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Ajay Tripathi
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आखिर सांसद के दोनों सदनों की कार्यवाही/ गतिविधि और महत्वपूर्ण आवश्यक मुद्दे को जनता तक नीतिगत पहुंचाने के लिए टीवी चैनल हैं, जिनके माध्यम से प्रसारण का कार्य किया जाता है. वीडियो बनाना और प्रसारण करना मीडिया का काम है तो क्यों न उन्हें ही करने दिया. रही संसद की कार्यवाही संचालन हेतु जागरूकता की बात तो उस हेतु भी काफी प्रिंट और वीडियो सामग्री उपलब्ध है. फिर माननीय अपनी उर्जा ऐसे विषयों में क्यों खर्चे? वह क्यों न अपनी पूरी शक्ति अपने चुनावी क्षेत्र की समस्याओं और उनके निस्तारण में लगाए.
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मेरी मंशा किसी भी रूप में दयाशंकर सिंह के वक्तव्य का समर्थन करना नहीं है अपितु उन्होंने माफ़ी मांग ली और पार्टी से निष्काषित हो चुके हैं, प्राथमिकी दर्ज कर गिरप्तारी हेतु दबिश भी जारी है. देर-सबेर गिरप्तारी भी हो जाएगी. इसके उपरान्त भी प्रदर्शन कर अपशब्द कहे गए, जिह्वा काटने पर ईनाम का एलान किया गया. यह भी उतना ही निंदनीय है. उचित यह होता की आप व्यवस्था के तहत न्याय का इंतज़ार करते या गाली का जवाब गाली से या नंगई से देने के बजाय शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते. इससे समाज में भी पॉज़िटिव एनर्जी जाती.
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अब देखना यह है जिस शीला दीक्षित को उन्नाव के बहू के रूप में अपनी पहचान देने की अवश्यकता पड़ रही है. उस बहू को क्या यूपी वाले स्वीकार कर सेवा करने का एक मौका देते हैं? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. पर इतना तो तय है की शीला दीक्षित के आने से कांग्रेस के कार्यकर्ता और कांग्रेस पार्टी फिर से पुनर्जीवित हो जाएगी  और पार्टी का वजूद पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर स्थिति में होगी.
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ग्रामीण भारत में घर की महिला ही भोजन बनाती है और साफ भोजन के लिए जरूरी है की वह पहले आपने हाथ साफ करे लेकिन गाँव की कोई महिला ऐसा नही करती. अधिकांश औरते कहती हैं की यदि हाथ में कुछ लगा रहा तो पानी से हाथ धुल लेती हैं नहीं तो कपडे से पोंछकर काम में लग जाती हैं. उसी हाथ से खाना बनाने के दौरान आग कम होने पर उपला और लकड़ी भी डालती जाती हैं. किसी-किसी घर में तो चूल्हे के धुएं की उचित निकासी की व्यवस्था भी नहीं होती. महिलाएं भी सबके खाने के बाद याद रहने पर हाथ धुल लेती हैं नहीं तो साड़ी या किसी भी कपडे में हाथ पोंछ कर खाना खा लेती है. आंगन में मक्खियों का साम्राज्य रहता है आप चाहे जितना भी बचना चाहों पर बच नहीं सकते एकाध मक्खी तो खाने पर बैठ ही जाती है.
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लोग लाइक पाने के लिए अलग-अलग पोज, अलग-अलग जगह और अलग-अलग करतब करते हुए अपनी फोटो खींचकर सोशल नेटवर्किंग साइट पर महज लाइक पाने की लालशा से अपलोड करते हैं और लाइक  मिलने पर स्माइली फेस और डिसलाइक्स मिलने पर उदास फेस बना लेते हैं.  उनकी प्रसन्नता और उदासी महज एक ‘क्लिक’ में छुप गयी है. लोग जल्दी सुबह और देर रात में अपनी फोटो पोस्ट करते हैं और आपसे उम्मीद करते हैं की आप उसे उसी वक्त लाइक करेंगें. साहबजी! यह फोटो और सेल्फी का दौर है जिसमें हम बहुत गहरे फंसते जा रहे हैं.
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बात पोर्नोग्राफी की हो, तो समाज के तथाकथित लोगों को तीन चिंताएं अधिक सताती हैं- यौन हिंसा, इसकी लत लगना और बच्चों को इससे बचाना.
1. जहां तक पहली चिंता की बात है यौन अपराधों और पोर्नोग्राफी में कोई संबंध नहीं पाया गया है. दुनिया में कई अध्ययन किए गए हैं और इसमें कोई ऐसा सबूत नहीं मिला है. महिलाओं के खिलाफ हिंसा तो उन देशों में बढ़ी जहां पोर्न कानून उदार बना दिए गए और पोर्नोग्राफी पर सेंसरशिप लागू करने पर ऐसे अपराध कम हुए.
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हमें यह भी समझना चाहिए की ‘रेप’ सिर्फ एक स्थिति या घटना नहीं है. यह अत्यंत कष्टकारी वेदना है. यह शारीरिक यातना के साथ मानसिक आघात भी है जिसके निशान शीघ्र नहीं मिटते जीवनभर पीछा करते हैं. इसे आप इस तरह समझ सकते हैं जैसे कोई अनजान जब किसी बस में, ट्रेन में आपके शरीर से असंगत तरीके से टच हो जाय जो आप कितने आग-बबूला हो जाते हो. झगड़े की नौबत तक आ जाती है. आप घंटो परेशान हो जाते हो, आपकी बुद्धि स्थिर नहीं रहती जबकि यह सिर्फ टच मात्र था. फिर हम उस स्थिति के दर्द, घुटन, संत्रास, अमिट मानसिक वेदना की कल्पना भी नहीं कर सकते.
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सलमान खान का वक्तव्य कल से मीडिया की सुर्खी बना हुआ है. यत्र-तत्र-सर्वत्र निंदा हो रही है. चपल ताड़ित भांति महिला आयोग हरकत में आ गया. घर पर रोज नारी का अपमान करने वाले भी आगे आ के लम्बी-लम्बी छोड़ रहे हैं.
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आजकल एक नया जुमला चल रहा है...'भारत माता की जय नहीं बोलूँगा'....भारत माता का स्थान जन्म माँ से ऊँचा है...धरा माँ  की सहायता लेकर ही जननी माँ हमें संपोषित करती है...इसका अपमान काफी दुखद है...इसी तथ्य को कटाक्ष करते हुए यह कविता लिखने का प्रयास है...आशा है पसंद आएगी..
दुखियारी माँ !
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