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Chanakya sharma
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Chanakya sharma

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ईरान यात्रा के दौरान भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की पोशाक को लेकर सोशल मीडिया में चर्चाएं.
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Chanakya sharma

पर्व, त्यौहार, उत्सव  - 
 
सोच अपनी अपनी। 

सभी सरकारें चाहे या न चाहे , जनता को अप्रैल फूल बनाती आई है। 
कैसे =====३१ मार्च जो कमाया और सरकार को दिया वह खत्म फिर अगले ३१ मार्च तक कमाओ 
और दे दो  .. 

__________________________________

कुछ भी हो --- चाहे नया साल कभी मना लो -- लेकिन अर्थ व्वस्था के लिए वैदिक सम्वत जो अक्सर अप्रैल के प्रथम सप्ताह या मार्च के आखिर में आता है == पर भारत में बताएँगे      कि नया साल जनवरी है। 

___________________________________

हम धोएंगे नहीं पूछेंगे - पूछेंगे नहीं चाटेंगे --तब शब्दों को चाटते रहिये - अप्रैल फूल बनते और बनाते रहिये ,

क्या हम इस अप्रैल फूल पर चित्र के अनुसार अनुसार पूरे भारत में नव संवत्सर का स्वागत कराने की कोशिश 
कितने भारतीय करेंगे। 
_____________________________________________
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Ashish
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Chanakya sharma

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FIFA  organised by India in 2017 
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Chanakya sharma

Editors Picks News  - 
 
  यह लेख पिछले साल लिखा गया था , मैनै दैखा कि अाज भी अभी से अाधुनिक माता पिता बच्चो को गुब्बारे खरीदकर दे रहे है , जब वे किसी को फैक कर मारते है उसमे दु्रघटना हो जाती है , आखो की रोशनी भी चली जाती है , पर प्रशासन की नीद दुर्घटना होने के बाद खुलती है  किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अभी तक बाजार मे रासायनिक रंगो को बैचने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा कदम नही उठाया है आैर हिन्दुआै के नेता बनने वाले आैर उनकी पैरवी करने वाले तथाकथित स्वमं भू लाल लंगोटा धारी शंकरा चार्य जो सिर्फ राजनिती मे रूचि रखते है चुप बैठे है , जैसे समाज से उनका कुछ लेना देना नही आैर न सामाजिक रीति रिवाजो से -जो आज इस हालात मे पहुच चुके है कि त्योहार मे सकुशल बाहर जाने को सोचना पडता है कि जाये या नही ,

बाकी आप पर निर्भर है कि आप कितने अपने मिलने वालो को होली से पहिले यह संदेश भेजना चाहेगे , सिर्फ लाइक करने से आप समझंगे पर समाज बनाने मे आपका भी योगदान है क्योकि आपसे ही समाज है। 
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भारतीय त्यौहार औऱ उनका वैज्ञानिक रहस्य 


होली -  होली का नाम लेते ही रंग रंगीला उत्सव आपके मन में आता है।  पर क्या मालुम है कि 
इस त्यौहार को मनाने के पीछे हमारे सनातन ऋषि -मुनियो का क्या विज्ञान था , वह समयाभाव और अज्ञानता की वजह से लुप्त हो गया


जैसा क़ि आप जानते हैं कि हमारे देश में चार ऋतुएँ होती है , शरद ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतू के 
आरम्भ में फागुण  महीने में यह त्यौहार मनाया जाता है।  जो स्वरूप आज इस त्यौहार का है वह 
प्राचीन काल नहीं था , और न ही रासायनिक रंगो का प्रयोग होता था। 


सभी पड़े लिखे लोग जानते हैं कि यदि शरीर से उत्सर्जन पदार्थ नहीं निकालेंगे तब वह शरीर में 
हानिकारक तत्व को पैदा कर देते हैं , और जब वह बाहर निकलते हैं तब बहुत कष्ट होता है। 
शरद ऋतुओ में हमारी त्वचा से पसीना जो एक उत्सर्जन पदार्थ है रुक जाता है जिससे त्वचा के 
रन्द्र यानि छेद रुक जाते है और जब बाहर के वातावरण का तापमान बढ़ जाता है तब त्वचा में 
छोटे छोटे दाने दाने निकलने लगते है , जो बहुत कष्टकारी होते हैं , बच्चो में अक्सर चैत्र मॉस में 
चेचक और खसरा भी इसी का परिणाम है। 


