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मैं प्रकृति हूँ
                            मैं प्रकृति हूँ मैं प्रकृति हूँ ! मैं तो आँचल बनकर आई थी इस ब्रह्माण्ड पर, मगर बुद्धिजीवियों ने मुझे विभाजित कर दिया | क्या कमी रह गई थी मेरी ममता में? सब कुछ तो अर्पित कर दिया है मैंने अपना ! कहीं धाराओं में बहती हूँ नदी बनकर, त...
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