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देवसिंह रावत DEV SINGH RAWAT
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Pyara Uttrakhand
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शराब के कारण  बिहार के एक गांव पर जैसा जुर्माना हुआ ऐसा ही जुर्माना भारत के प्रधानमंत्री व सभी  मुख्यमंत्रियों, पुलिस प्रमुखों पर भी होता तो देश सोने की चिड़िया बन जाता।
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भारत में बगलादेश के घुसपेट करना और यूरोप में अरब शरणार्थी की बाढ़,दोनों सुनियोजित हमला कर कब्जा करने की एक रणनीति है।
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अंग्रेजों के बाद, अंग्रेजी की गुलामी से भारत की आजादी के लिए आगे आयें देशभक्त
भारतीय भाषा आंदोलन
श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री भारत
विषय- (क)अंग्रेजों के जाने के 68 साल बाद भी पूरी व्यवस्था पर काबिज अंग्रेजी की गुलामी से भारत को मुक्ति दिलाओं और भारतीय भाषायें लागू करो।
(ख) 35 माह से संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर चल रहे भारतीय भाषा आंदोलन के अखण्ड धरने पर सरकार का राष्ट्रघाती शर्मनाक मौन क्यों?
हमारी मांगे (1)संघ लोकसेवा आयोग (2) सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों (3) शिक्षा (4) सभी रोजगार की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता हटा कर भारतीय भाषा लागू करते हुए शासन प्रशासन संचालित करने की मांग
(ग)- 18 जनवरी 1968 व 1991 को संसद में पारित राजभाषा संकल्प को लागू करो

जय हिन्द! वंदे मातरम्।
मान्यवर,
पूरे विश्व के चीन, रूस, जर्मन, फ्रांस, जापान, टर्की, इस््रााइल सहित सभी स्वतंत्र व स्वाभिमानी देश अपने देश की भाषा में अपनी व्यवस्था संचालित करके विकास का परचम पूरे विश्व में फंेहरा रहे हैं। परन्तु भारत में अंग्रेजों के जाने के 68 साल बाद भी बेश्र्मी से फिरंगी भाषा में ही न केवल राजकाज व न्याय व्यवस्था संचालित की जा रही है अपितु शिक्षा(चिकित्सा, यांत्रिकी, सामान्य)ही नहीं रोजगार व सहित पूरी व्यवस्था अंग्रेजी को ही पद प्रतिष्ठा व सम्मान का प्रतीक बना कर भारत व भारतीय संस्कृति को अंग्रेजियत के प्रतीक इंडिया का गुलाम बनाया जा रहा है। अंग्रेजो के जाने के 68 साल बाद भी जिस बेशर्मी से देश के हुक्मरानों ने अंग्रेजी की गुलामी से देश के स्वाभिमान, संस्कृति व लोकशाही को जमीदोज करके दिन प्रतिदिन भारत को मिटा कर फिरंगी सम्राज्ञी का गुलाम इंडिया बनाने का राष्ट्रद्रोही कृत्य जारी रखा है। उसको देख कर भारतीय भाषा आंदोलन ने 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट पर देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त कराने व भारतीय भाषायें लागू कराने के लिए भारतीय लोकशाही के कुरूक्षेत्र जंतर मंतर पर ऐतिहासिक आंदोलन का शंखनाद करके अखण्ड धरना प्रारम्भ कर दिया है। ताकि संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय जैसे शीर्ष संवैधानिक संस्थानों से भारतीय भाषाओं की बहाली से भारत के गांवों तक गुलामी का कलंक मिटा कर लोकशाही के सूर्याेदय से भारत फिर पूरे विश्व में अपना परचम फेहराये।।परन्तु दुर्भाग्य है कि आप जैसे भारतीय भाषाओं को देश विदेश में अधिक महत्व देने वाले प्रधानमंत्री के कार्यालय से भी भाषा आंदोलन के ज्ञापनों की पावती भी अंग्रेजी भाषा में ही मिलता है। हमें आशा है कि आप देश की आजादी को विगत 68 साल से फिरंगी भाषा‘अंग्रेजी’ की बेडियों से मुक्त करने के अपने दायित्व का पालन करेंगे। बलात फिरंगी भाषा के गुलामी का कलंक ढो रहे भारत की लोकशाही स्थापित करने हेतु राष्ट्र के जीवन मूल्यों की संवाहिका भारतीय भाषाओं सेे पूरी व्यवस्था को संचालित करने के अपने प्रथम संवैधानिक दायित्व का निर्वहन करेंगे ।तभी देश सच्चे अर्थो में आजाद होगा और तभी शहीदों की शहादत साकार होगी। आशा है आप देश को विदेशी भाषा की गुलामी से मुक्ति दे कर देश को अपनी भाषा, अपना नाम व अपना सम्मान प्रदान करके अपने दायित्व का निर्वहन करने का काम करेंगे।
