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Pratibha Verma
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Passionate about poetry.....
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मिट्टी में खेलते हुए सपने देखें हैं मैंने ...
मिट्टी में खेलते हुए सपने देखें हैं मैंने  इन नन्हें हांथों की लकीरें देखीं हैं मैंने  कितना प्यारा है ये बचपन  जहाँ न कल की कोई फिक्र है  न ही आज की कोई चिंता  बस मासूमियत से  भरे ये चेहरे  हँसी से खिलखिलाते हुए  इन नन्हें क़दमों की  आहट भी कितनी प्यारी है ...
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तब से तुमसे प्यार किया है...
जब तुमने पहली बार  मुझे देखा था  उन झुकी हुई निगाहों से  तब से तुमसे प्यार किया है  जब तुम शरमा के  भाग गई थी  और चुपके से  झरोखे से मुझे  देख रही थी  तब से तुमसे प्यार  किया  है तुम्हारी पायल की  वो आवाज़ आज भी  कहीं कैद है  इस दिल के किसी कोने में  तब से त...
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इत्तेफ़ाक से गर तुम्हे मिल जाए जिंदगी ...
इत्तेफ़ाक से गर तुम्हे मिल जाए जिंदगी  मुस्कुराते हुए किसी चौराहे पे  हंस के मेरा भी सलाम कर देना  जिंदगी की उन तंग गलियों से  हम निकल न पाए वक़्त पे  शायद तभी थोड़ी नाराज़ सी है  पता है हमको मना  तो लेंगे  बस अभी वक़्त की कुछ पाबंदी है  डर  है कहीं रिश्ता न टूट...
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देखते हैं वक़्त का फैसला क्या होता है !!
जब भी तुम्हारा जिक्र होता है  लबों पे ख़ुशी खुद खुद आ जाती है  क्या है हक़ीक़त किसको मालूम  कल क्या होगा किसको खबर  आज तुम हो और ये पल  कब धूमिल हो जाए किसको खबर  कुछ तो खास है तुम में  और तुम्हारी बातों में  जो ये पल थम सा गया है  अब देखते हैं वक़्त का फैस...
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जन्मदिन मुबारक हो !!
ओह मेरी मातृभाषा तुम कितनी शांत सी हो निर्मल सी कटुता की भाषा तुम्हे आती नहीं दिल भर जाता है जब कोई खुद के लफ़्ज़ों में तुम्हे पिरोता है जब कोई खुद को बयां करता है फिर भी आज की समझ कुछ अजब सी है शायद किसी को याद भी नहीं कि  आज तुम्हारा दिन है अपनी मातृभाषा का...
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पिछले साल की बारिश ...
पिछले साल की बारिश कुछ ऐसी कसक छोड़ गई तुम्हारी वो पहली नज़र अपना असर छोड़ गई.. हमारे मिलने का सिलसिला अब भी जारी है... वो पहली मुलाकात अपनी महक छोड़ गई !!
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कभी तुझसे कोई...
कभी तुझसे कोई शिकायत नहीं की  बिना मिले ही तुझसे सारी बातें की  नहीं जानती कि कभी कुछ कहना भी चाहा था  पर तुझसे मिलने की कभी हिमाकत नहीं की  माना कि क़िस्मत का खेल बहुत ही अनोखा है  हाँ मुझे तेरी किस्मत से मिलना तो है  शायद उसी के भरोसे मैं कुछ कह पाऊं  और त...
कभी तुझसे कोई...
कभी तुझसे कोई...
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ख्वाबों की दुनिया...
ख्वाबों की दुनिया हर कोई बनाता है  जिसमें उम्मीदों की पेंगें भरता  है  सारे पहलुओ को हम दरकिनार कर  उड़ना चाहतें हैं खुले आसमाँ  में  शायद ये उम्मीद नाम ही है  टूटने का....  कोई न कोई खड़ा रहता है  हमारे पर कुतरने को  और शायद मन ही मन  मुस्कुराता है ओ शक्स  अ...
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बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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