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Savita Mishra
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किताब पढ़ते हुए--"ज़िन्दा है मन्टो" नामक संग्रह
"ज़िन्दा है मन्टो" नामक संग्रह को पढ़ते हुए सबसे कष्टप्रद बात हमारे लिए हुई, वह है पेज की बर्बादी। दो -तीन लाईन की कथाएँ और पूरा खाली पेज मुँह चिढ़ाता रहा। ऐसे प्रकाशकों से खास गुज़ारिश है हमारी कि मेहरबानी करके पन्ने को खाली नहीं छोड़िये। धरती-आकाश दोनों ही अपन...

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देते हैं ...कुछ यूँ ही
भावों को हम शब्दों में पिरो देते हैं विचारों को वाक्यों में तिरो देते हैं मेरे भावों को भाव देता है जब कोई संबल मिलता जो लेखन में सिरो देते हैं |

  सिरो... ध्यान,  रचनात्मक | "पांच लिंकों का आनन्द" ब्लॉग में सोमवार ११ दिसंबर २०१७ को  कमेन्ट में  लिखी 

यहां भी दुनिया बसी है, हमें तो पता ही न था😊😊👍👍🙏

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मुठ्ठी भर अक्षर में छपी...अपनी छ: लघुकथाएँ ....:)
इन तीस बाक्सों में बंद एक शक्ल अपनी भी और 'मुट्ठी भर अक्षर' में चंद अक्षर के माध्यम से अपनी भी भावनायें व्यक्त हैं लघुकथा रूप में ...| हम तो हम बाकी २९ रचनाकार और भी हैं | आप सब पढ़ रहे हैं न ? हमारी लिखी हुई लघुकथा न पसंद आये तो और सब अच्छे लेखक हैं | पैसा ...

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जिधर देखती हूँ
गम की परछाइयाँ है
मुहब्बत की डगर में
बस नफरत...:)

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कोई बात हो तभी लिखे
कोई बात हो तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं चोट खाए दिल तभी लिखे यह जरुरी तो नहीं मन का गुबार निकल जाये यह बात जरुरी है दिल में रखकर दिल जलाये यह जरुरी तो नहीं |..सविता ----००------ कोई ख़ास नामचीन तो पहले भी ना थे पर अब तो हम गुमनाम होना चाहते है ........सविता मिश...

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आत्मग्लानी (लघुकथा)
"चप्पल घिस गयी बेटा, एक लेते आना | मैं थक गया हूँ, अब सोऊंगा |"
"पापा! दो साल से प्रमोशन रुका पड़ा है | दे दीजिये न बाबू को हजार रूपये | आपकी फ़ाइल आगे बढ़ा देगा | बिना दाम के, कहीं काम होते हैं क्या? आप फालतू ही सिद्धांतो में अब तक अटके हैं | "
"बेटा, गाढ़े की कमाई है, ऐसे कैसे दे दूँ? और कोई गलत काम भी तो नहीं करा रहा हूँ !"
"अच्छा पापा, इन बातों में एक बात बताना भूल ही गया |"
"क्या बेटा ?"
"सरकारी कॉलेज में मेरा एडमिशन हो गया है | लेकिन वहां का.....

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"चिलक"
"यह कैसा संकल्प ले रहे हो रघुवीर बेटा ! गंगाजल अंजुली में भर इस तरह संकल्प लेने का मतलब भी पता है तुम्हें!!" " पिताजी, आप अन्दर ही अंदर घुलते जा रहे हैं | कितनी व्याधियों ने आपको घेर लिया है | नाती-पोतों की किलकारियों से भरा घर, फिर भी आपके चेहरे पर मैंने आ...

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"सुनहले ख़्वाब बस"

दिल में तो धड़कती ही हूँ मैं
पर! साँसों में भी तेरे
फ़ैल जाना चाहती हूँ मैं

किसी ने तीसरी बटन
किसी ने दूसरी
किसी ने सिर्फ बटन कहकर ही
ख्याली पुल कर लिया तैयार
अपने पति का सानिध्य पाने को........

मैंने भी सोचा ...तोड़ दूँ मैं भी
तुम्हारे शर्ट की पहली बटन
क्योंकि मैं साँसों में तुम्हारे
बस जाना चाहती थी
टांकने को बटन....

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खुशियां दस्तक दे ही देती हैं। इस कथा को लिखते समय कलम अपने आप घूमती गयी थी। लिखना था वृद्धाश्रम पे कुछ दुख की पुड़िया सा, जिसे पढ़ते हुए लोगों को दुख और बेटे के प्रति घृणा हो जाये, जैसा कि आमतौर पे होता है! लेकिन कलम ने सुख की ओर रुख कर लिया था, जिसको वाल पोस्ट करने के बाद कोई लघुकथा के जानकार , आकर शाबासी नहीं दिए थें। लेकिन शाबासियां हाथ फैलाये स्वागत कर रही थी इस लघुकथा की। बहुत बहुत तहेदिल से आभार +RAMESHWAR KAMBOJ HIMANSHU भैया और @Sukesh Sahni भैया आप दोनों जन का। दूसरी बार लघुकथा. कॉम पर सविता की कथा "संवर्धन" अब "तोहफ़ा" शीर्षक के साथ 😊😊😊 Devendra Nath Mishra

http://laghukatha.com/%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A5%9E%E0%A4%BE/
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