इसी कष्टकारी पीड़ा को दूर करने के लिए हमारे ऋषियों ने होली नामक उत्सव को मनाने की 
परम्परा का प्रारम्भ किया था ,


इसमें पूर्णिमा को चांदनी रात में आग जलाकर हवन करके वातावरण को इतना गर्म कर दिया जाता है कि शरीर से पसीना निकलने लगे और शरीर के रन्द्र खुल जाए , फिर क़िसी 
भीगे कपडे से शरीर को साफ कर लिया जाता है। 


अगले दिन टेसू /पलाश के फूल जो पहले दिन पानी में भिगो दिए जाते है उनको पिचकारी 
की सहायता से एक दुसरे पर डालकर होली मनाते है जिसमे कपडे फूलो के रंग से काफी टाइम तक भीगे रहने की वजह से पसीना जो अम्लीय होता है और टेसू जो क्षारीय होता है ,
त्वचा को उदासीनीकरण कर देते हैं।  आपने देखा होगा कि घमौरियों के लिए भी केल्शियम 
कार्बोनेट पाउडर लगाकर उदासीनीकरण करके (जो कि ठोस रूप में होता है ) त्वचा को 
और नुक्सान पहुचाते है रंद्र को रोक देते हैं , जबकि तरल रूप में होली खेलकर हम पूरे साल में एक बार अपने शरीर की शुद्धि ही नहीं पूरे समाज को स्वस्थ रखते है , पर ध्यान रहे रासायनिक रंगो से नहीं। 


देर से ही सही पर अपने ऋषियों की परम्परा को सनातन वैज्ञानिकता से जीवित रखिये 
और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का सन्देश का दुनिया को दीजिये !!
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Chanakya sharma

Festivals & Culture  - 
 
  यह लेख पिछले साल लिखा गया था , मैनै दैखा कि अाज भी अभी से अाधुनिक माता पिता बच्चो को गुब्बारे खरीदकर दे रहे है , जब वे किसी को फैक कर मारते है उसमे दु्रघटना हो जाती है , आखो की रोशनी भी चली जाती है , पर प्रशासन की नीद दुर्घटना होने के बाद खुलती है  किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अभी तक बाजार मे रासायनिक रंगो को बैचने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा कदम नही उठाया है आैर हिन्दुआै के नेता बनने वाले आैर उनकी पैरवी करने वाले तथाकथित स्वमं भू लाल लंगोटा धारी शंकरा चार्य जो सिर्फ राजनिती मे रूचि रखते है चुप बैठे है , जैसे समाज से उनका कुछ लेना देना नही आैर न सामाजिक रीति रिवाजो से -जो आज इस हालात मे पहुच चुके है कि त्योहार मे सकुशल बाहर जाने को सोचना पडता है कि जाये या नही ,

बाकी आप पर निर्भर है कि आप कितने अपने मिलने वालो को होली से पहिले यह संदेश भेजना चाहेगे , सिर्फ लाइक करने से आप समझंगे पर समाज बनाने मे आपका भी योगदान है क्योकि आपसे ही समाज है। 
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भारतीय त्यौहार औऱ उनका वैज्ञानिक रहस्य 


होली -  होली का नाम लेते ही रंग रंगीला उत्सव आपके मन में आता है।  पर क्या मालुम है कि 
इस त्यौहार को मनाने के पीछे हमारे सनातन ऋषि -मुनियो का क्या विज्ञान था , वह समयाभाव और अज्ञानता की वजह से लुप्त हो गया


जैसा क़ि आप जानते हैं कि हमारे देश में चार ऋतुएँ होती है , शरद ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतू के 
आरम्भ में फागुण  महीने में यह त्यौहार मनाया जाता है।  जो स्वरूप आज इस त्यौहार का है वह 
प्राचीन काल नहीं था , और न ही रासायनिक रंगो का प्रयोग होता था। 