जहां भारत सहित पूरा विश्व, आतंकवादियों के आतंक के कहर से सहमा हुआ हैै। वहीं दूसरी तरफ संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र व प्राचीन सनातन संस्कृति का देश ‘भारत’, अंग्रेजी की गुलामी से मर्माहित है। भारतीय भाषा आंदोलन, जो 35 महीने से संसद की चैखट पर देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने और भारतीय भाषाओं को लागू करने के लिए निरंतर आजादी की जंग लड़ रहा है, संसद से मांग करता है कि सरकार तत्काल देशहित में 1968 व 1991 में संसद में पारित संकल्प को तत्काल लागू करे या इसे वापस ले। अंग्रेजों के जाने के 68 साल बाद भी देश की आजादी के लिए न केवल तरस रहा है अपितु अंग्रेजी की गुलामी के आतंक से मृत्यप्रायः हो चूका है। कभी विश्व में ज्ञान में जगत गुरू व समृद्धि में सोने की चिड़िया कहलाने वाला भारत अंग्रेजी की गुलामी से इतना पथभ्रष्ट्र हो गया है कि वह अपनी भारतीय भाषा व नाम के लिए तरस रहा है। यही नहीं हुक्मरानों द्वारा बलात अंग्रेजी का गुलाम देश बनाये जाने के कारण भारत विश्व में जहां अपने नाम से वंचित हो कर थोपे गये नाम इंडिया के नाम से संसार के सबसे गरीब व भ्रष्ट देशों की जमात में खड़ा है।
देश से अंग्रेजी की गुलामी के कलंक से मुक्ति दिलाने के लिए संसद की चैखट जंतर मंतर पर विगत 21 अप्रैल 2013ं से सतत् आंदोलन कर रहे भारतीय भाषा आंदोलन को 35 माह पूरे होने पर जिस शर्मनाक मौन भारत सरकार ने रखा है वह न केवल माॅं भारती,लोकशाही व माानवाधिकारों का घोर अपमान है अपितु यह देश की आजादी के लिए अपनी शहादत देने वाले अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह व नेताजी सहित लाखों सपूतों के अमूल्य बलिदानों का भी घोर अपमान है। विदेशी आक्रांताओं की गुलामी से भारत को मुक्त कराने के लिए अपनी शहादत देने वाले माॅं भारती के महान सपूतों ने सपने में भी यह कल्पना भी नहीं की होगी कि अंग्रेजों के जाने के बाद देश के हुक्मरान, बेशर्मी से देश की आजादी को फिरंगी भाषा(अंग्रेजी) का गुलाम बना कर देश की लोकशाही व संस्कृति को रौंदने का जघन्य कृत्य करेंगे ।देश के हुक्मरानों द्वारा देश को बलात फिरंगी भाषा अंग्रेजी भाषा थोपने के खिलाफ भारतीय भाषा आंदोलन हर माह 21 तारीख को धिक्कार दिवस मनाने के लिए विवश है।
देश का दुर्भाग्य यह है कि 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने के 68 साल बाद भी देश को वह आजादी हासिल नहीं हुई जिसके लिए हमारे शहीदों व स्वतंत्रता सैनानियों ने अपना सर्वस्व बलिदान किया। उसी फिरंगी भाषा (अंग्रेजी) की दासता शर्मनाक ढ़ग से जकड़ा हुआ है जिसकी गुलामी से मुुक्ति के लिए देश के लाखों सपूतों ने अपना सर्वस्व बलिदान देते हुए शताब्दियों तक लम्बा ऐतिहासिक संघर्ष किया था। देश के हुक्मरानों की अंग्रेजी दासता के अंध मोह के कारण आज संसार का सबसे बडा लोकतंत्र अपने नाम, अपनी भाषा व अपने इतिहास के साथ साथ लोकशाही के लिए तरस रहा है। आज देश में न्यायपालिका सहित पूरी व्यवस्था में अंग्रेजी का ही राज चल रहा है। देश में सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों में ही नहीं संघ लोकसेवा आयोग से लेकर शिक्षा, प्रतिष्ठा व रोजगार पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा की दासता में जकड़ा हुआ है। लोकशाही के नाम पर देश की सवा सौ करोड़ जनता को 15 अगस्त 1947 के बाद बैशर्मी से विदेशी भाषा को बलात थोप कर व भारतीय भाषाओं को तिरस्कार कर पूरे देश को गूंगा बहरा बना कर लोकशाही, स्वाभिमान व मानवाधिकार का गला ही घोट रखा है। इसी फिरंगी भाषा की गुलामी से देश को मुक्त कराने के लिए भारतीय भाषा आंदोलन तीन दशक से से निरंतर संघर्ष कर रहा है। देश की अस्मिता, सम्मान व लोकशाही को अंग्रेजी के अंध मोह में रौंद रहे हुक्मरानों की धृष्ठता को देख कर भारतीय भाषा आंदोलन ने 21 अप्रैल 2013 से संसद की चैखट, राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर पर अखण्ड धरना दे कर देश की आजादी को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का ऐतिहासिक आंदोलन शुरू कर रखा है। हमारा साफ मानना है कि भले ही देश 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजाद हो गया हो परन्तु देश के हुकमरानों के फिरंगी भाषा के प्रति अंध मोह के कारण देश की आजादी आज भी 68 सालों से अंग्रेजी भाषा द्वारा गुलाम बनायी गयी है। पूरे तंत्र में उसी फिरंगी भाषा का राज चलने के कारण आज भी भारत राष्ट्रमण्डल देशों की प्रमुख ब्रिट्रेन की सम्राज्ञी का ही गुलाम बना हुआ है। जिस देश का अपने देश की भाषा का शासन, न्याय, शिक्षा, रोजगार व सम्मान में राज न हो वह देश गुलामी से बदतर स्वयं भू गुलाम उसी विदेशी भाषा का होता है जिसका राज उस देश में चल रहा होता है।
