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Malti Mishra
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अन्तर्ध्वनि मेरी वह ध्वनि है जो अनकहे भाव दर्शाती है जिह्वा व्यथित हो शांत जब होती अन्तर्ध्वनि मेरी ध्वनि बन जाती है।
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कहते हैं न कि अच्छाई और सच्चाई के मुकाबले बुराई और झूठ की संख्या बहुत अधिक होती है। इसका साक्षात्कार तो बार-बार होता रहता है। हम देश में सुरक्षित रहकर स्वतंत्रता पूर्वक अपना जीवन जीते हैं तो हमें अभिव्यक्ति की आज़ादी, सहिष्णुता-असहिष्णुता, दलित-अधिकार, अल्पसंख्यक आदि सबकुछ दिखाई देता है, हम सभी विषयों पर खुलकर चर्चा करते हैं या यूँ कहूँ कि बिना समझे अपना मुँह खोलते हैं। हमारे बोल देश-विरोधी हैं या समाज विरोधी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। परंतु ऐसे ही लोगों को पकड़ कर सरहद पर खड़ा कर देना चाहिए जो सेना के मुकाबले विद्रोहियों, देशद्रोहियों के अधिकारों की पैरवी करते हुए मानवधिकार का हवाला देते हैं।
जब तपती धूप और शरीर को जलाती लू में खुले आसमान के नीचे खड़े होंगे, जब सर्द बर्फीली हवाएँ शरीर को छेदेंगी, जब वर्षा की धार पैर नहीं टिकने देगी.... तब इन्हें समझ आएगा कि एक सैनिक की ड्यूटी कैसी होती है, तब इन्हें सहिष्णुता-असहिष्णुता, दलित-अधिकार, अल्पसंख्यक और मानवाधिकार आदि के नाम भी याद नहीं आएँगे। गर्मी में ए०सी० की ठंडक, सर्दी में रूम हीटर की गर्मी और बरसात में अपने बंगले की मजबूत छत इन सब राजसी ठाट-बाट में रहकर देश-दुनिया की चर्चा करना हर किसी के लिए आसान होता है परंतु हम मानव प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ होकर भी एक पशु जितनी समझ भी नहीं रख पाए। एक पशु भी जिसकी रोटी खाता है, जिसकी शरण में रहता है उस पर न भौंकता है और न ही उसे किसी प्रकार का नुकसान पहुँचाने का प्रयास करता है। परंतु मानव विशेषकर भारत के नागरिक जिन सैनिकों, जिन सुरक्षा बलों की सुरक्षा के साए में आजा़दी की सांस लेते हैं, जिनकी सुरक्षा में रहकर बेफिक्री की नींद सोते हैं, उन्हीं पर पत्थर बरसाते हैं,उन्हीं का अपमान करते हैं और वो भी किस लिए? चंद रूपयों के लालच में। इससे तो यही सिद्ध होता है कि इन्हें आजाद रखने की बजाय यदि बंधक बनाकर रखा जाता और रोज इनके मुँह पर कागज के चंद टुकड़े फेंके जाते तो शायद ये ज्यादा वफादारी दिखाते।
सोने पर सुहागा तो यह हुआ कि जो लोग एक अखलाक के मरने पर पूरे विश्व में असहिष्णुता का विधवा विलाप कर रहे थे, देश को बदनाम कर रहे थे, अवॉर्ड वापसी की नौटंकी कर रहे थे उन्हें इन आततायियों के पत्थर और इनका जवान (सुरक्षा कर्मी)को लात मारना दिखाई नहीं पड़ा, जिन लोगों ने देशद्रोह का नारा लगाने वाले उमर खालिद और कन्हैया को गोद लेकर कोर्ट में उनको बेगुनाह साबित करने के लिए बड़े-बड़े वकील खड़े कर दिए उन लोगों को सैनिकों का अपमान दिखाई नहीं देता, बस यदि कभी कुछ दिखाई देता है तो सिर्फ ये कि मौजूदा सरकार को किस प्रकार अपराधी के कटघरे में खड़ा करें...
यदि कश्मीरी आतताई पत्थर मारते हैं तो ये कहेंगे कि सरकार क्या कर रही है? और यदि ये आतताई पकड़ लिए जायँ तो यही राजनीति के प्यादे कहते हैं कि सरकार मानवाधिकार का हनन कर रही है, बेचारे बच्चों पर जुर्म कर रही है। मैं ही नही देश की जनता भी यही जानना चाहती है कि जब यही बेचारे बच्चे पत्थर मार रहे थे तब आप लोग किस बिल में मुँह छिपाकर बैठे थे या आप लोगों की नजर में क्या सैनिकों और सुरक्षा बलों का मानवाधिकार नहीं होता, क्यों उनका दर्द नहीं दिखता चंद जयचंदों को क्यों सिर्फ उन लोगों का मानवाधिकार दिखाई देता है जिनमें मानवता नाम की चीज नही होती।
मैं भी सरकार से कुछ अपेक्षाएँ रखती हूँ और चाहती हूँ कि ऐसे पत्रकारों, नेताओं, समाज के ठेकेदारों, बुद्धिजीवियों पर शिकंजा कसे जो इस प्रकार के आततायियों को बेचारा बताकर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं। निःसंदेह ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आएँगे जिससे ये स्पष्ट हो जाएगा कि ये लोग हमेशा खुलकर देशद्रोहियों का ही साथ क्यों देते हैं। सेना पर पत्थर फेंकना हो, उन पर आक्रमण हो उस समय बहुत से बुद्धिजीवी और अधिकतर पत्रकारों की ऐसी चुप्पी देखने को मिलती है मानों कहीं कुछ हुआ ही न हो और जैसे ही उन पत्थर बाजों में से कोई पकड़ा जाता है ये सभी अपने-अपने खोल उतारकर मैदान में आ डटते हैं ये सिद्ध करने के लिए कि पत्थर बाज और आततायी मासूम हैं और सेना उनपर जुर्म कर रही है। पत्थर बाजों का मनोबल बढ़ाने वाले सिर्फ पाकिस्तान में नहीं उनमें से बहुत से तो यहीं दिल्ली में बैठकर ही सारी नौटंकी का क्रियान्वयन करते हैं, हाथ बेशक किसी के भी हों पत्थर पकड़ाने का कार्य तो वही करते हैं जो सरकार को असक्षम साबित करना चाहते हैं। पत्थर बाजों के सूत्रधारों की गर्दन पकड़ी जाए और कोई नरमी न बरतते हुए पत्थर के बदले गोलियाँ दागी जाएँ तो अपने आप सेना का मान बढ़ेगा और आततायियों के हौसले पस्त होंगे। हाथों में पत्थर पकड़ने और जवान पर लात मारने या अपमान करने वालों को पहले से पता हो कि वो किसी भी क्षण सैनिक की गोली का शिकार हो सकता है तो वो कभी पत्थर नहीं उठाएगा।
मालती मिश्रा


