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rahul dev
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पाठक का कोना / अँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद
                                                  अँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद : एक समीक्षात्मक टिप्पणी            
       यह समीक्षा-लेख
वाणी प्रकाशन से सुधीश पचौरी के संपादकत्व में प्रकाशित पत्रिका ‘ वाक् ’ के मार्च 16, अंक 22 में छपा है. इस
समीक्षा के   ...
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कौन कितना जानता है परसाई को
मृ त्यु के बाद हमारे देश में कुछ धार्मिक
कर्मकांड होते हैं और अगर मौत एक साहित्यकार की है तो कुछ साहित्यिक कर्मकांड भी
होते हैं। इसके बाद सारे दायित्व पूरे हो जाते हैं। भारतीय समाज में एक खास
प्रवृत्ति यह भी है कि जब तक देह सामने होती है तब तक वाचाल संस्कृत...
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समकालीन कवि और कविता / अनिल पाण्डेय
समकालीन
कवि और कविता अनिल
पाण्डेय        कविता का लिखना, दिखाई दे रही घटनाओं का,
प्रतीत हो रही बातों का, ठीक-ठीक उसी रूप में रख देना भर नहीं है | ऐसा करने से
कविता के समाप्त होने का जितना खतरा होता है उससे कहीं अधिक कवि की कविताई संशय के
घेरे में आ जाती है ...
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भाषांतर - अनूदित आयरिश कहानी
छिपा हुआ निशानची                                                               --- मूल
लेखक : लायम ओ ' फ़्लैहर्टी                                                            
--- अनुवाद
: सुशांत सुप्रिय              जून की शाम का लम्बा झुटपुटा रात
में विलीन ...
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कविता की तमीज़
आत्मकथ्य / प्रमोद बेड़िया _________________________________ हर किसी के अनुभव अलग- अलग होते हैं- दो कवियों , दो चोरों के ,  दो दलालों के ,  दो नेताओं के , क्योंकि यह दुनिया
विविधताओं से भरी पड़ी है ! यहाँ मैं कवियों के अनुभव पर ही बात करना चाहता हूँ !
आप वि...
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कौन कितना जानता है परसाई को
मृत्यु के बाद हमारे देश में कुछ धार्मिक
कर्मकांड होते हैं और अगर मौत एक साहित्यकार की है तो कुछ साहित्यिक कर्मकांड भी
होते हैं। इसके बाद सारे दायित्व पूरे हो जाते हैं। भारतीय समाज में एक खास
प्रवृत्ति यह भी है कि जब तक देह सामने होती है तब तक वाचाल संस्कृति...
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क्रांतिकारी की कथा
‘ क्रांतिकारी ’ उसने उपनाम रखा था।
खूब पढ़ा-लिखा युवक। स्वस्थ , सुंदर। नौकरी भी अच्छी। विद्रोही।
मार्क्स-लेनिन के उद्धरण देता , चे-ग्वेवारा का खास भक्त। कॉफी हाउस में काफी देर तक बैठता। खूब बातें करता। हमेशा
क्रांतिकारिता के तनाव में रहता। सब उलट-पुलट देना ...
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इसलिए व्यंग्य…
इस विषय को कई तरह से देखा जा सकता है. क्या हमसे यह कैफियत मांगी
जा रही है कि व्यंग्य किसलिए ? वैसे इन दिनों बहुत सारा व्यंग्य ऐसा
लिखा भी जा रहा है कि पूछने की तमन्ना तो हमारी भी होती है कि ऐसा व्यंग्य किसलिए ? पर मैं उम्मीद करता
हूं कि सम्पादक इतना कड़वा स...
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अतिथि देवो भव / सीताराम गुप्ता
यदि हम अच्छे मेहमान और अच्छे मेज़बान बन सकें तो जीवन
कितना आनंदपूर्ण हो जाए!      हमारी संस्कृति में आतिथ्य
को बड़ा महत्त्व प्रदान किया गया है। अतिथि को भगवान का दर्जा दिया गया है। कहा गया
है अतिथि देवोभव। इसी का पालन करते हुए अधिकांश लोग घर आए मेहमानों की से...
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दो ग़ज़लें / नज़्म सुभाष
===== गजल-१ ===== दफ्तर की शैतानी है हरदिन आनाकानी है मुद्दा इतना बड़ा नही जितनी गलतबयानी है तेरा स्वेद लहू जैसा खून हमारा पानी है आग लगाकर कम्बल दे धर्म- धुरन्धर दानी  है नजर मीन के जिस्मों पर बगुला बेहद ध्यानी है दिन बहुरेंगे दंगों के बस अफवाह उड़ानी है स...
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