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भारतीय ज्योतिष
ग्रहनक्षत्रों की गणना की वह पद्धति है जिसका भारत में विकास हुआ है। आजकल भी भारत में इसी पद्धति से पंचांग बनते हैं, जिनके आधार पर देश भर में धार्मिक कृत्य तथा पर्व मनाए जाते हैं। वर्तमान काल में अधिकांश पंचांग सूर्यसिद्धांत, मकरंद सारणियों तथा ग्रहलाघव की विधि से प्रस्तुत किए जाते हैं। कुछ ऐसे भी पंचांग बनते हैं जिन्हें नॉटिकल अल्मनाक के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है, किंतु इन्हें प्राय: भारतीय निरयण पद्धति के अनुकूल बना दिया जाता है।

प्राचीन भारत में ज्‍योतिष का अर्थ ग्रहों और नक्षत्रों की चाल का अध्‍ययन करने के लिए था, यानि ब्रह्माण्‍ड के बारे में अध्‍ययन। कालान्‍तर में फलित ज्‍योतिष के समावेश के चलते ज्‍योतिष शब्‍द के मायने बदल गए और अब इसे लोगों का भाग्‍य देखने वाली विद्या समझा जाता है।

फलित ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष शब्द का यौगिक अर्थ ग्रह तथा नक्षत्रों से संबंध रखनेवाली विद्या है। इस शब्द से यद्यपि गणित (सिद्धांत) ज्योतिष का भी बोध होता है, तथापि साधारण लोग ज्योतिष विद्या से फलित विद्या का अर्थ ही लेते हैं।

ग्रहों तथा तारों के रंग भिन्न-भिन्न प्रकार के दिखलाई पड़ते हैं, अतएव उनसे निकलनेवाली किरणों के भी भिन्न भिन्न प्रभाव हैं। इन्हीं किरणों के प्रभाव का भारत, बैबीलोनिया, खल्डिया, यूनान, मिस्र तथा चीन आदि देशों के विद्वानों ने प्राचीन काल से अध्ययन करके ग्रहों तथा तारों का स्वभाव ज्ञात किया। पृथ्वी सौर मंडल का एक ग्रह है। अतएव इसपर तथा इसके निवासियों पर मुख्यतया सूर्य तथा सौर मंडल के ग्रहों और चंद्रमा का ही विशेष प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी विशेष कक्षा में चलती है जिसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। पृथ्वी फलित ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष शब्द का यौगिक अर्थ ग्रह तथा नक्षत्रों से संबंध रखनेवाली विद्या है। इस शब्द से यद्यपि गणित (सिद्धांत) ज्योतिष का निवासियों को सूर्य इसी में चलता दिखलाई पड़ता है। इस कक्षा के इर्द गिर्द कुछ तारामंडल हैं, जिन्हें राशियाँ कहते हैं। इनकी संख्या है। मेष राशि का प्रारंभ विषुवत् तथा क्रांतिवृत्त के संपातबिंदु से होता है। अयन की गति के कारण यह बिंदु स्थिर नहीं है। पाश्चात्य ज्योतिष में विषुवत् तथा क्रातिवृत्त के वर्तमान संपात को आरंभबिंदु मानकर, 30-30 अंश की 12 राशियों की कल्पना की जाती है। भारतीय ज्योतिष में सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु ही मेष आदि की गणना की जाती है। इस प्रकार पाश्चात्य गणनाप्रणाली तथा भारतीय गणनाप्रणाली में लगभग 23 अंशों का अंतर पड़ जाता है। भारतीय प्रणाली निरयण प्रणाली है। फलित के विद्वानों का मत है कि इससे फलित में अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि इस विद्या के लिये विभिन्न देशों के विद्वानों ने ग्रहों तथा तारों के प्रभावों का अध्ययन अपनी अपनी गणनाप्रणाली से किया है। भारत में 12 राशियों के 27 विभाग किए गए हैं, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। ये हैं अश्विनी, भरणी आदि। फल के विचार के लिये चंद्रमा के नक्षत्र का विशेष उपयोग किया जाता है।

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सोमवती अमावस्या, जानें कब से कब तक है मुहूर्त, क्या है महत्व

