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Tararam Gautam
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On the birthday 9th April of Rahul Sankrityayan ji




Subject: Rahul sankrityayan... Tararam

अगर मुझे राहुल ना मिले होते .... 

Subject: Rahul sankrityayan... Tararam

अगर मुझे राहुल ना मिले होते .... 
                                        ताराराम
                                           निदेशक,
                                   बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र ,                                                                               जोधपुर 
    बाबा साहेब डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म का नाम मैंने बचपन में अपने पिताजी से सुन रखा था. जब वे द्वितीय विश्व-युद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना के एक सिपाही के नाते जापान सीमा पर लड़ने गए तो वहां उनका बौद्ध धर्मानुयायी सैनिकों से परिचय हुआ और रंगून आदि कुछ जगहों के बौद्ध मठों के बारे में भी उन्हें कुछ जानकारी थी. द्वितीय विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर उनका पद-स्थापन कलकता में हो गया. जहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर और गाँधी नाम के दो शख्सियत के बारे में जानकारी मिली थी. जिसे वे यदा-कदा हम लोगों को बताया करते थे. प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी और 14 अप्रैल को वे हमारे घर में पकवान बनवाते थे और वे आजादी की लडाई और विभिन्न युद्धों में अपने खुद के अनुभव को लोगों में साझा करते थे. वे बड़े उत्साह से विभिन्न लड़ाईयों के सजीव वर्णन और उसके महत्त्व को बताते थे. हमारी स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में वे सदैव अपने शौर्य-पदकों के साथ  विशेष पोशाक धारण कर सभा में उपस्थित होते थे. पूरे गाँव में भारत के विभिन्न युद्धों में भारत की ओर से लड़ने वाले वे अकेले ही शख्स थे, जो ऐसे कार्यक्रमों में सरिक होते थे. ऐसे अवसरों पर हमको  उनसे आंबेडकर और बुद्ध का नाम तो सुनने को मिला था, परन्तु महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम नहीं सुना था. सन 1975 में उन्होंने गाँव में पहली बार डॉ. आंबेडकर जयंती मनाई और मुझे विश्व-विद्यालय में दाखिला दिलाने साथ आये, जहाँ पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध के परम अनुयायी एच. आर. जोधा से मुलाकात हुई. श्री एच. आर. जोधा के मुहं से ही मुझे पहली बार महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम सुनने को मिला. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम के साथ ही उनका साहित्य भी पहली बार पढ़ने को मिला. पिताजी ने वृहद-स्तर पर 1978-79 में गांव में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर कार्यक्रम रखा तो  कौसल्यायन जी को आमंत्रित करने के पीछे भी राहुल जी के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही था.
              अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक आंदोलनों की स्थिति से वाकिफ था और हमारे क्षेत्र में शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में किये जाने वाले छोटे-बड़े आन्दोलनों में हमारे पिताजी की भूमिका के कारण ऐसे अन्दोलनों में सक्रीय रहना एक नियति-सी बन गयी थी. जोधपुर में एच.आर. जोधा अम्बेडकरी मिशन के जुझारू और निष्ठावान कर्ता-धर्ता थे और अकसर वे हमारे छात्रावास में आते रहते थे. हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक विषय पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी. आपात-काल के इस समय में विद्यार्थी वर्ग में भी असंतोष था और विद्यार्थियों के छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहते थे. मैं अपने आपको उनसे भी अलग नहीं रख सका. एक दिन जोधा साहब ने मुझे राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक पढ़ने को दी, जिसका नाम था- “तुम्हारी क्षय”. उस पुस्तक को बिना विराम के जब तक मैंने पूरा नहीं पढ़ा, तब तक सोया नहीं. पुस्तक बड़ी सहज और सरल शब्दों में थी, साथ ही वह हमारी ज्वलन्त समस्याओं को लेकर ही थी, उस पहली पुस्तक को पढ़ने के बाद राहुल सांकृत्यायन जी के बारे में और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र हो गयी और विचार पक्का कर लिया कि उनके पूरे लेखन को पढ़ लिया जाय. उस समय जोधपुर में दो पुस्तक विक्रेता थे जो राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य रखा करते थे, जोधा साहब ने मेरा उनसे परिचय कराया और उसके बाद राहुल जी की जब भी कोई नयी कृति आती उसे खरीदकर पढ़ ही लेता. उस पुस्तक विक्रेता से स्तालिन, कार्ल मार्क्स आदि पढने के बाद मुझे उनका ग्रन्थ दर्शन-दिग्दर्शन भी पढ़ने को मिला. उसको पढ़कर लगा कि राहुल सांकृत्यायन जैसा महापुरुष, जिसने ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो मत, दुनिया को बदल डालो’ जैसी सरल कृतियों का सृजन किया है, जिसकी भाषा आम बोल-चल की भाषा है, जो सम-सामयिक विषयों पर सहज और सरल शब्दों में लिखता है, दर्शन जैसे क्लिष्ट और नीरस विषय को भी उतने ही सरल शब्दों में लोगों के लिए ज्ञेय बना सकता है. मैंने इसको एच. आर. जोधा से जानना चाहा, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इनका लेखक एक ही है- महओंडित राहुल सांकृत्यायन! फिर तो उनका विविध-रूपा साहित्य पढ़ने के बाद वे मेरे जीवन के वे एक आदर्श पुरुष बन गए. उनके अधिकांश साहित्य को मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया. मेरे जीवन में राहुल जी के साहित्य ने बौद्ध धर्म को गंभीरता से समझने और आत्मसात करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर मेरे को वह साहित्य पढ़ने को नहीं मिलता तो कदाचित मैं बौद्ध धर्म को ठीक ढंग से नहीं समझ पाता और साथ ही उस समय जो विद्यार्थी-असंतोष की ज्वाला थी, उसमें कहीं बह गया होता परन्तु राहुल जी की जब “भागो मत, दुनिया बदल डालो” रचना पढ़ी तो नजरिया ही बदल गया. अगर राहुल जी नहीं मिलते तो यह समझ भी मुझ में नहीं होती, ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बौद्धिक विरासत और साहित्यिक सम्पदा हमारे लिए बड़े गौरव की अमूल्य निधि है. अस्तांचल की दहलीज पर जाती हुई 19वीं शताब्दी में उनका जन्म हुआ, उन्होंने 20वीं शती की भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगा और 22वीं शती की परिकल्पना कर उसने अपने को युग-दृष्टा होने की बात प्रमाणित कर दी.                                       विश्व-विद्यालय के स्नातक कोर्स में मैंने मनोविज्ञान, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र जैसे दुरूह विषयों को लेकर पढाई शुरू की तो दर्शन की दुरूह गलियों में भारतीय दर्शनों को और बौद्ध-दर्शन के अंतर्भूत सिद्धांतों को समझने में राहुल सांकृत्यायन जी की अनुपम कृतियों ने सदैव मेरा मार्ग-दर्शन किया. हर एक विषय को समझाने की उनकी शैली बेजोड़ है. एक लुप्तप्रायः धर्म को साहित्य के प्राण-पयोधर से सिंचित कर उन्होंने उस बगीचे को हरा-भरा कर दिया. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के स्वयंभू धनी थे. वे स्वयंभू महापंडित थे- अद्भुत, आश्चर्य-चकित करने वाला व्यक्तित्व !
               भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य के पुनरुत्थान में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का अतुलनीय योगदान है. बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व के धनि तथा बौद्ध-वाड्मय के पुरस्कर्ता को आधुनिक भारतीय संस्कृति का निर्माता कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के वे शिखर-पुरुष है. पराधीन भारत में 9 अप्रैल 1893 को उत्तर-प्रदेश के एक छोटे से गाँव पन्दाहा के सनातनी सरयूपारीण ब्राहमण के घर में उनका जन्म हुआ. बचपन में केदार पाण्डेय के नाम से जाना जाने वाला यह बालक घर-बार छोड़कर भाग जाता है और कलकता की मिलो में मजदूरी करने लग जाता है. वहां भी उसे स्थिरता कहाँ, वह इधर से उधर, एक से दूसरी टोह लेते हुए यायावरी का जीवन जीता है. घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता भागने वाला यही बालक बड़ा होकर दुनिया को कहता है कि भागो मत, दुनिया को बदल डालो ! कोई सपने में भी यह नहीं सोच सकता कि भागने वाला यह बालक, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पायी, एक दिन विश्व की 36 भाषाओँ में पारंगत हो जायेगा और एक दिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का व्यक्तित्व बनेगा. उसका बहु-आयामी लेखन पर आधिपत्य होगा, त्रिपिटकाचार्य, साहित्यवाचस्पति, पद्म-भूषण आदि उपाधियों के साथ देश-विदेश में विख्यात होगा और जब 33 साल बाद अपने जन्म-स्थान के घर लौटेगा तो महापंडित से विभूषित होकर अपने पूरे आभा-मंडल के साथ, सबके आदर्श का पात्र होगा.   
         आश्चर्य-चकित करने वाले उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बहु-आयामी विकास के बारे में उनके एक अनन्य मित्र डॉ काशीप्रसाद जायसवाल ने बिलकुल ठीक ही लिखा है- ‘उस समय मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा, जिसे मैं आज जानता हूँ- एक ऐसा आदमी जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्व-व्यापी है, जो पूर्ण रूप से स्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे आप से आप दौड़ पड़ते है, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा, जैसे वह गौतम और ईसा मसीह के पीछे चलता था’. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल के ये उद्गार उस विराट व्यक्तित्व की झलक-भर है. निःसंदेह राहुल संकृत्यायन  भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना है. डॉ. आंबेडकर, महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन जैसे शलाका-पुरुष बीसवीं शताब्दी में विद्यमान थे, अगली शताब्दियों में लोग इस पर आश्चर्य करेंगें. भारतीय संस्कृति के क्षितिज पर आविर्भूत ऐसी विलक्षण विभूति अपनी अगाध विद्वता, अद्भुत मेधा, जाबांज यायावरी, बहु-आयामी कृतित्व आदि गुणों के वैशिष्ट्य से सदियों तक अद्वितीय बनी रहेगी.
               आज महापंडित राहुल सांकृत्यायन का विराट व्यक्तित्व अगाध पांडित्य, ज्ञानाकुल यायावरी और विलक्षण साधना का एक उज्जवल प्रतिमान बन गया है. सांस्कृतिक ध्वज-वाहक तथा मानव-स्वातन्त्र्य के पक्षधर राहुल सांकृत्यायन के जीवन की यात्रा ऋग्वैदिक ‘दिवोदास’ से प्रारंभ होकर प्रज्ञा के पुंज अमिताभ बुद्ध की रश्मि-रंजित भूमि से अंकुरित होकर तथागत बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ के आलोक में बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय के रूप में विकसित हुई दिखती है. अपनी जीवन-यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक, एक मतवाद से दूसरे मतवाद तक, एक भूखंड से दूसरे भूखंड तक, एक भाषा से दूसरी भाषा तक, एक विधा से दूसरी विधा तक दुःख से मनुष्य जाति की मुक्ति के लिए निरंतर संघर्ष तथा ज्ञान की खोज के लिए सतत गतिशील बने रहने वाले महामानव राहुल का स्वयंभूत्व अपने आप में अद्वितीय था. वे सदैव ज्ञान-पिपासु बने रहे. वे अतृप्त हो इधर से उधर घुमक्कड़ी करते रहे. वस्तुतः उनके समस्त चिंतन और लेखन के मूल में जिज्ञासात्मक और प्राणहारक यायावरी केन्द्रित थी, जिसने उन्हें केदार पाण्डेय से रामोदर दास और रामोदर दास से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा दी. उनका सम्पूर्ण जीवन चरैवेति-चरैवेति तथा अत्त दीपो भव का सर्वोत्कृष्ट उदहारण बन गया है.
                वे कहीं रुके नहीं, निरंतर प्रवाहवान ही बने रहे. चाहे वह विचार का प्रवाह हो या आचार का- उनके जीवन के सातत्य को खंडित नहीं कर पाया. दर-दर भटकते हुए वे ऐसे आलोक की खोज में लगे रहे, जिससे मानव के दुखों की मुक्ति सुनिश्चित की जा सके. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को रूपांकित करते हुए रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि राहुल का ध्यान एक ऐसी आत्मा का ध्यान है, जो युग-युगांतर से अन्धकार के बीच आलोक खोजती आ रही है, एक के बाद दूसरी प्राप्तियां उनके पक्ष में आती रही है, किन्तु वे उन्हें पीछे छोड़कर ‘नेति-नेति’ कहते हुए आगे बढ़ जाती है, मानो जो सिद्धि मिली है, वह उसे तृप्ति नहीं दे सकती, मानो जो कुछ वह खोज रही है, वह और अभी आगे है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन उस विराट सांस्कृतिक क्षितिज का नाम है, जिसे समझना जितना आसन है, उसे मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है.
