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Satyendra Rai
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बेबस बस्ती
बेबस बस्ती जर्ज़र इमारतें गली सुखकर टूटी पड़ी पानी की प्यास से घर से घर की दूरी बढ़ी कभी शोर कभी चोर की गूँज से दहलता नगर दहशत की दीवारों से बंधे हम सब के घर नज़र देखती तमाशा आवाज़ ख़ामोशी की ग़ुलाम है ज़िन्दगी जो हर रोज़ देखती नया सवेरा वही हर वक़्त ख़ुदग़र्ज़ी के नाम ...

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अधमरी "अनामिका"
अधमरी "अनामिका" सर्द सुबह की उस रोज़ घर के दरवाज़े से दूर बिजली के तारों को थामे गली के अंधियारों में खड़ा गिरते पानी को निहारता कि एक ज़ोर की... चीख़ ज़र्रे.. ज़र्रे.. को झकझोरती तेज़ी से निकलते … आती आवाज़ का असर भी इतना कि.. लगा किसी दहशत ने द्वार पे... दस्तक़ दे ...

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है "आप - आप" की धूम !!!
जज़्बा है दीवानों सा है "आप - आप" की धूम दिशा - दिशा डोर बंधने लगी खिलने लगे हैं "केजरी" के फ़ूल सोया - सोया सारा समाँ आज गा रहा... आम - आम के गूंज झाड़ू - झाड़ू झंकार दे रही घर - घर खिली आस की धूप मुद्दा - मुद्दा मूर्छित पड़ा था कल तक आज मौसम - मौसम छाने लगा ख़ा...

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तालिबान...
तालिबान... दिल में दहशत शहर शमशान ज़िन्दगी बेबस ज़ख़्मी जान.. जनाज़े में पड़े वो मासूम से चेहरे ख़ून... ख़ून ज़मीन आंसू... आंसू इंसान बस सरहदों के बीच बंटा वो... एक मुल्क़ नहीं मेरा पड़ोसी है जिसकी ना तो... ज़मात से मैं जुदा हूँ ना जुबान से... सियासी सपेरों की पैदाईश....

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"आफ़त में आशियाना"
क्यों दू तुम्हे मैं अपना आशियाना गुना है... चुना है असर अस्ल तक बुना है मेरी उम्मीदों का उमंग है ये यही मेरे सपनों का सच समां है रूह... रूह में बसी आदत इसकी बचपन इन दीवारों संग पला है कभी हंसी... कभी ख़ुशी ज़िन्दगी ने ग़म भी बांटे इसके मयार में मौसम ताउम्र गुज़...

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"हवस" में "हिंदुस्तान"
फिर एक तमाशा मेरी मौत पर लगा है हवस के हाथ ताक़त क़ानून जुर्म का नशा है घर से निकलते ही माँ कहती... बिटिया ज़रा संभल के जाना और फिर दबे पावं पीछे-पीछे... आ जाती सड़क तक ना चुप रहती... ना ठहरती बस बेचैनियों संग बहती मेरे सफ़र को सोच उसकी सिकन... बेहया.. बेशर्म.. ...

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