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deepak singh
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अभिप्राय … !!!

मुझे आदत है दूर जाते एहसास भुलाने का,
मौसम बदलने और छोड़ जाते इंसानों का,
गुजरते वक़्त में रूठ के एहसान जाताना,
मंजिल दीखते ही मुड़ जाते बेईमानों का।

पर गम नहीं इस बेरुखी का ज़माने की,
महसूस होती है कमी अब उस खजाने की,
मेरी बातों में ना जाने ऐसी क्या कमी थी,
कोशिश भी नाकाम उस ज़िद को मानाने की।

लेकिन समझदारी है अक्सर सच्चाई अपनाने में,
छोटी-2 खुशियों से जीवन को सजाने में,
मुश्किल तो है सांस लेना भी इस डगर आके,
हरकत तो हमेशा होती ही है इंसान को डिगाने में।

अब चुप रह और मुझे भी चुप रहने दे,
ये लहू भी चुपचाप यूँही अब बहने दे,
पहचान सके तो पहचान लाल रंग अब तो,
रोक दे या आदत है तुझे तो मुझे भी सहने दे।।
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हकीकत में डटा रहा पर ख्यालों का क्या करूँ,
किसीको एहसास न होने दिया पर सपनों से कैसे लड़ूँ,
डरपोक नहीं हूँ, हर मुश्किल का सामना कर सकता हूँ,
दिखाऊँ साहस सभी को पर इन विचारों से कैसे न डरूँ ||
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कभी तो मेरा बोलना भी काम आएगा,

सोचता हूँ कब मेरा मुकाम आएगा,

दौड़ता हूँ ज़िद लिए कुछ और पाने को,

जाने कब मेरे कर्मो का भुगतान आएगा।


करूँ ऐसे जतन की काबिल भी बन जाऊं,

जो सोचता हूँ हर खुशी हासिल भी कर पाऊं,

इंसान हूँ इंसान को इंसानियत सिखाता हूँ,

संसार सागर पार न सही साहिल से लड़ आऊं।


फिर थक के आलस से मैं टूट जाता हूँ,

अपनी ही ताकत से थोड़ा रूठ जाता हूँ,

फिर किसी अपने की बात मान कर ही,

पहाड़ का सामना कर भी मंजिल से छूट जाता हूँ।


पीछे मुड़ के जब भी देखता हूँ अपना सफ़र,

रास्ते पर नहीं खुद में दिखता है मुझे असर,

जमाने पर कोई निशान ना छोड़ पाया हूँ,

सोचता हूँ कहाँ रह गयी कमी, क्या रह गयी कसर।


सोचा किस्से-कहानियों में ही मिशाल बन जाऊँगा,

मंजिल पहुँचने से पहले गर मैं कहीं थम जाऊंगा,

और अगर कोई सोचता है मेरा जूझना बेकार हुआ है,

तो नहीं, सामर्थ करने वालों के लिए दिशा ही छोड़ जाऊँगा।
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मतलबी, बेमतलबी इस सफ़र के दो ये फ़साने हैं,
मैं न बदलूँ, तू न बदले ये वक़्त ही बदल जाएगा |
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बचपन के वो दिन पास आते हैं,
रुखी सी इस जिंदगी में एक आस लाते हैं,
बारिश में वो काग़ज़ की कश्ती देख,
दूर छोड़ सब सैयम, मस्ती और विवेक...
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Lust of love, lost of some aim,
It’s a word impossible, it’s just a lust of a stupid game…
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मेरी बेमतलबी को नाप ले ऐसा पैमाना कोई नहीं,
दिखा दे असली सूरत वो आइना कोई नहीं,
खुद को चीज़ कहूँ तो होती है तकलीफ बहोत,
और बनु नाचीज़ जहाँ ऐसा जमाना कोई नहीं।।।
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मुकरा भी हूँ कई बार इस राह में,
अंदाज़ा लगा अब नए हिसाब में,
गिरा तो फिर हो गया खड़ा भी,
हार तो कभी जीतने की चाह में।
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सीख के भी कभी इंसान मानता ही तो नहीं,
प्रेम और विश्वास में फर्क जानता भी तो नहीं,
काट के सर किसीका लाश पे होकर खड़े,
खुद की गलती को भी कभी पहचानता तो नहीं।
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