Profile cover photo
Profile photo
Madhav sharma
69 followers -
खुद के बारे में लिखना और बताना इतना आसान नहीं होता क्योंकि...
खुद के बारे में लिखना और बताना इतना आसान नहीं होता क्योंकि...

69 followers
About
Communities and Collections
View all
Posts

Post has attachment
कौन अच्छा है? 
मैंने कहा, तुम
उसने फिर पूछा,सच बताओ
तुम सच में बहुत अच्छी हो, मैंने फिर कहा।
अच्छा?
हां  तुम सच में बहुत अच्छी हो
बताओ तो कितनी? ख़ामोश आंखों से उसने पूछा
इस बार मैं कुछ ना बोल सका क्योंकि
मैंने  तुम्हारी अच्छाइयों को तराजू लेकर तौला नहीं कभी
समंदर की गहराई को नाप सका है क्या कोई?
या आसमां के पार देख सका है कोई?
फिर मैं कैसे पा लूं थाह तुम्हारी
जब भी पूछोगी कि कितनी
मैं तुम्हारी आँखों सा ख़ामोश हो जाऊंगा...
Add a comment...

Post has attachment
शाम ढल कर रात बन गई है। मेरे घर के सामने पाखर के पेड़ के पत्ते खड़खड़ा रहे हैं मानो किसी के आने की सूचना दे रहे हों। बारिश इस किसी के आने को और पुख़्ता कर रही है। खिड़की के शीशे से बूंद झर-झर गिर रही हैं। सड़क पर बह रहा पानी दरिया सा महसूस हो रहा है। रात की रोशनी इस दरिया को झेलम सा बना रही है। दरिया के सामने वाले घर पाकिस्तान लग रहे हैं और उधर से आवाज़ आ रही है...
Add a comment...

Post has attachment
अक्टूबर के फूल
उसे फूल पसंद थे। उसे फूल चुनना पसंद था। घास में पड़े फूल उठाकर कटोरी में भर लेना भी उसे बेहद पसंद था, लेकिन फूलों के गिर जाने पर उन्हें ना उठाने वाले उसे बिल्कुल पसंद नहीं थे। बेतरतीबी भी उसे पसंद नहीं थी। पसंद थे तो सिर्फ फूल। झक सुफेद जिसके माथे पर लाल बिंदी लगी होती है वही फूल। एक दिन फूल गिरा लेकिन कोई उसे समेट नहीं पाया। समेटने वाली खुद सिमट गई ICU की मशीनों से। उसके सिमटते ही घास पर चादर बिछना बंद हो गई। सारे फूल गिर कर मुरझाने लगे। फूल की खुशबू की जगह दवाइयों की गंध ने ले ली। मुरझाये फूल भी महक रहे थे लेकिन उसकी पहुंच से दूर। फिर कोई बेतरतीब आया कटोरी में फूल लेकर। मशीनों की आवाज़ों के बीच फूल उसके सिरहाने रख दिये गए। उसके नथूने फूले, फूलों ने कमाल कर दिया। बेतरतीब रोज फूल लाने लगा। वो फूल देखकर फूली नहीं समाती लेकिन ज़ाहिर नहीं कर सकती। फिर एक दिन बेतरतीब चला गया। उसका जाना फूलों की महक के जाने जैसा था। मशीनें फिर भारी होने लगीं। बेतरतीब लौट आया, महक भी लौट आई।
लेकिन जब तक वो लौटा महीना बीत चुका था। फूल खिलने का मौसम रीत गया था। वो मुरझाकर लाश बन गई थी।
वो अक्टूबर का ही महीना था। वो अक्टूबर के फूल थे...लाल बिंदी वाले।
#october #varun #moviereview #october

अक्टूबर के फूल http://meribakhar.blogspot.com/2018/06/blog-post.html
Add a comment...

