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Ganesh Pandey
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एक कवि और शेष कवि
- गणेश पाण्डेय एक कवि अपने वक्त में साहित्यनीति के लिए लड़ रहा था मठों और किलों से टकरा-टकरा कर अपना सिर लहूलुहान कर रहा था था एक पागल कवि साहित्य की दुनिया में खुदकुशी कर रहा था शेष कवि अपनी कमीज की आस्तीन मोड़कर लिखने की मेज पर बड़ी अदा से कोहनी टिकाये रा...

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जैसा हूं वैसा हूं
- गणेश पाण्डेय हूं गुरुद्रोही हूं नहीं हूं साहित्यद्रोही नहीं हूं जो भी हूं बिल्कुल पारदर्शी हूं हूं गरीब प्रेमचंद हूं नहीं हूं अमीर इनामचंद नहीं हूं जैसा हूं वैसा हूं हिन्दी के हरामजादों जैसा नहीं हूं हूं बहुत से बहुत ज्यादा पागल हूं।

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हिन्दी के नये सुमनों से
- गणेश पाण्डेय मैंने पूछा कि तुम हिन्दी के कवि हो उसने कहा कि वह हिन्दी का नया मार्क्सवादी कवि है  मैंने कहा कि तुम हिन्दी के कवि हो उसने कहा कि हो सकता हूं पर उसके मूल विचार हिन्दी के नहीं हैं मैंने कहा कि फिर भी तुम हिन्दी के कवि हो उसने कहा कि हां-हां, क...

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सिया
- गणेश पाण्डेय सिया तुम मेरी प्रिया नहीं हो तो क्या हुआ उस युग की सिया नहीं हो तो क्या हुआ कितनी सुघड़ हो सलोनी हो कितनी अच्छी हो अपनी इस कृशता में कोई परिधान हो रंग कोई  समय कोई भी  चाँद के सामने हो जैसे कोई  कोमल ऐसी कि छूकर नत हो जल वाणी से नित चूता है जि...

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यह कौन है जो हमें अच्छा करने से रोकता है
-गणेश पाण्डेय मेरे गाँव से सिवान तक उसके सिवान से उसके गाँव तक दूर-दूर तक खेतों की छाती डबडब पानी से जुड़ाएगी नहीं  चाहे उर्वरधरा की अनगिन दिनों की लंबी प्यास बुझेगी नहीं जड़ों में पहुँचेगी नहीं गोबर की खाद चाहे यूरिया - स्यूरिया  तो कैसे लहलहाएंगी फसलें  कैस...

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पहाड़, च्यूँटे और बुरा वक्त
- गणेश पाण्डेय यहां से वहां तक और वहां से न जाने कहां तक पसरा हुआ यह पहाड़  जैसे प्रलय तक टस से मस नहीं होगा  सदियों की मूसलाधार बरसात इसे बहाकर नहीं ले जा सकती है  पृथ्वी की बडी से बडी आँधियाँ इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी  जैसे इस सबसे ठोस और सबसे भारी महांधक...

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अथ आलोचक कथा
- गणेश पाण्डेय शुभ्रवसना वीणा वादिनी ने पहले वीणा बजाकर मुझे गहरी नींद में जगाया और सिरहाने आकर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मां की तरह मुस्कायीं बहुत दिनों बाद सपने में मां आयी पूछा- काहेक रोवत हौ के मारिस है फिर मां ने ही कहा- तूडि देव ओकर हड्डी-पसली उसके बा...

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सलाम वालेकुम
- गणेश पाण्डेय सब साहिबान को सलाम जो मुझे छोड़ने आये थे सिवान तक उन भाइयों को सलाम जो अड्डे तक आये थे मेरी छोटी-छोटी चीजों को लेकर। उन चच्चा को खासतौर से सलाम जिन्होंने मेरा टिकट कटाया था और कुछ छुट्टे दिये थे वक्त पर काम आने के लिए। बचपन के उन साथियों को स...

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साहित्य के इस राज्य में
- गणेश पाण्डेय साहित्य के इस राज्य में  दूध और दही की नदियां अनगिनत  सुदर्शन पुरुष और सुंदर स्त्रियाँ असंख्य वृद्ध, अधेड़, युवा और किशोरों की जगमग दुनिया का ओर-छोर नहीं  कोई कभी रोता नहीं कोई कभी सोता नहीं  सब हृष्ट-पुष्ट कोई रोग-शोक नहीं  ऐसा स्वास्थ्य ऐसा ...

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साहित्य के इस राज्य में
- गणेश पाण्डेय साहित्य के इस राज्य में  दूध और दही की नदियां अनगिनत  सुदर्शन पुरुष और सुंदर स्त्रियाँ असंख्य वृद्ध, अधेड़, युवा और किशोरों की जगमग दुनिया का ओर-छोर नहीं  कोई कभी रोता नहीं कोई कभी सोता नहीं  सब हृष्ट-पुष्ट कोई रोग-शोक नहीं  ऐसा स्वास्थ्य ऐसा ...
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