आज से लगभग 47 वर्ष पूर्व भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था। उस प्रस्ताव को लागू करने के सवाल पर भारत का शासन एवं प्रशासन हमेशा से स्वयं को बचाता रहा है। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को लागू करने का मामला हो या सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय में जनता की भाषा में सुनवाई का सवाल हो ! संघ लोक सेवा आयोग एवं सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ स्वयं संसद ने भी अपने प्रस्ताव को संवैधानिक कारणों के चलते हमेशा दबाने की कोशिश ही की है। दरअसल कारण जो भी हो, डरावने सचों का सामना करने का जिगरा ना भारत की संसद एवं शासन व्यवस्था के पास बचा है और ना ही समाज के पास ! सब अपनी-अपनी सुविधानुसार कामचलाऊ झूठ के सहारे चल रहे हैं । अंग्रेजी का आरक्षण भारत में अनंतकाल तक चलता रहेगा ! यह डरावना सच भारत के संविधान में ही लिख दिया गया था। संविधान के इस भयानक सच पर कभी सीधी बात नहीं होती। क्योंकि संविधान सर्वोपरि है। लिहाजा अंग्रेजी का चक्रव्यूह अब गांवों तक को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है। सर्वोच्च न्यायालय एवं संसद भी सर्वोपरि है। इन पर उंगली उठाना गुनाह है। यह डर भी जनता की नसों में उतारा जा चुका है। संविधान-संसद एवं सरकारों की देखरेख में अंग्रेजी की जड़ों को भारत की नसों में गहरे उतारने के साथ-साथ भारत की भाषाओं को मान्यता दिलाने के लिए भी सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर अपनी-अपनी सुविधानुसार ठग-विधाऐं भारत में चल रही हैं । ऐसी ही एक ठग विधा का आयोजन भारतसरकार की तरफ से प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर से शुरू होता है जो दो सप्ताह तक चलता है। इसमें सिर्फ ‘सरकारी ठग’ ही शामिल होते हैं। इस आयोजन के द्वारा अरबों रूपयों के उस फंड का औचित्य सिद्ध किया जाता है जो सरकार में बैठे ‘भाषा आंदोलनकारियों’ पर प्रत्येक वर्ष खर्च किया जा रहा है।
इन ‘सरकारी आंदोलनकारियों’ के प्रयासों के चलते सरकारी विभागों में भारतीय भाषाओं की मान्यता हेतु संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिश पर लगभग 5 वर्ष में एक बार राष्ट्रपति के आदेश जारी करने की भी परम्परा है। परम्परागत राष्ट्रपति के ये आदेश किन रद्दी की टोकरियों के हवाले कर दिये जाते हैं, इसकी फिक्र ना कभी संसद को रही और ना ही राष्ट्रपति भवन को। भाषा के सवालों को लेकर संसद एवं राष्ट्रपति भवन के बीच चलती आ रही इस ठग विधा का यह दूसरा नमूना है। भारतीय भाषाओं के सवाल पर संविधान के बाद, अब तक ठगी एवं झूठ का सबसे बडा उदाहरण स्वयं संसद ने लगभग 45 वर्ष पूर्व 18 जनवरी 1968 को पेश किया था। भारतीय भाषाओं को लागू करने हेतु इस दिन संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया था, उसका नाम दिया गया संसदीय संकल्प। वह संकल्प पिछले 45 वर्षों से कभी संसद के बाहर नहीं जा पाया। संसद के ओर संकल्पों की तरह यह संकल्प भी संसद की कैद में दर्ज हो चुका है। भारत में अनंतकाल तक अंग्रेजी के आरक्षण की संवैधानिक किलेबंदी के चलते, आखिर किस आधार पर संसद ने भारतीय भाषाओं को लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया? इस प्रस्ताव की वैधानिक स्थिति क्या है? संसदीय प्रस्तावों के प्रति स्वयं संसद की जिम्मेदारी एवं जवाबदेही क्या है? भाषायी मुद्दे पर जनता की भावनाओं के साथ पिछले 45 वर्षों से जारी इस संसदीय छल पर किसे कटघरे में खडा करें? और कौन करे? कौन देगा इन सवालों के जवाब?
