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Gwalior Hulchal Evening Daily
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आयकर छापेमारी में मंत्री और महिला कांग्रेस प्रमुख के पास मिले 162 करोड़ |
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24 January 2017
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दौलतानी की ब्राण्ड एम्बेसडर के रूप में नियुक्ति अवैध है,निगम परिषद में उठाएंगे मुद्दा: नेता प्रतिपक्ष दीक्षित |
सभापति व पूर्व सभापति भी बोले-परिषद में लाना चाहिए था नियुक्ति का प्रस्ताव |
दौलतानी स्वच्छता दूत हैं, कोई भी बन सकता है स्वच्छता दूत : पीआरओ |
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23 January 2017
#Gwalior
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हीराखंड एक्सप्रेस पटरी से उतरी, 32 लोगों की मौत, 54 अन्य घायल |
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22 January 2017
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ग्वालियर किला तलहटी में हजारों अतिक्रमण हो गए, कलेक्टर क्या करते रहे?--
सरकारी जमीन पर अतिक्रमण होने की सबसे बड़ी वजह है सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय न होना। जिले का प्रशासनिक और राजस्व प्रमुख कलेक्टर होता है, नगर निगम का प्रमुख नगर निगम आयुक्त होता है, इसके साथ राजस्व विभाग के तमाम अधिकारी नियुक्त रहते हैं, फिर भी हर जिले में अवैध निर्माण दशकों से हो रहे हैं। ग्वालियर किला तलहटी के 300 मीटर के दायरे में बने निर्माण तोड़े जाएं, क्योंकि ये अवैध हैं, ऐसा आदेश मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खण्डपीठ ने कुछ वर्ष पूर्व दिया था, लेकिन आज तक इस पर अमल नहीं हो सका है। ग्वालियर किला पहाड़ी पर लगभग ढाई वर्ग किलामीटर में है। इसके नीचे 300 मीटर के दायरे में हजारों अवैध मकान बन गए। ये अतिक्रमण पिछले 30 साल से हो रहे हैं और आश्चर्य है कि किसी भी कलेक्टर ने इनके खिलाफ ठोस वैधानिक कार्यवाही नहीं की। ग्वालियर किला भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) के अंतर्गत है। अतिक्रमण रोकना इस विभाग की भी जिम्मेदारी है, लेकिन एएसआई संसाधन विहीन है। इसके अधिकारियों को कोई भी धमका देता है। कल 19 जनवरी को मोहम्मद गोस के मकबरे के आसपास के अतिक्रमण तोडऩे के दौरान एएसआई के अधिकारी शशिकांत राठौर के साथ कुछ लोगों ने अभद्र व्यवहार किया और गाली-गलौच की। ये लोग भाजपा, सीटू से जुड़े थे। श्री राठौर ने मौके पर मौजूद पुलिस बल से मदद मांगी, पुलिस ने तुरंत कार्रवाही नहीं की। बाद में सीटू व कुछ अन्य के खिलाफ तो मामला दर्ज हो गया लेकिन भाजपा नेता के खिलाफ नहीं हुआ। इस माहौल से समझा जा सकता है कि एएसआई कितनी असहाय है। ऐसे में जिला कलेक्टर को ही सख्त कार्रवाई करनी चाहिए और अपनी पूरी प्रशासनिक टीम अतिक्रमणकारियों के खिलाफ लगाना चाहिए।
आम जन का हमेशा यही तर्क रहता है कि जब सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हो रहा होता है उस समय प्रशासन कार्रवाई क्यों नहीें करता?
शासन को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ एक नया कानून बनाना चाहिए। इसके तहत जिस अधिकारी के क्षेत्र में अतिक्रमण पाया जाए, उसको भी जिम्मेदार माना जाए। यदि ऐसा हुआ तो समय रहते अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई होने लगेगी।
प्रदीप मांढरे
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कुर्सी बचाने के लिए यादव और बच्चन की नोटंकी या वास्तविक राजनीति ?
