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Ambrish Singh Baghel
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Ambrish Singh Baghel commented on a post on Blogger.
पबों और क्लबों के नाईट लाइफ का सुंदर चित्रण । मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आपको अमिरियत से चिढ़ और गरीबीयत से प्रेम है क्योंकि आपने कभी अमीर बनने के बारे में तो सोचा नही। आपका लेख भी उसी अमीरी और गरीबी के बीच ना पाट पाने वाले खाई से प्रेरित दिखाई देती है।
नाइट क्लब
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madheshiaa.blogspot.com
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बहुत पहले सड़क सीधे आसमान की ओर जाती थी
बेल-लताओं की तरह रोज़ उठती, रोज़ बढ़ती
तारे उसकी कोशिशों को देख हंसा करते थे
फिर भी हर रोज़ वह अपना क़द बढ़ा लेती उठती जाती
एक दिन चांद भी उस पर हंस पड़ा
उस दिन सड़क धड़ाम से गिर गई
उसके बाद दुनिया की कोई सड़क कभी उठ नहीं पाई
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  हरिवंश राय बच्चन ने अपने काव्य संग्रह 'कटती प्रतिमाओं की आवाज़' में एक बेहद सहज पर दिल को छू लेने वाली कविता लिखी थी। देखिए इंसानों की इस प्रवृति को एक पेड़ के बिंब द्वारा कितनी खूबसूरती से उभारा है बच्चन साहब ने..
 
एक दिन तूने भी कहा था,
जड़?
जड़ तो जड़ ही है,
जीवन से सदा डरी रही है,
और यही है उसका सारा इतिहास
 कि ज़मीन में मुँह गड़ाए पड़ी रही है,
लेकिल मैं ज़मीन से ऊपर उठा,
बाहर निकला, बढ़ा हूँ,
मज़बूत बना हूँ,
इसी से तो तना हूँ।

एक दिन डालों ने भी कहा था,
तना?
किस बात पर है तना?
जहाँ बिठाल दिया गया था वहीं पर है बना;
प्रगतिशील जगती में तील भर नहीं डोला है,
खाया है, मोटाया है, सहलाया चोला है;
लेकिन हम तने में फूटीं,
दिशा-दिशा में गयीं
 ऊपर उठीं,
नीचे आयीं
 हर हवा के लिए दोल बनी, लहरायीं,
इसी से तो डाल कहलायीं।


 एक दिन पत्तियों ने भी कहा था,
डाल?
डाल में क्‍या है कमाल?
माना वह झूमी, झुकी, डोली है
 ध्‍वनि-प्रधान दुनिया में
 एक शब्‍द भी वह कभी बोली है?
लेकिन हम हर-हर स्‍वर करतीं हैं,
मर्मर स्‍वर मर्म भरा भरती हैं
 नूतन हर वर्ष हुईं,
पतझर में झर
 बाहर-फूट फिर छहरती हैं,
विथकित चित पंथी का
 शाप-ताप हरती हैं।


 एक दिन फूलों ने भी कहा था,
पत्तियाँ?
पत्तियों ने क्‍या किया?
संख्‍या के बल पर बस डालों को छाप लिया,
डालों के बल पर ही चल चपल रही हैं;
हवाओं के बल पर ही मचल रही हैं;
लेकिन हम अपने से खुले, खिले, फूले हैं-
रंग लिए, रस लिए, पराग लिए-
हमारी यश-गंध दूर-दूर  दूर फैली है,
भ्रमरों ने आकर हमारे गुन गाए हैं,
हम पर बौराए हैं।
 सबकी सुन पाई है,
जड़ मुस्करायी है!

 जड़ की इस मुस्कुराहट से जनाब राहत इंदौरी का ये शेर याद आता है।
 ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
 फिर भी जो लोग बड़े हैं वो बड़े रहते है
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जज़्बात
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ambrishbaghel.blogspot.com
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He looked upon the garish day
With such a wistful eye;
The man had killed the thing he loved
And so he had to die.

Oscar Wilde
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अमा,अब उठ भी आओ,रूबरू हमसे जिंदगी की चौपड़ खेलो
यूँ कब तलक आदर्शों के धर्म-ग्रंथों में विश्राम करोगे............:)
~S-roz~
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