कुछ ऐसे ही सवालों के उत्तरों की तलाश में, हिन्दुस्तान में अंग्रेजी को बलात थोपने के सबसे बडे़ केन्द,्र संघ लोक सेवा आयोग पर 16 अगस्त 1988 से विश्व के सबसे लम्बे धरने की शुरूआत हुई। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाऐं भारतीय भाषाओं में हो! भाषा आंदोलनकारियों की इस मांग से सहमति जताते हुए 175 संसद सदस्यों ने भी अपने हस्ताक्षरों से युक्त ज्ञापन तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह को दिया था। 12 मई 1994 को पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के नेतृत्व में देश के सभी शीर्ष राजनीतिक नेताओं/दलों का सामूहिक धरना संघ लोक सेवा आयोग के मुख्य द्वार पर दिया गया। इसमें राष्ट्रीय समाचार पत्रों के सम्पादकों, 50 से अधिक संसद सदस्यों, विधायकों, पूर्व राज्यपालों सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने हिस्सा लिया। इसी दिन संसद के दोनों सदनों में सभी दलों ने मुखर होकर भारतीय भाषाओं के सवाल पर अपना पक्ष रखा। लेकिन संविधान के अनुच्छेदों में पद, पैसा एवं प्रतिष्ठा केवल अंग्रेजी वर्ग के लिए आरक्षित कर दिये जाने की किसी ने चर्चा नहीं की। लिहाजा वह भाषायी आक्रोश हमेशा की तरह केवल रस्म अदायगी बन कर रह गया।
विवश होकर भाषा आंदोलनकारियों ने स्वयं संसद में भाषा के सवाल पर देश का ध्यान आकर्षित करने की योजना बनायी। 21 अप्रेल, 1989 एवं 10 जनवरी 1991 को आंदोलनकारी संसद में प्रवेश कर गये। नारेबाजी की। 1991 में पर्चे फेंकने की घटना के बीच एक आंदोलनकारी भी दर्शक दीर्घा से नीचे लोक सभा में कूद गया। नतीजा सिर्फ इतना निकला कि वह अपनी पसलियां तुडवाकर दो महीने अस्पताल में रहा और संसद ने 18 जनवरी 1968 के उस बेजान प्रस्ताव को पुनः अगले दिन ध्वनिमत से पारित कर अपने हाथ खडे़ कर दिये। संघ लोक सेवा आयोग पर चल रहे निरंतर धरने को लगभग 14 वर्ष हो चुके थे। इसी बीच अनेक सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति से आंदोलनकारियों की सीधी झडपें भी हुई। अनेक विरोध प्रदर्शनों, आमरण अनशन एवं लम्बे धरने से आजीज आकर भारतीय भाषाओं को लागू करने के बजाय, अचानक सरकार की देखरेख में धरने को नेस्तनाबूद कर दिया गया, आंदोलकारियों का सामान, तम्बू आदि उखाडकर फेंक दिये गये। संसद द्वारा पारित प्रस्ताव को लागू करने के लिए चल रहे अनवरत सत्याग्रह को तहस-नहस करने की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही पर किसी भी राजनीतिक दल एवं नेता ने अपना विरोध नहीं जताया। संसद में भाषाओं के सवाल पर मुखर रहने वाले नेताओं ने भी अपने मुंह सिल लिए थे। संसद एवं सर्वोच्च न्यायालय ने भी सचमुच आंखों पर पट्टी बांध ली थी। अंग्रेजी की इन पट्टियों को सारे हिन्दुस्तानी मिलकर नोंचे!
सभी देशवासियों से विनम्र निवेदन है कि वे देश को अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त करने के लिए इस अभियान को सफल बनाने में अपना योगदान दे कर देश की आजादी के लिए शहीद हुए लाखों शहीदों की शहादत को साकार करें। हम अंग्रेजी सहित किसी भी भाषा के विरूद्ध नहीं है।कोई भी व्यक्ति संसार या सृष्टि की किसी भी भाषा को पढ़, लिख व बोल सकता है। परन्तु किसी देश में अपनी भाषा छोड़ कर बलात विदेशी भाषा थोपना न केवल राष्ट्रद्रोह है अपितु यह मानवाधिकार का घोर हनन और लोकशाही का गलाघोंटने वाला कृत्य है। आओ इस अभियान में आप सभी अपना योगदान दें।
देवसिंह रावत
(महासचिव)
भारतीय भाषा आंदोलन

राष्ट्रीय धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली मोबाइल 9910145367
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उत्सव जिंदगी का हम मनायें केसे ?
सुन कर भी माॅं भारती की चित्कार
माॅं भारती के नाम व जुबान पर ही
लगा है अंग्रेजी व इंडिया के ताले।
दुशासन चिर हरण कर रहे हैं यहां
माॅं भारती का यहां कदम कदम पर
ये दो टके के लिए गौ बध करा कर
देश की संस्कृति को ही रौंद रहे है ?
बिलख रहे हैं भूख से बच्चे गलियों में
आप ही बताओं हम जश्न कैसे मनायें ?
-देवसिंह रावत
भारतीय भाषा आंदोलन
धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली
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उत्सव जिंदगी का हम मनायें केसे ?