सभी पड़े लिखे लोग जानते हैं कि यदि शरीर से उत्सर्जन पदार्थ नहीं निकालेंगे तब वह शरीर में 
हानिकारक तत्व को पैदा कर देते हैं , और जब वह बाहर निकलते हैं तब बहुत कष्ट होता है। 
शरद ऋतुओ में हमारी त्वचा से पसीना जो एक उत्सर्जन पदार्थ है रुक जाता है जिससे त्वचा के 
रन्द्र यानि छेद रुक जाते है और जब बाहर के वातावरण का तापमान बढ़ जाता है तब त्वचा में 
छोटे छोटे दाने दाने निकलने लगते है , जो बहुत कष्टकारी होते हैं , बच्चो में अक्सर चैत्र मॉस में 
चेचक और खसरा भी इसी का परिणाम है। 


इसी कष्टकारी पीड़ा को दूर करने के लिए हमारे ऋषियों ने होली नामक उत्सव को मनाने की 
परम्परा का प्रारम्भ किया था ,


इसमें पूर्णिमा को चांदनी रात में आग जलाकर हवन करके वातावरण को इतना गर्म कर दिया जाता है कि शरीर से पसीना निकलने लगे और शरीर के रन्द्र खुल जाए , फिर क़िसी 
भीगे कपडे से शरीर को साफ कर लिया जाता है। 


अगले दिन टेसू /पलाश के फूल जो पहले दिन पानी में भिगो दिए जाते है उनको पिचकारी 
की सहायता से एक दुसरे पर डालकर होली मनाते है जिसमे कपडे फूलो के रंग से काफी टाइम तक भीगे रहने की वजह से पसीना जो अम्लीय होता है और टेसू जो क्षारीय होता है ,
त्वचा को उदासीनीकरण कर देते हैं।  आपने देखा होगा कि घमौरियों के लिए भी केल्शियम 
कार्बोनेट पाउडर लगाकर उदासीनीकरण करके (जो कि ठोस रूप में होता है ) त्वचा को 
और नुक्सान पहुचाते है रंद्र को रोक देते हैं , जबकि तरल रूप में होली खेलकर हम पूरे साल में एक बार अपने शरीर की शुद्धि ही नहीं पूरे समाज को स्वस्थ रखते है , पर ध्यान रहे रासायनिक रंगो से नहीं। 


देर से ही सही पर अपने ऋषियों की परम्परा को सनातन वैज्ञानिकता से जीवित रखिये 
और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का सन्देश का दुनिया को दीजिये !!
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Chanakya sharma

Discussion  - 
 
  यह लेख पिछले साल लिखा गया था , मैनै दैखा कि अाज भी अभी से अाधुनिक माता पिता बच्चो को गुब्बारे खरीदकर दे रहे है , जब वे किसी को फैक कर मारते है उसमे दु्रघटना हो जाती है , आखो की रोशनी भी चली जाती है , पर प्रशासन की नीद दुर्घटना होने के बाद खुलती है  किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अभी तक बाजार मे रासायनिक रंगो को बैचने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा कदम नही उठाया है आैर हिन्दुआै के नेता बनने वाले आैर उनकी पैरवी करने वाले तथाकथित स्वमं भू लाल लंगोटा धारी शंकरा चार्य जो सिर्फ राजनिती मे रूचि रखते है चुप बैठे है , जैसे समाज से उनका कुछ लेना देना नही आैर न सामाजिक रीति रिवाजो से -जो आज इस हालात मे पहुच चुके है कि त्योहार मे सकुशल बाहर जाने को सोचना पडता है कि जाये या नही ,

बाकी आप पर निर्भर है कि आप कितने अपने मिलने वालो को होली से पहिले यह संदेश भेजना चाहेगे , सिर्फ लाइक करने से आप समझंगे पर समाज बनाने मे आपका भी योगदान है क्योकि आपसे ही समाज है। 
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भारतीय त्यौहार औऱ उनका वैज्ञानिक रहस्य 


होली -  होली का नाम लेते ही रंग रंगीला उत्सव आपके मन में आता है।  पर क्या मालुम है कि 
इस त्यौहार को मनाने के पीछे हमारे सनातन ऋषि -मुनियो का क्या विज्ञान था , वह समयाभाव और अज्ञानता की वजह से लुप्त हो गया