                उनके बहु-मुखी व्यक्तित्व का अनुशीलन विभिन्न अध्येताओं ने वैष्णव साधु, आर्य-समाजी प्रचारक, बौद्ध संस्कृति के उपासक तथा प्रखर चिन्तक आदि के रूप में किया है. वस्तुतः, उनकी नेति-नेति की वृति ने उन्हें वैष्णव, वेदांती, तंत्र-साधक, आर्य-समाजी, गाँधीवादी, कांग्रेसी, समाजवादी-साम्यवादी, आदि भूमिकाओं के बीचो-बीच मानववाद की मंजिल तक पहुँचाया. उनमें एक साथ बहु-मुखी भाषा-विद, महान यायावर, प्रकांड दर्शन-शास्त्री इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता-सेनानी, साम्यवादी चिन्तक, साहित्य-दृष्टा आदि रूपों के समेकित दर्शन होते है. उनका व्यक्तित्व अनेकों में एक था. राहुल सांकृत्यायन जी ने अतीत के खंडहरों में झांककर वर्त्तमान को पाया एवं भविष्य की रुपरेखा तैयार की थी. उनकी जीवन-यात्रा आज की पीढ़ी को एक मिथकीय पात्र की तरह लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. राहुल जी  का दाम्पत्य जीवन भी उतार-चढाव वाला ही रहा. उनकी पहली शादी 1904 में, जब वे 11 वर्ष की बहुत छोटी उम्र के थे, तब रामदुलारी नामक बालिका से हुई. उनके लिए यह एक तमाशा था. समाज के प्रति विद्रोह के बीज पैदा करने में इसने ही पहला काम किया, इस पत्नी को उन्होंने कभी भी दाम्पत्य-भाव से नहीं देखा. उनकी दूसरी शादी लेनिनग्राद में मंगोल विदुषी लोला से 1937 में हुई, जिनसे उन्हें 1938 में ईगोर नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. उनकी तीसरी शादी अधिक उम्र ( 57 ) में नेपाली तरुणी कमला से सन 1950 में हुई. उनसे एक पुत्री जया (1953 ) व एक पुत्र जेता ( 1955 ) का जन्म हुआ. उनके दाम्पत्य जीवन में भावुकता की जगह स्थितियां ज्यादा प्रबल नजर आती है.
                अपनी प्रयोजनमूलक गत्यात्मक जीवन-शैली के कारण  उन्होंने कई बार धर्म बदला, देश बदला, भोजन, वस्त्र और विचार बदले कि इन विविध स्वरूपों से अलग कर के उनको किसी एक स्वरूप में न तो देखा जा सकता है और न ही मूल्यांकित किया जा सकता है. उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा के वैचारिक परिवर्तन के मूल में यथा-निर्दिष्ट बौद्ध सूत्र को अंगीकृत कर लिया था, जब वे कहते है- ‘बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया है, न कि सर पर उठाये फिरने के लिए’ तो उनका वह हर एक परिवर्तन और स्वरूप हमें समझ में आ जाता है. उसमें राहुल सांकृत्यायन बादलों से घिरे आकाश में जैसे चंद्रमा शोभायमान होता है, वैसे ही वे साहित्य-इतिहास के गगन में दैदीप्यमान हो उठते है. सन 1910 में घर छोड़ा और 1916 में उनका बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. फलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओँ को सीख कर उसमें महारथ हासिल की. विश्व-जनिन उथल-पुथल में वे 1917 की रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित हुए. वे भारत में उस विचारधारा के अग्रणी लोगों में गिने जाने लगे और धरातल पर किसानों के आन्दोलनों की अगुवायी भी की. यायावर राहुल एक जगह कहाँ टिकने वाले थे, 1923 से उनका विदेशी यात्राओं का दौर शुरू हुआ, जो मृत्यु-पर्यंत बना रहा. श्रीलंका में जाकर 1930 में उन्होंने बौद्ध-भिक्षु की दीक्षा लेकर चीवर धारण कर लिया, 1937 में लेनिनग्राद जा पहुंचे और चीवर को छोड़ गृहस्थी बसा ली. बिहार के किसान आन्दोलन में प्रमुख भूमिका की वजह से उन्हें एक साल जेल जाना पड़ा. भारत छोडो आन्दोलन में हुंकार का संपादन किया. वे शीर्ष कम्युनिस्ट, शीर्ष कांग्रेसी, शीर्ष समाजवादी सब कुछ रहे. ऐसे कई अनेकानेक रूप किसी अन्य महामानव के देखने और सुनने को नहीं मिलते है. वे विरलों में से विरले पुरुष थे.                   
                एक डाल से दूसरे डाल और एक पात से दूसरे पात अवतिष्ठ होते हुए भी राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट आस्था कभी भी नहीं टूटी. उन्होंने अपना सर्वस्व हिंदी को दिया. जो कुछ हिंदी को दिया. आज वह अपौरुषेय अवदान जैसा लगता है और हिंदी भाषा-साहित्य जगत में वे हिंदी के जनक के रूप में प्रस्थापित हुए. राहुल सांकृत्यायन, इतिहास का एक ऐसा महान व्यक्तित्व, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई, फिर भी मेधा के उच्चतम शिखर पर अवस्थित हुआ. वह न केवल लब्द्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में पहचाना गया, बल्कि इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता एवं बौद्ध दार्शनिक के रूप में भी एक अद्वितीय हस्ताक्षर प्रमाणित और प्रस्थापित हुए, जिसकी अनुगूँज इस देश में और इस देश के बाहर भी सदियों तक सुनाई देती रहेगी. उनके चिंतन में, जहाँ एक ओर बुद्ध की करुणा और प्रज्ञा है, वहीँ साम्यवादी विचारों के आदर्श की सरिणी भी समाहित है. उनकी भाषा यथार्तपरक व्यवहारिक एवं व्यवसाय-कुशलता के साथ ही सरल और सहज गति में अभिव्यक्त हुई है. उनकी रचनायें हर किसी का मन-मष्तिष्क एवं हृद्य का आलोडन-विलोडन किये बिना नहीं रह सकती है. यही उनकी जीवन्तता है. जिस संवेदनशीलता, सहजता, प्रवाह और साक्षी-भाव से उन्होंने अपनी रचनाओं में शब्दों का संयोजन किया है, वह पाठक को झकझोरे बिना रह ही नहीं सकती है और पाठक उनका कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. वस्तुतः उनकी रचनाएँ चिंतन की विविध धाराओं का बखूबी प्रतिनिधित्व कराती है.          
                हिंदी भाषा के जनक माने जाने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य को विपुल भण्डार से परिपूरित किया है. उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के अलोक में उनकी ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खोज, हिंदी प्रदेश की प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओँ-उपभाषाओं का अध्ययन-अनुशीलन, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में धर्म-दर्शन और राजनीति की व्याख्या, बौद्धों की प्रतीत्यसमुत्पादवादी दृष्टि के प्रति सहज आग्रह-शीलता, साम्यवादी चिंतन, राष्ट्रिय आन्दोलनों में सहभागिता आदि में सामान प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए, प्रवास, कारावास और पारिवारिक अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए इस देश और विश्व-जनिन संस्कृति को बहुत कुछ दिया. उनकी 150 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी और बहुत सारा संग्रह अप्रकाशित भी पड़ा है. हिंदी में  विभिन्न विधाओं में उनकी कालजयी कृतियाँ अनुपम है, जिसको बार-बार पढ़ने का मन करता है और हर बार उसमें  नए-नए माणिक्य हस्तगत हुए बिना नहीं रह सकते है. उनके साहित्य सृजन की झलक कहानियों के रूप में- सतमी के बच्चे; वोल्गा से गंगा; बहुरंगी आदि, उपन्यास में- बाईंसवीं सदी; सिंह-सेनापति; जय यौधेय; विस्मृत यात्री; दिवोदास आदि, निबंधों में- साहित्य रत्नावलि; पुरातत्व निबंधावलि; आज की समस्याएं; तुम्हारी क्षय आदि, जीवनी लेखन में- सरदार पृथ्वी सिंह; वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली; नए भारत के नए नेता; स्तालिन; कार्ल मार्क्स; माओ-त्से-तुंग; मेरे असहयोग के साथी आदि, यात्रा वृतांत में तिब्बत में सवा वर्ष; मेरी लद्दाख यात्रा; किन्नर देश; रूस में पच्चीस मास; चीन में क्या देखा; एशिया के दुर्गम भूखंडों में आदि, आत्म-कथा में मेरी जीवन-यात्रा ( 1 से 5 खंड ) तथा लंका, जापान, ईरान, मदुर स्वपन, जीने के लिए, कनैला की कथा, कप्तान लाल, सिंहल के वीर पुरुस, जिनका मैं कृतज्ञ हूँ आदि अद्भुत और अविस्मरणीय है. 
                बौद्ध धर्म और दर्शन पर सुत-पिटक के मज्झिम निकाय, दीघ-निकाय, संयुत-निकाय आदि व विनय-पिटक का अनुवाद, बौद्ध संस्कृति, महा-मानव बुद्ध, बुद्ध-चर्या आदि विलक्षण अवदान है, जिससे हिंदी जगत बुद्ध और बौद्ध धर्म को समझ पाया. बौद्ध-संस्कृति के सन्दर्भ में श्रीलंका, तिब्बत और नेपाल उनके विशेष आकर्षण के केंद्र थे. तिब्बत की उनकी लोमहर्षक यात्राएँ ( सन 1929-30,1934,1936एवं 1938 )सर्वाधिक दुस्साहसपूर्ण,महानियौर सार्थक प्रमाणित हुई और भारत से विलुप्त प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अवशेषों को तिब्बत से प्राप्त कर भारत वासियों को ही नहीं बल्कि समस्त विश्व को अवगत कराया. जिस प्रकार ह्वेनसांग भारतीय ज्ञान-सम्पदा को चीन ले गया था, उसी प्रकार राहुल संकृत्यायन विलुप्त भारतीय ज्ञान-सम्पदा को भारत लौटा लाये. वे बीसवीं सदी के ह्वेनसांग है, एसा कहे तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी. उनकी काल-जयी कृतियों में दर्शन-दिग्दर्शन, ऋग्वैदिक आर्य, मध्य-एशिया का इतिहास ( दो खंड ), अकबर, मानव-समाज, दोहा-कोष आदि कई रचनाएँ शुमार है. उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और विवरण भी लिखे. वे अपनी पुस्तकों का प्रूफ स्वयं देखना पसंद करते थे, लॉ जर्नल प्रेस, नॅशनल हेराल्ड प्रेस, सम्मलेन मुद्रणालय, मोहन प्रेस आदि से उनकी रचनाये निरंतर चापती रही. उनके द्वारा प्रणीत विभिन्न भाषाओँ के व्याकरण और शब्द-कोष अतुलनीय है, जो आज भी प्रकाश-स्तम्भ की तरह अध्येताओं का मार्ग-दर्शन करते है. इसके साथ ही संस्मरण, डायरी, पत्र आदि जो सर्जन है, वह हमें उनके यायावरी, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन-पक्षों का विश्व-व्यापी मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक नजरिया प्रदान करता है और उनके अथाह विराट व्यक्तित्व का अहसास कराता है. इस विराट व्यक्तित्व के साक्षात्कार के बाद विख्यात प्राच्य-विद सिलवां लेवी ने उन में अमिताभ बुद्ध का साक्षात्कार किया था.
                राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा का पूर्वार्द्ध जितनी मस्ती में बीता, भौतिक दृष्टि से उनके जीवन का उत्तरार्द्ध उतना ही कष्टमय बीता. अत्यधिक परिश्रम और व्यैक्तिक चिंताओं ने उन्हें मधुमेह, हृदयरोग, उच्च-रक्तचाप और स्मृति-भ्रंश आदि रोगों का शिकार बना दिया था. जीवन के अंतिम दो वर्षों में उनकी स्मृति-शक्ति लुप्त हो गयी थी. जो नाम, धाम, धर्म, वस्त्र और विचार बार-बार बदलता रहा और अपने जीवन-यात्रा में सतत परिवर्तन का पक्षधर रहा, उसने इसको भी सहज रूप से स्वीकार्य बना दिया था. आवास-प्रवास और कारावास आदि की अस्त-व्यस्तता ने उनके चिंतन और लेखन के कर्म को कभी बाधित नहीं किया था, परन्तु जीवन के अंतिम वर्षों में स्मृति ने ही उनका साथ छोड़ दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा एक गति और एक-लय में लिखा, इस महापंडित ने अपनी कलम को न तो किसी प्रकाशक के अधीन कभी गिरवी रखा और न किसी इनाम या पुरस्कार के खातिर उसको बदला. उन्होंने ता-उम्र अपनी किसी भी कृति को कहीं भी पुरस्कार के लिए भेजा तक नहीं, वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते थे. उनको जो ठीक लगा, ठीक जंचा, उसी को ठीक-ठीक लिखा. बुद्ध के सिद्धांतों को जीवन के यथार्त धरातल पर पुनः उतारने और उकेरने में वे कामयाब हुए परन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध-दर्शन के पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर शंकाओं में घिर गए और बेझिझक उन्हें नकार भी दिया.   
                उनकी जीवन यात्रा का अंतिम दशक आर्थिक चिताओं का भी दशक रहा. नयी गृहस्थी का भार, परिवार का आर्थिक भविष्य, चिकित्सा का खर्च आदि सब कुछ उन्हें आर्थिक अनिश्चिंतता के भंवर में डालने वाली एक से बुरी एक परिस्थिति थी. वे चाहते तो राजनेताओं से मदद ले सकते थे, प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्र-पति सर्व-पल्ली राधाकृषण जैसे उनके गुण-ग्राह्य दोस्त थे. वे किसी भी प्रकाशक को कहते तो उन पर अनुकम्पा कर सकता था, वे अपनी किसी भी पुस्तक को किसी पुरस्कार की प्रविष्टि में भेज कर पुरस्कार राशि भी पा सकते थे परन्तु इसे वे अपने आत्म-सम्मान की चेतना के विपरीत समझते थे और आर्थिक तंगी को पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते थे. उन्होंने अपने मित्र पंडित किशोरीलाल वाजपई को 4 नवम्बर 1961 के पत्र में लिखते है- ‘आर्थिक निश्चिन्तता का ख्याल रखना जरुरी है......रुपये के मूल्य को मैं भी समझता हूँ, किन्तु मेरी पाण्डुलिपि कहीं पुरस्कृत होने के लिए न भेजना.’ अंतिम वर्षों में विपन्नताओं और अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए सत्तर वर्ष की अवस्था में संज्ञा-शून्यता की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए रूस भी ले जाया गया पर 14 अप्रैल 1963 को वे भौतिक शारीर से विमुक्त हो गए.
                हर काल और हर युग में राहुल संकृत्यायन जैसी विभूतियों का जन्म होना दुर्लभ है. ऐसी विभूतियाँ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए ही जीती है और अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से दुनिया को विचम्भित कर उन्हें प्रकाश की वे किरणें दे जाती है, जो उनको सदा-सर्वदा प्रकाश देती रहती है. राहुल सांकृत्यायन हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को बेहद पसंद करते थे और वे स्वयं भी हिमालय की तरह प्रखर और प्रभावोत्पादक थे. वे अपना घर भी हिमालय की गोद में ही बसाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने पहले नैनीताल में और बाद में दार्जिलिंग में अपना घर बसाया- उनके शारीर का अंतिम संस्कार भी दार्जिलिंग में ही किया गया. भौतिक शारीर से इस लोक से चले जाने के बाद भी उन पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा और लिखा जाता रहेगा. डॉ. प्रभाकर माचवे ने ( राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), विष्णु चन्द्र शर्मा (राहुल सांकृत्यायन का विरल व्यक्तित्व, 1989 ), भदंत आनंद कौशल्यायन (राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), रत्नसुन्दर शाक्य ( भिक्खु-त्रयी, 1992 ), गुणाकर मुले ( महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वयंभू महापंडित, 1993, राहुल चिंतन, 1994 ) आदि ने उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है. कई संस्थानों और संस्थाओं ने उनके लेखन और चिंतन के विविध आयामों को रेखान्तित करने की कोशिश की है, परन्तु ये सब अभी भी सतत प्रक्रिया के कुछ क्षण भर है, उनकी बहुत-सी रचनाएँ और आयाम अभी भी बाहर  आने है. हम सब उसके अविरल इंतजार में है कि हमें कोई एक ओर राहुल सांकृत्यायन मिल जाय.  ..... इति-यत्नं ! भवतु सब्ब मंगलम !!

                                        ताराराम
                                           निदेशक,
                                   बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र ,                                                                               जोधपुर 
    बाबा साहेब डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म का नाम मैंने बचपन में अपने पिताजी से सुन रखा था. जब वे द्वितीय विश्व-युद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना के एक सिपाही के नाते जापान सीमा पर लड़ने गए तो वहां उनका बौद्ध धर्मानुयायी सैनिकों से परिचय हुआ और रंगून आदि कुछ जगहों के बौद्ध मठों के बारे में भी उन्हें कुछ जानकारी थी. द्वितीय विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर उनका पद-स्थापन कलकता में हो गया. जहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर और गाँधी नाम के दो शख्सियत के बारे में जानकारी मिली थी. जिसे वे यदा-कदा हम लोगों को बताया करते थे. प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी और 14 अप्रैल को वे हमारे घर में पकवान बनवाते थे और वे आजादी की लडाई और विभिन्न युद्धों में अपने खुद के अनुभव को लोगों में साझा करते थे. वे बड़े उत्साह से विभिन्न लड़ाईयों के सजीव वर्णन और उसके महत्त्व को बताते थे. हमारी स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में वे सदैव अपने शौर्य-पदकों के साथ  विशेष पोशाक धारण कर सभा में उपस्थित होते थे. पूरे गाँव में भारत के विभिन्न युद्धों में भारत की ओर से लड़ने वाले वे अकेले ही शख्स थे, जो ऐसे कार्यक्रमों में सरिक होते थे. ऐसे अवसरों पर हमको  उनसे आंबेडकर और बुद्ध का नाम तो सुनने को मिला था, परन्तु महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम नहीं सुना था. सन 1975 में उन्होंने गाँव में पहली बार डॉ. आंबेडकर जयंती मनाई और मुझे विश्व-विद्यालय में दाखिला दिलाने साथ आये, जहाँ पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध के परम अनुयायी एच. आर. जोधा से मुलाकात हुई. श्री एच. आर. जोधा के मुहं से ही मुझे पहली बार महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम सुनने को मिला. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम के साथ ही उनका साहित्य भी पहली बार पढ़ने को मिला. पिताजी ने वृहद-स्तर पर 1978-79 में गांव में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर कार्यक्रम रखा तो  कौसल्यायन जी को आमंत्रित करने के पीछे भी राहुल जी के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही था.
              अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक आंदोलनों की स्थिति से वाकिफ था और हमारे क्षेत्र में शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में किये जाने वाले छोटे-बड़े आन्दोलनों में हमारे पिताजी की भूमिका के कारण ऐसे अन्दोलनों में सक्रीय रहना एक नियति-सी बन गयी थी. जोधपुर में एच.आर. जोधा अम्बेडकरी मिशन के जुझारू और निष्ठावान कर्ता-धर्ता थे और अकसर वे हमारे छात्रावास में आते रहते थे. हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक विषय पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी. आपात-काल के इस समय में विद्यार्थी वर्ग में भी असंतोष था और विद्यार्थियों के छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहते थे. मैं अपने आपको उनसे भी अलग नहीं रख सका. एक दिन जोधा साहब ने मुझे राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक पढ़ने को दी, जिसका नाम था- “तुम्हारी क्षय”. उस पुस्तक को बिना विराम के जब तक मैंने पूरा नहीं पढ़ा, तब तक सोया नहीं. पुस्तक बड़ी सहज और सरल शब्दों में थी, साथ ही वह हमारी ज्वलन्त समस्याओं को लेकर ही थी, उस पहली पुस्तक को पढ़ने के बाद राहुल सांकृत्यायन जी के बारे में और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र हो गयी और विचार पक्का कर लिया कि उनके पूरे लेखन को पढ़ लिया जाय. उस समय जोधपुर में दो पुस्तक विक्रेता थे जो राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य रखा करते थे, जोधा साहब ने मेरा उनसे परिचय कराया और उसके बाद राहुल जी की जब भी कोई नयी कृति आती उसे खरीदकर पढ़ ही लेता. उस पुस्तक विक्रेता से स्तालिन, कार्ल मार्क्स आदि पढने के बाद मुझे उनका ग्रन्थ दर्शन-दिग्दर्शन भी पढ़ने को मिला. उसको पढ़कर लगा कि राहुल सांकृत्यायन जैसा महापुरुष, जिसने ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो मत, दुनिया को बदल डालो’ जैसी सरल कृतियों का सृजन किया है, जिसकी भाषा आम बोल-चल की भाषा है, जो सम-सामयिक विषयों पर सहज और सरल शब्दों में लिखता है, दर्शन जैसे क्लिष्ट और नीरस विषय को भी उतने ही सरल शब्दों में लोगों के लिए ज्ञेय बना सकता है. मैंने इसको एच. आर. जोधा से जानना चाहा, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इनका लेखक एक ही है- महओंडित राहुल सांकृत्यायन! फिर तो उनका विविध-रूपा साहित्य पढ़ने के बाद वे मेरे जीवन के वे एक आदर्श पुरुष बन गए. उनके अधिकांश साहित्य को मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया. मेरे जीवन में राहुल जी के साहित्य ने बौद्ध धर्म को गंभीरता से समझने और आत्मसात करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर मेरे को वह साहित्य पढ़ने को नहीं मिलता तो कदाचित मैं बौद्ध धर्म को ठीक ढंग से नहीं समझ पाता और साथ ही उस समय जो विद्यार्थी-असंतोष की ज्वाला थी, उसमें कहीं बह गया होता परन्तु राहुल जी की जब “भागो मत, दुनिया बदल डालो” रचना पढ़ी तो नजरिया ही बदल गया. अगर राहुल जी नहीं मिलते तो यह समझ भी मुझ में नहीं होती, ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बौद्धिक विरासत और साहित्यिक सम्पदा हमारे लिए बड़े गौरव की अमूल्य निधि है. अस्तांचल की दहलीज पर जाती हुई 19वीं शताब्दी में उनका जन्म हुआ, उन्होंने 20वीं शती की भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगा और 22वीं शती की परिकल्पना कर उसने अपने को युग-दृष्टा होने की बात प्रमाणित कर दी.                                       विश्व-विद्यालय के स्नातक कोर्स में मैंने मनोविज्ञान, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र जैसे दुरूह विषयों को लेकर पढाई शुरू की तो दर्शन की दुरूह गलियों में भारतीय दर्शनों को और बौद्ध-दर्शन के अंतर्भूत सिद्धांतों को समझने में राहुल सांकृत्यायन जी की अनुपम कृतियों ने सदैव मेरा मार्ग-दर्शन किया. हर एक विषय को समझाने की उनकी शैली बेजोड़ है. एक लुप्तप्रायः धर्म को साहित्य के प्राण-पयोधर से सिंचित कर उन्होंने उस बगीचे को हरा-भरा कर दिया. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के स्वयंभू धनी थे. वे स्वयंभू महापंडित थे- अद्भुत, आश्चर्य-चकित करने वाला व्यक्तित्व !
               भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य के पुनरुत्थान में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का अतुलनीय योगदान है. बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व के धनि तथा बौद्ध-वाड्मय के पुरस्कर्ता को आधुनिक भारतीय संस्कृति का निर्माता कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के वे शिखर-पुरुष है. पराधीन भारत में 9 अप्रैल 1893 को उत्तर-प्रदेश के एक छोटे से गाँव पन्दाहा के सनातनी सरयूपारीण ब्राहमण के घर में उनका जन्म हुआ. बचपन में केदार पाण्डेय के नाम से जाना जाने वाला यह बालक घर-बार छोड़कर भाग जाता है और कलकता की मिलो में मजदूरी करने लग जाता है. वहां भी उसे स्थिरता कहाँ, वह इधर से उधर, एक से दूसरी टोह लेते हुए यायावरी का जीवन जीता है. घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता भागने वाला यही बालक बड़ा होकर दुनिया को कहता है कि भागो मत, दुनिया को बदल डालो ! कोई सपने में भी यह नहीं सोच सकता कि भागने वाला यह बालक, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पायी, एक दिन विश्व की 36 भाषाओँ में पारंगत हो जायेगा और एक दिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का व्यक्तित्व बनेगा. उसका बहु-आयामी लेखन पर आधिपत्य होगा, त्रिपिटकाचार्य, साहित्यवाचस्पति, पद्म-भूषण आदि उपाधियों के साथ देश-विदेश में विख्यात होगा और जब 33 साल बाद अपने जन्म-स्थान के घर लौटेगा तो महापंडित से विभूषित होकर अपने पूरे आभा-मंडल के साथ, सबके आदर्श का पात्र होगा.   
         आश्चर्य-चकित करने वाले उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बहु-आयामी विकास के बारे में उनके एक अनन्य मित्र डॉ काशीप्रसाद जायसवाल ने बिलकुल ठीक ही लिखा है- ‘उस समय मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा, जिसे मैं आज जानता हूँ- एक ऐसा आदमी जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्व-व्यापी है, जो पूर्ण रूप से स्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे आप से आप दौड़ पड़ते है, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा, जैसे वह गौतम और ईसा मसीह के पीछे चलता था’. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल के ये उद्गार उस विराट व्यक्तित्व की झलक-भर है. निःसंदेह राहुल संकृत्यायन  भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना है. डॉ. आंबेडकर, महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन जैसे शलाका-पुरुष बीसवीं शताब्दी में विद्यमान थे, अगली शताब्दियों में लोग इस पर आश्चर्य करेंगें. भारतीय संस्कृति के क्षितिज पर आविर्भूत ऐसी विलक्षण विभूति अपनी अगाध विद्वता, अद्भुत मेधा, जाबांज यायावरी, बहु-आयामी कृतित्व आदि गुणों के वैशिष्ट्य से सदियों तक अद्वितीय बनी रहेगी.
               आज महापंडित राहुल सांकृत्यायन का विराट व्यक्तित्व अगाध पांडित्य, ज्ञानाकुल यायावरी और विलक्षण साधना का एक उज्जवल प्रतिमान बन गया है. सांस्कृतिक ध्वज-वाहक तथा मानव-स्वातन्त्र्य के पक्षधर राहुल सांकृत्यायन के जीवन की यात्रा ऋग्वैदिक ‘दिवोदास’ से प्रारंभ होकर प्रज्ञा के पुंज अमिताभ बुद्ध की रश्मि-रंजित भूमि से अंकुरित होकर तथागत बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ के आलोक में बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय के रूप में विकसित हुई दिखती है. अपनी जीवन-यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक, एक मतवाद से दूसरे मतवाद तक, एक भूखंड से दूसरे भूखंड तक, एक भाषा से दूसरी भाषा तक, एक विधा से दूसरी विधा तक दुःख से मनुष्य जाति की मुक्ति के लिए निरंतर संघर्ष तथा ज्ञान की खोज के लिए सतत गतिशील बने रहने वाले महामानव राहुल का स्वयंभूत्व अपने आप में अद्वितीय था. वे सदैव ज्ञान-पिपासु बने रहे. वे अतृप्त हो इधर से उधर घुमक्कड़ी करते रहे. वस्तुतः उनके समस्त चिंतन और लेखन के मूल में जिज्ञासात्मक और प्राणहारक यायावरी केन्द्रित थी, जिसने उन्हें केदार पाण्डेय से रामोदर दास और रामोदर दास से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा दी. उनका सम्पूर्ण जीवन चरैवेति-चरैवेति तथा अत्त दीपो भव का सर्वोत्कृष्ट उदहारण बन गया है.
                वे कहीं रुके नहीं, निरंतर प्रवाहवान ही बने रहे. चाहे वह विचार का प्रवाह हो या आचार का- उनके जीवन के सातत्य को खंडित नहीं कर पाया. दर-दर भटकते हुए वे ऐसे आलोक की खोज में लगे रहे, जिससे मानव के दुखों की मुक्ति सुनिश्चित की जा सके. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को रूपांकित करते हुए रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि राहुल का ध्यान एक ऐसी आत्मा का ध्यान है, जो युग-युगांतर से अन्धकार के बीच आलोक खोजती आ रही है, एक के बाद दूसरी प्राप्तियां उनके पक्ष में आती रही है, किन्तु वे उन्हें पीछे छोड़कर ‘नेति-नेति’ कहते हुए आगे बढ़ जाती है, मानो जो सिद्धि मिली है, वह उसे तृप्ति नहीं दे सकती, मानो जो कुछ वह खोज रही है, वह और अभी आगे है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन उस विराट सांस्कृतिक क्षितिज का नाम है, जिसे समझना जितना आसन है, उसे मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है.
                उनके बहु-मुखी व्यक्तित्व का अनुशीलन विभिन्न अध्येताओं ने वैष्णव साधु, आर्य-समाजी प्रचारक, बौद्ध संस्कृति के उपासक तथा प्रखर चिन्तक आदि के रूप में किया है. वस्तुतः, उनकी नेति-नेति की वृति ने उन्हें वैष्णव, वेदांती, तंत्र-साधक, आर्य-समाजी, गाँधीवादी, कांग्रेसी, समाजवादी-साम्यवादी, आदि भूमिकाओं के बीचो-बीच मानववाद की मंजिल तक पहुँचाया. उनमें एक साथ बहु-मुखी भाषा-विद, महान यायावर, प्रकांड दर्शन-शास्त्री इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता-सेनानी, साम्यवादी चिन्तक, साहित्य-दृष्टा आदि रूपों के समेकित दर्शन होते है. उनका व्यक्तित्व अनेकों में एक था. राहुल सांकृत्यायन जी ने अतीत के खंडहरों में झांककर वर्त्तमान को पाया एवं भविष्य की रुपरेखा तैयार की थी. उनकी जीवन-यात्रा आज की पीढ़ी को एक मिथकीय पात्र की तरह लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. राहुल जी  का दाम्पत्य जीवन भी उतार-चढाव वाला ही रहा. उनकी पहली शादी 1904 में, जब वे 11 वर्ष की बहुत छोटी उम्र के थे, तब रामदुलारी नामक बालिका से हुई. उनके लिए यह एक तमाशा था. समाज के प्रति विद्रोह के बीज पैदा करने में इसने ही पहला काम किया, इस पत्नी को उन्होंने कभी भी दाम्पत्य-भाव से नहीं देखा. उनकी दूसरी शादी लेनिनग्राद में मंगोल विदुषी लोला से 1937 में हुई, जिनसे उन्हें 1938 में ईगोर नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. उनकी तीसरी शादी अधिक उम्र ( 57 ) में नेपाली तरुणी कमला से सन 1950 में हुई. उनसे एक पुत्री जया (1953 ) व एक पुत्र जेता ( 1955 ) का जन्म हुआ. उनके दाम्पत्य जीवन में भावुकता की जगह स्थितियां ज्यादा प्रबल नजर आती है.
                अपनी प्रयोजनमूलक गत्यात्मक जीवन-शैली के कारण  उन्होंने कई बार धर्म बदला, देश बदला, भोजन, वस्त्र और विचार बदले कि इन विविध स्वरूपों से अलग कर के उनको किसी एक स्वरूप में न तो देखा जा सकता है और न ही मूल्यांकित किया जा सकता है. उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा के वैचारिक परिवर्तन के मूल में यथा-निर्दिष्ट बौद्ध सूत्र को अंगीकृत कर लिया था, जब वे कहते है- ‘बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया है, न कि सर पर उठाये फिरने के लिए’ तो उनका वह हर एक परिवर्तन और स्वरूप हमें समझ में आ जाता है. उसमें राहुल सांकृत्यायन बादलों से घिरे आकाश में जैसे चंद्रमा शोभायमान होता है, वैसे ही वे साहित्य-इतिहास के गगन में दैदीप्यमान हो उठते है. सन 1910 में घर छोड़ा और 1916 में उनका बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. फलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओँ को सीख कर उसमें महारथ हासिल की. विश्व-जनिन उथल-पुथल में वे 1917 की रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित हुए. वे भारत में उस विचारधारा के अग्रणी लोगों में गिने जाने लगे और धरातल पर किसानों के आन्दोलनों की अगुवायी भी की. यायावर राहुल एक जगह कहाँ टिकने वाले थे, 1923 से उनका विदेशी यात्राओं का दौर शुरू हुआ, जो मृत्यु-पर्यंत बना रहा. श्रीलंका में जाकर 1930 में उन्होंने बौद्ध-भिक्षु की दीक्षा लेकर चीवर धारण कर लिया, 1937 में लेनिनग्राद जा पहुंचे और चीवर को छोड़ गृहस्थी बसा ली. बिहार के किसान आन्दोलन में प्रमुख भूमिका की वजह से उन्हें एक साल जेल जाना पड़ा. भारत छोडो आन्दोलन में हुंकार का संपादन किया. वे शीर्ष कम्युनिस्ट, शीर्ष कांग्रेसी, शीर्ष समाजवादी सब कुछ रहे. ऐसे कई अनेकानेक रूप किसी अन्य महामानव के देखने और सुनने को नहीं मिलते है. वे विरलों में से विरले पुरुष थे.                   
                एक डाल से दूसरे डाल और एक पात से दूसरे पात अवतिष्ठ होते हुए भी राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट आस्था कभी भी नहीं टूटी. उन्होंने अपना सर्वस्व हिंदी को दिया. जो कुछ हिंदी को दिया. आज वह अपौरुषेय अवदान जैसा लगता है और हिंदी भाषा-साहित्य जगत में वे हिंदी के जनक के रूप में प्रस्थापित हुए. राहुल सांकृत्यायन, इतिहास का एक ऐसा महान व्यक्तित्व, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई, फिर भी मेधा के उच्चतम शिखर पर अवस्थित हुआ. वह न केवल लब्द्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में पहचाना गया, बल्कि इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता एवं बौद्ध दार्शनिक के रूप में भी एक अद्वितीय हस्ताक्षर प्रमाणित और प्रस्थापित हुए, जिसकी अनुगूँज इस देश में और इस देश के बाहर भी सदियों तक सुनाई देती रहेगी. उनके चिंतन में, जहाँ एक ओर बुद्ध की करुणा और प्रज्ञा है, वहीँ साम्यवादी विचारों के आदर्श की सरिणी भी समाहित है. उनकी भाषा यथार्तपरक व्यवहारिक एवं व्यवसाय-कुशलता के साथ ही सरल और सहज गति में अभिव्यक्त हुई है. उनकी रचनायें हर किसी का मन-मष्तिष्क एवं हृद्य का आलोडन-विलोडन किये बिना नहीं रह सकती है. यही उनकी जीवन्तता है. जिस संवेदनशीलता, सहजता, प्रवाह और साक्षी-भाव से उन्होंने अपनी रचनाओं में शब्दों का संयोजन किया है, वह पाठक को झकझोरे बिना रह ही नहीं सकती है और पाठक उनका कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. वस्तुतः उनकी रचनाएँ चिंतन की विविध धाराओं का बखूबी प्रतिनिधित्व कराती है.          
