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Ojaswani Sharma
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****शहीद****

यह सिर्फ एक कविता नहीं है, ये कुछ अलग अलग कविताओं का मिश्रण है जिसके माध्यम से मैं एक जवान (फौजी) के जीवन की एक छोटी सी झलक पेश कर रही हूँ।

मेरे अंदर इतनी काबिलियत तो नहीं है की मैं उनकी जीवन कथा बयां करूं, जितना वो करते है और जितना उनके घरवाले उन्हे करने देते है वो शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता।

ये काव्य तो बस एक छोटी सी कोशिश है। इसमें 4 अंश है, कृपया समय निकल कर चारो अंश पढ़ना।

प्रथम (पहला) अंश

गद्यांश
जब बेटा पैदा होता है, तब कितनी खुशी का माहौल होता है, उस माहौल को वर्णित करती ये कविता-

काव्यांश
"नन्ही किलकारी से चारो तरफ खुशियां है छाई,
बेटे के जन्म पर बाप ने मिठाई है बटवाई।

माँ बाप ने संजोके आँखों में सपने हज़ार,
न्योछावर कर दिया बेटे पर अपना प्यार।

बड़ा हुआ, अपने अंदर उसने एक जूनून पहचाना,
देश की रक्षा करना उसने अपना परम कर्तव्य माना।

माँ बाप के मन में यह कैसी व्यथा आयी,
आखिर कैसे भेज दे बेटे को सीमा पर करने लड़ाई।

फीकी पड़ गयी व्यथा बेटे के जूनून के आगे,
भेज दिया उसको सरहद पर बांध के मन्नतो के धागे।"


द्रितीय (दूसरा) अंश

गद्यांश
२२ साल उसने अपने घर के लिए फ़र्ज़ पूरे किए परन्तु अब उसे भारत माँ के प्रति अपने कर्तव्य पूरे करने थे। सब छोड़ जाना उसके लिए आसान नहीं था। वतन के लिए जंग में जाते वक्त उसके मन के भाव अपने परिवार के लिए इस कविता द्वारा-

काव्यांश
"चल पड़ा हूँ लड़ने देश के लिए मैं जंग,
माँ, होगी दिल में तू हर पल मेरे संग,

जब खून की होली सरहद पर खेली जाएगी,
पापा, तब आपकी प्यार वाली डाँट याद आएगी,

भूलकर सब जंग के लिए मैं तैयार हो जाऊँगा,
बहन, पर तेरे से किया हर वादा मैं निभाऊँगा,

पता नहीं मुझको कि क्या लिखा है जिंदगी में कल,
प्रिय, रहोगी दिल में मेरे तुम हर पल,

चली जाए अगर वहाँ वतन के लिए मेरी जान,
बच्चों, बनाए रखना तुम सदैव घर का मान,

भारत माँ के पुत्र होने का फर्ज बखूबी निभाऊँगा,
चलकर ना सही तो तिरंगे में लिपटकर वापस जरूर आऊँगा ।"

तृत्य (तीसरा) अंश

गद्यांश
घर में त्यौहार का माहौल है, आखिर हो भी क्यों ना, २ दिन बाद घर का चिराग सरहद से लौटने जो वाला है। सब बहुत खुश है, घर में रिश्तेदार आए हुए है तभी अचानक कुछ खबर आती है और माहौल पूरा बदल जाता है।

काव्यांश
"फिर अख़बार के पन्नो पर यह पैगाम आया है,
फिर एक शहीद का बलिदान आया है।

फिर सबका खून खौल उठा है,
फिर ये सोशल मीडिया बोल उठा है।

फिर सबने नारे शहीदों के नाम के लगाए है,
फिर उनके परिवार के साथ सबने कंधे मिलाये है।

2 दिन का जूनून ख़त्म हुआ, भूल गए सब कुर्बानी,
शहीदों के नाम की फिर छा गयी वो ही गुमनामी।"

चतुर्थ (चौथा) अंश

गद्यांश
माना की हम सभी ने दुःख की घड़ी में शहीदों के परिवार का बहुत साथ दिए, पर हमारा वो जूनून, वो साथ बस २ दिन का रह जाता है। जिनके लिए हम सभी नारे लगा रहे थे, अब हमे उनके नाम भी याद नहीं रहते। सबके बस एक ही नाम रह जाते है, शहीद

