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pankhuri gupta
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औरतें कलाकार होती हैं
औरतें खुश हो जाती हैं छोटी छोटी चीजों में मसलन टीवी पर उनकी पसंद का चैनल चला दिया
जाए या फिर किसी दिन उनके खाना बनाने की छुट्टी
कर दी जाए ऐसी ही तमाम छोटी छोटी
बातें क्योंकि वो जानती हैं बड़ी बातें बड़ी चीजें उनके लिए नहीं हैं उस बारे में बात करना ही
उन्हें ज...

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आज एक दिन
आज एक दिन मैं शिकायत नहीं करुँगी अपने अधिकारों की बहने नहीं दूंगी आँखों से भावों को भूल जाउंगी इस निष्ठुर समाज का सच स्त्री पुरुष के वर्चस्व की दौड़ दिन के उजाले में जन्म दूंगी सपनों को पलकों के झूले पर झुलाउंगी सिखाउंगी उड़ना नन्हे नन्हे सपनों को हौसलों के प...

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शहीद की चिट्ठी
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर प्रकाशित मेरी रचना "शहीद की चिट्ठी" उन सभी परिवारों को मेरा नमन है जिन्होंने अपने बेटों को देश की खातिर खो दिया । उन सबको दिल से सलाम । जय हिन्द ~~~पारुल'पंखुरी' शहीद की चिट्ठी माँ, कल छब्बीस जनवरी है ;मुझे गए हुए भी छब्बीस ह...

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रचनाएँ
दोस्तों एवं परिवार के सदस्यों आप सबकी शुभकामनाओं से आज दिल्ली/एनसीआर के अखबार ट्रू टाइम्स में मेरी दो रचनाओं को प्रकाशित किया गया है मैं सम्पादन टीम की ह्रदय से आभारी हूँ । आप सभी का भी हार्दिक आभार रचनाओं पर अपना स्नेह यूँ ही बनाये रखियेगा | ~~~पारुल'पंखुर...

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Happy women's Day
अरे सरिता मेरे जूते कहाँ हैं ?हजार बार तुम्हे कहा है की इन्हें साफ़ कर के पोलिश कर के रखा करो । और ये क्या है इस सूट के साथ ये टाई !!! तुम 10 साल बाद भी गवार की गंवार ही हो एक चीज भी बदल नहीं पायी तुम अपने अंदर । चलो अब मुझे ही देखती रहोगी या नाश्ता भी लगाओग...

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होली का गीत
होली का गीत सुनने के लिए नीचे  दिए  लिंक पर क्लिक कीजिये https://soundcloud.com/parul-gupta-2/holi-ka-geet अ र र र र र र र र ... हो फागुन रंग रंगीला आया मस्ती होली की ले आया तन मन रंगों सा हरसाया मिलकर धूम मचाये री इइइइ अ र र र र र र र र ... हो कोई पिचकारी ...

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बारिश की किसानों पर मार
विधा-- हाइकु बेवक़्त वर्षा किसान पर मार धान बेकार सपने बोता हलधर बरसों रोई सरसों फागुन गीत कृषक कैसे गाये फसलें रुलाएं सीलता चूल्हा महंगाई की मार खेप बेकार और आखिर में एक विनती ईश्वर से .... थामो बारिश रहम बरसाओ सूर्य दिखाओ -पारुल'पंखुरी' चित्र - साभार गूगल 

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pankhuri gupta commented on a post on Blogger.
वाह  क्या खूब लिखा है ! सुन्दर और सटीक व्यंग है आदरणीय 

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मै २०१४ हूँ
भोपाल के दैनिक लोकजंग अखबार में २ जनवरी २०१५ को प्रकाशित मेरी रचना : अतीत के पन्नों को फिर से दोहराने आया हूँ मैं 2014 हूँ अपनी व्यथा सुनाने आया हूँ बदलेगा दिन और तारीख़ फिर साल बदल ये जाएगा मेरे मन के ताजा..जख्मों पर मरहम कौन लगाएगा कुछ देर है अभी 2015 के आ...

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कोहरे की चुनरी
कोहरे की चुनरी ओढ़े रात जब शबाब पर आती है  सफ़ेद धुएँ के  साये में ज़ेहन  अक्सर तेरी यादों का कम्बल बुना करता है ठिठुरती रात हाथ  कंपकंपाती है बदन सिहरा जाती है लपेट लेती हूँ तब बुनते बुनते ही अपने चारों तरफ और महसूस करती हूँ एक अलाव  सीने में जलता हुआ  आँखों ...
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