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vandana bajpai
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कलम रूकनी नहीं चाहिए
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यूँ तो जिंदगी नेगेटिव और पॉजिटिव परिस्थितयों का मिला जुला रूप है | फिर भी कुछ लोग हर परिस्थिति में पॉजिटिव रहते हैं और कुछ ज्यादातर में नेगेटिव | पॉजिटिव लोग हर बुराई में भी कुछ अच्छाई ढूंढ लेते हैं और नेगेटिव हर अच्छाई में कुछ बुराई | जाहिर हैं जो ज्यादा पॉजिटिव रहेगा वो ज्यादा समय खुश व् उर्जा से भरा हुआ रहेगा | जिसके कारण अपने काम ज्यादा जोश व् ऊर्जा से कर पायेगा , परिणाम स्वरुप सफलता की ऊँचाइयों को छुएगा | अब दुनिया में कौन है जो ज्यादा खुश , ज्यादा स्वस्थ और ज्यादा सफल नहीं होना चाहता | फिर भी हम में से बहुत से लोग हैं जो अपनी परिस्थितियों को दोष देते रहते हैं | और कहते हैं हम प्रयास तो करते हैं पॉजिटिव रहने का पर क्या करें नेगेटिविटी मेरे जीवन का हिस्सा बन गयी है | पीछा ही नहीं छोडती |
ये लेख उन्हीं लोगों के लिए है जो ये सोंचते हैं कि वो निगेटिविटी के जाल में फंस गए हैं और निकल ही नहीं पा रहे हैं | यहाँ इस लेख के माध्यम से मैं आप को बताने जा रही हूँ कि नेगेटिव से पॉजिटिव कैसे बनें वो भी सिर्फ 5 स्टेप में | यानि ...
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आपने कई बार महसूस किया होगा की कोई व्यक्ति अच्छा कर्म करता है उसे बुरा फल मिलता है व् कोई बुरा कर्म करता है उसे अच्छा फल मिलता है | एक उदाहरण के तौर पर एक छोटी सी कहानी शेयर करना चाहूंगी | ये कहानी है दो दोस्तों की | विशाल और तुषार दो दोस्त थे | एग्जाम खत्म हो गए थे | थोडा रिलैक्स टाइम था | एक दिन दोनों बाहर घूमने जाना चाहते थे | पर कहाँ जाएँ इसमें थोडा विवाद था | तुषार फिल्म देखने जाना चाहता था | फिल्म थोड़ी बी ग्रेड थी | विशाल ने कहा ," रिजल्ट निकला नहीं है ऐसे में फिल्म देखना ठीक नहीं है | फिर ऐसी फिल्म तो बिलकुल नहीं उसने सुझाव दिया की उसके घर के पास मंदिर में गीता का प्रवचन चल रहा है वहीँ चलते हैं | पर तुषार राजी नहीं हुआ | लिहाजा दोनों ने अलग - अलग अपनी -अपनी मर्जी की जगह जाने का निश्चय किया |





अब तुषार फिल्म देखने तो चला गया पर उसे लगता रहा की विशाल का फैसला सही था उसे भी घटिया फिल्म की जगह प्रवचन सुनना चाहिए था | विशाल कितना लकी है जो उसे इतना ज्ञान मिल रहा है | | उधर विशाल प्रवचन में बैठा सोंचता रहा की तुषार ही सही था | प्रवचन कितना बोरिंग है | तुषार तो फिल्म का लुत्फ़ उठा रहा होगा और मैं तो यहाँ फंस गया | अब तुषार मन से प्रवचन सुनने को मंदिर में था व् विशाल फिल्म देखने को थियेटर में | उनके कर्मफल उनके द्वारा किये गए काम के आधार पर नहीं | उस आधार पर मिले जिस आधार पर जो भावना , विचार या मन के साथ जहाँ पर थे | अक्सर हमें कर्म और कर्मफल का ऐसा उल्टा - पुल्टा नियम देखने को मिलता है जिसका आधार सिर्फ विचार हैं |

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लिखो की कलम अब तुम्हारे हाथ में भी है

लिखो की कैसे छुपाती हो

चूल्हे के धुए में आँसू

लिखो की हूकता है दिल जब

गाज़र –मूली की तरह

उखाड़ कर फेंक दी जाती हैं

कोख की बेटियाँ

लिखो उन नीले साव के बारे में

जो उभर आते है पीठ पर

लिखो की कैसे कलछता है मन

सौतन को देख कर

इतना ही नहीं ...

प्रेम के गीत लिखो

मुक्ति का राग लिखो
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हमेशा की तरह करवाचौथ से एक दिन पहले काकी करवाचौथ का सारा सामान ले आयीं | वो रंग .बिरंगे करवे , चूड़ी , बिंदी ...सब कुछ लायी थी | और हमेशा की तरह सबको हुलस –हुलस कर दे रही थी | मुझे देते हुए बोलीं ,ये लो दिव्या तुम्हारे करवे , अच्छे से पूजा करना , तुम्हारी और दीपेश की जोड़ी बनी रहे | मैंने उनके पैर छू कर करवे ले लिए | तभी मेरा ध्यान बाकी बचे सामान पर गया | सामान तो खत्म हो गया था | मैंने काकी की ओर आश्चर्य से देख कर पूंछा ,”काकी ,और आपके करवे ?”इस बार से मैं करवाचौथ नहीं रहूँगी ,काकी ने द्रणता से कहा | मैं अवाक सी उनकी ओर देखती रह गयी | मुझे इस तरह घूरते देख कर मेरे मन में उठ रहे प्रश्नों के ज्वार को काकी समझ गयीं | वो मुस्कुरा कर बोलीं ,” नीत्से ने कहा है ,आशा बहुत खतरनाक होती है | वो हमारी पीड़ा को कम होने ही नहीं देती |” काकी की घोर धार्मिक किताबों के अध्यन से चाणक्य और फिर नीत्से तक की यात्रा की मैं साक्षी रही हूँ | तभी अम्माँ का स्वर गूंजा ,”नीत्से,अब ये मुआ नीत्से कौन है जो हमारे घर के मामलों में बोलने लगा | मैं काकी , अम्माँ और ‘नीत्से’ को वहीँ छोड़ कर अपने कमरे में चली आई |
मन बहुत भारी था | कभी लगता था जी भर के रोऊँ उस क्रूर मजाक पर जो काकी के साथ हुआ तो कभी लगता था जी भर के हँसू क्योंकि काकी के इस फैसले से एक नए इतिहास की शुरुआत जो होनी थी | विडम्बना है कि दुःख से बचने के लिए चाहें हम झूँठ के कितने ही घेरे अपने चारों ओर पहन लें पर इससे मुक्ति तभी मिलती है जब हममे सच को स्वीकार कर उससे टकराने की हिम्मत आ जाती है | मन की उहापोह में मैं खिड़की के पास बैठ गयी | बाहर चाँद दिखाई दे रहा था | शुभ्र , धवल , निर्मल |
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