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मातृभाषा, मातृभूमि और माँ का कोई विकल्प नहीं
इसकी सेवा से बढ़-चढ़कर दूजा कोई संकल्प नहीं

नित उठ शीश नवा करके हम सब मिलकर वंदन करें
मातृभूमि की पावन माटी का आओ अभिनंदन करें।

इसी धरा पर करके क्रीड़ा पैरों पर अपने चलना सीखा
जीवन का यह अनमोल धरोहर समता इसकी कहीं न दीखा

शान हमारी मान हमारा इससे ही हमारा गौरव है
संपूर्ण जगत में व्याप्त हुआ इसका मनभावन सौरव है

इसके आदर्शों की गाथा जब विश्व ये पूरा गाता है
जन्म हमारा धन्य हुआ यह सोच हृदय हर्षाता है।

मातृभाषा, मातृभूमि और माँ का.....
मालती मिश्रा, दिल्ली✍️

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मातृभाषा, मातृभूमि और माँ का कोई विकल्प नहीं
इसकी सेवा से बढ़-चढ़कर दूजा कोई संकल्प नहीं

नित उठ शीश नवा करके हम सब मिलकर वंदन करें
मातृभूमि की पावन माटी का आओ अभिनंदन करें।

इसी धरा पर करके क्रीड़ा पैरों पर अपने चलना सीखा
जीवन का यह अनमोल धरोहर समता इसकी कहीं न दीखा

शान हमारी मान हमारा इससे ही हमारा गौरव है
संपूर्ण जगत में व्याप्त हुआ इसका मनभावन सौरव है