सुन कर भी माॅं भारती की चित्कार
माॅं भारती के नाम व जुबान पर ही
लगा है अंग्रेजी व इंडिया के ताले।
दुशासन चिर हरण कर रहे हो यहां
माॅं भारती का यहां कदम कदम पर
ये दो टके के लिए गौ बध करा कर
देश की संस्कृति को ही रौंद रहे है ?
बिलख रहे हैं भूख से बच्चे गलियों में
आप ही बताओं हम जश्न कैसे मनायें ?
-देवसिंह रावत
भारतीय भाषा आंदोलन
धरना स्थल जंतर मंतर दिल्ली
दुनिया सदा से घूमती गोल चक्कर
पर तुम अपने केंद्र में स्थिर रहो डटकर
दृष्टि को दृश्य से हटाकर, दृष्टा में आकर
आँखें बंद कर जान लो, तुम्हीं वह आत्मा हो
बाहर की चहल पहल में छोड़ न देना
दिल की गहराई में छिपे आनंद को चख लेना
सदा से वहीँ था, बस थोड़ा ढका था
वह नूतन परम हर्ष , वह नित्य उत्कर्ष
केवल अज्ञान से ही हैं सभी विवाद
घुल जाते आतंरिक प्रकाश में सब अवसाद
इस आनंद को बांटना ही बस अपना काम
जुड़ते जुड़ते संपूर्ण विश्व बना अपना अधिष्ठान
अनेक भाषाएँ अनेक धारणाएँ बंधी एक सूत में
जगत में जितने रूप, प्रेम ही हर रूप में
जो बना वो टूटेगा, जो मिला वो छूटेगा
पर हमारा आत्म शाश्वत, रहेगा अनन्त तक
इस पथ पर हम हँसते, गाते, और साथ ही करते ध्यान
सब सहज हो जाए, हम उत्सव मनाएं जब दृढ हो जाए ज्ञान
आँखों में चमक, बस चेहरे पर मुस्कान रखें आप
पर्याप्त है, इसी से पड़ जाए जगत पर अमिट छाप
जैसे सभी नदियां एक हो समंदर में समाएँ
सभी धर्म एक हो जीवन को उत्सव बनाएँ
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2016-03-17
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रविशंकर के विश्व सांस्कृति उत्सव प्रकरण से सरकार सहित पूरा तंत्र बेनकाब
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कहीं इस आयोजन से अक्षरधाम की तरह यमुना के इस तट पर विश्व का दर्शनीय धरोहर बनाना चाहते हैं श्री श्री!
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नई दिल्ली (प्याउ)। पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार फेज-एक के समीप के यमुना तट पर 1000 एकड़ भूमि पर विश्व विख्यात संत श्री श्री रविशंकर के आर्ट आॅफ लिविंग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय भव्य विश्व सांस्कृतिक उत्सव में जहां विश्व भर के 150 से अधिक देशों के लाखों लोग भाग ले रहे है। 11 मार्च से 13 मार्च तक हो रहे इस तीन दिवसीय विश्व सांस्कृतिक उत्सव में जहां 35 लाख लोगों के सम्मलित होगे। इसके लिए भले ही मोदी सरकार ने पूरा तंत्र इसको सफल बनाने में झोंक दिया है। लोग हैरान है कि आम आदमी के हर काम पर अडंगा लगाने वाला प्रशासन कैसे प्रभावशाली सबल व्यक्ति के लिए नियम कानून नजरांदाज करके सेवा में समर्पित हो जाता है।परन्तु समाज में ऐसे भी लोग हैं जो केवल अपने अहं की तुष्टि के लिए इस भव्य आयोजन में किसी भी प्रकार से ग्रहण लगाना चाहते है। इस आयोजन से भले ही यमुना के इस क्षेत्र में सफाई का विशेष सराहनीय कार्य किया गया हो। यह भी हो सकता है कि इस क्षेत्र को श्री श्री रविशंकर भी अक्षरधाम की तरह ही ऐसा विकास करें की यह देश विदेश के लिए एक प्रमुख दर्शनीय स्थल बन कर चमक जाये। भले ही यह पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन करने वाला एक बडा कार्यक्रम हो। परन्तु जिस प्रकार से मोदी सरकार ने तमाम नियम कानूनों को दर किनारा करके पूरा तंत्र इस सफल बनाने में झोंका उससे कहीं न कहीं आम जीवन में इन नियम कानूनों के कारण अपने कार्य प्रारम्भ न कर सकने वाले आम आदमी के दिल में टीस का उठना स्वाभाविक है। इसके साथ इस निजी संस्था के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए यहां पर मोदी सरकार ने यमुना में दो पंटून पुल बनाने के लिए लगाया गया। वह एक प्रकार से गलत परंपरा प्रतीत हो रही है। सेना का ऐसा दुरप्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ यह कोई सामान्य या गरीब संस्था नहीं है यह काम संसार की सबसे अमीर संस्थाओं में से एक श्री श्री रवि शंकर की संस्था करा रही है। यह संस्था अपने खर्चे पर यह बना सकती थी। हां हो सकता है यह सब सुरक्षा की दृष्टि से सेना को सरकार ने किया हो। इसके साथ इस आयोजन में आतंकी हमले से बचाव के लिए करीब 5 हजार से अधिक सुरक्षा बल तैयार किये गये।