                हिंदी भाषा के जनक माने जाने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य को विपुल भण्डार से परिपूरित किया है. उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के अलोक में उनकी ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खोज, हिंदी प्रदेश की प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओँ-उपभाषाओं का अध्ययन-अनुशीलन, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में धर्म-दर्शन और राजनीति की व्याख्या, बौद्धों की प्रतीत्यसमुत्पादवादी दृष्टि के प्रति सहज आग्रह-शीलता, साम्यवादी चिंतन, राष्ट्रिय आन्दोलनों में सहभागिता आदि में सामान प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए, प्रवास, कारावास और पारिवारिक अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए इस देश और विश्व-जनिन संस्कृति को बहुत कुछ दिया. उनकी 150 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी और बहुत सारा संग्रह अप्रकाशित भी पड़ा है. हिंदी में  विभिन्न विधाओं में उनकी कालजयी कृतियाँ अनुपम है, जिसको बार-बार पढ़ने का मन करता है और हर बार उसमें  नए-नए माणिक्य हस्तगत हुए बिना नहीं रह सकते है. उनके साहित्य सृजन की झलक कहानियों के रूप में- सतमी के बच्चे; वोल्गा से गंगा; बहुरंगी आदि, उपन्यास में- बाईंसवीं सदी; सिंह-सेनापति; जय यौधेय; विस्मृत यात्री; दिवोदास आदि, निबंधों में- साहित्य रत्नावलि; पुरातत्व निबंधावलि; आज की समस्याएं; तुम्हारी क्षय आदि, जीवनी लेखन में- सरदार पृथ्वी सिंह; वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली; नए भारत के नए नेता; स्तालिन; कार्ल मार्क्स; माओ-त्से-तुंग; मेरे असहयोग के साथी आदि, यात्रा वृतांत में तिब्बत में सवा वर्ष; मेरी लद्दाख यात्रा; किन्नर देश; रूस में पच्चीस मास; चीन में क्या देखा; एशिया के दुर्गम भूखंडों में आदि, आत्म-कथा में मेरी जीवन-यात्रा ( 1 से 5 खंड ) तथा लंका, जापान, ईरान, मदुर स्वपन, जीने के लिए, कनैला की कथा, कप्तान लाल, सिंहल के वीर पुरुस, जिनका मैं कृतज्ञ हूँ आदि अद्भुत और अविस्मरणीय है. 
                बौद्ध धर्म और दर्शन पर सुत-पिटक के मज्झिम निकाय, दीघ-निकाय, संयुत-निकाय आदि व विनय-पिटक का अनुवाद, बौद्ध संस्कृति, महा-मानव बुद्ध, बुद्ध-चर्या आदि विलक्षण अवदान है, जिससे हिंदी जगत बुद्ध और बौद्ध धर्म को समझ पाया. बौद्ध-संस्कृति के सन्दर्भ में श्रीलंका, तिब्बत और नेपाल उनके विशेष आकर्षण के केंद्र थे. तिब्बत की उनकी लोमहर्षक यात्राएँ ( सन 1929-30,1934,1936एवं 1938 )सर्वाधिक दुस्साहसपूर्ण,महानियौर सार्थक प्रमाणित हुई और भारत से विलुप्त प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अवशेषों को तिब्बत से प्राप्त कर भारत वासियों को ही नहीं बल्कि समस्त विश्व को अवगत कराया. जिस प्रकार ह्वेनसांग भारतीय ज्ञान-सम्पदा को चीन ले गया था, उसी प्रकार राहुल संकृत्यायन विलुप्त भारतीय ज्ञान-सम्पदा को भारत लौटा लाये. वे बीसवीं सदी के ह्वेनसांग है, एसा कहे तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी. उनकी काल-जयी कृतियों में दर्शन-दिग्दर्शन, ऋग्वैदिक आर्य, मध्य-एशिया का इतिहास ( दो खंड ), अकबर, मानव-समाज, दोहा-कोष आदि कई रचनाएँ शुमार है. उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और विवरण भी लिखे. वे अपनी पुस्तकों का प्रूफ स्वयं देखना पसंद करते थे, लॉ जर्नल प्रेस, नॅशनल हेराल्ड प्रेस, सम्मलेन मुद्रणालय, मोहन प्रेस आदि से उनकी रचनाये निरंतर चापती रही. उनके द्वारा प्रणीत विभिन्न भाषाओँ के व्याकरण और शब्द-कोष अतुलनीय है, जो आज भी प्रकाश-स्तम्भ की तरह अध्येताओं का मार्ग-दर्शन करते है. इसके साथ ही संस्मरण, डायरी, पत्र आदि जो सर्जन है, वह हमें उनके यायावरी, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन-पक्षों का विश्व-व्यापी मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक नजरिया प्रदान करता है और उनके अथाह विराट व्यक्तित्व का अहसास कराता है. इस विराट व्यक्तित्व के साक्षात्कार के बाद विख्यात प्राच्य-विद सिलवां लेवी ने उन में अमिताभ बुद्ध का साक्षात्कार किया था.
                राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा का पूर्वार्द्ध जितनी मस्ती में बीता, भौतिक दृष्टि से उनके जीवन का उत्तरार्द्ध उतना ही कष्टमय बीता. अत्यधिक परिश्रम और व्यैक्तिक चिंताओं ने उन्हें मधुमेह, हृदयरोग, उच्च-रक्तचाप और स्मृति-भ्रंश आदि रोगों का शिकार बना दिया था. जीवन के अंतिम दो वर्षों में उनकी स्मृति-शक्ति लुप्त हो गयी थी. जो नाम, धाम, धर्म, वस्त्र और विचार बार-बार बदलता रहा और अपने जीवन-यात्रा में सतत परिवर्तन का पक्षधर रहा, उसने इसको भी सहज रूप से स्वीकार्य बना दिया था. आवास-प्रवास और कारावास आदि की अस्त-व्यस्तता ने उनके चिंतन और लेखन के कर्म को कभी बाधित नहीं किया था, परन्तु जीवन के अंतिम वर्षों में स्मृति ने ही उनका साथ छोड़ दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा एक गति और एक-लय में लिखा, इस महापंडित ने अपनी कलम को न तो किसी प्रकाशक के अधीन कभी गिरवी रखा और न किसी इनाम या पुरस्कार के खातिर उसको बदला. उन्होंने ता-उम्र अपनी किसी भी कृति को कहीं भी पुरस्कार के लिए भेजा तक नहीं, वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते थे. उनको जो ठीक लगा, ठीक जंचा, उसी को ठीक-ठीक लिखा. बुद्ध के सिद्धांतों को जीवन के यथार्त धरातल पर पुनः उतारने और उकेरने में वे कामयाब हुए परन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध-दर्शन के पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर शंकाओं में घिर गए और बेझिझक उन्हें नकार भी दिया.   
                उनकी जीवन यात्रा का अंतिम दशक आर्थिक चिताओं का भी दशक रहा. नयी गृहस्थी का भार, परिवार का आर्थिक भविष्य, चिकित्सा का खर्च आदि सब कुछ उन्हें आर्थिक अनिश्चिंतता के भंवर में डालने वाली एक से बुरी एक परिस्थिति थी. वे चाहते तो राजनेताओं से मदद ले सकते थे, प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्र-पति सर्व-पल्ली राधाकृषण जैसे उनके गुण-ग्राह्य दोस्त थे. वे किसी भी प्रकाशक को कहते तो उन पर अनुकम्पा कर सकता था, वे अपनी किसी भी पुस्तक को किसी पुरस्कार की प्रविष्टि में भेज कर पुरस्कार राशि भी पा सकते थे परन्तु इसे वे अपने आत्म-सम्मान की चेतना के विपरीत समझते थे और आर्थिक तंगी को पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते थे. उन्होंने अपने मित्र पंडित किशोरीलाल वाजपई को 4 नवम्बर 1961 के पत्र में लिखते है- ‘आर्थिक निश्चिन्तता का ख्याल रखना जरुरी है......रुपये के मूल्य को मैं भी समझता हूँ, किन्तु मेरी पाण्डुलिपि कहीं पुरस्कृत होने के लिए न भेजना.’ अंतिम वर्षों में विपन्नताओं और अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए सत्तर वर्ष की अवस्था में संज्ञा-शून्यता की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए रूस भी ले जाया गया पर 14 अप्रैल 1963 को वे भौतिक शारीर से विमुक्त हो गए.
                हर काल और हर युग में राहुल संकृत्यायन जैसी विभूतियों का जन्म होना दुर्लभ है. ऐसी विभूतियाँ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए ही जीती है और अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से दुनिया को विचम्भित कर उन्हें प्रकाश की वे किरणें दे जाती है, जो उनको सदा-सर्वदा प्रकाश देती रहती है. राहुल सांकृत्यायन हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को बेहद पसंद करते थे और वे स्वयं भी हिमालय की तरह प्रखर और प्रभावोत्पादक थे. वे अपना घर भी हिमालय की गोद में ही बसाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने पहले नैनीताल में और बाद में दार्जिलिंग में अपना घर बसाया- उनके शारीर का अंतिम संस्कार भी दार्जिलिंग में ही किया गया. भौतिक शारीर से इस लोक से चले जाने के बाद भी उन पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा और लिखा जाता रहेगा. डॉ. प्रभाकर माचवे ने ( राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), विष्णु चन्द्र शर्मा (राहुल सांकृत्यायन का विरल व्यक्तित्व, 1989 ), भदंत आनंद कौशल्यायन (राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), रत्नसुन्दर शाक्य ( भिक्खु-त्रयी, 1992 ), गुणाकर मुले ( महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वयंभू महापंडित, 1993, राहुल चिंतन, 1994 ) आदि ने उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है. कई संस्थानों और संस्थाओं ने उनके लेखन और चिंतन के विविध आयामों को रेखान्तित करने की कोशिश की है, परन्तु ये सब अभी भी सतत प्रक्रिया के कुछ क्षण भर है, उनकी बहुत-सी रचनाएँ और आयाम अभी भी बाहर  आने है. हम सब उसके अविरल इंतजार में है कि हमें कोई एक ओर राहुल सांकृत्यायन मिल जाय.  ..... इति-यत्नं ! भवतु सब्ब मंगलम !!




Read the history analytically--- Brahmans and Kasim----सिंध का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक इतिहास "चचनामा" माना जाता है। उसमे कई महत्वपूर्ण सूचनाएं है। भारत किंवा सिंध पर मुसलमानों के प्रथम आक्रमण का भी इसमे सविस्तार जिक्र है।
कासिम के आक्रमण के समय सिंध का राजा दाहिर मारा गया। उसकी पत्नी को ब्राह्मणों ने ही आक्रमणकारी को सौंपा।
हारी हुई प्रजा पर कई बंदिशे लागु हुई। कुछ लोग उनकी सेना में भर्ती हुए। वे भी मुस्लमान बनकर ही हो सकते थे। यह वो ही वर्ग था जो आज अपने को क्षत्रीय नहीं बल्कि तथाकथित राजपूत कहता है। कई प्रकार के टेक्स लगे।
चालाक ब्राह्मण राजा दाहिर के क़त्ल के बाद कासिम के आगे सर मुंडाकर सेवा में हाजिर हुए। 'राज' की सेवा का वादा किया। टेक्स से उन्मुक्तियाँ पाई। उनके द्वारा यह विशेषाधिकार या आरक्षण इस आधार पर हासिल किया कि वे हिन्दुओं में सर्वोच्च है। हिन्दू उनका बहुत आदर करते है आदि आदि तर्क दिए।
कासिम ने उन्हें आरक्षण या विशेषाधिकार दे दिए। उन्हें राज में ऊँचे ऊँचे पद दिए गए।बदले में वे जगह जगह जाकर कासिम के लिए काम करते। साधारण जनता पर ब्राह्मणों का प्रहार और तेज हो गए --ब्राह्मणों द्वारा राष्ट्रद्रोह और गद्दारी का यह एतिहासिक प्रमाण चचनामा में है।

चच नामा और तारीख-ए-हिन्द वा सिंध के वर्णन को इससे मिलाये और सच्चाई देखे। Historians of Sind भी देखे । here under pages are quoted from " the history of India- as told by its own historians,volume-1,by sir H.M. Elliot
"The relations of Dahir are betrayed by the Brahmans" page-84
"The Brahmans come to Muhammad Kasim" page- 84-85
" ladi, the wife of Dahir is taken with his two maiden daughters" page- 84, and many more conspiracies and c.




Subject: Rahul sankrityayan... Tararam

अगर मुझे राहुल ना मिले होते .... 

Subject: Rahul sankrityayan... Tararam

अगर मुझे राहुल ना मिले होते .... 