4 फरवरी को मौनी अमावस्या है क्योकि ये अमावस्या सोमवार के दिन पड़ रही है लिहाज़ा ये सोमवती अमावस्या कहलाएगी और इसीलिए इसका महत्व भी कई गुना बढ़ गया है। सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को ही सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस बार सोमवती अमावस्या मौनी अमावस्या के दिन है और बेहद ही दुर्लभ संयोग है। सोमवती अमावस्या का हिंदू धर्म में बेहद ही विशेष महत्व होता है। चूंकि ये सोमवार के दिन होती है लिहाज़ा इस दिन भगवान शिव की पूजा की जाती है और यही कारण है कि सोमवती अमावस्या पर विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु की कामना के लिए व्रत भी करती हैं। आइए आपको बताते हैं कि सोमवती अमावस्या कब है, ये कब से कब तक रहेगी, कहानी और महत्व

सोमवती अमावस्या कब है?
नाम से ही ज्ञात है कि सोमवती अमावस्या सोमवार को ही होती है। इस बार सोमवती अमावस्या 4 फरवरी यानि मौनी अमावस्या के दिन है। इस दिन पति की लंबी उम्र और पितृों की शांति के लिए व्रत का विधान होता है। सोमवती अमावस्या पर भगवान शिव की पूजा की जाती है।

कब से कब तक रहेगी सोमवती अमावस्या?
4 फरवरी को सोमवती अमावस्या है जो रविवार आधी रात से ही शुरू हो जाएगी। सोमवार को दिन भर अमावस्या का योग रहेगा। वही सोमवार रात 12 बजे के बाद ही अमावस्या संपन्न हो जाएगी। यानि सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में ही डुबकी लगाकर पुण्य कमाया जा सकता है।

सोमवती अमावस्या की कहानी
यूं तो सोमवती अमावस्या व्रत से सम्बंधित कई कहानियां प्रचलित हैं जिन्हे विधि विधान से सुनना चाहिए। इनमें से सोमवती अमावस्या की एक कहानी हम भी आपको सुना रहे हैं जो इस प्रकार है- एक गरीब ब्रह्मण परिवार था, जिसमे पति, पत्नी के अलावा एक पुत्री भी रहती थी। ब्राह्मण परिवार में बेटी धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। वो लड़की बेहद सुन्दर, संस्कारवान और गुणवान भी थी, लेकिन गरीब होने के कारण उसका विवाह नहीं हो पा रहा था। एक दिन ब्रह्मण के घर एक साधू पधारे, जो उस कन्या के सेवा भाव से काफी प्रसन्न हुए और कन्या को लम्बी आयु का आशीर्वाद देते हुए बताया कि इस कन्या की हथेली में विवाह योग्य रेखा नहीं है। ब्राह्मण दम्पति काफी परेशान हुआ और साधू से इसका उपाय भी पूछा कि कन्या ऐसा क्या करे की उसके हाथ में विवाह योग बन जाए। तब साधू ने बताया कि कुछ दूरी पर एक गाँव में सोना नाम की धोबी जाति की एक महिला अपने बेटे और बहू के साथ रहती है, जो की बहुत ही आचार- विचार और संस्कार संपन्न तथा पति परायण है। यदि यह कन्या उसकी सेवा करे और वह महिला इसकी शादी में अपने मांग का सिन्दूर लगा दे, उसके बाद इस कन्या का विवाह हो तो इस कन्या का विधवा योग मिट सकता है। साधू ने यह भी बताया कि वह महिला कहीं आती जाती नहीं है। यह बात सुनकर ब्रह्मणि ने अपनी बेटी से धोबिन कि सेवा करने को कहा। लिहाज़ा अपने माता-पिता की बात मान वो कन्या रोज़ाना तडके ही उठ कर सोना धोबिन के घर जाकर, सफाई करती और अन्य सारे करके अपने घर वापस आ जाती। सोना धोबिन अपनी बहू से पूछती है कि तुम तो तड़के ही उठकर सारे काम कर लेती हो और पता भी नहीं चलता। बहू ने कहा कि माँ जी मैंने तो सोचा कि आप ही सुबह उठकर सारे काम ख़ुद ही ख़त्म कर लेती हैं। मैं तो देर से उठती हूँ। इस पर दोनों सास बहू निगरानी करने लगी कि कौन है जो तडके ही घर का सारा काम करके चला जाता है तब धोबिन ने देखा कि एक कन्या घर में आती है और सारे काम करके चली जाती है। रोज़ाना की तरह जब वो कन्या जाने लगी तो धोबिन ने पूछा कि आप कौन है तब कन्या ने साधू की सारी बातें उसे बताई। सोना धोबिन पति परायण थी, लिहाजा वो कन्या की बात मानने को तैयार हो गई। लेकिन उस वक्त उसके पति की स्वास्थ्य ठीक नहीं था लेकिन वो फिर भी कन्या के साथ उसके घर जाने को तैयार हो गई। लेकिन जैसे ही सोना धोबिन ने अपनी मांग का सिन्दूर कन्या की मांग में लगाया तो सोना धोबिन के पति की मौत हो गई। उसे इस बात की जानकारी हुई तो वो वापस लौटने लगी तब उसने सोचा कि रास्ते में कहीं पीपल का पेड़ मिलेगा तो उसकी परिक्रमा करके ही जल ग्रहण करेगी। उस दिन सोमवती अमावस्या थी। ब्रह्मण के घर मिले पूए- पकवान की जगह उसने ईंट के टुकडों से भँवरी दी और परिक्रमा की और उसके बाद जल ग्रहण किया। ऐसा करते ही उसके पति के मुर्दा शरीर में जान आ गई। तभी से इस व्रत की महिमा और बढ़ गई।