अरूण यादव को मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने और कमलनाथ को कमान देने की अखबारी चर्चाएं चल रही थीं कि कटनी में हवाला काण्ड को दबाने की शिवराज सरकार के कथित षडयंत्र के खिलाफ एनएसयूआई/युवक कांग्रेस के भोपाल में मुख्यमंत्री निवास घेरने के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में अरूण यादव गंभीर रूप से घायल हो गए । उन्हें अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया है। जाहिर है इस पिटाई से श्री यादव को राजनैतिक लाभ हुआ है। अब नेतृत्व परिवर्तन की बाते नहीं हो रहीं । यादव खेमा तो पार्टी हाईकमान तक यह बात पहुंचा रहा होगा कि उनका नेता अपनी जान पर खेलकर विपक्षी धर्र्म निभा रहा है।
अरूण यादव पिटाई काण्ड के कुछ रोज बाद यानी २१जनवरी को राज्य विधान सभा में प्रभारी नेता प्रतिपक्ष बालाबच्चन ने बड़वानी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के जनजाति सम्मेलन कार्यक्रम में बखेड़ा खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री जब भाषण दे रहे थे, तब उनका माईक छीन लिया । जाहिर है इस अप्रत्याशित घटना से बखेड़ा खड़ा होना ही था । मंच पर मौजूद खरगौन के भाजपा सांसद सुभाष पटेल ने बाला बच्चन का कॉलर पकड़ लिया ।
अब कांग्रेसी इस मुद्देे को जोर शोर से उठा रहे हैं कि मुख्यमंत्री की मौजूदगी में नेता प्रतिपक्ष के साथ गुण्डागर्दी की गई ।
बाला बच्चन कमल नाथ समर्थक माने जाते है और नेता प्रतिपक्ष के लिए वर्षाे से प्रबल दावेदार हैं । सिंधिया और दिग्विजय खेमे के कई विधायक भी नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए लालायित हैं। इनमेें महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा, डॉ. गोविंद सिंह, रामनिवास रावत, आरिफ अकील ,मुकेश नायक शामिल हैं।
इन दोनों घटनाओं से यह भी सवाल उठ रहे हैं कि कहीं अपनी कुर्सी बचाने के लिए अरूण यादव और बाला बच्चन ने जानबूझकर तो यह राजनीतिक ड्रामा नहीं किया ? बच्चन और उनके समर्थक विधायक विधानसभा के आगामी सत्र में नेता प्रतिपक्ष के अपमान का मुद्दा उठा सकते हैं । यानी अगले कुछ रोज यह मामला और यादव पर लाठीचार्ज का मुद्दा छाया रहेगा । इसलिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की स्थायी नियुक्ती का मामला और टल सकता है । अन्य दावेदारों के चेहरे लटक रहे हैं। सिंधिया खेमे के नेताओं ने यादव व बच्चन प्रकरण में कुछ नहीं बोला है। हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जरूर अरूण यादव पर हमले पर बयान जारी कर अपना विरोध जाहिर किया था, लेकिन वह उन्हें अस्पताल में देखने नहीं गए और न ही सिंधिया के गृहनगर ग्वालियर व उनके संसदीय क्षेत्र के तीनों जिले शिवपुरी, गुना और अशोक नगर में सिंधिया समर्थकों ने अरूण यादव की पिटाई व बाला बच्चन का अपमान मुद्दे पर न तो धरना दिया और न ही ज्ञापन, बयान ।
प्रदीप मांढरे
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Hirakhand Express Accident: Railway Minister Announces Inquiry, Ex-Gratia |
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22 January 2017
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महापौर ने सिंधिया स्कूल में अवैध निर्माण का मुद्दा उठाया तो कांग्रेसियों ने उन्हें आड़े हाथों लिया-
ग्वालियर हलचल संवाददाता
