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shikha kaushik
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shikha's posts

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'हर ज़ख्म छिपाना पड़ता है '
अपनों की गद्दारी का ; हर ज़ख़्म छिपाना पड़ता है ! गैरों के  अपनेपन  से  ; ये दिल बहलाना पड़ता है ! ....................................... है मालूम हमें मक्कारी  ; पीठ के पीछे करता है , पर महफ़िल में हंसकर उससे ; हाथ मिलाना पड़ता है ! ...............................

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मुस्लिम महिला की स्थिति मजाक !
भारतीय नारी ब्लॉग की माननीया सदस्य सुश्री शालिनी कौशिक जी का महत्वपूर्ण आलेख -   इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तीन तलाक के मुद्दे पर तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा -''मुस्लिम महिलाओं से क्रूरता है तीन तलाक ''.आरम्भ से हम सुनते आये कि मुसलमानों में बस पति ने कहा ''तलाक-त...

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मुझे खामोश रहने दो
मेरे दिल में बहुत शोले मुझे खामोश रहने दो, लबों पर आ गये तो आग दुनिया में लगा देंगे ! उबलते हैं उफनते हैं बगावत के समन्दर जो, अगर दिल चीर कर रख दूं ये दुनिया को बहा देंगे ! तेरी जिद है बनाना मुझको अपने पैर की जूती, हमारे हौसले सरताज दुनिया का बना देंगे ! नह...

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दीप जलाना सीखा है!
जब जब कंटक चुभे हैं पग में, मैंने चलना सीखा है,   अंधियारों से लड़कर मैंने, दीप जलाना सीखा है! .......................... अपनों की गद्दारी देखी, गैरों की हमदर्दी भी, पत्थर की नरमाई देखी, फूलों की बेदर्दी भी, सूखे रेगिस्तानों से प्यास बुझाना सीखा है!  अंधिया...

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हिंदी ब्लॉगिंग और महिला सरोकार : ['भारतीय -नारी ' सामूहिक ब्लॉग के सन्दर्भ में ]
I HAVE PRESENTED THIS RESEARCH PAPER 0N 30TH MARCH 2016 AT MALVIYA BHAVAN DELHI  IN A SEMINAR -DR.SHIKHA KAUSHIK भारतीय समाज विभिन्न धर्मों , समूहों और जातियों से मिलकर बना है ,जिसमें char वर्णों के अतिरिक्त एक एक और जाती भी है .वह जाति है -स्त्री की . आज इ...

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'आइटम' कहते हुए लज्जा तो आनी चाहिए !
कोख में ही क़त्ल होने से बची कलियाँ हैं हम  , खिल गयी हैं इस जगत में झेलकर ज़ुल्मो सितम , मांगती अधिकार  स्त्री भीख नहीं चाहिए , अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए ! .............................................................. पितृसत्ता ने इशारों पर नचाई...

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मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !
देख दुःखों में डूबा मुझको ; जिनके उर आनंद मनें , किन्तु मेरे रह समीप ; मेरे जो हमदर्द बनें , ढोंग मित्रता का किंचिंत ऐसा न मुझको भाता ! मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !  सुन्दर -मँहगे उपहारों से ; भर दें जो झोली मेरी ,, पर संकट के क्षण में जो ; आने में करते देरी ...

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मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !
देख दुःखों में डूबा मुझको ; जिनके उर आनंद मनें , किन्तु मेरे रह समीप ; मेरे जो हमदर्द बनें , ढोंग मित्रता का किंचिंत ऐसा न मुझको भाता ! मैं ऐसे मित्र नहीं चाहता !  सुन्दर -मँहगे उपहारों से ; भर दें जो झोली मेरी ,, पर संकट के क्षण में जो ; आने में करते देरी ...

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समीक्षक- आरिफा एविस
समीक्षक- आरिफा एविस ‘क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती’ डॉ. शिखा कौशिक ‘नूतन’ द्वारा लिखा गया लघु कथा संग्रह है जिसमें स्त्री और पुरुष की गैर बराबरी के विभिन्न पहलुओं को छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से सशक्त रूप में उजागर किया है. इस संग्रह में हमारे समाज की सामं...

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'वो' भयभीत नहीं होने देता '
बसा हुआ हर उर में है 'वो' ; भयभीत नहीं होने देता , विषम घड़ी में भी शत्रु की जीत नहीं होने देता ! ...................................... रुको नहीं बढ़ते जाओ ; चीर अंधेरों के चीरो , बलिदानों की झड़ी लगा दो , किंचित नहीं झुको वीरों , वीर-प्रसूता के मस्तक को ल...
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