इसके आदर्शों की गाथा जब विश्व ये पूरा गाता है
जन्म हमारा धन्य हुआ यह सोच हृदय हर्षाता है।

मातृभाषा, मातृभूमि और माँ का.....
मालती मिश्रा, दिल्ली✍️

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मातृभाषा, मातृभूमि और माँ का कोई विकल्प नहीं
इसकी सेवा से बढ़-चढ़कर दूजा कोई संकल्प नहीं

नित उठ शीश नवा करके हम सब मिलकर वंदन करें
मातृभूमि की पावन माटी का आओ अभिनंदन करें।

इसी धरा पर करके क्रीड़ा पैरों पर अपने चलना सीखा
जीवन का यह अनमोल धरोहर समता इसकी कहीं न दीखा

शान हमारी मान हमारा इससे ही हमारा गौरव है
संपूर्ण जगत में व्याप्त हुआ इसका मनभावन सौरव है

इसके आदर्शों की गाथा जब विश्व ये पूरा गाता है
जन्म हमारा धन्य हुआ यह सोच हृदय हर्षाता है।

मातृभाषा, मातृभूमि और माँ का.....
मालती मिश्रा, दिल्ली✍️

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मातृभाषा, मातृभूमि और माँ का कोई विकल्प नहीं
इसकी सेवा से बढ़-चढ़कर दूजा कोई संकल्प नहीं

नित उठ शीश नवा करके हम सब मिलकर वंदन करें
मातृभूमि की पावन माटी का आओ अभिनंदन करें।

इसी धरा पर करके क्रीड़ा पैरों पर अपने चलना सीखा
जीवन का यह अनमोल धरोहर समता इसकी कहीं न दीखा

शान हमारी मान हमारा इससे ही हमारा गौरव है
संपूर्ण जगत में व्याप्त हुआ इसका मनभावन सौरव है

इसके आदर्शों की गाथा जब विश्व ये पूरा गाता है
जन्म हमारा धन्य हुआ यह सोच हृदय हर्षाता है।

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मालती मिश्रा, दिल्ली✍️
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सुप्रभात🙏
मधुप गुंजार करे मधुकर पान करे
रंगीन तितलियों की आई अब बारी है।।

क्यारी-क्यारी सज रही दिशाएँ महक रहीं
पाटल पलाश मिल डगर सँवारी है।।

हरियाली ओढ़े धरा दुल्हन सी सज रही
चाँवर डुलाय रही डाली मतवारी है।।

कल-कल नदिया भी उल्लास जताय रही
उषा ने स्वर्ण कलश नदी में उतारी है।।

मालती मिश्रा, दिल्ली✍️

सुप्रभात🙏
मधुप गुंजार करे मधुकर पान करे
रंगीन तितलियों की आई अब बारी है।।

क्यारी-क्यारी सज रही दिशाएँ महक रहीं
पाटल पलाश मिल डगर सँवारी है।।

हरियाली ओढ़े धरा दुल्हन सी सज रही
चाँवर डुलाय रही डाली मतवारी है।।

कल-कल नदिया भी उल्लास जताय रही
उषा ने स्वर्ण कलश नदी में उतारी है।।

मालती मिश्रा, दिल्ली✍️

सुप्रभात🙏
मधुप गुंजार करे मधुकर पान करे
रंगीन तितलियों की आई अब बारी है।।

क्यारी-क्यारी सज रही दिशाएँ महक रहीं
पाटल पलाश मिल डगर सँवारी है।।

हरियाली ओढ़े धरा दुल्हन सी सज रही
चाँवर डुलाय रही डाली मतवारी है।।

कल-कल नदिया भी उल्लास जताय रही
उषा ने स्वर्ण कलश नदी में उतारी है।।

मालती मिश्रा, दिल्ली✍️

सुप्रभात🙏
मधुप गुंजार करे मधुकर पान करे
रंगीन तितलियों की आई अब बारी है।।

क्यारी-क्यारी सज रही दिशाएँ महक रहीं
पाटल पलाश मिल डगर सँवारी है।।

हरियाली ओढ़े धरा दुल्हन सी सज रही
चाँवर डुलाय रही डाली मतवारी है।।

कल-कल नदिया भी उल्लास जताय रही
उषा ने स्वर्ण कलश नदी में उतारी है।।

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