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Arvind pathik
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poet,six collection published,presently working with dte .
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सुनिए और बताइए
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मेरा चर्चित व्यंग्य -प्रेम और साहित्य का फेसबुक काल पढिये -
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एक कविता अभी अभी
तुम्हारी वज़ह से ही सच सच बना रहता है -------
--------------------------------------अरविन्द पथिक
सच एकाकी रहने को अभिशप्त है
फिर भी तुम सच के साथ खड़े हो
भले ही तुमने कुछ भी कहा सुना नहीं झूठ से
पर झूठ के सीने में शूल से गड़े हो
सच तो योद्धा है, पहलवान है
उसका तो कोई कुछ नहीं बिगाड पायेगा
हा उसकी पीठ पर पड़ने वाला हर पत्थर
अब तुम्हारी तरफ आएगा
सच की सेहत पर क्या फर्क पड़ता -?
तुम साथ होते न होते
सब के साथ मिलकर सच को गलियां नहीं भी देते
तो कम से कम मौन ही रहते ‘
पर, नहीं तुम तो कुछ ज्यादा ही बेख़ौफ़ हो गये
सच के कपड़े पहनकर इतरा रहे झूठ को सरे बाज़ार
बार- बार नंगा कर दिया
तुमने इस उदासीन सच के लिए
इस मगरूर सच के लिए
साहित्य की , राजनीति की हाट में
कितनी ही बार दंगा कर दिया
पर क्या हुआ?
झूठ ही नहीं
सच के सारे ठेकेदार
अब तुम्हारी सुपारी लिए बैठे हैं
निदा ,लांछन ,चापलूसी ,अहम ,कुंठा के हरबो से लैस
एक ही झटके में तुम्हारा काम तमाम करने को
कटिबद्ध तक्षक से ऐंठे हैं
जरा सी चूक हुयी कि
ये तुम्हे अज्ञात के
बियावान में दफना आयेंगे
और सब को चीख चीखकर बताएँगे
कि वो जो गुम हो गया
झूठ के साथ नहीं
झूठ ही था
अरे वह सच के साथ होगा
तो कबीर की साखी और सबद सा
पांच सौ साल बाद लौट आएगा
और तब वह खुद ही बताएगा कि
सच कौन है, और क्या है ---?
प,र हमें पता है
जो रातोरात भाग गया है
वह मिथ्या है—
-------------------
पर मैं जानता हूँ
सच के साथ रहते रहते
तुम्हे भी कुंठा ,निंदा और
घुटन की आदत हो गयी है
अफ़सोस क्या करूँ तुम्हारे लिए ‘
तुम्हारे जैसो की पहले भी
खामोश शहादत हो गयी है
और सच भी तो
तुम जैसो की वजह से ही तना रहता है
तुम जियो अपने ढंग से
तुम्हारी वज़ह से ही सच सच बना रहता है -
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एक पाकिस्तान ही है जहाँ कलाकार पैदा होते हैं बाकी सब तो कूढ़ मगज हैं ,इतने संवेदन शील कलाकार जो जर्मनी से लेकर अमरीका और सीरिया से लेकर फिलिस्तीन तक के आतंकवाद पर टसुये बहाते हैं पर भारत में आतंकवादी वारदात होने पर इनके मुह में दही जम जाता है --,आखिर भारत इनके लिए नोट कमाने की मंडी है -दारूल हरब है ,यहाँ बसने वाले सब काफ़िर हैं ,इनकी मौत पर अल्लाह के बन्दों को जश्न मनाना है--तो क्यों करे पाकिस्तान की या आतंकवाद की निंदा -
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रामनवमी  पर विशेष
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कब कहा मैंने कि ये पहचान दो दिन की अमर हो
साँस इन बेहोश घड़ियों की ना लौटे बेखबर हो 
कब कहा मैंने कि मेरी याद की बुझती शमां पर 
एक पल को भी तुम्हारी लाज से नीची नजर हो 
---------------------रामेश्वर शुक्ल अंचल
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