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PARSA
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कभी कभी शामें ऐसे भी आती हैं
लगातार बोलते रहने से थक जाने के बाद बहुत घूम लिए की तरह घर लौटता हूँ एक-एक कर अपनी नाकामियां गिनता हूँ और खुश होते हुए खिड़की के बाहर दीखते स्विमिंग पूल में  चार गोते लगाकर मर जाता हूँ . मुझे बहुत बार डूबकर मर जाने के सपने आये हैं आते रहते हैं जीते जी मर जान...
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पर मरि कविता नहीं आती
इस कदर  गरीब हो गया
हूँ की किसी भूल गए पुराने दुःख से उधार में आँसू लाता हूँ शायद इसी  तरह से कोई
कविता बने तुम्हारे बहुत पास पास चक्कर काटते हुए थककर खर्च हो गए बिम्ब की तरह लेट जाता  हूँ दो वाक्यों के बीच तीसरी की राह जोहता हुआ पर मरि कविता नहीं आती बिल्ल...
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रोज़ एक कविता लिखूंगा
रोज़ रोज़ रात का जागना को चेहरे से उतारकर कमोड
में टट्टी के ट के साथ बहा देना ये ज़िन्दा पानी का अँधेरे
में डूबकर मर जाने की कहानी है इतना भरा हुआ जैसे कोई काम नहीं की तरह रोज़ एक कविता
लिखूंगा सोचकर खुश हो जाता हूँ मुझे रोज़ एक कविता लिखनी
ही होगी सोचकर दु...
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आजकल बड़ी खुजली रहती है
तुम नाहक ही चिडचिडाती हो मेरी जान तुम्हारे ख़त्म हो चुके शैम्पू की बोतल  और चमक खो चुके सैंडिल के बीच एक खाली खुली आलमारी है  जिसे जाने तुम किन - कौन चीजों से  पाटना - ढांपना चाहती हो जबकि मैं तो बस इतना ही कह रहा हूँ की मेरे पीठ के पिछले हिस्से में जहाँ मे...
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मेरी जान
मेरी जान तुम्हारी नज़र में मैं कुछ कुछ हमारे पड़ोसी मुल्क सा हूँ बेवफ़ाई के ताने सहता हुआ एहतियातन बरते तुम्हारी मुहब्बत के सुकून में गुम खाली खाली खोया खोया. देखो जानेमन हम इस समय के सुविधाओं की पैदाइश हैं हमारे पेट भरे हुए हैं और अभी भी बहुत से ऐसे फूल है...
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तुम्हारे जाने की दोपहर में
तुम्हारे जाने की दोपहर में हवा से भड भड करती एक खिड़की है , एक मरी हुई किताब जिसकी कभी मैंने सुध नहीं ली. अधूरी पेंटिंग हमेशा मुझे डांटती हुई , और कमरे के बिलकुल बीचोंबीच तार पर सूखता अंडरवेयर और एक कन्डोम का पैकेट जिसे कई बार गुस्से में फेंक दूँ सोचते हुए ...
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हर दुःख की अपनी ही अलग भाषा होती है
हर मौसम की  अपनी कुछ मक्कारियां होती हैं अपनी यादें और उदासियाँ उबासियाँ जैसे हर दुःख की अपनी ही अलग भाषा होती है जिसमे हम अपने रोने को इस तरह लिखते हैं की भीतर का खालीपन आँख में उतरने से पहले ही सूख जाये और तुम्हारा होना या नहीं होना बहुत पहले पढ़ी और पढ़क...
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मह मह महकते मोगरे की तरह
                                                                           Artist - Myself मह मह महकते मोगरे की तरह सूंघता हूँ तुम्हे बहुत थका होने पर भी भागकर चढ़ जाता हूँ सीढियाँ चौथे माले के हमारे कमरे तक रोज़ आती है एक अदृश्य गौरैय्या तुम्हारे चहचहाने में...
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लाली
                                       Artist - Myself एकदम खौलते हुए दिन से छानकर निकाला है तुम्हे चाँद की तरह चिकनी गोरी गोल मोल छल्ला गले में कसता हुआ फँसता हुआ हँसता हुआ मैं हा हा हा ... अरे भोली तेरे जीभ की नोक पर जो ज़हर है उसे ही चाटकर धूप इतना नीला ह...
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