सोमवती अमावस्या पर पीपल की पूजा का महत्व
कहते हैं सोमवती अमावस्या पर खासतौर से पीपल के वृक्ष की पूजा का विधान है। इस दिन विवाहित स्त्रियां पीपल के वृक्ष की दूध, जल, पुष्प, अक्षत, चन्दन से पूजा कर इसकी परिक्रमा करती हैं।

सोमवती अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान का महत्व
यूं तो हर अमावस्या हिंदू धर्म में खास ही है लेकिन कहते हैं कि सोमवती अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान का खास महत्व है। इसके महत्व के बारे में महाभारत में भी जिक्र मिलता है कहते हैं कि महाभारत में भीष्म ने युधिष्ठिर सोमवती अमावस्या के महत्व के बारे में समझाते हुए कहा था कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने वाला मनुष्य समृद्ध, स्वस्थ्य और सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। कहते हैं इस पितृों की आत्मा की शांति के लिए भी व्रत किया जाता है।

माघ सोमवती अमावस्या का है खास महत्व
प्रत्येक हिंदी मास के कृष्ण पक्ष की पंद्रहवी तिथि को अमावस्या होती है। अमावस्या का बहुत खास महत्व होता है। इस दिन को पितृ तर्पण से लेकर स्नान-दान आदि कार्यों के लिए काफी शुभ माना जाता है। इसे मौनी अमावस्या या माघी अमावस्या भी कहते हैं। माघ अमावस्या धार्मिक रूप काफी खास होता है। वैसे तो किसी कार्य के लिए अमावस्या की तिथि शुभ नहीं मानी जाती, लेकिन तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि कार्यों के लिए अमावस्या तिथि काफी शुभ होती है। इस दिन पितृ दोष और कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए उपवास और पूजा भी की जाती है।

सोमवती अमावस्या से दूर होते हैं अशुभ योग
किसी भी माह में सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन खासकर पूर्वजों को तर्पण किया जाता है। इस दिन उपवास करते हुए पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर शनि मंत्र का जाप करना चाहिए और पीपल के पेड़ के चारों ओर 108 बार परिक्रमा करते हुए भगवान विष्णु तथा पीपल वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। खासकर यह व्रत महिलाओं द्वारा संतान के दीर्घायु रहने की लिए की जाती है।

सोमवती अमावस्या के उपाय
– सोमवती अमावस्या के दिन तुलसी की 108 परिक्रमा करने से दरिद्रता मिटती है।
– इसके बाद क्षमता के अनुसार दान किया जाता है।
– सोमवती अमावस्या के दिन स्नान और दान का विशेष महत्त्व है।
– इस दिन मौन भी रखते हैं, इस कारण इसे मौनी अमावस्या भी कहा जाता है।
– माना जाता है कि सोमवती अमावस्या के दिन मौन रहने के साथ ही स्नान और दान करने से हजार गायों के दान करने के समान फल मिलता है।