जैसा क़ि आप जानते हैं कि हमारे देश में चार ऋतुएँ होती है , शरद ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतू के 
आरम्भ में फागुण  महीने में यह त्यौहार मनाया जाता है।  जो स्वरूप आज इस त्यौहार का है वह 
प्राचीन काल नहीं था , और न ही रासायनिक रंगो का प्रयोग होता था। 


सभी पड़े लिखे लोग जानते हैं कि यदि शरीर से उत्सर्जन पदार्थ नहीं निकालेंगे तब वह शरीर में 
हानिकारक तत्व को पैदा कर देते हैं , और जब वह बाहर निकलते हैं तब बहुत कष्ट होता है। 
शरद ऋतुओ में हमारी त्वचा से पसीना जो एक उत्सर्जन पदार्थ है रुक जाता है जिससे त्वचा के 
रन्द्र यानि छेद रुक जाते है और जब बाहर के वातावरण का तापमान बढ़ जाता है तब त्वचा में 
छोटे छोटे दाने दाने निकलने लगते है , जो बहुत कष्टकारी होते हैं , बच्चो में अक्सर चैत्र मॉस में 
चेचक और खसरा भी इसी का परिणाम है। 


इसी कष्टकारी पीड़ा को दूर करने के लिए हमारे ऋषियों ने होली नामक उत्सव को मनाने की 
परम्परा का प्रारम्भ किया था ,


इसमें पूर्णिमा को चांदनी रात में आग जलाकर हवन करके वातावरण को इतना गर्म कर दिया जाता है कि शरीर से पसीना निकलने लगे और शरीर के रन्द्र खुल जाए , फिर क़िसी 
भीगे कपडे से शरीर को साफ कर लिया जाता है। 


अगले दिन टेसू /पलाश के फूल जो पहले दिन पानी में भिगो दिए जाते है उनको पिचकारी 
की सहायता से एक दुसरे पर डालकर होली मनाते है जिसमे कपडे फूलो के रंग से काफी टाइम तक भीगे रहने की वजह से पसीना जो अम्लीय होता है और टेसू जो क्षारीय होता है ,
त्वचा को उदासीनीकरण कर देते हैं।  आपने देखा होगा कि घमौरियों के लिए भी केल्शियम 
कार्बोनेट पाउडर लगाकर उदासीनीकरण करके (जो कि ठोस रूप में होता है ) त्वचा को 
और नुक्सान पहुचाते है रंद्र को रोक देते हैं , जबकि तरल रूप में होली खेलकर हम पूरे साल में एक बार अपने शरीर की शुद्धि ही नहीं पूरे समाज को स्वस्थ रखते है , पर ध्यान रहे रासायनिक रंगो से नहीं। 


देर से ही सही पर अपने ऋषियों की परम्परा को सनातन वैज्ञानिकता से जीवित रखिये 
और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का सन्देश का दुनिया को दीजिये !!
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sujeet kumar kushawaha's profile photo
 
  यह लेख पिछले साल लिखा गया था , मैनै दैखा कि अाज भी अभी से अाधुनिक माता पिता बच्चो को गुब्बारे खरीदकर दे रहे है , जब वे किसी को फैक कर मारते है उसमे दु्रघटना हो जाती है , आखो की रोशनी भी चली जाती है , पर प्रशासन की नीद दुर्घटना होने के बाद खुलती है  किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अभी तक बाजार मे रासायनिक रंगो को बैचने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा कदम नही उठाया है आैर हिन्दुआै के नेता बनने वाले आैर उनकी पैरवी करने वाले तथाकथित स्वमं भू लाल लंगोटा धारी शंकरा चार्य जो सिर्फ राजनिती मे रूचि रखते है चुप बैठे है , जैसे समाज से उनका कुछ लेना देना नही आैर न सामाजिक रीति रिवाजो से -जो आज इस हालात मे पहुच चुके है कि त्योहार मे सकुशल बाहर जाने को सोचना पडता है कि जाये या नही ,

