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Dr.Raghunath Misra 'Sahaj'
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name: raghunath misra, advocate and personality development advisor.I am a poet, writer, author dramatist, literary and cultural critic, honourary literary editor and publisher.
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'सहज' के दोहे
रचनाकार- डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' विधा-  दोहे जीवन है अनमोल यह, इसको नहीं बिगाड़. यह है दुर्लभ से मिला,समझ नहीं खिलवाड़. सोच सार्थक हो सदा,दिन कैसे भी होयँ. निश्चित काटेंगे वही, जो खेतों में बोयँ. सदा सफलता के नियम,रहें अटल ले मान. इसी लिए तू कर जतन,छोड़ सभी अभिम...
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'सहज' के दोहे
रचनाकार- डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' विधा-  दोहे जीवन है अनमोल यह, इसको नहीं बिगाड़. यह है दुर्लभ से मिला,समझ नहीं खिलवाड़. सोच सार्थक हो सदा,दिन कैसे भी होयँ. निश्चित काटेंगे वही, जो खेतों में बोयँ. सदा सफलता के नियम,रहें अटल ले मान. इसी लिए तू कर जतन,छोड़ सभी अभिम...
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Dr.Raghunath Misra 'Sahaj' commented on a post on Blogger.
यहाँ भारतीय मुद्रा -महिला -प्यार -विश्वास सभी का घोर अपमान देख कर अंदर से आहत महसूस कर रहा हूँ।सोनम-आनन्द दोनों को सोहरत-पैसे-धन-वैभव दोनों चाहिए थे। आनन्द का प्यार सच्चा था,जो सोहरत-धन-प्रसिद्धि के आगे झुका नहीं और हर हाल में वह सोनम के प्यार में कमी नहीं आने दी।प्यार तो प्यार के बदले प्यार भी नहीं चाहता।प्यार में अपेक्षा-माँग-लोभ-लालच विष हैं।प्यार का सच्चा उदाहरण/आदर्श राधा -मीरा और ऐसे अनेक हैं।मित्रता का उदाहरण ,महाभारतीय परिशिष्ट में, अर्जुन एक बेमिसाल है,जिसके लिए स्वयम् क्रिष्ण ने यहाँ तक कह दिया कि, 'यदि मेरा पुनर्जन्म मनुष्य के रूप में हो तो मैं मनुष्य बनूं"। वाकई सोनम का इस तरह , धन-वैभव -पदक-प्रतिषठा के लिए बदल जाना, प्यार का गला घोंटना है।बहुत ही नकारात्मक संदेश देता है और सीख भी कि प्यार में लोभ-लालच-अपेक्षा-माँग को कोई स्थान नहीं।आनन्द अपनी जगह सही होते हुए भी सवाल खड़ा करता है कि भले ही सोनम का प्यार बिका लेकिन उसने जो सोनम पर नोटों की बारिश की, वह धन का अपमान है। हालांकि यह कहानी हर तरह से नकारात्मक संदेश देती है, लेकिन प्रेमियों के लिए सकारात्मक संदेश भी है कि प्यार समर्पण चाहता है-स्वार्थ नहीं।अब देखें दोनों में से दोनों के हाध निराशा ही लगी-अपेक्षाओं के चलते।
मेरी राय में ऐसी नकारात्मक कहानियों को मंजरे आम करना ही गैर समझदारी है।
-डा०रघुनाथ मिश्र 'सहज'
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Dr.Raghunath Misra 'Sahaj' commented on a post on Blogger.
डॉ.साधना प्रधान जी की समीक्षा का स्वागत करते हुए गर्वान्वित महसूस कर रहा हूँ.मुझे इसलिए भी गर्व है की आदरणीय दादा ओम नीरव जी द्वारा सम्पादित, इस अद्भुत शोध ग्रन्थ , ''गीतिकलोक' के सुल्तानपुर में संपन्न लोकार्पण समारोह का मैं साक्षी हूँ. डॉ. साधना प्रधान की विषद-शोधपरक-गंभीर समीक्षा अति सराहनीय और समीक्षकर्मियों के लिए सीख है.
समीक्षक को सादर बधाई.
-डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज '
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