खेल रहे हैं ग्राहक बन कर, दुष्ट-बणिक के हाथों में।
दिन में डूब गया है सूरज, चन्दा गुम है रातों में।।
--
http://uchcharan.blogspot.in/2017/07/blog-post_26.html 
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गीत "झंझावातों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मानव दानव बन बैठा है ,  जग के झंझावातों में। दिन में डूब गया है सूरज ,  चन्दा गुम है रातों में।। होड़ लगी आगे बढ़ने की ,  मची हुई आपा-धापी , मुख में राम बगल में चाकू ,  मनवा है कितना पापी , दिवस-रैन उलझा रहता है ,  घातों में प्रतिघातों में। दिन में डूब गया है...

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Wednesday, July 26, 2017
पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है; चर्चामंच 2678

पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है
रविकर
"कुछ कहना है"
पतन होता रहा फिर भी बहुत पैसा कमाया है ।
किया नित धर्म की निन्दा, तभी लाखों जुटाया है।
सहा अपमान धन खातिर, अहित करता हजारों का
पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है।।
गुटर गूं के अतिरिक्त नहीं है जीवन
smt. Ajit Gupta
अजित गुप्‍ता का कोना
कित गए बदरा पानी वारे ?
Alpana Verma अल्पना वर्मा
Vyom ke Paar...व्योम के पार

चीन और कम्युनिस्टों की भाषा एक-सी
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ब्लॉगिंग : कुछ जरुरी बातें...3
केवल राम
चलते -चलते.

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 2
गौतम राजऋषि
पाल ले इक रोग नादां...

...जरूरी नहीं कि वो भी आपको उतना ही प्यार करते हों,
जितना आप उन्हें प्यार करते हैं
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Information2media

वक़्त ज़िंदगी और नैतिकता ...
क्या सही क्या गलत ...
खराब घुटनों के साथ
रोज़ चलते रहना
ज़िंदगी की जद्दोजहद नहीं
दर्द है उम्र भर का ...
एक ऐसा सफ़र
जहाँ मरना होता है रोज़ ज़िंदगी को ...
ऐसे में ...
सही बताना क्या में सही हूँ ...

स्वप्न मेरे ...पर Digamber Naswa
मुठ्ठी भर ...


Sunehra Ehsaas पर

Nivedita Dinkar
गाजे घन...
घनन घनन घन गाजे घन सन सन
सनन समीर छनन छनन छन
पायलें कल कल नदिया नीर
कुहू कुहू कुक कोयली पिहू पिहू मित मोर
हर रही चित चंचल को सुखद सुहानी भोर
अंबर तक उड़ता आँचल लहरे
मन के तीर. घनन घनन घन....

कविता मंच पर KL SWAMI
क्यों बनें घुमक्कड़?
(Why To Be A Traveller)


TRAVEL WITH RD
Laxmirangam:
इस गली में आना छोड़ दो

आपका ब्लॉग
अजेय
दुनिया में कुछ भी अजेय नहीं
वह जो अजेय है मात्र है एक दंभ...

सरोकार पर Arun Roy
सिर्फ प्रवेश ना करने देने से ही
शिवजी ने बालक का वध नहीं किया होगा


कुछ अलग सा पर गगन शर्मा
शब्द से ख़ामोशी तक –
अनकहा मन का (१२)


बावरा मन पर

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'वो सफ़र था कि मुकाम था' -
मेरी नज़र से

ज़ख्म…जो फूलों ने दिये पर
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आँखों की उदास पुतली और नमीं

मेरे मन की पर

अर्चना चावजी
Archana Chaoji
सचबयानी

अंदाज़े ग़ाफ़िल पर

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
एक शाश्वत सत्य ...निधि सक्सेना
yashoda Agrawal
मेरी धरोहर
कार्टून :- चलो टैंक उगाएं
Kajal Kumar
Kajal Kumar's Cartoons
काजल कुमार के कार्टून

गति ही जीवन है...
अनुपमा पाठक
अनुशील
गीत
"सावन की हरियाली तीज"
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
उच्चारण

चाँद दिखाई दिया दूज का,
फिर से रात हुई उजियाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली...


प्रस्तुतकर्ता रविकर चर्चा मंच पर Wednesday, July 26, 2017
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