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Madan Saxena
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खुद को भूल जाने की ग़लती सबने कर दी है
हर इन्सान की दुनिया में इक जैसी कहानी है

दौलत के नशे में जो अब दिन को रात कहतें हैं
हर गलती की  कीमत भी, यहीं उनको चुकानी है

मदन ,वक़्त की रफ़्तार का कुछ भी भरोसा  है नहीं
किसको जीत मिल जाये, किसको हार  पानी है

सल्तनत ख्वाबों की मिल जाये तो अपने लिए बेहतर है
दौलत आज है  तो क्या , आखिर कल तो जानी है

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नजर फ़ेर ली है खफ़ा हो गया हूँ
बिछुड़ कर किसी से जुदा हो गया हूँ
 
मैं किससे करूँ बेबफाई का शिकबा
कि खुद रूठकर बेबफ़ा हो गया हूँ 
 
बहुत उसने चाहा बहुत उसने पूजा
 मुहब्बत का मैं देवता हो गया हूँ 
 
बसायी थी जिसने दिलों में मुहब्बत
उसी के लिए क्यों बुरा हो गया हूँ 
 
मेरा नाम अब क्यों तेरे लब पर भी आये
अब मैं अपना नहीं दूसरा हो गया हूँ 
 
मदन सुनाऊँ किसे अब किस्सा ए गम 
मुहब्बत में मिटकर फना हो गया हूँ .
ग़ज़ल(मुहब्बत)
ग़ज़ल(मुहब्बत)
saxenamadanmohan.blogspot.in

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घर मंदिर है ,मालूम तुमको पापा को भी मालूम है जब
झगड़े में क्या बच्चे पाएं , मम्मी तुमको क्या मालूम

क्यों इतना प्यार जताती हो , मुझको कमजोर बनाती हो
दूनियाँ बहुत ही जालिम है , मम्मी तुमको क्या मालूम

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जीवन के सफ़र में जो पाया है सहेजा है
खोया है उसी की चाह में ,ये दिल क्यों मचले है

मिलता अब समय ना है , समय ये आ गया कैसा
रिश्तों को निभाने के अब हालात बदले हैं

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समय अच्छा बुरा होता ,नहीं हैं दोष इंसान का 
बहुत मुश्किल है ये कहना  किसने खेल खेला है 

जियो  ऐसे कि हर इक पल ,मानो आख़िरी पल है 
आये भी अकेले थे और जाना भी अकेला

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समय के साथ बहने का मजा कुछ और है यारों 
रिश्तें भी बदल जाते समय जब भी बदलता है 
 
मुसीबत "मदन " अच्छी है पता तो यार चलता है 
कैसे कौन कब कितना,  रंग अपना बदलता है

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ना रिश्तों की ही कीमत है ना नातें अहमियत रखतें
रिश्तें हैं उसी से आज जिससे मिल सके धन है

सियासत में नहीं  युबा , बुढ़ापा काम पा जाता
समय ये आ गया कैसा दिल में आज उलझन है

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छोड़ गया जो पत्थर दिल ,जिसने दिल को दर्द दिया है 
दिल भी कितना पागल है  ये उसके लिए मचलता है 

रिश्तों को ,दो पल गए बनाने में औ दो पल गए निभाने में 
"मदन " रिश्तों के कोलाहल में ये जीवन ऐसे  चलता है

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