बाकी आप पर निर्भर है कि आप कितने अपने मिलने वालो को होली से पहिले यह संदेश भेजना चाहेगे , सिर्फ लाइक करने से आप समझंगे पर समाज बनाने मे आपका भी योगदान है क्योकि आपसे ही समाज है। 
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Chanakya sharma

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जो फौजी पूरे देश से राखी बँधवाता है , ये अपने को बुद्धिजीवी देश के सैनिको को बलात्कारी कहने वाले 
कनैया यानि कानिया की कोई भी बहिन आखे फोड़ देगी , क्या कर रहे वे सर्वोच्च अदालत के जज साहिब ,
क्या नींद आ गयी -?  अगर मेरे देश के सिपाहियों को बलात्कारी कहने वाले को तुरंत या तो जेल में भेजो -
नहीं तो उसकी हत्या कराने में आपकी भूमिका पर भी सवाल उठाने वाले - इस नामाकूल देश में -पुरूस्कार 
लौटाने वालो की कमी नहीं। 
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Have him in circles
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Chanakya sharma

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Sadi aur Saal Ki Ladai -----??

Aur bhi bahut Afsaane hai .....Jindgi ke -

Ye Prakaar aur media waale ..Baat ka batangah Banane mai bahut tej hai ... 
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ईरान यात्रा के दौरान भारतीय विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की पोशाक को लेकर सोशल मीडिया में चर्चाएं.
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Chanakya sharma

Humor & Fun  - 
 
आपका क्या कहना है - कुछ तो बोलो------
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Raman patil's profile photojagdish parmar Ex Army's profile photoSunil Kumar Sharma's profile photo
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+jagdish parmar Ex Army लाईक/कमेंट्स पाने हेतु फुरसती जाने कहाँ 2 से लेकर आ जाते हैं पोस्ट।लगता है पूर्वी यू पी या बिहार के हैं जहाँ के लोगों को धड़ल्ले से नकल करते हुए TV पर दिखाया जाता रहा है।अधूरा ज्ञान बड़ा घातक होता है।नई पीढ़ी जल्दी से जल्दी शार्टकट से लोकप्रियता,धन पाने की कोशिश में लगी रहती पाई जा रही है।जो उनके लिए घातक तो है ही और देश के लिए भी घातक है।
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Chanakya sharma

Politics and Religion  - 
 
  यह लेख पिछले साल लिखा गया था , मैनै दैखा कि अाज भी अभी से अाधुनिक माता पिता बच्चो को गुब्बारे खरीदकर दे रहे है , जब वे किसी को फैक कर मारते है उसमे दु्रघटना हो जाती है , आखो की रोशनी भी चली जाती है , पर प्रशासन की नीद दुर्घटना होने के बाद खुलती है  किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अभी तक बाजार मे रासायनिक रंगो को बैचने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा कदम नही उठाया है आैर हिन्दुआै के नेता बनने वाले आैर उनकी पैरवी करने वाले तथाकथित स्वमं भू लाल लंगोटा धारी शंकरा चार्य जो सिर्फ राजनिती मे रूचि रखते है चुप बैठे है , जैसे समाज से उनका कुछ लेना देना नही आैर न सामाजिक रीति रिवाजो से -जो आज इस हालात मे पहुच चुके है कि त्योहार मे सकुशल बाहर जाने को सोचना पडता है कि जाये या नही ,

बाकी आप पर निर्भर है कि आप कितने अपने मिलने वालो को होली से पहिले यह संदेश भेजना चाहेगे , सिर्फ लाइक करने से आप समझंगे पर समाज बनाने मे आपका भी योगदान है क्योकि आपसे ही समाज है। 
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भारतीय त्यौहार औऱ उनका वैज्ञानिक रहस्य 


होली -  होली का नाम लेते ही रंग रंगीला उत्सव आपके मन में आता है।  पर क्या मालुम है कि 
इस त्यौहार को मनाने के पीछे हमारे सनातन ऋषि -मुनियो का क्या विज्ञान था , वह समयाभाव और अज्ञानता की वजह से लुप्त हो गया