Post has attachment
ये दुनिया अब हम सबके लिए वो खिड़की हो गई है और इस खिड़की के सामने से गुजरने वाला हर किरदार हमारे लिए बेहद सामान्य। पहाड़ के उस तरफ बहती नदी की आवाजें हमारी स्मृति में नहीं है, क्यों कि पहाड़ को चीर कर हमने उसकी रोड़ी से घर चुन लिए हैं। क्या आपको अपने घर की दीवारों से पहाड़ के चीखने की आवाज़ें नहीं आती? उसके पार  बहने वाली नदी हमारी आंखों की तरह सूखी नहीं दिखती? क्या हम सुर्ख नहीं हो गए हैं नदी के पाटों की तरह।
Add a comment...

Post has attachment
हे! राम, कितने राम
 
चलो राम जी
उनका नाम घमंडी था लेकिन स्वभाव ऐसा कि बोलें तो दिल पसीज कर फाहा बन जाए। माथे से पीला चंदन कभी मिटा हुआ नहीं देखा मैंने। सुबह गायों को हांकते हुए भी उन्हें कहते थे, चलो राम जी...
 
बॉक्स वाले राम
पीले रंग के बड़े से कागज में कई छोटे-छोटे बॉक्स बने हैं। गर्मियों की छटि्टयों में उन बॉक्सेज को राम नाम से भरने की प्रतियोगिता हो रही है। कई सालों से बुजुर्ग अपने राम इन बच्चों के नाम करते आ रहे हैं। ये बच्चों के राम हैं। 
 
राम-राम मास्टर
मेरा दोस्त है फिरोज, उसके दादा हैं मुश्तू। अपनी बकरियां चराने घर से सामने होते हुए ही निकलते हैं, आधे घंटे पहले ही बकरियां दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाती हैं। जब खुद आते हैं तो बिना राम-राम मास्टर कहे निकल नहीं पाते। उनकी बकरियां भी उनसे पहले आकर बोलती हैं, राम-राम मास्टर। 
 
राम-राम नहीं ली? 
उन्होंने पास से गुजरते हुए उन्हें राम-राम कहा। वह सुन नहीं पाए और आगे बढ़ गए। कुछ दिन बाद घर में कुछ लोगों का खाना-पीना हुआ और वह नहीं आए। क्योंकि उस दिन उन्होंने उनकी राम-राम नहीं ली थी। 
 
गुस्से वाले राम
घर में एक संदूक है जो तब खुले में रखा था। बाबरी वाला साल याद नहीं लेकिन कई साल बाद भी संदूक पर गुस्से में तीर ताने राम थे।  जो बच्चे देखें तो डर ही जाएं। 
 
छप्पर वाले राम
मंदिर ट्रक में बैठा हुआ है और राम तिरपाल के नीचे। तेज शोर है हिंदूओं को जगाने का। अगर वही असली राम हैं तो ऊपर वाले राम कौनसे राम हैं, किसके राम हैं?
Add a comment...

Post has attachment
एक नदी
बहती कल-कल
घाटों पर रुके हुए लोग
देखते उसकी निश्छलता, उसका वेग

अब नदी है नाला
आदत नहीं छोड़ी नदी ने
बह रहा है फिर भी कल-कल
लेकिन घाटों पर नहीं हैं लोग
कौन देखे उसकी निश्छलता, उसका वेग
ये नदी नहीं, हमारी पीढ़ी की है त्रासदी
एक नदी...बहती थी जो कल-कल
Add a comment...

Post has attachment
अक्सर मुझे कई चीजें बहुत देर से मिलती हैं
कविता, किताब,कहानी या फिर कोई अच्छा इंसान...
जब मैं दूसरों से कहता हूं तुमने वो कविता पढ़ी क्या?
फलां किताब बहुत अच्छी है, वो इंसान तो बहुत ही अच्छा है
सुनकर हँसने लगते हैं लोग खिलखिलाते हुए कहने की कोशिश में.. तुझे अब पता चला है?
तब थोड़ा सहम जाता हूँ मैं और उदास हो जाता हूं अपनी रफ़्तार पर। 
फिर मैं हँसने लगता हूं उन हंसने वालों
पर, थोड़ा गुस्सा भी। 
कितने स्वार्थी हो तुम 
जब बिकती है कोई किताब या चर्चा में होती है कोई कविता
तब तुम सब उसे पढ़कर छोड़ देते हो दराजों में, अकेला हो जाता होगा वो इंसान जो भीड़ से घिरा रहता होता था हर वक़्त
और जब वो हो जाते हैं एकदम अकेले तब 
मैं पहुंचता हूं उन दराजों तक
जमी हुई गर्द झाड़ता हूँ 
बीच में लगे बुक मार्क लगा देता हूं पहले पन्ने पर
तब मुस्कुरा जाती हैं किताबें, कविताएं और वो इंसान
अक्सर...
Add a comment...

