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Shobha Mishra
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"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है ?"
इस प्रश्न पर कुछ सम्मानित वरिष्ठ, युवा लेखिकाओं, महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के विचार आज फरगुदिया पर पढ़िए !
आदरणीय सरला महेश्वरी जी, सुधा दीदी, वंदना शर्मा दीदी, कविता वाचक्नवी दीदी, मीना दीदी, किरन दीदी, विजय पुष्पम दीदी, उषा राय जी ...
प्रिय आभा बोधि जी, नाइस हसन जी, प्रत्यक्षा जी, आराधना सिंह, डॉ विभावरी, चंद्रकांता सहयोग के लिए आप सभी का बहुत आभार!!

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राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है ?
"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है ?"  इस प्रश्न पर कुछ सम्मानित वरिष्ठ, युवा लेखिकाओं, महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के विचार आज फरगुदिया पर पढ़िए ! आदरणीय  सरला महेश्वरी जी, सुधा दीदी, वंदना शर्मा दीदी, कविता वाचक्नवी दीदी, मीना दीदी, किरन दीदी, विज...

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"हमें उन ग्लोरिफिकेशंस की निर्मिति को भी समझना है, बार-बार उसका हवाला देने वालों की मानसिकता को भी समझना है.. मुझे नहीं पता कि मैं जो कुछ भी कह रही हूँ या कि कहने जा रही हूँ, वह किसी पाठ की शक्ल ले भी पाएगा कि नहीं। यह भी नहीं जानती इसे पढ़ने वाले इसे किस तरह से लेंगे, क्योंकि ये कुछ अनुभव हैं, कुछ जिए हुए अनुभव, कुछ देखे हुए अनुभव बस्स...ये अनुभव अपने प्रस्तुत किए जाने की गढ़ावट में बेहद कच्चे हैं पर इन्हें कहना ज़रूरी है..."
आज अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर लेखिका स्वाती का लेख हम सभी के लिए! ढेरों शुभकामनायें ...

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चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई...!! - स्वाती
चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई...!! पढ़ा गया हमको जैसे पढ़ा जाता है काग़ज बच्चों की फटी कॉपियों का ‘ चनाजोरगरम ’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले! देखा गया हमको जैसे कि कुफ्त हो उनींदे देखी जाती है कलाई घड़ी अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद  ! सुना गया हमको यों ही उ...

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“बहुत ....बहुत करते थे! .. कुछ कुछ रचनाओं के लिए तो बहुत करते थे .. कोई लड़की अपनी कहानी लेकर हंस के ऑफिस में गयी थी तो उसने मुझे बताया कि उन्होंने कहा - देखो कहानी कैसे लिखी जाती है मन्नू से जाकर सीखो ... उस लड़की ने मुझे बताया .. ये नहीं बताते थे .. तो मुझे अच्छा लगता था कि चलो कम से कम मेरे लेखन की तो ये इतनी तारीफ करतें हैं .. ये मेरी रचनाओं के प्रशंसक थे!

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“स्वीकार तो करते थे.. बहुत करते थे .. ऐसी बात नहीं कि स्वीकार नहीं किया.. कभी कभी नहीं भी करते थे .. कभी कभी कहते थे – ए! तुम तो जिद लेकर बैठ जाती हो .. अरे क्या है इसमें अगर कुछ अलग है मेरे जीवन में!! ...लेकिन भीतर ही भीतर महसूस भी करते थे कि कोई भी औरत अपने पति के जीवन में दूसरी औरत बर्दाश्त नहीं करेगी..!”
आदरणीय मन्नूजी से प्रेम जैसे विषय पर बात कर पाना मेरे लिए बहुत कठिन था फिर भी बातचीत के माध्यम से उनके दांपत्य जीवन के पहेली रुपी प्रेम में कुछ ढूँढने की कोशिश की है! पढ़ें आप सब भी ...

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दाम्पत्यः प्रेम और पहेली - मन्नू जी से एक मुलाकात
दाम्पत्यः प्रेम या पहेली -मन्नू जी से एक मुलाकात आदरणीय मन्नू जी मेरी बहुत प्रिय लेखिका हैं! उन जैसी सम्मानित शख्सियत से भला कौन नहीं प्रभावित होगा! अब तक जितनी बार उनसे मिली हूँ, ढेर सारी सुखद स्मृतियां लेकर लौटी हूँ! बहुत दिनों से मन था उनसे मिलने का! उनक...