जैसा क़ि आप जानते हैं कि हमारे देश में चार ऋतुएँ होती है , शरद ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतू के 
आरम्भ में फागुण  महीने में यह त्यौहार मनाया जाता है।  जो स्वरूप आज इस त्यौहार का है वह 
प्राचीन काल नहीं था , और न ही रासायनिक रंगो का प्रयोग होता था। 


सभी पड़े लिखे लोग जानते हैं कि यदि शरीर से उत्सर्जन पदार्थ नहीं निकालेंगे तब वह शरीर में 
हानिकारक तत्व को पैदा कर देते हैं , और जब वह बाहर निकलते हैं तब बहुत कष्ट होता है। 
शरद ऋतुओ में हमारी त्वचा से पसीना जो एक उत्सर्जन पदार्थ है रुक जाता है जिससे त्वचा के 
रन्द्र यानि छेद रुक जाते है और जब बाहर के वातावरण का तापमान बढ़ जाता है तब त्वचा में 
छोटे छोटे दाने दाने निकलने लगते है , जो बहुत कष्टकारी होते हैं , बच्चो में अक्सर चैत्र मॉस में 
चेचक और खसरा भी इसी का परिणाम है। 


इसी कष्टकारी पीड़ा को दूर करने के लिए हमारे ऋषियों ने होली नामक उत्सव को मनाने की 
परम्परा का प्रारम्भ किया था ,


इसमें पूर्णिमा को चांदनी रात में आग जलाकर हवन करके वातावरण को इतना गर्म कर दिया जाता है कि शरीर से पसीना निकलने लगे और शरीर के रन्द्र खुल जाए , फिर क़िसी 
भीगे कपडे से शरीर को साफ कर लिया जाता है। 


अगले दिन टेसू /पलाश के फूल जो पहले दिन पानी में भिगो दिए जाते है उनको पिचकारी 
की सहायता से एक दुसरे पर डालकर होली मनाते है जिसमे कपडे फूलो के रंग से काफी टाइम तक भीगे रहने की वजह से पसीना जो अम्लीय होता है और टेसू जो क्षारीय होता है ,
त्वचा को उदासीनीकरण कर देते हैं।  आपने देखा होगा कि घमौरियों के लिए भी केल्शियम 
कार्बोनेट पाउडर लगाकर उदासीनीकरण करके (जो कि ठोस रूप में होता है ) त्वचा को 
और नुक्सान पहुचाते है रंद्र को रोक देते हैं , जबकि तरल रूप में होली खेलकर हम पूरे साल में एक बार अपने शरीर की शुद्धि ही नहीं पूरे समाज को स्वस्थ रखते है , पर ध्यान रहे रासायनिक रंगो से नहीं। 


देर से ही सही पर अपने ऋषियों की परम्परा को सनातन वैज्ञानिकता से जीवित रखिये 
और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का सन्देश का दुनिया को दीजिये !!
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Chanakya sharma

पर्व, त्यौहार, उत्सव  - 
 
  यह लेख पिछले साल लिखा गया था , मैनै दैखा कि अाज भी अभी से अाधुनिक माता पिता बच्चो को गुब्बारे खरीदकर दे रहे है , जब वे किसी को फैक कर मारते है उसमे दु्रघटना हो जाती है , आखो की रोशनी भी चली जाती है , पर प्रशासन की नीद दुर्घटना होने के बाद खुलती है  किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अभी तक बाजार मे रासायनिक रंगो को बैचने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा कदम नही उठाया है आैर हिन्दुआै के नेता बनने वाले आैर उनकी पैरवी करने वाले तथाकथित स्वमं भू लाल लंगोटा धारी शंकरा चार्य जो सिर्फ राजनिती मे रूचि रखते है चुप बैठे है , जैसे समाज से उनका कुछ लेना देना नही आैर न सामाजिक रीति रिवाजो से -जो आज इस हालात मे पहुच चुके है कि त्योहार मे सकुशल बाहर जाने को सोचना पडता है कि जाये या नही ,

