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Suresh Swapnil
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दुनिया में रहता हूँ
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...फिर नमी होगी
मेरे  अल्फ़ाज़  मुझसे  रूठ  कर  कुछ  दूर  बैठे  हैं कि  जैसे  वक़्त  के  हाथों  सनम  मजबूर  बैठे  हैं करें  किससे  शिकायत  दोस्तों  की  बेनियाज़ी  की वफ़ा  के  दफ़्तरों  में  भी  तन-ए-रंजूर  बैठे  हैं किसी  दिन  फिर  नमी  होगी  निगाहों  में  मेह्रबां  की दुआ  लेक...

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'फ़रिश्ते  छोड़ने  आए  हैं  सहर  को  ससुराल ख़ैर-मक़दम  तो  कीजिए  अज़ीज़दारों  का… !' सलामे-सहर,  दोस्तों ! अगर जाग रहे हैं तो क़ुदरत इस नायाब हुस्न का दीदार ज़रूर कीजिए। 'शम्स  पांवों  में  जिसके  आलता  लगाता  हो हुस्ने-नायाब  सहर  बानो है  माशूक़  मेरी !' 'हज़ारों...

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एक उम्मीदे-शिफ़ा ...
चंद  अश्'आर  जो  सीने  में  दबा  रक्खे  हैं कुछ  समझ-सोच  के  यारों  से  छुपा  रक्खे  हैं एक  उम्मीदे-शिफ़ा  ये  है  कि  वो  आ  जाएं इसलिए  मर्ज़  तबीबों  से  बचा  रक्खे  हैं हो  अगर  दिल  में  शरारत  तो  बता  दें  हमको वर्न:  हमने  भी  कई  दांव  लगा  रक्खे  ...

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रहम नहीं आता ...
आज  ख़ामोश  रहें  भी  तो  क्या और  दिल  खोल  कर  कहें  भी  तो  क्या ? आपको  तो  रहम  नहीं  आता हम  अगर  दर्द  सहें  तो  भी  क्या क़त्ल  करके  हुज़ूर  हंसते  हैं भीड़  में  अश्क  बहें  भी  तो  क्या ज़ुल्म  तारीख़  में  जगह  लेंगे शाह  के  क़स्र  ढहें  भी  तो  क्या ...

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आशिक़ों की अमां...
न  दिल  चाहते  हैं  न  जां  चाहते  हैं फ़क़त  आशिक़ों  की  अमां   चाहते  हैं उड़ानों  पे  बंदिश  न  पहरा  सुरों  पर परिंदे    खुला  आस्मां   चाहते  हैं मुरीदे-शहंशाह  हद  से  गुज़र  कर रिआया  के  दोनों  जहां  चाहते  हैं क़फ़न  खेंच  कर  लाश  से  वो  हमारी बदन  पर ...

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रग़ों में ज़हर...
किधर  ढूंढिएगा  कहां  खो  गया मियां  मान  लीजे  कि  दिल  तो  गया उसे  तिश्नगी  ने  न  बख़्शा  कभी अकेला  ख़राबात  में  जो  गया गुलों  को  न  अब  कोई  इल्ज़ाम  दे कि  मौसम  रग़ों  में  ज़हर  बो  गया मदारी  बना  शाह  जिस  रोज़  से हक़ीक़त  से  क़िस्सा  बड़ा   गया लबे-च...

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मौत को इश्क़...
जब  जहालत  गुनाह  करती  है सल्तनत  वाह  वाह  करती  है आइन-ए-मुल्क  में  बहुत  कुछ  है क्या  सियासत  निबाह  करती  है सल्तनत  चार  दिन  नहीं  चलती जो  सितम  बेपनाह  करती  है अस्लहे  वो:  असर  नहीं  करते जो  वफ़ा  की  निगाह  करती  है आशिक़ी  में  अना  कभी  दिल  ...

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वफ़ा के सताए...
ईद  में  मुंह  छुपाए  फिरते  हैं ग़म  गले  से  लगाए  फिरते  हैं दुश्मनों  के  हिजाब  के  सदक़े रोज़  नज़रें  चुराए   फिरते  हैं दिलजले  हैं  बहार  के  आशिक़ तितलियों  को  उड़ाए  फिरते  हैं कोई  उनको  पनाह  में  ले  ले जो  वफ़ा  के  सताए  फिरते  हैं टोपियां  हैं  ग...

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एक दिन मुक़र्रर हो...
शौक़  तो  उन्हें  भी  है  पास  में  बिठाने  का जो  हुनर  नहीं  रखते  दूरियां   मिटाने  का रोज़  रोज़  क्यूं  हम  भी  आपसे  पशेमां  हों एक  दिन  मुक़र्रर  हो  रूठने-मनाने  का आपकी  सफ़ाई  से  मुत्मईं  नहीं  हैं  हम राज़  कोई  तो  होगा  आपके  न  आने  का कस्रते-सिया...

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लबों पर तबस्सुम ...
सितम  कीजिए    दग़ा  कीजिए ख़ुदा  के  लिए  ख़ुश  रहा  कीजिए दुआ  है  फ़रिश्ते  मिलें   आपको न  हो  तो  हमीं  से  वफ़ा  कीजिए बुरे  वक़्त  में   बेहतरी  के  लिए लबों  पर  तबस्सुम  रखा  कीजिए सितारे  पहुंच  से  अगर  दूर  हैं तो  किरदार  अपना  बड़ा  कीजिए फ़क़ीरो-शहंशा...
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