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"न जाने कितनी ग़ज़लों,गीतों में पिरोया है मैंने अपने प्रेम को ! अपनी कैफ़ियत तो बयां करने की फ़न ईश्वर ने मुझे दिया है लेकिन अक्सर जब विशाल को अपने अहसासात कहने के लिए शब्द नहीं मिलते तो मेरे इसी फ़न से वो थोड़ी-थोड़ी जलन महसूस करते हैं ! मैं मुस्कुरा देती हूँ और कहती हूँ
'भले ही न हों तुम्हारे पास शायराना लफ़्ज़, न हों तुम पर प्रेम में पगे हुए शब्दों का ख़ज़ाना लेकिन तुमने एक संवेदनशील,भावुक पत्नी को कभी बिखरने नहीं दिया है तुम मुझे इतना समझते हो कि जब मैं कुछ लिखने की प्रक्रिया में होती हूँ ,तुम बहुत ज़रूरी होने पर भी मेरे ख़्यालात की दुनिया में दस्तक नहीं देते!मेरी हर उपलब्धि जैसे तुम्हारी उपलब्धि है ,ऐसी बहुत सी बारीक बातों से मैंने जाना है ये तुम्हारा समर्पण है मेरे प्रति!
जीवन में आयी हर परिस्थिति, हर ज़िम्मेदारी निबाहने में तुम मुझे सक्षम पाते हो, ये तुम्हारा विश्वास है मेरे प्रति!
मेरी कई रुचियों की पौध तुम्हारे साथ और समर्थन से लहलहा उठी हैं ! मेरे आकाश,निजता,विस्तार को तुमने सदा सम्मान दिया है! ऐसी कई भागीदारियाँ जतलाती हैं कि ये तुम्हारा आदर है मेरे व्यक्तित्व के प्रति!
मैंने तुम्हें 'तुम' रहने दिया है और तुमने मुझे 'मैं'!हमारी ये समझदारी हमारे 'हम' होने में बहुत अहम है !"

लेखिका सोनरूपा विशाल से जब भी किसी ख़ास अवसर पर लिखने के लिए कहतीं हूँ वे हमेशा मेरी उम्मीदों पर खरी उतरतीं हैं! विवाह उपरांत भी कैसे उनके सहचर के प्रेम में कोई बदलाव नहीं आया .. उनकी रुचियों को कैसे अपने प्रेम से सींचा .. उसे बहुत खूबसूरती से इस संस्मरण के माध्यम से साझा किया है..

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पावन संकल्पों से संकल्पित होकर- सोनरूपा विशाल
लेखिका सोनरूपा विशाल से जब भी किसी ख़ास अवसर पर लिखने के लिए कहतीं हूँ वे हमेशा मेरी उम्मीदों पर खरी उतरतीं हैं! विवाह उपरांत भी कैसे उनके सहचर के प्रेम में कोई बदलाव नहीं आया .. उनकी रुचियों को कैसे अपने प्रेम से सींचा .. उसे बहुत खूबसूरती से इस संस्मरण के ...

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"प्रेम बुलबुले की तरह उग कर फूट पड़ने वाली क्षणिक स्थिति नहीं है। इसलिए असफल प्रेम की अभिव्यक्ति के नाम पर वह एसिड अटैक, बलात्कार या हत्याकी कायर साजिशों में उभर कर अपने को गिराता नहीं, आकर्षण को हार्दिकता और उत्तेजना को सृजन के आनंद में तब्दील कर 'चितकोबरा' उपन्यास के मनु-रिचर्ड और 'मढ़ी का दीवा' के जगसीर-भानी की तरह प्रेम की परिधि मे हर दबी-कुचली अस्मिता को ले आता है। आज यदि साहित्य में प्रेम 'वन नाइट स्टैंड' या दैहिक तृप्ति का एक माध्यम मात्र बन कर रह गया है तो समाज के विघटनशील चरित्र के साथ-साथ साहित्यकार की सृजनशीलता के क्रमश- क्षरित होते चले जाने का भी सूचक है।"

हिंदी की प्रेम कहानियाँ - जिनमें प्रेम के रूप में सिर्फ समर्पण, त्याग और गूढ़ आस्था का चित्रण है, उस स्थापित प्रेम के स्वरुप की आलोचनात्मक शिनाख्त करता रोहिणी अग्रवाल जी का सारगर्भित लेख ..
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