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Neetu Singhal
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दासकरिता बदली ते बदले नहि जो देस |
बिगरी न बानी बान न बिगरी नहि परिबेस || १ ||

भावार्थ : - शब्ताब्दियों तक के दासकर्ता से अन्य दासकर्ता की अधीन होने के पश्चात भी जिस देश की वेशभूषा जिसका परिवेश विकृत नहीं हुवा , परिवर्तित अधीनता के पश्चात भी यह देश अपरिवर्तित रहा |

धरमी धरम बिहून भए बरनी बरन बिहीन |
दूजे मेले मेलि के होतब गयउ मलीन || ३ ||

भावार्थ : - दूसरों की मलिनता के मिलावट से मलीन होकर इस देश में प्रादुर्भूत धर्मानुयायी धर्म से विहीन हो गए, वर्ण धारण करने वाले वर्णी वर्ण से विहीन हो गए | और यह भारत इंडिआ होता चला गया |

बहिर देस के जनित पुनि होत गयउ एकदेस |
बिगड़े भूषा भाष सों बिगड़त गए परिबेस || २ ||

भावार्थ : (फिर विभाजन के पश्चात जब )बहिर्देश के मूल और इस देश के मूलभूत जब एक ही देश के कहलाने लगे तब इस देश की विकृत हुई वेशभूषा के साथ इसका पावन परिवेश ( आहार-विहार, आचार-विचार )भी विकृत होता चला गया |

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बहिर देस के जनित पुनि होत गयउ एकदेस |
बिगड़े भूषा भाष सों बिगड़त गए परिबेस || १ ||

भावार्थ : फिर बहिर्देश के मूल और इस देश के मूलभूत जब एकदेश के कहलाने लगे तब इस देश की विकृत हुई वेशभूषा के साथ इसका पावन परिवेश ( आहार-विहार, आचार-विचार )भी विकृत होता चला गया | |
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देस रिपु अपनाई गए बिसर गयो सो बीर |
सुवारथी सत्ता गहे सुरते मोती हीर || ५ ||

भावार्थ : - देश के शोषणकर्ता शत्रु अपनाए गए देश पर बलिदान होने वाले उन शूरवीरों को विस्मृत कर दिया गया | सत्ता स्वार्थपरायणता के हाथ लग गई थी उसे केवल हीरे मोती और नीलम का ही स्मरण रहा |

धर्म संस्कृति आपुनी रच्छत अपुनी बान |
देस भूमि हुँत को बीर दियउ प्रान बलिदान || ४ ||

भावार्थ : - अपनी धर्म -संस्कृति अपनी अस्मिता अपनी देशभूमि के लिए वीरों ने प्राणों का बलिदान दिया था |


सत्ताधारि सोंहि बिबस अबरउ लेखनहार |
ता प्रियजनहि हुँत एहि बिधि लिखेउ गै अधिकार || ३ ||

भावार्थ : - सत्ताधारी से विवश होकर संविधान के अन्य रचनाकारों ने भारत के दासकर्ता किन्तु उनके प्रियजनों हेतु अधिकार लिखकर उन्हें देश की सम्प्रभुता से संपन्न किया गया |

अस सत्तारूढ़ि दल तैं बिरचित गै सँबिधान |
देस हुँत दुर्भाग लिखे तिनके हुँत कल्यान || २ ||

भावार्थ : - जो दासकर्ता को संरक्षण दे ऐसे सत्तारूढ़ दल के द्वारा देश का संविधान निर्मित हुवा, और संविधान में सत्ताधारी के इन आत्मीय जनों के भाग्य में सुख -सौभाग्य और भारतवासियों के भाग्य में दुर्भाग्य लिखा गया |


राजत जुग लगि देस परि खायउ लूट खसौट |
संबध तिन्हनि आपुने सासनहर दिएँ ओट || १ ||

भावार्थ : - शताब्दियों तक जिस बहिर्देशीय समुदाय ने इस देश पर राज कर उसका आर्थिक शोषण किया उनसे आत्मीय सबंध स्थापित कर देश स्वतन्त्र होने के पश्चात भी सत्ताधारी उन्हें अपना सरंक्षण देते गए |

अधुनातन को भया नहि अहो बांचत अँगरेजि |
को कलीसाई को भए इस्लामिक रँगरेजि || ९ ||

भावार्थ : - इस प्रकार पाश्चात्यीकरण से अंग्रेजी बांचता देश आधुनिक तो नहीं हुवा प्रत्युत वह भारत से इंडिया हो गया और भारतीयों में संकरित जाति से संकरित धर्म का जातक होते हुवे कोई ईसाई तो कोई रंगरेज इस्लामिक हो गया |
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