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Binay Shukla
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हिंद वालों से ही हिंदी को खतरा 1

आज इंडिगो में दिल्ली से कलकत्ता यात्रा के दौरान वाराणसी एयरपोर्ट पर एक हाल्ट के लिये उतारा गया। आगे दूसरे विमान से जाना था। इंडिगो के एक ग्राउंड स्टाफ से कुछ पूछा उन्होंने मुझसे हिंदी के बजाय अंग्रेजी में जवाब दिया। घंटे भर के अंतराल में उनसे तीन बार भेंट हुई हर बार उन्होंने मात्र अंग्रेजी में ही चर्चा की।जब विमान में चढ़ने लगा तो वे फिर मिले।इस बार विमान के अंदर तक आए।जाने क्यों मेरे मन मे चुहल करने की इच्छा हुई।मैंने उनसे कहा,भाईसाहब यदि बुरा न मानें तो एक बार पूछूँ।
दो बार कबूल करवा लिया कि बुरा नहीं मानेंगे तो मैंने आखिरकार पूछ ही लिया,
'ये बताइये,आपको हिंदी नहीं आती,या जितने यात्री इस विमान में चल रहे हैं उन्हें हिंदी नहीं आती कि आप सबसे अंग्रेजी में ही बात करते हैं?
सज्जन थोड़ा सा हिले और बोले, नहीं ऐसी बात नहीं।यहाँ से ज्यादातर अंग्रेज ही यात्रा करते हैं इसलिये हम अंग्रेजी में ही बात करते हैं।
मैं बड़ा गदगद हुआ कि चलो शायद मुझे भी अंग्रेज समझ रहे हैं इसलिए अंग्रेजी में बात की।मेरी छाती चौड़ी हो गई।पर मेरा प्रश्न जस का तस रहा।
मैंने फिर कहा, क्या आपको मैं अंग्रेज लगा,या बाकी सब यात्री अंग्रेज?
उन्होंने बचाव की मुद्रा में कहा, नहीं ऐसी बात नहीं है।हमें दो ही भाषा मे बात करने की इजाजत है,एक अंग्रेजी और....
मैं सोच रहा था कि दूसरी कोई और विदेशी या देशी भाषा हो
पर दूसरी भाषा के रूप में हिंदी का नाम सुन मैं आक्रामक हो गया
मैंने कहा,आप जिस प्रदेश में हैं उसकी भाषा हिंदी है फिर भी आप भारतीय यात्रियों से भी अंग्रेजी बोल रहे हैं बगैर यह जाने की आपकी भाषा वह समझ पा रहा है या नहीं।यह तो बड़े दुख की बात है। कम से कम जो चेहरे और रंगरूप से भारतीय लगे उनसे तो हिंदी में बोल लिया कीजिये।कभी समय मिले तो अकेले में सोचियेगा कि क्या उचित है।
मैंने फिर दुहराया,मेरी बात का बुरा तो नहीं मान रहे हैं?
उन्होंने भी कहा, नहीं बिल्कुल नहीं।
मैंने फिर कहा बुरा मत मानियेगा और सोचियेगा जरूर।
उन्होंने भी कहा जरूर सोचूंगा,
और फिर मैं कविता लिखने में व्यस्त हो गया।

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अब जाकर लग रहा है कि होली खेली
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श्रीमती माला वर्मा जी की नवीनतम पुस्तक।माला वर्माजी एक कुशल गृहिणी होने के साथ ही अच्छी लेखिका भी हैं।अबतक विश्व के 36 देशों की यात्रा कर चुकी हैं।अपनी हर यात्रा की कहानी अपने डायरी में लिखती रहती हैं।जैसे ही भारत आती हैं,समस्त अनुभवों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवा देती हैं।यात्रा संस्मरण की उनकी समस्त पुस्तकें हिंदी भाषा मे यात्रा विचरण एवं गाइड के रूप में बहुत ही कारगर है।मेरे विचार से हिंदी में सुदूर देशों की यात्रा का जीवंत विवरण जितना उन्होंने अपनी पुस्तकों में लिखा है वैसा मिलना मुश्किल है।
प्रस्तुत पुस्तक भूषण प्रकाशन,हलिशहर,कलकत्ता द्वारा प्रकाशित किया गया है।अमेजन पर भी उपलब्ध है।
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बांग्ला भाषा पढ़ने वाले मित्रों के लिये एक जानकारी
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आज विश्व भाषा दिवस है। यूं तो भाषा बहुत ही सूक्ष्म और तुच्छ लगती है पर कभी कभी इसकी पीर इतनी असर कर जाती है कि राष्ट्र अलग हो जाते हैं,जब देशों का यह हाल है तो फिर परिवार का क्या होगा।
विश्व भाषा दिवस की ढेरों शुभकामना।

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हिंदी के विकास में सर्वाधिक योगदान किसका है
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