इस यमुना के बाढ़ में डूबने वाले क्षेत्र में हो रहे इस तीन दिवसीय कार्यक्रम के समापन अवसर पर जहां एक तरफ राष्ट्रपति ने सम्मलित होने पर अपनी असमर्थता प्रकट की वहीं यह विवाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निशाने पर भी आ गया है। पर्यावरण व यमुना और आस-पास के जैवपारिस्थिकी तंत्र को नुकसान पंहुचने के नाम पर जहां इस कार्यक्रम को निरस्त करने की मांग की गयी। एनजीटी ने इस शिकायत के आधार पर आॅर्ट आॅफ लिविंग पर 120 करोड़ रूपए का जुर्माना लगाया था। किसानों की फसल की बर्बादी का सवाल हो या अन्य सवाल। इस प्रकरण से एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या श्री श्री इस आयोजन को कहीं और नियम से नहीं कर सकते थे। हो सकता हो उनकी नजर भी इस स्थान को अक्षर धाम की तरह ही विशेष विकसित करने की हो, जिसकी पृष्ठभूमि के लिए यह आयोजन किया जा रहा हो। पर जो हो इससे यमुना की सफाई ही होगी। देश का नाम रोशन होगा। वहीं पूरी व्यवस्था बेनकाब हो जायेगी। क्या देश में ऐसा तंत्र स्थापित नहीं हो सकता है जो आम आदमी के कार्यो के लिए वेसा ही सहयोग दे जैसा श्रीश्री जैसे धनाडयों के इस आयोजन में दे रहा है।
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देशद्रोही आतंकी का समर्थन करना व देश की बर्बादी के नारे लगाना अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। -उच्च न्यायालय (जनेविवि प्रकरण परं )
फिर
सुधरने का अवसर दे कर 6 माह की जमानत पर रिहा हुए देशद्रोह के मामले में बंद कन्हैया, की रिहाई पर जश्न मनााने वाले कौन,? क्यों?
रिहा होने के बाद कन्हैया के भाषण पर ताली बजाने वाले बतायेंगे कि इस भाषण में एक शब्द भी इस अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले वामपंथी ने देश के लाखों कश्मीरियों को मार मार कर कश्मीर से खदेड़ने वाले आतंकियों के खिलाफ नहीं बोले?
यह कथनी से कहीं अधिक करनी को सम्मान देता है। विद्धान तो रावण भी था परन्तु करनी जब निंदनीय हो तो वह भाषण स्वीकार नहीं किया जाता।
क्या कन्हैया ने जनेविवि में देशद्रोही नारे लगाने वालों को रोकने की कोशिश की थी? नहीं , क्यों? वे चेहरा ढके हुए लोग कोन
क्या कन्हैया व उसके साथी कश्मीर की आजादी के लिए जनविवि तो दूर संसद की चैखट जंतर मंतर पर नारे नहीं लगाते......?
क्या कन्हैया व उसके साथी संसद पर हुए आतंकी हमले के गुनाहगार गुरू की फांसी का विरोध नहीं करते?
क्या कन्हैया व उनके तथाकथित अभिव्यक्ति की आजादी की बात कहने वालों ने कभी आतंकियों द्वारा कश्मीर में मारे गये सेकडों कश्मीरियों की हत्या व लाखों कश्मीरियों को वहां से भगाये जाने के खिलाफ अपनी जुबान भी खोली? नहीं कभी नहीं।
न्यायालय ने भी दो टूक शब्दों में कहा कि देशद्रोही आतंकी का समर्थन करना व देश की बर्बादी के नारे लगाना अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है।
तो फिर ऐसे छात्रों के ऐसे कृत्यों का हमदर्द कौन और क्यों? क्या यही इनकी राष्ट्रभक्ति है? ऐसे छात्र को बिहार का बेटा बताने वाले कौन से तत्व हैं? इनको बेनकाब करो।
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2016-03-05
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गौ रक्षा के लिए सत्तांध भाजपा व कांग्रेस के पाखण्ड से भारतीय संस्कृति हुई कलंकित, मर्माहित गौ माता की चित्कार सुनकर आसमान भी रोया
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सत्ता में रहते हुए गौ हत्या पर प्रतिबंध न लगाने वाले कांग्रेसी व भाजपाई, अब गौ आंदोलन में सम्मलित हो कर खुद को गौ भक्त व दूसरे को गुनाहगार बताने में जुटे।
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7 दिन से चले गौ आंदोलन में गोपालमणि से नहीं अपितु गोपालदास मुनि के तैवरों से आशंकित है पुलिस प्रशासन
