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anil purohit
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प्रेम
प्रेम 30  04  15 शाम का धूँआ-धूँआ स घाटी के चारों तरफ पहाडियाँ अधनंगे से नीले काले धरे रूप काट ली गयी फसलें। कुछ इंसानों के काम संजोई गयीं तो कुछ मवेशियों के लिए। बचे रह गए ठूँठ उड़ रहे -पंछी चहकते से होड़ लगाने टुकड़ी बदली के बस कुछ देर की बात फिर सन्नाटा ही ...
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धर्म
धर्म 30  04  15 जाल एक बिछा रास्तों का क्या गगन, क्या जमीन, क्या सागर। मंजिल की धुन में हर तरफ-चले जा रहे काफिले कुछ सवार हो तो कुछ पैदल मंजर से बेखबर। मंजिलें कब किसे मिली रास्ते कब किसी के हुए फिर भी नहीं चूकते-जोर आजमाने से। बहुआयामी बहुरंगी -चक्र एक घूम...
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दर्शन
दर्शन 30  04  15 कागजों पर खींच लकीरें आड़ी तिरछी निहोरते अपलक-उभरे कोई तस्वीर थपथपाते रहे हवाओं को बदहवास सुनाई दे कोई संगीत। तस्वीर कोई भी उभरे-बेखबर सुर कोई भी सजे-अनजान। लकीरों के बीच से -उतार लेते तस्वीर खामोशियों से ही-सजा लेते संगीत। अपनी ही तूली से अ...
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एक और... 24. 05. 15 ढूँढ रहा समरांगण में क्षत विक्षत भीष्म अपना एक कोना। डगमगाते कदम- ढोते बोझ अपना ही थरथराते होंठ-कुछ कहने को तत्पर। जब तब ना सुना अब सुने कौन? विस्मित समय की चाल पर जो गुजर गया चाल नदी की चल अब बस मुहाने पर मिल हो जाना विलीन। गोद में इस अ...
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मेरा गाँव
मेरा गाँव ---------- मेरा गाँव अब शहर हो गया कब देखी इसने काली लंबी नागिन सड़कें कब छुए बिजली के तार। रोज जो- सना रहता मिट्टी, गोबर में अब महकाते रंगीन बाजार। मंदिरों की घंटियाँ, मस्जिदों के अजान दब रह जाते, लाउडस्पीकरों में पट गयी बू गाँव की, शहर की खुशबूओं...
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उलझन
उलझन --------- एक डुबकी और इस ठन्डे नदी के पानी में। मन ही नहीं हो रहा  बाहर निकलने का। थरथराता सा हौले हौले उतारा (था) अपने आपको फिर (होगी) वही थरथराहट बाहर निकलते ही। बहता आ रहा - टुकड़ा एक काठ का लहरों से आँख मिचौली करता एक लकीर स्याह सी नदी पर बनती, मिटत...
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उलझन
उलझन --------- एक डुबकी और इस ठन्डे नदी के पानी में। मन ही नहीं हो रहा  बाहर निकलने का। थरथराता सा हौले हौले उतारा (था) अपने आपको फिर (होगी) वही थरथराहट बाहर निकलते ही। बहता आ रहा - टुकड़ा एक काठ का लहरों से आँख मिचौली करता एक लकीर स्याह सी नदी पर बनती, मिटत...
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ख्वाब-ग़ज़ल
ख्वाब एक हसीं मंजर का, परवान चढ़ रहा था, सिसकियों ने जाने किसकी, मंजर ही सारा पलट दिया। उम्मीद पर अभी अभी, संभले थे जानिबे मंजिल हकीकत ने फिर से,  जखम दिल का हरा कर दिया। लौट आने का वादा, खूब किया निगाहों ने तेरे दरो दीवार के सायों ने, तनहा ना हमें रहने दिया...
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दो लाईना
ये किस मुकाम पर आ गयी ज़िंदगी  मरने से ज्यादा  जीने को डर लगता। दरिया बन समुन्दर की चाहत में  पत्थरों से जाने क्या निकले, समुन्दर से मिले तो उसे पत्थरों में ओझल होते  देखे।
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गलियारे
गलियारे ------------ गुज़रते देखा है मैंने रास्ते शहरों के बीच। किनारा कर लेते ईंट गारों के मकान। कुछ रास्ते गुज़र जाते  गावों की ओट से बाँधे रखती उनको गलियाँ, धागों से बिखरती। ओझल होती गलियाँ इन्हीं अनजाने रास्तों पर भटकती फिरती- सोचती रहतीं,  ये रास्ते अनजा...
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