Profile cover photo
Profile photo
rajender tyagi
412 followers
412 followers
About
rajender's interests
View all
rajender's posts

Post has attachment
मूंग की दाल
  बॉस की झाड़ और राह की धूल , दोनों झाड़ने के बाद मुन्नालाल खाना
खाने बैठ गया। रोटी का टुकड़ा तोड़ा और सब्जी की कटोरी में भिगोया। टुकड़ा कटोरी में
ऐसे डूब गया जैसे बिना पतवार की नाव नदी में। मुन्नालाल का जायका बे-जायका हो गया।
उसने चिल्लाकर पत्नी से पूछा , '' भा...

Post has attachment
चरण कमल बंदौ..!
उन्हें आज
शर्मा जी के विद्यालय का उद्ंघाटन करने आना है। समारोह का उदघोषक बार-बार घोषणा कर
रहा है- मंत्रीजी के चरण कमल शीघ्र ही पड़ने वाले हैं। उदघोषक मंत्रीजी के आने में विलंब का
कारण बता रहा है , मंत्रीजी
किसी आवश्यक मीटिंग में व्यस्त हैं। वह शाश्वत सत्य का...

Post has attachment
'आप' से 'खाप' बनने की क़वायद
लोकतांत्रिक राजनीति में प्राय: दो प्रकार के जीव पाए जाते हैं, बुद्धूजीवी और बुद्धिजीवी। बुद्धूजीवी जीवों की प्रकृत्ति दीमक मार रसायन के समान होती है। अर्थात जिस प्रकार दीमक मार रसायन लकड़ी की रक्षा करता रहता है। उसी प्रकार बुद्धूजीवी जीव लोकतंत्र की रक्षा मे...

Post has attachment
rajender tyagi was tagged in rajender tyagi's album.
Photo

"भाजपा पीडीपी की साझा कश्मीर सरकार ने अलगाववादी मसरत आलम को रिहा किया।" जरूर कॉमन मिनीमम प्रोग्राम के तहत रिहा किया होगा! क्यों मोदी जी? वास्तव में आपकी राजनैतिक सूझबूझ पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाया जा सकता!

Post has attachment
दो पाटन के बीच में
रंग न रंगोली इस बार अपनी होली बैरंग ही होले-होले आगे-आगे होली।
अट्ठाइस को अच्छे दिन का बजट था , पाँच की होली ,   आठ को महिला दिवस! हमारा पाँच न आठ हो पाया
न अट्ठाइस , बस तीन-तेरह हो कर रह गया। दो पाटों के बीच फंसी हमारी स्थिति संत
कबीर समान थी। गनीमत बस इतन...

Post has attachment
नैकिता के मायने
                    डॉक्टर वात्स्यायन से महर्षि अरविन्द-दर्शन पर
टिप्स लेने के लिए मेरठ आया था। ' अरविन्द-दर्शन
में मानववाद ' मेरे शोध-प्रबन्ध का विषय था। विचार
कुछ बदला , सोचा पहले कुछ समय कॉलेज की लाइब्रेरी
में ही बैठकर अरविन्द दर्शन पर नोट ले लिए जाएं और...

Post has attachment

अहसास

अपरिचित एक
अनजाना- सा!
मन में उठती टीस-सा
मौन मिलन के भाव-सा!
वह आया,  किन्‍तु...!
जाने कब चला गया!
 नि:शब्‍द खड़ा, मैं
उस पथ पर अब तक
भाव शून्‍य-सा,राह निहारूं!
फिर आएगा, भाव वेग से
प्रेम पथ,आलोकित करता!
अपरिचित एक
अनजाना-सा...!

सुना है केजरीवाल साहब अपनी पार्टी का नाम " आम आदमी पार्टी" रखने जा रहे हैं। अच्‍छा है! उन्‍होने अपनी श्‍ाक्‍लो सूरत भी आम आदमी जैसी बना ली है। शक्‍ल से भी किसी के समझ्‍ा न आए इसलिए दूसरों को टोपी पहनाते-पहनाते उन्‍होंने खुद भी टोपी पहनली है। जिस पर वैसे ही "आम आदमी" लिखा है, जैसे वनस्‍पती घी की मिठाई बेचने वाले किसी हलवाई ने अपनी दुकान पर लिख लिया हो,"शुध्‍द देशी घी से बनी मिठाईयां!" यह सब तो ठीक है, मगर केजरीवाल साहब बताए कि स्‍वयं वे किस प्रकार के "आम आदमी" है। क्‍या टोपी पहनने माञ से कोई "आम आदमी" बन सकता है?
Wait while more posts are being loaded