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Padmasambhava Shrivastava
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By building relations we create a source of love and personal pride and belonging !
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अनुप्रिया के रेखांकन : बहती नदी की व्यथा
बिहार की कोसी नदी ​धार बदल -बदल बहती है.​पर्वतीय नदी की तरह खिलंदड़ ! सरपट बहती किनारों पर बसे गाँवों के मंडईयों , सूखते तालाबों को लीलती पसर जाती है.अनुप्रिया का बचपन इन्हीं गाँवों के इर्दगिर्द बीता है. घनेरे आम्रकुंज , बाँसवाड़ी, कस्बाई...

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Padmasambhava Shrivastava commented on a post on Blogger.
शब्दातीत भावात्मक लोक में सुप्त ज्वालामुखी का स्फोट अंतर्लीनता के क्षण की चीत्कार है, जिसकी वैचारिक स्थापना प्रस्तुत दीर्घ कविता के मुक्त होने के बाद अनुभूति होती है।

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निर्भया कांड की हर बरसी पर हम और आप खुद से एक ही सवाल करते हैं कि तब से अब तक बदला क्या? क्या औरतों की सुरक्षा को लेकर वो डर कम हुआ जिसने 16 दिसंबर 2012 के बाद हममें से कइयों को सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दिया था?

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क्‍या यह माना जाए की बिहार की नई नीतीश-तेजस्वी सरकार ने अपने कामकाज की ठोस शुरुआत कर दी है। सरकार में हो रही हलचल को इस रूप में देखा जा सकता है। हालांकि यहां ठोस शुरुआत का मतलब यह है कि नई सरकार ने दलितों और पिछड़े वर्गों को प्राथमिकता देने का काम शुरू कर दिया है। आपको बता दें कि नई सरकार के गठन में इसी वर्ग का खासा योगदान रहा था। ठोस शुरुआत का संकेत सरकार ने महाधिवक्ता की नियुक्ति के रूप में दिया है। पहले यह माना जा रहा था कि इस अहम पद पर नियुक्ति को लेकर नीतीश व लालू के बीच टकराव होगा। वजह यह कि नीतीश कुमार अपने विश्वासपात्र पीके शाही को यह जिम्मेवारी देना चाहते थे। लेकिन लालू प्रसाद शाही के पक्ष में नहीं थे। आपको बता दें कि राजनीतिक गलियारे में यह पद काफ़ी अहम माना जा रहा था। लालू चाहते थे कि महाधिवक्ता और उनकी टीम में दलित और पिछड़े शामिल हों। इस अहम सवाल का महत्व का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि बीते सोमवार को लालू प्रसाद उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास पहुंचे और उनके साथ विचार-विमर्श किया। नई सरकार के लिए सामाजिक न्याय कितना महत्वपूर्ण है, यह फ़ैसला एक लिटमस टेस्ट के जैसा था। इस टेस्ट में नई सरकार सफ़ल को सांकेतिक रूप से सफल माना जा सकता है। लालू-नीतीश ने मिलकर रामबालक महतो को महाधिवक्ता पद की जिम्मेवारी दी। हालांकि इससे पहले भी वे राज्य के महाधिवक्ता थे। लेकिन तब हालात दूसरे थे। तब पीके शाही राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री थे और राज्य की न्यायिक व्यवस्था में उनकी अहम भूमिका थी। अब वे सरकार हाशिए पर हैं। ऐसे में राम बालक महतो का महाधिवक्ता बनाया जाना खासा महत्वपूर्ण है। बहरहाल, सवाल केवल महाधिवक्ता की नियुक्ति का नहीं है। महाधिवक्ता की टीम में लालू प्रसाद के विश्वासपात्र व वरिष्ठ अधिवक्ता सूर्य नारायण यादव को भी शामिल किया गया है, जो यह साबित करने के लिए काफ़ी है कि राज्य सरकार के इस अहम निर्णय में लालू प्रसाद की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में सरकार के इस निर्णय का दूरगामी प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। वजह यह कि पिछली सरकार के समय कई ऐसे फ़ैसले आए थे, जिनसे सामाजिक न्याय पर प्रतिकूल असर पड़ा था। इनमें विभिन्न नरसंहारों का फ़ैसला भी शामिल है, जिनके आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था। बहरहाल, अब देखना यह है कि लालू की पसंद के महाधिवक्‍ता चुनने में नीतीश की रजामंदी के कितने अप्रत्‍यक्ष और प्रत्‍यक्ष फायदे हैं। जाहिर है यह सियासी गणित है इसमें कोई भी फैसला हित परहित को नजर अंदाज किए बिना नहीं लिया जाता।
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