Profile cover photo
Profile photo
Shikha Gupta
2,039 followers
2,039 followers
About
Posts

Post has attachment
Shikha Gupta commented on a post on Blogger.
Add a comment...

Post has attachment
समय का जाल
मैं बीत गयी इक और साल ... लम्हे-लम्हे कुछ ठहरी सी लम्हा-लम्हा ही बढ़ी चली विकट रहा समय का जाल मैं बीत गयी इक और साल ... रोयी तो मुस्कायी भी सपनों की परछाई सी अभी सुकूं अभी बेहाल मैं बीत गयी इक और साल ... पलकें ना झपकाई थीं रात कहाँ मुरझाई थी जलना जिसे, बुझी ...
Add a comment...

Post has attachment
अवशिष्ट
डूबते-डूबते फिर   धीरे-धीरे उबरती हूँ  छितरी हुई   बिखरी सी  सागर के थपेड़ों से टूटी  रह जाती हूँ मात्र अवशिष्ट समान  जानती हूँ ... मैं ही हूँ दुर्गा  मैं ही सिंदूर खेलती स्त्री  और मैं ही हूँ वो अभिशप्त  जिससे छीना गया अधिकार  सिंदूर खेलने का  दुर्गा-सम कहल...
Add a comment...

Post has attachment
चाँद के लिये
मखमली रूई के फाहे सा  बादलों से चुहल करता  ग़ज़लों में बसा आशिक़  महबूबा ... नज़्मों-रुबाई का  रातों का सूरज  सितारों का शहंशाह  आसमान के सहन में  इठलाता था चाँद  चांदनी बिखेरता ...  अपनी गोलाइयों पर  मुस्कुराता था चाँद  आसमां से पिघल ... पानी में  अकसर उतर आता...
Add a comment...

Post has attachment
अधिकार का सवाल
लोमड़ की टोली ने जम कर शिकार किया  माँस इकठ्ठा कर दावतें उड़ायीं  लहू के रंगों से आतिश सजायी  जो जी भर गया तो  कुछ निशानियाँ रख लीं जश्न की  और पूँछ फटकारते  फेंक दिये माँस के लोथड़े सड़ने के लिये  उनके साथ चले आये थे  खून सने पंजों के निशान  उनके दाँतों में अभ...
Add a comment...

Post has attachment
बंदिनी
देखो! रोज़ की तरह उतर आयी है सुबह की लाली मेरे कपोलों पर महक उठी हैं हवायें फिर से ... छू कर मन के भाव पारिजात के फूल सजाये बैठे हैं रंगोली पंछी भी जुटा रहे हैं तिनके नये सिरे से सजाने को नीड़ सुनो! कोयल ने अभी-अभी पुकारा हमारा नाम अच्छा,कहो तो... आज फिर लपेट...
Add a comment...

Post has attachment
संबंधों की धुरी
मेरे तुम्हारे संबंधों की क्यूँ सदा पृथक रही धुरी जो तुम रहे सदा से तुम मात्र मेरे लिये ही क्यूँ लक्ष्मण-रेखित परिधि विषम स्वीकृत थी जब जानकी अग्नि-परीक्षा क्यूँ रची कैसी प्रीत की रागिनी मेरे तुम्हारे संबंधों की क्यूँ सदा पृथक रही धुरी नदिया की जल-धारा से नव...
Add a comment...

Post has attachment
साँकल
कई नाग फुँफकारते हैं अँधेरे चौराहों पर अटकने लगती है साँसों में ठिठकी सी सहमी हवायें खौफनाक हो उठते हैं दरख्तों के साये भी अपने ही कदमों की आहट डराती है अजनबी बन सूनी राह की बेचैनी बढ़ जाती है हद से ज़्यादा तब ... टाँक लेते हैं दरवाज़े खुद ही कुंडियों में साँक...
Add a comment...

Post has attachment
Add a comment...

Post has attachment
साँकल
कई नाग फुंफकारते हैं  अँधेरे चौराहों पर  अटकने लगती है साँसों में ठिठकी-सहमी हवायें खौफनाक हो उठते हैं दरख्तों के साये भी अपने ही कदमों की आहट डराती है अजनबी बन सूनी राह की बेचैनी बढ़ जाती है हद से ज्यादा तब ... टाँक लेते हैं दरवाज़े खुद ही कुण्डियों में सांक...
Add a comment...
Wait while more posts are being loaded