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Kb Rastogi
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आज कुछ लीक से हट कर।
कवियों के लिए कहा गया है "जहां ना पहुंचे रवि, वहाँ पहुचे कवि"
शायद इसलिए कि वह अपनी कल्पना की उड़ान से एक नई दुनियां में प्रवेश कर जाता है जो कि वास्तविकता से परे होती है।
लेखक भी कवियो की तरह ही अपने लेखन में, कल्पनाओं की तूलिका से कुछ ऐसे रंग भर देते हैं जो पाठक को उन्ही रंगो में रंग देते हैं।
एक लेखक के पास विचारो की एक श्रंखला होती है। वह कभी भी किसी भी विषय पर लिखने बैठ जाता है।
वह अपनी भाषा - शैली से एक ऐसा तारतम्य बना देता है कि पाठक उसी में खो जाता है।
बात आती है विषय की , तो बचपन में एक कहानी पढ़ी थी " साईकिल की सवारी " लेखक थे सुदर्शन।
कहानी में लेखक को साईकिल चलानी नहीं आती है, जबकि उसके बच्चे सीख कर उसके सामने से चलाते हुए निकलते हैं तब वह सोंचता है उसे भी सीखना चाहिए , कोशिश करता है , साईकल चलाना सीखने के लिए एक ट्रेनर भी रखता है लेकिन विफल हो जाता है।
यह उनके लेखन का प्रभाव था कि उनकी यह कहानी पाठ्य पुस्तक में शामिल की गई थी।
ऐसे ही एक कहानी याद आती है कि लेखक अपने बाल कटवाने नाई की दुकान पर जाता है , सोंचिए क्या नाई के बाल काटने पर भी लेख लिखा जा सकता है ;परन्तु लेखक ने उसके बाल काटने की कला को अपने शब्दों में पूरो कर एक पूरा लेख लिख दिया ।
उसे लेख कहो या कहानी वह भी पाठ्य पुस्तिका में शामिल कर ली जाती है।
यही कह सकते हैं लेखन एक कला है। लेखक अपने शब्दों के मायाजाल में बाँध कर पाठक को ऐसा मंत्रमुग्ध कर देता है कि पाठक उसी में खो जाता है ।
ऐसे ही आज भी कई लोग हैं जो अपने लेखन से पाठक को मजबूर कर देते हैं उसके लेख को पढ़ने के लिए।
वास्तव में लेखन एक कला है एक विधा है जो सभी में नहीं होती है।
किसी भी विधा पर किया गया लेखन समूचीलेखक की लेखन कला का चेहरा प्रस्तुत करता है।
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राजधानी एक्सप्रेस में फर्स्ट AC की यात्रा
कई लोगो में अहंकार तो कूट - कूट कर भरा होता है विशेष रूप से जब वह राजधानी के  फर्स्ट AC से सफर कर  रहा होता है। लगता है वह सफर करने नहीं बल्कि फाइव स्टार होटल में खाने के लिए आये हैं। अभी दो हफ्ते पहले ही बम्बई  जाना हुआ , आजकल रेलवे की  फ्लेक्सी फेयर स्कीम...
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रेलवे के अकर्मण्य अधिकारी
अधिकारी किस तरह से मैनेजमेंट को सब्जबाग दिखा कर अपना उल्लू साधते हैं इसका एक किस्सा है। बात  करीब तीस वर्ष  पहले एक टीवी कंपनी की  है  , उस समय कम्पनी की दिल्ली की बिक्री लगभग 25 लाख़  महीने की थी , मार्केटिंग  स्टाफ पर हर समय कंपनी की सेल बढ़ाने का दबाव रहता...
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रेलवे में फ्लैक्सी किराया प्रणाली
एक  कहावत है ,  चौबे जी गए छब्बे बनने लेकिन बन के लौटे  दुबे।  या फिर आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे।  इस तरह की कहावते आज के समय में  भारतीय रेल के अधिकारियो  के ऊपर पूरी तरह से चरितार्थ हैं।   इन अधिकारियों ने मुंगेरी लाल के  हसीन  सपनो की तर...
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