                                        ताराराम
                                           निदेशक,
                                   बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र ,                                                                               जोधपुर 
    बाबा साहेब डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म का नाम मैंने बचपन में अपने पिताजी से सुन रखा था. जब वे द्वितीय विश्व-युद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना के एक सिपाही के नाते जापान सीमा पर लड़ने गए तो वहां उनका बौद्ध धर्मानुयायी सैनिकों से परिचय हुआ और रंगून आदि कुछ जगहों के बौद्ध मठों के बारे में भी उन्हें कुछ जानकारी थी. द्वितीय विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर उनका पद-स्थापन कलकता में हो गया. जहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर और गाँधी नाम के दो शख्सियत के बारे में जानकारी मिली थी. जिसे वे यदा-कदा हम लोगों को बताया करते थे. प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी और 14 अप्रैल को वे हमारे घर में पकवान बनवाते थे और वे आजादी की लडाई और विभिन्न युद्धों में अपने खुद के अनुभव को लोगों में साझा करते थे. वे बड़े उत्साह से विभिन्न लड़ाईयों के सजीव वर्णन और उसके महत्त्व को बताते थे. हमारी स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में वे सदैव अपने शौर्य-पदकों के साथ  विशेष पोशाक धारण कर सभा में उपस्थित होते थे. पूरे गाँव में भारत के विभिन्न युद्धों में भारत की ओर से लड़ने वाले वे अकेले ही शख्स थे, जो ऐसे कार्यक्रमों में सरिक होते थे. ऐसे अवसरों पर हमको  उनसे आंबेडकर और बुद्ध का नाम तो सुनने को मिला था, परन्तु महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम नहीं सुना था. सन 1975 में उन्होंने गाँव में पहली बार डॉ. आंबेडकर जयंती मनाई और मुझे विश्व-विद्यालय में दाखिला दिलाने साथ आये, जहाँ पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध के परम अनुयायी एच. आर. जोधा से मुलाकात हुई. श्री एच. आर. जोधा के मुहं से ही मुझे पहली बार महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम सुनने को मिला. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम के साथ ही उनका साहित्य भी पहली बार पढ़ने को मिला. पिताजी ने वृहद-स्तर पर 1978-79 में गांव में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर कार्यक्रम रखा तो  कौसल्यायन जी को आमंत्रित करने के पीछे भी राहुल जी के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही था.
              अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक आंदोलनों की स्थिति से वाकिफ था और हमारे क्षेत्र में शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में किये जाने वाले छोटे-बड़े आन्दोलनों में हमारे पिताजी की भूमिका के कारण ऐसे अन्दोलनों में सक्रीय रहना एक नियति-सी बन गयी थी. जोधपुर में एच.आर. जोधा अम्बेडकरी मिशन के जुझारू और निष्ठावान कर्ता-धर्ता थे और अकसर वे हमारे छात्रावास में आते रहते थे. हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक विषय पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी. आपात-काल के इस समय में विद्यार्थी वर्ग में भी असंतोष था और विद्यार्थियों के छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहते थे. मैं अपने आपको उनसे भी अलग नहीं रख सका. एक दिन जोधा साहब ने मुझे राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक पढ़ने को दी, जिसका नाम था- “तुम्हारी क्षय”. उस पुस्तक को बिना विराम के जब तक मैंने पूरा नहीं पढ़ा, तब तक सोया नहीं. पुस्तक बड़ी सहज और सरल शब्दों में थी, साथ ही वह हमारी ज्वलन्त समस्याओं को लेकर ही थी, उस पहली पुस्तक को पढ़ने के बाद राहुल सांकृत्यायन जी के बारे में और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र हो गयी और विचार पक्का कर लिया कि उनके पूरे लेखन को पढ़ लिया जाय. उस समय जोधपुर में दो पुस्तक विक्रेता थे जो राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य रखा करते थे, जोधा साहब ने मेरा उनसे परिचय कराया और उसके बाद राहुल जी की जब भी कोई नयी कृति आती उसे खरीदकर पढ़ ही लेता. उस पुस्तक विक्रेता से स्तालिन, कार्ल मार्क्स आदि पढने के बाद मुझे उनका ग्रन्थ दर्शन-दिग्दर्शन भी पढ़ने को मिला. उसको पढ़कर लगा कि राहुल सांकृत्यायन जैसा महापुरुष, जिसने ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो मत, दुनिया को बदल डालो’ जैसी सरल कृतियों का सृजन किया है, जिसकी भाषा आम बोल-चल की भाषा है, जो सम-सामयिक विषयों पर सहज और सरल शब्दों में लिखता है, दर्शन जैसे क्लिष्ट और नीरस विषय को भी उतने ही सरल शब्दों में लोगों के लिए ज्ञेय बना सकता है. मैंने इसको एच. आर. जोधा से जानना चाहा, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इनका लेखक एक ही है- महओंडित राहुल सांकृत्यायन! फिर तो उनका विविध-रूपा साहित्य पढ़ने के बाद वे मेरे जीवन के वे एक आदर्श पुरुष बन गए. उनके अधिकांश साहित्य को मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया. मेरे जीवन में राहुल जी के साहित्य ने बौद्ध धर्म को गंभीरता से समझने और आत्मसात करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर मेरे को वह साहित्य पढ़ने को नहीं मिलता तो कदाचित मैं बौद्ध धर्म को ठीक ढंग से नहीं समझ पाता और साथ ही उस समय जो विद्यार्थी-असंतोष की ज्वाला थी, उसमें कहीं बह गया होता परन्तु राहुल जी की जब “भागो मत, दुनिया बदल डालो” रचना पढ़ी तो नजरिया ही बदल गया. अगर राहुल जी नहीं मिलते तो यह समझ भी मुझ में नहीं होती, ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बौद्धिक विरासत और साहित्यिक सम्पदा हमारे लिए बड़े गौरव की अमूल्य निधि है. अस्तांचल की दहलीज पर जाती हुई 19वीं शताब्दी में उनका जन्म हुआ, उन्होंने 20वीं शती की भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगा और 22वीं शती की परिकल्पना कर उसने अपने को युग-दृष्टा होने की बात प्रमाणित कर दी.                                       विश्व-विद्यालय के स्नातक कोर्स में मैंने मनोविज्ञान, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र जैसे दुरूह विषयों को लेकर पढाई शुरू की तो दर्शन की दुरूह गलियों में भारतीय दर्शनों को और बौद्ध-दर्शन के अंतर्भूत सिद्धांतों को समझने में राहुल सांकृत्यायन जी की अनुपम कृतियों ने सदैव मेरा मार्ग-दर्शन किया. हर एक विषय को समझाने की उनकी शैली बेजोड़ है. एक लुप्तप्रायः धर्म को साहित्य के प्राण-पयोधर से सिंचित कर उन्होंने उस बगीचे को हरा-भरा कर दिया. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के स्वयंभू धनी थे. वे स्वयंभू महापंडित थे- अद्भुत, आश्चर्य-चकित करने वाला व्यक्तित्व !
               भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य के पुनरुत्थान में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का अतुलनीय योगदान है. बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व के धनि तथा बौद्ध-वाड्मय के पुरस्कर्ता को आधुनिक भारतीय संस्कृति का निर्माता कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के वे शिखर-पुरुष है. पराधीन भारत में 9 अप्रैल 1893 को उत्तर-प्रदेश के एक छोटे से गाँव पन्दाहा के सनातनी सरयूपारीण ब्राहमण के घर में उनका जन्म हुआ. बचपन में केदार पाण्डेय के नाम से जाना जाने वाला यह बालक घर-बार छोड़कर भाग जाता है और कलकता की मिलो में मजदूरी करने लग जाता है. वहां भी उसे स्थिरता कहाँ, वह इधर से उधर, एक से दूसरी टोह लेते हुए यायावरी का जीवन जीता है. घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता भागने वाला यही बालक बड़ा होकर दुनिया को कहता है कि भागो मत, दुनिया को बदल डालो ! कोई सपने में भी यह नहीं सोच सकता कि भागने वाला यह बालक, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पायी, एक दिन विश्व की 36 भाषाओँ में पारंगत हो जायेगा और एक दिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का व्यक्तित्व बनेगा. उसका बहु-आयामी लेखन पर आधिपत्य होगा, त्रिपिटकाचार्य, साहित्यवाचस्पति, पद्म-भूषण आदि उपाधियों के साथ देश-विदेश में विख्यात होगा और जब 33 साल बाद अपने जन्म-स्थान के घर लौटेगा तो महापंडित से विभूषित होकर अपने पूरे आभा-मंडल के साथ, सबके आदर्श का पात्र होगा.   
         आश्चर्य-चकित करने वाले उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बहु-आयामी विकास के बारे में उनके एक अनन्य मित्र डॉ काशीप्रसाद जायसवाल ने बिलकुल ठीक ही लिखा है- ‘उस समय मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा, जिसे मैं आज जानता हूँ- एक ऐसा आदमी जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्व-व्यापी है, जो पूर्ण रूप से स्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे आप से आप दौड़ पड़ते है, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा, जैसे वह गौतम और ईसा मसीह के पीछे चलता था’. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल के ये उद्गार उस विराट व्यक्तित्व की झलक-भर है. निःसंदेह राहुल संकृत्यायन  भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना है. डॉ. आंबेडकर, महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन जैसे शलाका-पुरुष बीसवीं शताब्दी में विद्यमान थे, अगली शताब्दियों में लोग इस पर आश्चर्य करेंगें. भारतीय संस्कृति के क्षितिज पर आविर्भूत ऐसी विलक्षण विभूति अपनी अगाध विद्वता, अद्भुत मेधा, जाबांज यायावरी, बहु-आयामी कृतित्व आदि गुणों के वैशिष्ट्य से सदियों तक अद्वितीय बनी रहेगी.
               आज महापंडित राहुल सांकृत्यायन का विराट व्यक्तित्व अगाध पांडित्य, ज्ञानाकुल यायावरी और विलक्षण साधना का एक उज्जवल प्रतिमान बन गया है. सांस्कृतिक ध्वज-वाहक तथा मानव-स्वातन्त्र्य के पक्षधर राहुल सांकृत्यायन के जीवन की यात्रा ऋग्वैदिक ‘दिवोदास’ से प्रारंभ होकर प्रज्ञा के पुंज अमिताभ बुद्ध की रश्मि-रंजित भूमि से अंकुरित होकर तथागत बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ के आलोक में बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय के रूप में विकसित हुई दिखती है. अपनी जीवन-यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक, एक मतवाद से दूसरे मतवाद तक, एक भूखंड से दूसरे भूखंड तक, एक भाषा से दूसरी भाषा तक, एक विधा से दूसरी विधा तक दुःख से मनुष्य जाति की मुक्ति के लिए निरंतर संघर्ष तथा ज्ञान की खोज के लिए सतत गतिशील बने रहने वाले महामानव राहुल का स्वयंभूत्व अपने आप में अद्वितीय था. वे सदैव ज्ञान-पिपासु बने रहे. वे अतृप्त हो इधर से उधर घुमक्कड़ी करते रहे. वस्तुतः उनके समस्त चिंतन और लेखन के मूल में जिज्ञासात्मक और प्राणहारक यायावरी केन्द्रित थी, जिसने उन्हें केदार पाण्डेय से रामोदर दास और रामोदर दास से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा दी. उनका सम्पूर्ण जीवन चरैवेति-चरैवेति तथा अत्त दीपो भव का सर्वोत्कृष्ट उदहारण बन गया है.
                वे कहीं रुके नहीं, निरंतर प्रवाहवान ही बने रहे. चाहे वह विचार का प्रवाह हो या आचार का- उनके जीवन के सातत्य को खंडित नहीं कर पाया. दर-दर भटकते हुए वे ऐसे आलोक की खोज में लगे रहे, जिससे मानव के दुखों की मुक्ति सुनिश्चित की जा सके. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को रूपांकित करते हुए रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि राहुल का ध्यान एक ऐसी आत्मा का ध्यान है, जो युग-युगांतर से अन्धकार के बीच आलोक खोजती आ रही है, एक के बाद दूसरी प्राप्तियां उनके पक्ष में आती रही है, किन्तु वे उन्हें पीछे छोड़कर ‘नेति-नेति’ कहते हुए आगे बढ़ जाती है, मानो जो सिद्धि मिली है, वह उसे तृप्ति नहीं दे सकती, मानो जो कुछ वह खोज रही है, वह और अभी आगे है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन उस विराट सांस्कृतिक क्षितिज का नाम है, जिसे समझना जितना आसन है, उसे मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है.
