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Avdhesh Kumar
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सिंड्रेला और इसका एडवेंचर (बच्चों द्वारा निर्मित लघु फिल्म)
कृपया इन बच्‍चों द्वारा निर्मित फिल्‍म को लाईक एवं इस पर टिप्‍पणी अवश्‍य करें। निर्देशन : अरमान निर्माता : श्री अवधेश और श्री विजय राजकुमारी सिंड्रेला : सोनल (बड़ी), अदिति (छोटी) राजकुमार : आदित्य

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दो वक्त की रोटी
दो वक्‍त की रोटी के लिए इंसान दीवाना बना फिरता है रब की हर चौखट पर माथा रगड़ता मिलता है भाग्‍य चमकाने के लिए क्‍या-क्‍या नहीं फिर करता
है मन्दिर का तिलक, मस्जिद की
भभूति बाबाओं की दी लोंग-ईलायची मुँह में दबाए फिरता है सभी के नियमों को मन में बसाए फिरता है भ...

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जिंदगी के रंग
कवियत्री  :  निर्मल राज जीवन भर कठिनाइयों के पहाड़ और दुख के सागर लाँघ कर वह अंत तक - सारी चिंताएँ मुक्‍त, बच्‍चों की खातिर अपने ही भीतर बहती गमों की लहरें थाम लेती हैं डूबने से पहले ही जरा सी बची हुई मुस्‍कान वाह रे ! जीवन, जिंदगी जीने के कितने उसूल हैं - ...

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मैट्रो का सफर
मैट्रो का निर्माण हुआ है देखें कितना सुधार हुआ है बसों की भीड़ न हो पाई कम देखों चिल्‍लम-चिल्‍ली हरदम। मैट्रो में भी भीड़ है भारी मचा रही कितना हड़कंप उतरने वाले उतर न पाएं चढ़ने वाले बल आजमाएं किसी की देखो बटन टूट गई बैग किसी से खींचा न जाए चश्‍मा टूटा, घड...

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तो सोचता हूं -
जब देखता हूं भूखे-नंगे चिथड़ों में लिपटे बच्‍चों
को भीख मांगते हुए फटकार खाते
हुए तो सोचता हूं- क्‍या आदमी की शक्‍ल का हर आदमी इंसान होता है। जब देखता हूं - बच्चियों से बलात्‍कार करते उनका बचपन रौंधते हुए तो सोचता हूं- क्‍या आदमी की शक्‍ल का हर आदमी इंसान ह...

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पलभर की सांस
यह कविता उस बच्‍ची को समर्पित है, जो पैदा होते ही मृत्‍यु की गोद में समा गई। कवियत्री : निर्मल राज नौ महीने कोख में
रखकर दर्द से सिंचा था मैंने एक नन्‍हीं सी पौध
बनकर उगेगी आंगन मेरे खिलेगी शबनम की तरह महकेगी गुल-बहार बनकर गूँजेगी किलकारियाँ
तेरी मीठी-मीठी ...

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माँ की यादें
(स्‍वर्गीय माँ को समर्पित) ऑफिस से जब घर आता हूँ वही माँ का कमरा जिसमें वह बैठी रहती थी अब सूनापन नजर आता है। बैड पर बैठी रहती थी माँ कुछ न कुछ कहती रहती थी माँ न जाने कहाँ चली गई माँ अब सूनापन नजर आता है। कमरे में दाखिल होते ही माँ की पहली आवाज आज भी बहुत ...

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आज तो है
कवियत्री : निर्मल राज कल ना हमारा है ना किसी और का कल तो सिर्फ अपना है जो जीता है अपने लिए बड़ी शान से जो आज है जीवन का एक दिन वो दिन हमारा है जीयो आज सीना तानकर दुख की परछाई डूब गई अपने ही भीतर जो फैला रखा था चहूँ ओर काला साया बड़ी दूर तक नहीं छोड़ा उसने कल ...

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हिंदी बचाओ
अंग्रेजों की गुलामी से तो देश ये आजाद हुआ अंग्रेजी की गुलामी कर हिंदी को गुलाम हम बना रहे। गोरे तो चले गए अपनी रीतियों को छोड़कर सभ्‍यता अपनी पाकर भी हम भुला रहे। अंग्रेजों की अंग्रेजी कमाल बड़ा कर रही हम लोग हिंदी क्‍यों हाशिए पर पहुंचा
रहे। बच्‍चे आज के अं...
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