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Rangnath Singh
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हम अपने ख़याल को सनम समझे थे...
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Rangnath's posts

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तनु वेड्स मनु रिटर्न्स: दत्तो बडी ही कूल छोरी है
रंगनाथ सिंह साल 2011 में तनुजा चतुर्वेदी और मनु शर्मा की शादी में जो लोग भी
शामिल हुए थे उनके पास फिर से बारात करने का मौक़ा आ गया है क्योंकि तनु और मनु
रिटर्न हो गए हैं और क्या खूब रिटर्न हुए हैं. हिन्दी में किसी फ़िल्म का सीक्वेल
अक्सर पहली फ़िल्म के हिट ...

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हर नन्ही याद को हर छोटी भूल को नये साल की शुभकामनाएं!
सर्वश्वेरदयाल सक्सेना की ये कविता साल 2017 की आगवानी में व्हाट्सऐप ग्रुप से फ़ेसबुक तक घूम रही है। डिजिटल संसार में अपने प्रिय कवियों को विचरते देखना एक सुखद अनुभूति है। आप सभी को नये साल की शुभकामनाएँ... खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पांव को कुहरे में लिपटे उ...

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व्यंग्य मत बोलो, काटता है जूता तो क्या हुआ
व्यंग्य मत बोलो व्यंग्य मत बोलो। काटता है जूता तो क्या हुआ  पैर में न सही  सिर पर रख डोलो। व्यंग्य मत बोलो। अंधों का साथ हो जाये तो  खुद भी आँखें बंद कर लो जैसे सब टटोलते हैं  राह तुम भी टटोलो। व्यंग्य मत बोलो। क्या रखा है कुरेदने में  हर एक का चक्रव्यूह कु...

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सौ बरस के हुए स्पार्टकस और वॉन गॉघ की अमर भूमिकाएं करने वाले कर्क डग्लस
अभिनेता, लेखक, निर्माता व निर्देशक कर्क डग्लस इस 9 दिसंबर को सौ साल के हो गए। हाॅलीवुड के इतिहास में कुछेक और हस्तियों ने भी उम्र का सैंकड़ा जमाया है, लेकिन व्यक्तित्व की जिजीविषा के कारण कर्क डग्लस का जिक्र करना जरूरी हो जाता है। अमेरिका में 1950 के दशक में...

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आदर्श कृति की तलाश...
आलोचक की सबसे उचित परिभाषा मुझे ये मिली है कि आलोचक "आदर्श पाठक" होता है. सिनेमा हो या साहित्य दोनों में एक मर्मज्ञ आलोचक प्रस्तुत कृति की तुलना एक काल्पनिक "आदर्श कृति" से करता है. उस काल्पनिक "आदर्श कृति" की तुलना में वो प्रस्तुत कृति की सीमाएं दिखाता है....

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हर आदमी मुझे लगता है हम शकल, लोगो
दुष्यंत कुमार ये रोशनी है हक़ीक़त में एक छल, लोगों कि जैसे जल में झलकता हुआ महल, लोगों दरख़्त हैं तो परिन्दे नज़र नहीं आते जो मुस्तहक़ हैं वही हक़ से बेदख़ल, लोगों वो घर में मेज़ पे कोहनी टिकाये बैठी है थमी हुई है वहीं उम्र आजकल ,लोगों किसी भी क़ौम की तारीख...

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ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी
ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी मजबूर थे हम उस से मुहब्बत भी बहुत थी उस बुत के सितम सह के दिखा ही दिया हम ने गो अपनी तबियत में बगावत भी बहुत थी वाकिफ ही न था रंज-ए-मुहब्बत से वो वरना दिल के लिए थोड़ी सी इनायत भी बहुत थी यूं ही नहीं मशहूर-ए-ज़माना म...

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100 सर्वश्रेष्ठ अंग्रेजी कथेतर साहित्य सिरीज़
ब्रितानी अख़बार द गार्डियन ने इस साल जनवरी से अंग्रेजी भाषा में लिखे गए 100 सर्वश्रेष्ठ कथेतर साहित्य पर सिरीज़ चला रहा है. ऐसी कोई भी सूची विवाद से अछूती नहीं रह सकती. इसलिए हम इस सूची की किताबों को उल्लेखनीय भर मानते हुए पाठकों से साझा करते रहना चाहेंगे. ...

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‘संस्कृति’ अमीरों, पेटभरों का बेफिक्रों का व्यसन है
प्रेमचंद    मक़बूल फ़िदा हुसैन साम्प्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है. उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है, इसलिए वह उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल में जानवरों पर रोब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है. हिन्दू...

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अगले जनम मोहे बकरी न कीजो...
आशीष पाण्डेय मैं एक जज के घर के अहाते में लगी हरी-हरी सुंदर सी घास को चर गई, माली ने शायद उसे बड़ी ही मेहनत से उसे उगाया था. तभी तो मैं धर ली गई. मुझे मालूम नहीं था की जज साहब के अहाते में लगी घास को चरने के साथ ही मैं भारत के संविधान में लागू किसी कानून को...
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