                उनके बहु-मुखी व्यक्तित्व का अनुशीलन विभिन्न अध्येताओं ने वैष्णव साधु, आर्य-समाजी प्रचारक, बौद्ध संस्कृति के उपासक तथा प्रखर चिन्तक आदि के रूप में किया है. वस्तुतः, उनकी नेति-नेति की वृति ने उन्हें वैष्णव, वेदांती, तंत्र-साधक, आर्य-समाजी, गाँधीवादी, कांग्रेसी, समाजवादी-साम्यवादी, आदि भूमिकाओं के बीचो-बीच मानववाद की मंजिल तक पहुँचाया. उनमें एक साथ बहु-मुखी भाषा-विद, महान यायावर, प्रकांड दर्शन-शास्त्री इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता-सेनानी, साम्यवादी चिन्तक, साहित्य-दृष्टा आदि रूपों के समेकित दर्शन होते है. उनका व्यक्तित्व अनेकों में एक था. राहुल सांकृत्यायन जी ने अतीत के खंडहरों में झांककर वर्त्तमान को पाया एवं भविष्य की रुपरेखा तैयार की थी. उनकी जीवन-यात्रा आज की पीढ़ी को एक मिथकीय पात्र की तरह लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. राहुल जी  का दाम्पत्य जीवन भी उतार-चढाव वाला ही रहा. उनकी पहली शादी 1904 में, जब वे 11 वर्ष की बहुत छोटी उम्र के थे, तब रामदुलारी नामक बालिका से हुई. उनके लिए यह एक तमाशा था. समाज के प्रति विद्रोह के बीज पैदा करने में इसने ही पहला काम किया, इस पत्नी को उन्होंने कभी भी दाम्पत्य-भाव से नहीं देखा. उनकी दूसरी शादी लेनिनग्राद में मंगोल विदुषी लोला से 1937 में हुई, जिनसे उन्हें 1938 में ईगोर नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. उनकी तीसरी शादी अधिक उम्र ( 57 ) में नेपाली तरुणी कमला से सन 1950 में हुई. उनसे एक पुत्री जया (1953 ) व एक पुत्र जेता ( 1955 ) का जन्म हुआ. उनके दाम्पत्य जीवन में भावुकता की जगह स्थितियां ज्यादा प्रबल नजर आती है.
                अपनी प्रयोजनमूलक गत्यात्मक जीवन-शैली के कारण  उन्होंने कई बार धर्म बदला, देश बदला, भोजन, वस्त्र और विचार बदले कि इन विविध स्वरूपों से अलग कर के उनको किसी एक स्वरूप में न तो देखा जा सकता है और न ही मूल्यांकित किया जा सकता है. उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा के वैचारिक परिवर्तन के मूल में यथा-निर्दिष्ट बौद्ध सूत्र को अंगीकृत कर लिया था, जब वे कहते है- ‘बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया है, न कि सर पर उठाये फिरने के लिए’ तो उनका वह हर एक परिवर्तन और स्वरूप हमें समझ में आ जाता है. उसमें राहुल सांकृत्यायन बादलों से घिरे आकाश में जैसे चंद्रमा शोभायमान होता है, वैसे ही वे साहित्य-इतिहास के गगन में दैदीप्यमान हो उठते है. सन 1910 में घर छोड़ा और 1916 में उनका बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. फलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओँ को सीख कर उसमें महारथ हासिल की. विश्व-जनिन उथल-पुथल में वे 1917 की रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित हुए. वे भारत में उस विचारधारा के अग्रणी लोगों में गिने जाने लगे और धरातल पर किसानों के आन्दोलनों की अगुवायी भी की. यायावर राहुल एक जगह कहाँ टिकने वाले थे, 1923 से उनका विदेशी यात्राओं का दौर शुरू हुआ, जो मृत्यु-पर्यंत बना रहा. श्रीलंका में जाकर 1930 में उन्होंने बौद्ध-भिक्षु की दीक्षा लेकर चीवर धारण कर लिया, 1937 में लेनिनग्राद जा पहुंचे और चीवर को छोड़ गृहस्थी बसा ली. बिहार के किसान आन्दोलन में प्रमुख भूमिका की वजह से उन्हें एक साल जेल जाना पड़ा. भारत छोडो आन्दोलन में हुंकार का संपादन किया. वे शीर्ष कम्युनिस्ट, शीर्ष कांग्रेसी, शीर्ष समाजवादी सब कुछ रहे. ऐसे कई अनेकानेक रूप किसी अन्य महामानव के देखने और सुनने को नहीं मिलते है. वे विरलों में से विरले पुरुष थे.                   
                एक डाल से दूसरे डाल और एक पात से दूसरे पात अवतिष्ठ होते हुए भी राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट आस्था कभी भी नहीं टूटी. उन्होंने अपना सर्वस्व हिंदी को दिया. जो कुछ हिंदी को दिया. आज वह अपौरुषेय अवदान जैसा लगता है और हिंदी भाषा-साहित्य जगत में वे हिंदी के जनक के रूप में प्रस्थापित हुए. राहुल सांकृत्यायन, इतिहास का एक ऐसा महान व्यक्तित्व, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई, फिर भी मेधा के उच्चतम शिखर पर अवस्थित हुआ. वह न केवल लब्द्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में पहचाना गया, बल्कि इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता एवं बौद्ध दार्शनिक के रूप में भी एक अद्वितीय हस्ताक्षर प्रमाणित और प्रस्थापित हुए, जिसकी अनुगूँज इस देश में और इस देश के बाहर भी सदियों तक सुनाई देती रहेगी. उनके चिंतन में, जहाँ एक ओर बुद्ध की करुणा और प्रज्ञा है, वहीँ साम्यवादी विचारों के आदर्श की सरिणी भी समाहित है. उनकी भाषा यथार्तपरक व्यवहारिक एवं व्यवसाय-कुशलता के साथ ही सरल और सहज गति में अभिव्यक्त हुई है. उनकी रचनायें हर किसी का मन-मष्तिष्क एवं हृद्य का आलोडन-विलोडन किये बिना नहीं रह सकती है. यही उनकी जीवन्तता है. जिस संवेदनशीलता, सहजता, प्रवाह और साक्षी-भाव से उन्होंने अपनी रचनाओं में शब्दों का संयोजन किया है, वह पाठक को झकझोरे बिना रह ही नहीं सकती है और पाठक उनका कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. वस्तुतः उनकी रचनाएँ चिंतन की विविध धाराओं का बखूबी प्रतिनिधित्व कराती है.          
                हिंदी भाषा के जनक माने जाने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य को विपुल भण्डार से परिपूरित किया है. उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के अलोक में उनकी ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खोज, हिंदी प्रदेश की प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओँ-उपभाषाओं का अध्ययन-अनुशीलन, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में धर्म-दर्शन और राजनीति की व्याख्या, बौद्धों की प्रतीत्यसमुत्पादवादी दृष्टि के प्रति सहज आग्रह-शीलता, साम्यवादी चिंतन, राष्ट्रिय आन्दोलनों में सहभागिता आदि में सामान प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए, प्रवास, कारावास और पारिवारिक अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए इस देश और विश्व-जनिन संस्कृति को बहुत कुछ दिया. उनकी 150 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी और बहुत सारा संग्रह अप्रकाशित भी पड़ा है. हिंदी में  विभिन्न विधाओं में उनकी कालजयी कृतियाँ अनुपम है, जिसको बार-बार पढ़ने का मन करता है और हर बार उसमें  नए-नए माणिक्य हस्तगत हुए बिना नहीं रह सकते है. उनके साहित्य सृजन की झलक कहानियों के रूप में- सतमी के बच्चे; वोल्गा से गंगा; बहुरंगी आदि, उपन्यास में- बाईंसवीं सदी; सिंह-सेनापति; जय यौधेय; विस्मृत यात्री; दिवोदास आदि, निबंधों में- साहित्य रत्नावलि; पुरातत्व निबंधावलि; आज की समस्याएं; तुम्हारी क्षय आदि, जीवनी लेखन में- सरदार पृथ्वी सिंह; वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली; नए भारत के नए नेता; स्तालिन; कार्ल मार्क्स; माओ-त्से-तुंग; मेरे असहयोग के साथी आदि, यात्रा वृतांत में तिब्बत में सवा वर्ष; मेरी लद्दाख यात्रा; किन्नर देश; रूस में पच्चीस मास; चीन में क्या देखा; एशिया के दुर्गम भूखंडों में आदि, आत्म-कथा में मेरी जीवन-यात्रा ( 1 से 5 खंड ) तथा लंका, जापान, ईरान, मदुर स्वपन, जीने के लिए, कनैला की कथा, कप्तान लाल, सिंहल के वीर पुरुस, जिनका मैं कृतज्ञ हूँ आदि अद्भुत और अविस्मरणीय है. 
                बौद्ध धर्म और दर्शन पर सुत-पिटक के मज्झिम निकाय, दीघ-निकाय, संयुत-निकाय आदि व विनय-पिटक का अनुवाद, बौद्ध संस्कृति, महा-मानव बुद्ध, बुद्ध-चर्या आदि विलक्षण अवदान है, जिससे हिंदी जगत बुद्ध और बौद्ध धर्म को समझ पाया. बौद्ध-संस्कृति के सन्दर्भ में श्रीलंका, तिब्बत और नेपाल उनके विशेष आकर्षण के केंद्र थे. तिब्बत की उनकी लोमहर्षक यात्राएँ ( सन 1929-30,1934,1936एवं 1938 )सर्वाधिक दुस्साहसपूर्ण,महानियौर सार्थक प्रमाणित हुई और भारत से विलुप्त प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अवशेषों को तिब्बत से प्राप्त कर भारत वासियों को ही नहीं बल्कि समस्त विश्व को अवगत कराया. जिस प्रकार ह्वेनसांग भारतीय ज्ञान-सम्पदा को चीन ले गया था, उसी प्रकार राहुल संकृत्यायन विलुप्त भारतीय ज्ञान-सम्पदा को भारत लौटा लाये. वे बीसवीं सदी के ह्वेनसांग है, एसा कहे तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी. उनकी काल-जयी कृतियों में दर्शन-दिग्दर्शन, ऋग्वैदिक आर्य, मध्य-एशिया का इतिहास ( दो खंड ), अकबर, मानव-समाज, दोहा-कोष आदि कई रचनाएँ शुमार है. उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और विवरण भी लिखे. वे अपनी पुस्तकों का प्रूफ स्वयं देखना पसंद करते थे, लॉ जर्नल प्रेस, नॅशनल हेराल्ड प्रेस, सम्मलेन मुद्रणालय, मोहन प्रेस आदि से उनकी रचनाये निरंतर चापती रही. उनके द्वारा प्रणीत विभिन्न भाषाओँ के व्याकरण और शब्द-कोष अतुलनीय है, जो आज भी प्रकाश-स्तम्भ की तरह अध्येताओं का मार्ग-दर्शन करते है. इसके साथ ही संस्मरण, डायरी, पत्र आदि जो सर्जन है, वह हमें उनके यायावरी, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन-पक्षों का विश्व-व्यापी मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक नजरिया प्रदान करता है और उनके अथाह विराट व्यक्तित्व का अहसास कराता है. इस विराट व्यक्तित्व के साक्षात्कार के बाद विख्यात प्राच्य-विद सिलवां लेवी ने उन में अमिताभ बुद्ध का साक्षात्कार किया था.
                राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा का पूर्वार्द्ध जितनी मस्ती में बीता, भौतिक दृष्टि से उनके जीवन का उत्तरार्द्ध उतना ही कष्टमय बीता. अत्यधिक परिश्रम और व्यैक्तिक चिंताओं ने उन्हें मधुमेह, हृदयरोग, उच्च-रक्तचाप और स्मृति-भ्रंश आदि रोगों का शिकार बना दिया था. जीवन के अंतिम दो वर्षों में उनकी स्मृति-शक्ति लुप्त हो गयी थी. जो नाम, धाम, धर्म, वस्त्र और विचार बार-बार बदलता रहा और अपने जीवन-यात्रा में सतत परिवर्तन का पक्षधर रहा, उसने इसको भी सहज रूप से स्वीकार्य बना दिया था. आवास-प्रवास और कारावास आदि की अस्त-व्यस्तता ने उनके चिंतन और लेखन के कर्म को कभी बाधित नहीं किया था, परन्तु जीवन के अंतिम वर्षों में स्मृति ने ही उनका साथ छोड़ दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा एक गति और एक-लय में लिखा, इस महापंडित ने अपनी कलम को न तो किसी प्रकाशक के अधीन कभी गिरवी रखा और न किसी इनाम या पुरस्कार के खातिर उसको बदला. उन्होंने ता-उम्र अपनी किसी भी कृति को कहीं भी पुरस्कार के लिए भेजा तक नहीं, वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते थे. उनको जो ठीक लगा, ठीक जंचा, उसी को ठीक-ठीक लिखा. बुद्ध के सिद्धांतों को जीवन के यथार्त धरातल पर पुनः उतारने और उकेरने में वे कामयाब हुए परन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध-दर्शन के पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर शंकाओं में घिर गए और बेझिझक उन्हें नकार भी दिया.   