ग्वालियर, 21 जनवरी। भाजपा के नेता और ग्वालियर महापौर विवेक शेजवलकर ने जब ग्वालियर फोर्ट स्थित सिंधिया स्कूल में कथित अवैध निर्माण का मुद्दा उठाया और उसे ग्वालियर किला तलहटी में हुए अवैध निर्माण से जोड़ा तो सिंधिया समर्थक कांग्रेसियों ने उन्हें आड़े हाथों लिया और सिंधिया स्कूल का बचाव किया। मालूम हो कि श्री शेजवलकर ने कल बयान जारी किया था, जिसमें लिखा है कि महापौर ने केन्द्रीय मंत्री व ग्वालियर सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर और केन्द्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा को पत्र लिखा है कि मैं आपकी जानकारी में लाना चाहता हूं कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने पूर्व में 300 मीटर की परिधि में चिन्हित भवन भी निर्माणोपरांत मात्र चेतावनी देकर प्रकरण नियमित किए हैं। सिंधिया स्कूल को निर्माणोपरांत अनापत्ति पत्र जारी कर अनुमति दी गई है तो वर्षो पुराने गरीबों के मकानों को तोडऩे का क्या औचित्य है? इन्हें भी नियमित किया जाना चाहिए।
महापौर की टिप्पणी पर ग्वालियर हलचल के सम्पर्क करने पर कांग्रेस के पुरुषोतम भार्गव, मुन्नालाल गोयल, सुधा दुबे, वृन्दावन मेवार, बाल खाण्डे, रमेश चौरसिया, विश्वनाथ सालुंके, गजेन्द्र तिवारी ने अलग-अलग विचार में कहा कि सिंधिया स्कूल और ग्वालियर किला दोनों ही ग्वालियर की धरोहर हैं। इन नेताओं के मुताबिक सिंधिया स्कूल को शासन से कानूनन अनुमति मिली है। महापौर सिंधिया स्कूल पर निशाना साधकर अपनी राजनीति कर रहे हैं। सिंधिया स्कूल स्टेट के समय से स्थापित है। महापौर की बयानबाजी नितांत गलत है और कोर्ट की अवमानना है। महापौर की सराकर कोर्ट से स्टे लेने वालों की सम्पति भी तोडऩे की बात कर रही है। कांग्रेसियों के मुताबिक महापौर को ऐसा रास्ता अपनाना चाहिए कि लोग बेघर न हों।
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पवैया का मुद्दा शेजवलकर ने उठाया
ग्वालियर विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों अवैध निर्माण के खिलाफ प्रशासन द्वारा तोडफ़ोड़ की मुहिम चल रही है। मध्यप्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री जयभान ङ्क्षसह पवैया इस क्षेत्र से भाजपा विधायक हैं। श्री पवैया ने अभी तक इस अतिक्रमण मुहिम पर कुछ नहीं बोला है। कांग्रेस में पवैया के प्रतिद्वंदी और 2013 के विधानसभा चुनाव में पवैया के हाथों पराजित हुए प्रधुम्न सिंह तोमर जरुर इस मुद्दे को उठाए हुए हैं और तोडफ़ोड़ से प्रभावित गरीबों के पक्ष में सामने आ रहे हैं। उन लोगों के घर दुकानें तोड़ी जा रही हैं जो भारतीय पुरातत्व विभाग की गाइड लाइन का उल्लंघन करते हुए बनी हैं। भाजपा नेता और ग्वालियर महापौर विवेक शेजवलकर ने भारतीय पुरातत्व विभाग की गाइड लाइन और उनकी अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई पर ही सवाल उठा दिया। महापौर का कहना है कि जब ग्वालियर फोर्ट पर बने सिंधिया स्कूल में हुए निर्माण को पुरातत्व विभाग एनओसी दे सकता है, तब तानसेन मकबरे और किला तलहटी के 300 मीटर के दायरे में आए मकानों को क्यों अनुमति नहीं मिल सकती? मालूम हो कि सिंधिया स्कूल के मालिक कांग्रेस नेता व पूर्व केन्द्रीय राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। और केन्द्र में कांग्रेस शासनकाल के दौरान ही सिंधिया स्कूल में निर्माण हुए थे, जबकि पुरातत्व विभाग की गाइड लाइन के मुताबिक ये निर्माण जायज नहीं ठहराए जा सकते थे। भाजपा में अभी तक जयभान ङ्क्षसह पवैया ही सिंधिया और महल के खिलाफ बोलते रहे हैं। बीच-बीच में पार्टी सांसद प्रभात झा ने भी सिंधिया के खिलाफ बयान दिए हैं। यह पहला मौका है जब महल के थोड़े नजदीक माने जाने वाले विवेक शेजवलकर ने महल पर और सिंधिया पर बड़ा निशाना साधा है। शेजवलकर के सिंधिया के खिलाफ बयान से यह भी जाहिर हो रहा है कि उन्होंने तर्क संगत मुद्दा उठाया है और गरीबों के पक्ष में बोला है, जबकि पवैया जब-जब महल के खिलाफ, सिंधिया के खिलाफ बोले हैं तो ऐसा संदेश जाता है कि वह सिंधिया विरोधी राजनीति कर रहे हैं।
प्रदीप मांढरे
सम्पादक
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जिस प्रथा में लोग मरते हैं, जानवर घायल होते हैं उसे तमिल गौरव कहेंगे ?
