|| रामहिं केवल प्रेम पियारा ||
प्रेम ही सम्पूर्ण साधनाओं का सार तत्व है और यही भक्ति का प्राण भी है-
रामहि केवल प्रेम पियारा| जानि लेऊ जो जाननिहारा||(रामचरित मानस)
जप, तप ,शम ,दम ओर नियम चाहे कितने भी साधन कर लिये जायें लेकिन यदि प्रभुचरणों में प्रेम नहीं हो तो उपर्युक्त सारे प्रयास निष्फल चले जायेंगे|
भगवान आशुतोष भोले शंकर ने भी दुखी देवताओं को यही समझाया|
हरि व्यापक सर्वत्र समाना| प्रेम ते प्रकट होई मै जाना||(रामचरित मानस)
भगवान भोलेनाथ ने कहा कि भगवान के लिये कहीं आने जाने की जरूरत नहीं है सभी प्रेमभाव से यहीं प्रार्थना करें तो प्रभु यहीं प्रकट हो जायेगें| ओर हुआ भी यही सभी देवों ने जेसे ही प्रेम परिपूर्ण होकरआर्तभाव से प्रार्थना की वैसेही भगवान प्रकट हो गये| शंकरजी के कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेम में ही परमात्मा को प्रकट करने की असीम शक्ति है|
संत नानकदेव ने भी यही कहा था जो उस परमात्मा से प्रेम करता है, वही उसे पा सकता है-
' जिन प्रेम कियो तिनहि हरि पायो'|
कवीरसाहव तो ठाई अझर के प्रेम को ही ग्यान की पराकाष्ठा मानते हैं|
पोथी पढ पढ जग मुवा ,पंडित भया न कोय |
ठाई अझर प्रेम का पढे सो पंडित होय||
प्रेम से प्रभु भक्तों के अधीन हो जाते है| शवरी, निशाद , गोप-गोपी, वनवासी, रीछ, वंदर आदि ने प्रेम से ही प्रभु को अपने वश कर लिया|
वस्तुत: प्रभु को पुरुषार्थ, प्रभाव, अथवा वैभव से नही पाया जा सकता वल्कि बे तो केवल प्रेम के अधीन है|
||सवसे ऊँची प्रेम सगाई||
जिन परमात्मा का वेदों ने नेति नेति कहकर वर्णन किया है तथा जो मुनियों के लिये भी अगम है,उन्है मात्र
प्रेम के वल पर ही प्राप्त किया जा सकता है|🍀🌻🌷💐🌸
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