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Arvind Kumar
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"प्यार, पुलिया और प्रमोशन" की समापन किश्त...

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कहानी
प्यार, पुलिया और प्रमोशन (समापन किश्त) आज शाम को जब
वह रोज़ की तरह आफ़िस से थक-हार कर घर पहुँचा, तो देखा कि वहां मुहल्ले वालों का
मजमा लगा हुआ है। और रीना ने रो-रो कर पूरे घर को ही नहीं अड़ोस-पड़ोस को भी अपने
सिर पर उठा रखा है। उसे देखते ही वह बिफर पड़ी---“...

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कहानी---प्यार, पुलिया और प्रमोशन
(दो अंकों में)

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कहानी
प्यार, पुलिया और प्रमोशन वह तेज़ कदमों
से भाग रहा था। भागते-भागते कभी वह रुकता। पीछे मुड़ कर देखता। कुछ सोचता। और फिर
भागने लगता। कभी तेज़। कभी धीरे। कभी बहुत धीरे। और फिर अचनाक ही बहुत तेज़। इसी
तरह भागते , रूकते , पीछे मुड़ कर देखते , सोचते
और फिर भागते हु...

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व्यंग्य
इस दीवाली में भी   दीवाली तब वाकई दीवाली हुआ करती थी, जब हम छोटे-छोटे बच्चे हुआ करते थे । बेसब्री से पूरे साल इंतजार
की हुयी दीवाली । घरों की साफ़ सफाई । हर दिल में खुशियाँ और जोश भर देनेवाली दीवाली । सफेदी-गेर से घरों की पोत-पुताई । खील , बताशा , चीनी के मी...

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व्यंग्य
मेरे गाँव वाले पागल भैया मेरे एक गाँव भैया
थे। मतलब मेरे गाँव में रहते थे । और गाँव के तब के रीति-रिवाज़ के अनुसार हमारे भैया लगते थे । भैया शीतला
प्रसाद। और आप तो जानते ही हैं कि किसी ज़माने में अपने गाँव जवार में हर पुरुष या
तो भैया या बाबू या चाचा - ताऊ , ...

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व्यंग्य
तबाही के रंग हज़ार हमारे यहाँ के मौसम विभाग का हाल भी
कुछ -कुछ भेंड़िया आया भेंड़िया आया की गुहार लगा कर गाँव वालों को परेशान करने वाले
उस गड़रिये की तरह है, जिसकी बात पर कभी कोई गंभीरता से भरोसा नहीं करता। क्योंकि
आम तौर पर मौसम विभाग अनुमान कुछ लगाता है और हो...

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व्यंग्य---
चल हट, सेकुलर कहीं का आज कल हमारे बिमन दा फिर परेशान चल रहे हैं। और जैसा कि आपको
पता है कि वे जब भी परेशान होते हैं, मुझे परेशान करने चले आते हैं। सो इससे पहले
कि उनका बीपी बढे, वे मेरा बीपी बढ़ाने चले आये। और आते ही उन्होंने अपने उन सवालों
को दागना शुरू कर ...

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पांच कवितायेँ
परछाईं कौन कहता है कि परछाईं हमेशा आदमी के साथ चलती है वह तो रोशनी के हिसाब से कभी छोटी, कभी बड़ी कभी आगे, कभी पीछे और कभी कभी तो एकदम से गुम भी हो जाती है परछाईं आदमी के नहीं रोशनी के साथ चलती है। दाढ़ी कौन? बंधु तुम? तुम आ गए? हाँ, तुम्हें तो एक न एक दिन आन...

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व्यंग्य
यह जो मोबाईल फोन है न यह जो मोबाईल फोन है न, इसने पूरी दुनिया की जान को सांसत में डाल रखा है। इसका
इस्तेमाल करो, तो मुसीबत। और न करो, तो और भी बड़ी मुसीबत। अच्छे भले इंसान आज
चक्कर घिन्नी बनें फिर रहे हैं कि करें तो आखिर क्या करें? चक्करों के लिहाज़ से इसको
ल...
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