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सकट चौथ का व्रत हिन्दु कैलेण्डर के माघ महीने के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को किया जाता है। सकट चौथ को संकटा चौथ, संकष्टी चतुर्थी, माघी चौथ, तिलकुटा चौथ या वक्रतुंडी चतुर्थी भी कहा जाता है। हिन्दु पंचांग के अनुसार एक महीने में 2 बार चतुर्थी तिथि आती है। इनमें अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है। वहीं पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्णपक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी होती है। दोनों तरह की चतुर्थी पर गणेशजी की पूजा की जाती है।

सकट चौथ का महत्व
सकट चौथ पूरे साल में पड़ने वाली 4 बड़ी चतुर्थी तिथियों में से एक है। सकट चौथ पर सुहागन स्त्रियां सुबह-शाम गणेशजी की पूजा करती है और रात में चंद्रमा के दर्शन और पूजा करने के बाद पति का आशीर्वाद लेती हैं। इसके बाद व्रत खोला जाता है। इस तरह व्रत करने से दाम्पत्य जीवन में कभी संकट नहीं आता। पति की उम्र बढ़ती है और शादीशुदा जीवन में प्रेम के साथ सुख भी बना रहता है। इस व्रत को करने से पति के सारे संकट भी दूर हो जाते हैं।

सकट चौथ की कथा
सतयुग में राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। एक बार तमाम कोशिशों के बावजूद जब उसके बर्तन कच्चे रह जा रहे थे तो उसने यह बात एक पुजारी को बताई। उस पर पुजारी ने बताया कि किसी छोटे बच्चे की बलि से ही यह समस्या दूर हो जाएगी। इसके बाद उस कुम्हार ने एक बच्चे को पकड़कर भट्टी में डाल दिया। वह सकट चौथ का दिन था। काफी खोजने के बाद भी जब उसकी मां को उसका बेटा नहीं मिला तो उसने गणेश जी के समक्ष सच्चे मन से प्रार्थना की। उधर जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो भट्टी में उसके बर्तन तो पक गए लेकिन बच्चा भी सुरक्षित था।
इस घटना के बाद कुम्हार डर गया और राजा के समक्ष पहुंच पूरी कहानी बताई। इसके पश्चात राजा ने बच्चे और उसकी मां को बुलवाया तो मां ने संकटों को दूर करने वाले सकट चौथ की महिमा का वर्णन किया। तभी से महिलाएं अपनी संतान और परिवार के सौभाग्य और लंबी आयु के लिए व्रत को करने लगीं।

सकट चौथ आज, दिनभर क्या करें और क्या नहीं, किन बातों का रखना होगा ध्यान
सकट चौथ का व्रत आज किया जा रहा है। संकष्टी चतुर्थी के इस व्रत पर कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है। वरना छोटी सी गलती से व्रत और पूजा का पूरा फल नहीं मिल पाता है। कई लोग व्रत करते हुए अनजाने में कुछ गलतियां कर देते हैं जो होती तो छोटी हैं लेकिन उनसे व्रत का पुण्य और फल नहीं मिल पाता है। ऐसी ही गलतियों से बचने के लिए ग्रंथों में व्रत के नियम बताए गए हैं। जिनका ध्यान दिनभर रखा जाना चाहिए।

सकट चौथ पर क्या करें
1. सुबह जल्दी उठकर नहाएं और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद एक साफ आसन पर बैठकर भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। पूजा के दौरान भगवान गणेश को धूप व दीप दिखाएं।

2. गणेशजी की पूजा के समय सीधे हाथ में जल लेकर दिनभर व्रत रखने का संकल्प लें।

3. फिर गणेश मंदिर जाकर दर्शन करें।

4. गणेशजी को दुर्वा, फूल और लड्डू चढ़ाएं। तिल के लड्डुओं का भोग लगाएं।

5. दिनभर अन्न नहीं खाएं और फलाहार ही करें।

6. तिल, गुड़ या अन्य तरह की मिठाई का दान करें। गणेश मंदिर के पुजारी को भोजन करवाएं।

सकट चौथ पर क्या न करें, क्या सावधानियां रखें
1. सूर्योदय के बाद तक न सोए रहें।

2. बिना नहाए कुछ न खाएं।

3. झूठ न बोलें।

4. दिन में न सोएं।

5. ब्रह्मचर्य का पालन करें।

6. लड़ाई-झगड़ा न करें, तामसिक भोजन से दूर रहें।

7. किसी भी तरह का नशा न करें।



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