बाकी आप पर निर्भर है कि आप कितने अपने मिलने वालो को होली से पहिले यह संदेश भेजना चाहेगे , सिर्फ लाइक करने से आप समझंगे पर समाज बनाने मे आपका भी योगदान है क्योकि आपसे ही समाज है। 
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होली -  होली का नाम लेते ही रंग रंगीला उत्सव आपके मन में आता है।  पर क्या मालुम है कि 
इस त्यौहार को मनाने के पीछे हमारे सनातन ऋषि -मुनियो का क्या विज्ञान था , वह समयाभाव और अज्ञानता की वजह से लुप्त हो गया


जैसा क़ि आप जानते हैं कि हमारे देश में चार ऋतुएँ होती है , शरद ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतू के 
आरम्भ में फागुण  महीने में यह त्यौहार मनाया जाता है।  जो स्वरूप आज इस त्यौहार का है वह 
प्राचीन काल नहीं था , और न ही रासायनिक रंगो का प्रयोग होता था। 


सभी पड़े लिखे लोग जानते हैं कि यदि शरीर से उत्सर्जन पदार्थ नहीं निकालेंगे तब वह शरीर में 
हानिकारक तत्व को पैदा कर देते हैं , और जब वह बाहर निकलते हैं तब बहुत कष्ट होता है। 
शरद ऋतुओ में हमारी त्वचा से पसीना जो एक उत्सर्जन पदार्थ है रुक जाता है जिससे त्वचा के 
रन्द्र यानि छेद रुक जाते है और जब बाहर के वातावरण का तापमान बढ़ जाता है तब त्वचा में 
छोटे छोटे दाने दाने निकलने लगते है , जो बहुत कष्टकारी होते हैं , बच्चो में अक्सर चैत्र मॉस में 
चेचक और खसरा भी इसी का परिणाम है। 


इसी कष्टकारी पीड़ा को दूर करने के लिए हमारे ऋषियों ने होली नामक उत्सव को मनाने की 
परम्परा का प्रारम्भ किया था ,


इसमें पूर्णिमा को चांदनी रात में आग जलाकर हवन करके वातावरण को इतना गर्म कर दिया जाता है कि शरीर से पसीना निकलने लगे और शरीर के रन्द्र खुल जाए , फिर क़िसी 
भीगे कपडे से शरीर को साफ कर लिया जाता है। 


अगले दिन टेसू /पलाश के फूल जो पहले दिन पानी में भिगो दिए जाते है उनको पिचकारी 
की सहायता से एक दुसरे पर डालकर होली मनाते है जिसमे कपडे फूलो के रंग से काफी टाइम तक भीगे रहने की वजह से पसीना जो अम्लीय होता है और टेसू जो क्षारीय होता है ,
त्वचा को उदासीनीकरण कर देते हैं।  आपने देखा होगा कि घमौरियों के लिए भी केल्शियम 
कार्बोनेट पाउडर लगाकर उदासीनीकरण करके (जो कि ठोस रूप में होता है ) त्वचा को 
और नुक्सान पहुचाते है रंद्र को रोक देते हैं , जबकि तरल रूप में होली खेलकर हम पूरे साल में एक बार अपने शरीर की शुद्धि ही नहीं पूरे समाज को स्वस्थ रखते है , पर ध्यान रहे रासायनिक रंगो से नहीं। 


देर से ही सही पर अपने ऋषियों की परम्परा को सनातन वैज्ञानिकता से जीवित रखिये 
और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का सन्देश का दुनिया को दीजिये !!
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Bajrang Singh Rathore's profile photoChanakya sharma's profile photoRitu Lall's profile photo
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Chanakya sharma

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  यह लेख पिछले साल लिखा गया था , मैनै दैखा कि अाज भी अभी से अाधुनिक माता पिता बच्चो को गुब्बारे खरीदकर दे रहे है , जब वे किसी को फैक कर मारते है उसमे दु्रघटना हो जाती है , आखो की रोशनी भी चली जाती है , पर प्रशासन की नीद दुर्घटना होने के बाद खुलती है  किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने अभी तक बाजार मे रासायनिक रंगो को बैचने पर प्रतिबन्ध लगाने जैसा कदम नही उठाया है आैर हिन्दुआै के नेता बनने वाले आैर उनकी पैरवी करने वाले तथाकथित स्वमं भू लाल लंगोटा धारी शंकरा चार्य जो सिर्फ राजनिती मे रूचि रखते है चुप बैठे है , जैसे समाज से उनका कुछ लेना देना नही आैर न सामाजिक रीति रिवाजो से -जो आज इस हालात मे पहुच चुके है कि त्योहार मे सकुशल बाहर जाने को सोचना पडता है कि जाये या नही ,