Post has attachment
अक्सर हम लड़के कभी किसी से कुछ नहीं सीखते
होते हैं लापरवाह, फक्कड़, अनाड़ी, मनमर्ज और बदतमीज
झेलते हैं बड़ों की झिड़क, गुस्सा और मिलता है ताना
...लेकिन जब कोई लड़का हो जाता है प्रेम में
वो सीखने लगता है
हर्फ़ दर हर्फ़ कुछ लिखने लगता है
समझने लगता है आंखों के इशारे
उंगलियों के स्पर्श से बुनने लगता है कुछ फाहे से सपने
गिनने लगता है अपनी धड़कनों को
सुनने लगता है अपनी सांसों को
लिखने लगता है कविताएं और सजाने लगता है अपनी ज़िन्दगी को
हर लड़का हो जाता है तब बुद्ध सा जब वो प्रेम में होता है।
लड़के
लड़के
meribakhar.blogspot.com
Add a comment...

Post has attachment
एक रुपये में बीसियों दुनिया खरीदी हैं मैंने
उंगलियों में घुमाकर गड्डों मेंं यूं ही डाल दिया करते थे
तब हर बच्चे की जेब में हर रंग की दुनिया रहा करती थी
नीली, लाल, चटक हरी और बैंगनी दुनिया...
टूटती थी, फूटती थी और खो भी जाती थी
जेबों से ऐसे ही गिर जाती थीं, इतनी थी कि गिनने में कम पड़ जाती थी
मगर फिर भी आसानी से और मिल जाती वैसी ही रंग-बिरंगी दुनिया
वो दुनिया जो हमारे इशारों पर टिकी थी,
एक आंख बंद कर सैकंडों में इधर से उधर पलट दी जाती थी
हम सब रोज अपनी दुनियाएं बदला करते थे
कुछ घंटों के युद्ध में कितने ही मुल्क हार-जीत लिया करते थे
फिर भी अगर माधव को फिरोज की दुनिया का रंग अच्छा लगा तो फिरोज से चार के साथ एक मुफ्त मिल जाती थी
ये सहिष्णुता भी थी।
काश! ये दुनिया कांच के उस कंचे के अंदर दिख रही दुनिया होती
हम सब अपने-अपने रंग अपनी जेबों में रखते
जब मन करता किसी से बदलते
हवा में ऊपर उछालते और वापस लपक लेते
खेलते, कूदते, हंसते, इठलाते...
असल दुनिया की सीमाओं से बेफ़िक्र होते
काश! हम सब उन बच्चों जैसे होते...
काश!...
Add a comment...

Post has attachment
अगर ना बनती ये सड़क तो
बारिसों में खरंजों से रिसते कांच से पानी में लात मार उसे मैला करते दिख जाते कुछ बच्चे
अगर ना बनती ये सड़क तो
बड़ के पेड़ से तोतों के बच्चे निकाल खेल रहे होते कुछ और दूसरे बच्चे
अगर ना बनती ये सड़क तो
मेड़ों से गुजरते हुए उनमें हुए छेद भी ठीक कर रहे होते कुछ बुज़ुर्ग
अगर ना बनती ये सड़क तो
ताल की पाल पे यूँ ही सूख नहीं जाते नीम के सैंकड़ों पौधे
अगर ना बनती ये सड़क तो
उस कुएं के घाटों पर बने रस्सियों के निशान थोड़े और गहरे हो गए होते
गहरे हो गए होते पूरब में बसे उन दलित बस्तियों से कुछ रिश्ते
अगर ना बनती ये सड़क तो....
बहुत कुछ था जो टूटने/ छूटने से बच जाता...
Add a comment...
Wait while more posts are being loaded