हम सब भूल जाते है और पहले की तरह ही अपने ज़िन्दगी व्यतीत करने लग जाते है, पर उनके परिवार वाले, उनके लिए ये सब कितना मुश्किल होता हैं, यह हम सोच भी नहीं सकते। वो हर दिन एक दर्द से गुजरते है जिसका हमे आभास भी नहीं है। इस कविता द्वारा एक छोटी सी कोशिश उस सब को दर्शाने की --


काव्यांश
"माँ का आँचल बेनाम हो गया,
बाप का सहारा कही गुमनाम हो गया।

करवाचौथ का चाँद अनजान हो गया,
राखी का बंधन बलिदान हो गया।

अंधेरो में खो गया बच्चो का वो अभिमान,
हमे रोशिनी देकर, एक और घर का चिराग हो गया कुर्बान।

वर्दी पहने बेटे ने अपना वादा बखूबी निभाया,
भारत माँ का पुत्र बन तिरंगे में लिपटकर वो वापस जरूर है आया।"
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चंद शब्दों में पिता के व्यक्तित्व को बयान कर दूँ, ऐसी ना मेरी काबिलीयत है तो ना उनकी की शख्सियत है जो यूँ ही बयान हो पाए।

मेरे द्वारा लिखी गई पिता के लिए यह कविता -

अभिमान हो आप हमारा, घर का स्वाभिमान हो।
हमारी खुशी से परिपूर्ण सुबह व शाम हो।।

पैरों पर खड़ा होना सिखाया, वो सहारा हो आप।
हमारी ख्वाहिशों का किनारा हो आप ।।

खुशी आपसे है तो घर का अनुशासन भी आप हो ।
घर की एकता का आश्वासन भी आप हो ।।

कंधे पर उठाए घर का दायित्व, वो ताकत हो आप ।
चलता जिससे यह घर, वो शान और शौकत हो आप ।।

गम को दिल में बसाए, चेहरे की मुस्कान है ।
वो मेरे पापा ही तो है जिनसे जग में हमारी पहचान है ।
जिनसे जग में हमारी पहचान है ।

#hindi_poem #hindi_poem_on_father #ojaswani_sharma
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माँ !!!!!!

सिर्फ एक शब्द नहीं, एक एहसास है माँ,
सबसे प्यारा अल्फाज़ है माँ ।।

हर जख्म की दवा है माँ,
हर मन्नत की दुआ है माँ ।।

संयम की मूर्ति है माँ,
ख्वाहिशों की पूर्ति है माँ ।।

मकान को घर बनाती है माँ,
उस घर को प्रेम से सजाती है माँ ।।

रोते बच्चे की पुकार है माँ,
खुशियों का संसार है माँ ।।

बच्चे की प्रथम मुस्कुराहट है माँ,
हर खुशी की आहत है माँ ।।

बच्चों की पहली शिक्षक है माँ,
उनकी सदैव रक्षक है माँ ।।

बच्चों की शक्ति है माँ,
हृदय की सच्ची भक्ति है माँ ।।

हमारे दर्द में रोती है माँ,
हम जागे तो वो भी ना सोती है माँ ।।

सहनशीलता की पराकाष्ठा है माँ,
हमारी हर पल आस्था है माँ ।।

आँचल में ममता सँवारे, ईश्वर का स्वरूप है माँ,
सिर्फ एक नहीं बल्कि अपने भीतर समाए हजारों रुप है माँ ।।

खुशनसीब है हम जो माँ हमारे संग है,
आखिर उन्हीं से तो हमारे जीवन में रंग है।।
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#Mantra_Chanting
A "mantra" is a sacred utterance, a numinous sound, a syllable, word or phonemes, or group of words in #Sanskrit believed by practitioners to have psychological and #spiritual powers.
A #chant from Latin cantare, "to sing" is the iterative speaking or singing of words or #sounds, often primarily on one or two main pitches called reciting tones. Chants may range from a simple melody involving a limited set of notes to highly complex musical structures, often including a great deal of repetition of musical subphrases, such as Great Responsories and Offertories of Gregorian chant. Chant may be considered speech, music, or a heightened or stylized form of speech.

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