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नई दिल्ली(प्याउ)। अंग्रेजों के भारत से जाने के 68 साल बाद भी देश में गौ माता ही हत्या व मांस निर्यात पर प्रतिबंध न लगाने वाले कांग्रेस व भाजपाई, 28 फरवरी से दिल्ली के रामलीला मैदान से जंतर मंतर पर चल रहे गौ रक्षा आंदोलन में सम्मलित हो कर जहां खुद को गौ भक्त व दूसरे को गौ विरोधी बताने में लगे हैं। इन सत्तांधों के इस पाखण्ड को देख कर भले ही गौ रक्षा आंदोलन चला रहे आयोजक मूक रहे पर 5 मार्च को इनके पाखण्ड को देख कर जहां गौ माता चित्कार रही थी वहीं आसमान भी वर्षा कर मानों रो रहा है। लम्बे समय से 5 मार्च की सांय साढे सात बजे जंतर मंतर पर ही नहीं दिल्ली भी वर्षा से तरोबतर हो गयी।
वहीं पुलिस प्रशासन इस गौ आंदोलन में गोपालमणि से नहीं अपितु 7वें दिन भी आमरण अनशन जारी रखने वाले संत गोपालदास मुनि के तैवरों से बेहद परेशान है। उल्लेखनीय है कि संत गोपालदास कई आमरण अनशनों, जेल यात्राओं व प्रधानमंत्री आवास सहित भाजपा मुख्यालय में किये गये अपने प्रदर्शनों के कारण पूरे देश के गौ आंदोलनकारियों में सबसे प्रखर माने जाते है। गोपालमणि जहां गौ कथा प्रवचनों के लिए जाने जाते है। वहीं संत गोपालदास मुनि अपने छापामार प्रदर्शनों व क्रांतिकारी तैवरों से हरियाणा ही नहीं देश की राजधानी में जाने जाते है। इसीलिए जंतर मंतर पर चल रहे अनशन पर सुरक्षा बलों व ऐजेन्सियों की नजर हर पल संत गोपालदास मुनि पर लगी रहती है। पर इसके बाबजूद जब संत गोपालदास 4 मार्च की रात से 5 मार्च की दोपहर 1 बजे तक अचानक अदृश्य हुए संत गोपालदास की ढूंढने में पसीने पसीने हो गये। जब संत गोपालदास मुनि 1 बजे बाद जंतर मंतर पर पंहुचे तो संत गोपालदास मुनि राजनैतिक दलों से दो टूक शब्दों में गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं इसलिए सभी राजनैतिक दल के नेता संत गोपालदास मुनि के सामने जाने से भी घबराते है। पुलिस प्रशासन ही नहीं मोदी सरकार को इस बात का भी भान है कि यह गौ आंदोलन का जंतर मंतर पर इतना लम्बा खिंचने के पीछे संत गोपालदास मुनि का अनशन को जारी रखना है।
इन राजनैतिक गौ भक्त बने कांग्रेसी व भाजपाईयों की केन्द्र सरकार ने अंग्रेजों के जाने के 68 साल में अपने शासनकाल में गौ भक्तों की गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग को जहां बेशर्मी से नजरांदाज करके लाखों गौ वंश का निर्मम हत्या जारी रखी वहीं गौ को विश्वमाता मान कर युगों युगों से पूजने वाली भारतीय संस्कृति को कलंकित करने का भी काम किया।
उल्लेखनीय है कि 28 फरवरी से रामलीला मैदान से जंतर मंतर पर गौ रक्षा के लिए गौ कथावाचक गोपालमणि के नेतृत्व में संसद के दर जंतर मंतर पर गौ रक्षा आंदोलन में गौ भक्त संत गोपालदास मुनि, प्रवीन माथुर व जितेन्द्र माथुर सहित 5 गौ भक्त अनशन पर बैठ गये। पर 1 मार्च को जहां गोरखपुर के सांसद महंत योगी आदित्यनाथ की सलाह पर गोपालमणि व प्रवीन माथुर सहित तीन अनशनकारी गौ भक्तों ने अपना अनशन समाप्त कर दिया। परन्तु गौ आंदोलनों में कई बार आमरण अनशन व जेल यात्रा कर चूके संत गोपालदास मुनि व उनके अनुयायी गौ भक्त जितेन्द्र मलिक ने अपना अनशन जारी रखा।
इस गौ आंदोलन में जहां भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्याम जी जाजू, सांसद हेमामालिनी, योगी आदित्यनाथ सहित आधा दर्जन के करीब सांसदों ने रामलीला मैदान से लेकर जंतर मंतर के इस संघर्ष में भाग ले कर अपना समर्थन दिया। वहीं कांग्रेस की तरफ से 2 मार्च को जंतर मंतर पर गौ रक्षा आंदोलन को कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने कांग्रेसी मंच से व गौ रक्षा आंदोलन के मंच पर जा कर अपना व अपनी पार्टी का समर्थन दिया। अपने पार्टी के आला नेता दिग्विजयी को समर्थन करते देख कर 5 मार्च को उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के नेतृत्व में उत्तराखण्ड व दिल्ली के कांग्रेसियों ने भी गौ रक्षा आंदोलन को अपना समर्थन दिया। इस अवसर किशोर उपाध्याय के नेतृत्व मे कांग्रेसियों ने गोपाल मणि महाराज की सरपरस्ती