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परम कवि
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कभी कोई-कभी कोई, दिल में तब, अब कोई, कोई बैरन हवा थी वो, गई जगा उमंग सोई | कभी इस पर, कभी उस पर, मचल जाता है ये यूँ ही, दिल बगिया है बहारों का, इसमें कभी कोई-कभी कोई || घटायें पर्वतों की अब, उठती हैं, मेरे मन...
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