बाकी आप पर निर्भर है कि आप कितने अपने मिलने वालो को होली से पहिले यह संदेश भेजना चाहेगे , सिर्फ लाइक करने से आप समझंगे पर समाज बनाने मे आपका भी योगदान है क्योकि आपसे ही समाज है। 
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भारतीय त्यौहार औऱ उनका वैज्ञानिक रहस्य 


होली -  होली का नाम लेते ही रंग रंगीला उत्सव आपके मन में आता है।  पर क्या मालुम है कि 
इस त्यौहार को मनाने के पीछे हमारे सनातन ऋषि -मुनियो का क्या विज्ञान था , वह समयाभाव और अज्ञानता की वजह से लुप्त हो गया


जैसा क़ि आप जानते हैं कि हमारे देश में चार ऋतुएँ होती है , शरद ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतू के 
आरम्भ में फागुण  महीने में यह त्यौहार मनाया जाता है।  जो स्वरूप आज इस त्यौहार का है वह 
प्राचीन काल नहीं था , और न ही रासायनिक रंगो का प्रयोग होता था। 


सभी पड़े लिखे लोग जानते हैं कि यदि शरीर से उत्सर्जन पदार्थ नहीं निकालेंगे तब वह शरीर में 
हानिकारक तत्व को पैदा कर देते हैं , और जब वह बाहर निकलते हैं तब बहुत कष्ट होता है। 
शरद ऋतुओ में हमारी त्वचा से पसीना जो एक उत्सर्जन पदार्थ है रुक जाता है जिससे त्वचा के 
रन्द्र यानि छेद रुक जाते है और जब बाहर के वातावरण का तापमान बढ़ जाता है तब त्वचा में 
छोटे छोटे दाने दाने निकलने लगते है , जो बहुत कष्टकारी होते हैं , बच्चो में अक्सर चैत्र मॉस में 
चेचक और खसरा भी इसी का परिणाम है। 


इसी कष्टकारी पीड़ा को दूर करने के लिए हमारे ऋषियों ने होली नामक उत्सव को मनाने की 
परम्परा का प्रारम्भ किया था ,


इसमें पूर्णिमा को चांदनी रात में आग जलाकर हवन करके वातावरण को इतना गर्म कर दिया जाता है कि शरीर से पसीना निकलने लगे और शरीर के रन्द्र खुल जाए , फिर क़िसी 
भीगे कपडे से शरीर को साफ कर लिया जाता है। 


अगले दिन टेसू /पलाश के फूल जो पहले दिन पानी में भिगो दिए जाते है उनको पिचकारी 
की सहायता से एक दुसरे पर डालकर होली मनाते है जिसमे कपडे फूलो के रंग से काफी टाइम तक भीगे रहने की वजह से पसीना जो अम्लीय होता है और टेसू जो क्षारीय होता है ,
त्वचा को उदासीनीकरण कर देते हैं।  आपने देखा होगा कि घमौरियों के लिए भी केल्शियम 
कार्बोनेट पाउडर लगाकर उदासीनीकरण करके (जो कि ठोस रूप में होता है ) त्वचा को 
और नुक्सान पहुचाते है रंद्र को रोक देते हैं , जबकि तरल रूप में होली खेलकर हम पूरे साल में एक बार अपने शरीर की शुद्धि ही नहीं पूरे समाज को स्वस्थ रखते है , पर ध्यान रहे रासायनिक रंगो से नहीं। 


देर से ही सही पर अपने ऋषियों की परम्परा को सनातन वैज्ञानिकता से जीवित रखिये 
और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का सन्देश का दुनिया को दीजिये !!
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14 comments on original post
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Chanakya sharma's profile photo
 
+Dilipkumar Tiwari - This is important but our temple poojari and saint are buzy  in to earn money .

They have no time to educate our peoples .
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