में गौ माता को राष्ट्र माता बनाने के लिये जतंर मतंर पर पहुँच कर 6 दिन से चल रहे अनशन धरने को आपना पूर्ण समर्थन दिया। इस अवसर पर कांग्रेसी नेता ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि गौमाता को राष्ट्रमाता बनाने की लड़ाई मे केंद्र सरकार जो हिंदूत्व और गौ रक्षक के नाम पर वोट मांगती है लेकिन गौ माता को राष्ट्र माता बनाने के लिऐ कोई कदम नही उठा रही है । कांग्रेसी नेताओं ने सरकार को चेतावनी दी सरकार अगर लोकसभा मे इस आशय का बिल नही लाई तो पूरी दिल्ली मे गौमाता को राष्ट्रमाता के सम्मान में कांग्रेसी सड़़कों पर उतर कर प्रचण्ड आंदोलन करेंगे।
इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए संतों, सांसदों व गौभक्तों का आने का क्रम जारी रहा। इस मंच पर भाजपा व कांग्रेसी नेता जहां खुद को सबसे बड़ा गौ भक्त बता रहे हैं वहीं अपने विरोधी भाजपा को पाखण्डी बता रहे हैं। वहीं भाजपाई नेता देश में अब तक गो हत्या पर प्रतिबंध न लगाये जाने के लिए गुनाहगार बता रहे है। भाजपाईयों का तर्क हैं कांग्रेस ने 5 दशक तक देश में राज किया। देश में चल रहे असंख्य कत्लखानों व गौ हत्या के लिए कांग्रेसी शासन को अधिक जिम्मेदार मानने वाले गौ भक्त अप्रत्याशित रूप से राजनीति के सबसे विवादस्थ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह को समर्थन करते व मंच के समक्ष आ कर खुद समर्थन देते देख कर भौचंक्के रह गये। उस समय मंच में जहां इस अनशन का नेतृत्व कर रहे गौ कथा वाचक गोपालमणि व अवधूत रामायणी सहित कई अग्रणी संत उपस्थित थे। इसकी भनक लगते ही भाजपा नेता भले ही इसे कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह का नाटक बता रहे हों परन्तु दिग्विजय के इस दाव से भाजपाई नेता गहरे दवाब में घिर गये। हालांकि 1 मार्च को भाजपा के हिन्दुत्व के सबसे प्रखर झण्डेबरदार व उप्र में भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री के सबसे मजबूत चेहरे गोरखपुर के सांसद आदित्यनाथ ने अनशन स्थल पर जा कर जहां गौ आंदोलन को अपना समर्थन दिया। वहीं उन्होंने अनशनकारी गौ भक्तों को देश के हर जनपद में व्यापक जनजागरण अभियान चलाने का आवाहन करके अप्रत्यक्ष रूप से अनशन समाप्त करने की सलाह दी। अब दिग्विजयसिंह ने गौ भक्तों के आंदोलन का खुला समर्थन करके अनशनकारी व गौ भक्तों को इस गौ आंदोलन को और तेज करने का बड़ा दाव खेल दिया। राजनीति के धुरंधर दिग्विजयी यह बखूबी से जानते हैं कि मोदी सरकार कहीं दूर दूर तक गौ हत्या बंदी का कानून व गौ मांस निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाने वाली। क्योंकि लोकसभा चुनाव में गौ मांस निर्यात व गौ हत्या को भारतीय संस्कृति पर कलंक बता कर घडियाली आंसू बहाने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने सत्तारूढ होने के बाद गौ हत्या बंद करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाये। इसी को देख कर दिग्विजय सिंह ने गौ भक्तों के अनशन रूपि आंदोलन को खुला समर्थन का दाव चल दिये । क्योंकि दिग्विजय जानते हैं कि जैसे जैसे गौ भक्तों को आंदोलन तेज होगा वेसे भाजपा के गौ भक्त चेहरा बेनकाब हो जायेगा।
जहां भाजपा व कांग्रेस की राजनीति में अगर किसी को नुकसान हो रहा है तो वह गौ माता व भारत को। सत्ता पाते ही ये राजनैतिक दल देश व गौ की भूल कर देश की संस्कृति पर कुठाराघात करते हैं। परन्तु सत्ता से बाहर होते ही इनको देश व गौ भक्त बन कर घडियाली आंसू बहाने लग जाते है। गौ आंदोलन के ध्वजवाहक जब तक मंचों में इन सत्तांधों को दो टूक बातों से इनका मंच पर ही सार्वजनिक रूप से गौ विरोधी चेहरा बेनकाब करते हुए इनकों आंदोलन से दूर नहीं रखेंगे तब तक न जनता जुटेगी व नहीं गौ आंदोलन में ही तेजी आयेगी। जब तक मंचों में गौ भक्तों की उपेक्षा और गौ विरोधी पार्टियों का स्वागत होगा तब तक गौ आंदोलन मुकाम पर नहीं पंहुच पायेगा।
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2016-03-05
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