दुखद है, शर्मनाक है कि तमिलनाडू के उच्च शिक्षित लोग व अन्य पेशे से जुड़े लाखों लोग उस जल्लीकट्टू प्रथा को इजाजत देने की मांग कर रहे हैं, जिसमें तमाम जन घायल हो जाते हैं, मर जाते हैं और बैलों-साण्डों को शारीरिक क्षति पहुंचती है।
तमिलनाडू में पोंगल पर्व के मौके पर साण्डों के साथ खेल को जल्लीकट्टू कहते हैं। इसमें साण्डों को दौड़ाया जाता है, फिर उन्हें काबू किया जाता है। इस क्रूर परम्परा में साण्ड कई लोगों को सींग, लात मारते हैं, उन्हें पटक देते हैं। गंभीर रूप से घायल लोगों की कई बार मौत भी हो जाती है। साण्डों-बेलों को भी इस खेल में शारीरिक नुक्सान पहुंचता रहा है।
पिछले दो दिन से तमिलनाडू में विभिन्न स्थानों पर हजारों, लाखों लोग जल्लीकट्टू का समर्थन करते हुए इसके आयोजन के लिए केन्द्र से अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं। इस जंगली खेल पर सुप्रीम कोर्ट 2014 में प्रतिबंध लगा चुका है। 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के दबाव में केन्द्र सरकार ने अध्यादेश लाकर इस आयोजन को अनुमति दे दी थी, बाद में पशुओं के अधिकारों के लिए कार्यरत संस्था पेटा ने इस अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। यह प्रकरण अभी लम्बित है। इधर तमिलनाडू के मुख्यमंत्री पनीरसेल्बम ने आज प्रधामनंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात कर राज्य में बिगड़ते हालात की जानकारी दी और उनसे जल्लीकट्टू आयोजन के लिए अध्यादेश लाने को कहा, लेकिन प्रधानमंत्री ने मामला कोर्ट मे लम्बित होने के कारण सरकार की ओर से असमर्थता व्यक्त की हालांकि उन्होंने जल्लीकट्टू को परम्परागत खेल बताते हुए इसे अपना समर्थन दिया।
कम से कम राजनैतिक दलों के नेताओं को तो बुरे को बुरा और अच्छे को अच्छा कहना चाहिए, लेकिन वे वोट बैंक की राजनीति के आगे सबकुछ भूल जाते हैं, न्यायालय की गरिमा भी।
तमिलनाडू विकसित राज्य है। औद्योगिक विकास, कृषि विकास व शैक्षणिक विकास की दृष्टि से यह राज्य देश के 5-6 अग्रणी राज्यों में शामिल है। जल्लीकट्टू जैसे असभ्य आयोजन के लिए सभ्य समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। उम्मीद है तमिलनाडू का सभ्य समाज इस हकीकत को समझेगा।
प्रदीप मांढरे
सम्पादक
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