                उनकी जीवन यात्रा का अंतिम दशक आर्थिक चिताओं का भी दशक रहा. नयी गृहस्थी का भार, परिवार का आर्थिक भविष्य, चिकित्सा का खर्च आदि सब कुछ उन्हें आर्थिक अनिश्चिंतता के भंवर में डालने वाली एक से बुरी एक परिस्थिति थी. वे चाहते तो राजनेताओं से मदद ले सकते थे, प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्र-पति सर्व-पल्ली राधाकृषण जैसे उनके गुण-ग्राह्य दोस्त थे. वे किसी भी प्रकाशक को कहते तो उन पर अनुकम्पा कर सकता था, वे अपनी किसी भी पुस्तक को किसी पुरस्कार की प्रविष्टि में भेज कर पुरस्कार राशि भी पा सकते थे परन्तु इसे वे अपने आत्म-सम्मान की चेतना के विपरीत समझते थे और आर्थिक तंगी को पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते थे. उन्होंने अपने मित्र पंडित किशोरीलाल वाजपई को 4 नवम्बर 1961 के पत्र में लिखते है- ‘आर्थिक निश्चिन्तता का ख्याल रखना जरुरी है......रुपये के मूल्य को मैं भी समझता हूँ, किन्तु मेरी पाण्डुलिपि कहीं पुरस्कृत होने के लिए न भेजना.’ अंतिम वर्षों में विपन्नताओं और अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए सत्तर वर्ष की अवस्था में संज्ञा-शून्यता की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए रूस भी ले जाया गया पर 14 अप्रैल 1963 को वे भौतिक शारीर से विमुक्त हो गए.
                हर काल और हर युग में राहुल संकृत्यायन जैसी विभूतियों का जन्म होना दुर्लभ है. ऐसी विभूतियाँ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए ही जीती है और अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से दुनिया को विचम्भित कर उन्हें प्रकाश की वे किरणें दे जाती है, जो उनको सदा-सर्वदा प्रकाश देती रहती है. राहुल सांकृत्यायन हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को बेहद पसंद करते थे और वे स्वयं भी हिमालय की तरह प्रखर और प्रभावोत्पादक थे. वे अपना घर भी हिमालय की गोद में ही बसाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने पहले नैनीताल में और बाद में दार्जिलिंग में अपना घर बसाया- उनके शारीर का अंतिम संस्कार भी दार्जिलिंग में ही किया गया. भौतिक शारीर से इस लोक से चले जाने के बाद भी उन पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा और लिखा जाता रहेगा. डॉ. प्रभाकर माचवे ने ( राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), विष्णु चन्द्र शर्मा (राहुल सांकृत्यायन का विरल व्यक्तित्व, 1989 ), भदंत आनंद कौशल्यायन (राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), रत्नसुन्दर शाक्य ( भिक्खु-त्रयी, 1992 ), गुणाकर मुले ( महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वयंभू महापंडित, 1993, राहुल चिंतन, 1994 ) आदि ने उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है. कई संस्थानों और संस्थाओं ने उनके लेखन और चिंतन के विविध आयामों को रेखान्तित करने की कोशिश की है, परन्तु ये सब अभी भी सतत प्रक्रिया के कुछ क्षण भर है, उनकी बहुत-सी रचनाएँ और आयाम अभी भी बाहर  आने है. हम सब उसके अविरल इंतजार में है कि हमें कोई एक ओर राहुल सांकृत्यायन मिल जाय.  ..... इति-यत्नं ! भवतु सब्ब मंगलम !!

                                        ताराराम
                                           निदेशक,
                                   बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र ,                                                                               जोधपुर 
    बाबा साहेब डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म का नाम मैंने बचपन में अपने पिताजी से सुन रखा था. जब वे द्वितीय विश्व-युद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना के एक सिपाही के नाते जापान सीमा पर लड़ने गए तो वहां उनका बौद्ध धर्मानुयायी सैनिकों से परिचय हुआ और रंगून आदि कुछ जगहों के बौद्ध मठों के बारे में भी उन्हें कुछ जानकारी थी. द्वितीय विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर उनका पद-स्थापन कलकता में हो गया. जहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर और गाँधी नाम के दो शख्सियत के बारे में जानकारी मिली थी. जिसे वे यदा-कदा हम लोगों को बताया करते थे. प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी और 14 अप्रैल को वे हमारे घर में पकवान बनवाते थे और वे आजादी की लडाई और विभिन्न युद्धों में अपने खुद के अनुभव को लोगों में साझा करते थे. वे बड़े उत्साह से विभिन्न लड़ाईयों के सजीव वर्णन और उसके महत्त्व को बताते थे. हमारी स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में वे सदैव अपने शौर्य-पदकों के साथ  विशेष पोशाक धारण कर सभा में उपस्थित होते थे. पूरे गाँव में भारत के विभिन्न युद्धों में भारत की ओर से लड़ने वाले वे अकेले ही शख्स थे, जो ऐसे कार्यक्रमों में सरिक होते थे. ऐसे अवसरों पर हमको  उनसे आंबेडकर और बुद्ध का नाम तो सुनने को मिला था, परन्तु महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम नहीं सुना था. सन 1975 में उन्होंने गाँव में पहली बार डॉ. आंबेडकर जयंती मनाई और मुझे विश्व-विद्यालय में दाखिला दिलाने साथ आये, जहाँ पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध के परम अनुयायी एच. आर. जोधा से मुलाकात हुई. श्री एच. आर. जोधा के मुहं से ही मुझे पहली बार महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम सुनने को मिला. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम के साथ ही उनका साहित्य भी पहली बार पढ़ने को मिला. पिताजी ने वृहद-स्तर पर 1978-79 में गांव में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर कार्यक्रम रखा तो  कौसल्यायन जी को आमंत्रित करने के पीछे भी राहुल जी के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही था.
              अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक आंदोलनों की स्थिति से वाकिफ था और हमारे क्षेत्र में शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में किये जाने वाले छोटे-बड़े आन्दोलनों में हमारे पिताजी की भूमिका के कारण ऐसे अन्दोलनों में सक्रीय रहना एक नियति-सी बन गयी थी. जोधपुर में एच.आर. जोधा अम्बेडकरी मिशन के जुझारू और निष्ठावान कर्ता-धर्ता थे और अकसर वे हमारे छात्रावास में आते रहते थे. हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक विषय पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी. आपात-काल के इस समय में विद्यार्थी वर्ग में भी असंतोष था और विद्यार्थियों के छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहते थे. मैं अपने आपको उनसे भी अलग नहीं रख सका. एक दिन जोधा साहब ने मुझे राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक पढ़ने को दी, जिसका नाम था- “तुम्हारी क्षय”. उस पुस्तक को बिना विराम के जब तक मैंने पूरा नहीं पढ़ा, तब तक सोया नहीं. पुस्तक बड़ी सहज और सरल शब्दों में थी, साथ ही वह हमारी ज्वलन्त समस्याओं को लेकर ही थी, उस पहली पुस्तक को पढ़ने के बाद राहुल सांकृत्यायन जी के बारे में और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र हो गयी और विचार पक्का कर लिया कि उनके पूरे लेखन को पढ़ लिया जाय. उस समय जोधपुर में दो पुस्तक विक्रेता थे जो राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य रखा करते थे, जोधा साहब ने मेरा उनसे परिचय कराया और उसके बाद राहुल जी की जब भी कोई नयी कृति आती उसे खरीदकर पढ़ ही लेता. उस पुस्तक विक्रेता से स्तालिन, कार्ल मार्क्स आदि पढने के बाद मुझे उनका ग्रन्थ दर्शन-दिग्दर्शन भी पढ़ने को मिला. उसको पढ़कर लगा कि राहुल सांकृत्यायन जैसा महापुरुष, जिसने ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो मत, दुनिया को बदल डालो’ जैसी सरल कृतियों का सृजन किया है, जिसकी भाषा आम बोल-चल की भाषा है, जो सम-सामयिक विषयों पर सहज और सरल शब्दों में लिखता है, दर्शन जैसे क्लिष्ट और नीरस विषय को भी उतने ही सरल शब्दों में लोगों के लिए ज्ञेय बना सकता है. मैंने इसको एच. आर. जोधा से जानना चाहा, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इनका लेखक एक ही है- महओंडित राहुल सांकृत्यायन! फिर तो उनका विविध-रूपा साहित्य पढ़ने के बाद वे मेरे जीवन के वे एक आदर्श पुरुष बन गए. उनके अधिकांश साहित्य को मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया. मेरे जीवन में राहुल जी के साहित्य ने बौद्ध धर्म को गंभीरता से समझने और आत्मसात करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर मेरे को वह साहित्य पढ़ने को नहीं मिलता तो कदाचित मैं बौद्ध धर्म को ठीक ढंग से नहीं समझ पाता और साथ ही उस समय जो विद्यार्थी-असंतोष की ज्वाला थी, उसमें कहीं बह गया होता परन्तु राहुल जी की जब “भागो मत, दुनिया बदल डालो” रचना पढ़ी तो नजरिया ही बदल गया. अगर राहुल जी नहीं मिलते तो यह समझ भी मुझ में नहीं होती, ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बौद्धिक विरासत और साहित्यिक सम्पदा हमारे लिए बड़े गौरव की अमूल्य निधि है. अस्तांचल की दहलीज पर जाती हुई 19वीं शताब्दी में उनका जन्म हुआ, उन्होंने 20वीं शती की भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगा और 22वीं शती की परिकल्पना कर उसने अपने को युग-दृष्टा होने की बात प्रमाणित कर दी.                                       विश्व-विद्यालय के स्नातक कोर्स में मैंने मनोविज्ञान, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र जैसे दुरूह विषयों को लेकर पढाई शुरू की तो दर्शन की दुरूह गलियों में भारतीय दर्शनों को और बौद्ध-दर्शन के अंतर्भूत सिद्धांतों को समझने में राहुल सांकृत्यायन जी की अनुपम कृतियों ने सदैव मेरा मार्ग-दर्शन किया. हर एक विषय को समझाने की उनकी शैली बेजोड़ है. एक लुप्तप्रायः धर्म को साहित्य के प्राण-पयोधर से सिंचित कर उन्होंने उस बगीचे को हरा-भरा कर दिया. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के स्वयंभू धनी थे. वे स्वयंभू महापंडित थे- अद्भुत, आश्चर्य-चकित करने वाला व्यक्तित्व !
               भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य के पुनरुत्थान में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का अतुलनीय योगदान है. बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व के धनि तथा बौद्ध-वाड्मय के पुरस्कर्ता को आधुनिक भारतीय संस्कृति का निर्माता कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के वे शिखर-पुरुष है. पराधीन भारत में 9 अप्रैल 1893 को उत्तर-प्रदेश के एक छोटे से गाँव पन्दाहा के सनातनी सरयूपारीण ब्राहमण के घर में उनका जन्म हुआ. बचपन में केदार पाण्डेय के नाम से जाना जाने वाला यह बालक घर-बार छोड़कर भाग जाता है और कलकता की मिलो में मजदूरी करने लग जाता है. वहां भी उसे स्थिरता कहाँ, वह इधर से उधर, एक से दूसरी टोह लेते हुए यायावरी का जीवन जीता है. घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता भागने वाला यही बालक बड़ा होकर दुनिया को कहता है कि भागो मत, दुनिया को बदल डालो ! कोई सपने में भी यह नहीं सोच सकता कि भागने वाला यह बालक, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पायी, एक दिन विश्व की 36 भाषाओँ में पारंगत हो जायेगा और एक दिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का व्यक्तित्व बनेगा. उसका बहु-आयामी लेखन पर आधिपत्य होगा, त्रिपिटकाचार्य, साहित्यवाचस्पति, पद्म-भूषण आदि उपाधियों के साथ देश-विदेश में विख्यात होगा और जब 33 साल बाद अपने जन्म-स्थान के घर लौटेगा तो महापंडित से विभूषित होकर अपने पूरे आभा-मंडल के साथ, सबके आदर्श का पात्र होगा.   
         आश्चर्य-चकित करने वाले उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बहु-आयामी विकास के बारे में उनके एक अनन्य मित्र डॉ काशीप्रसाद जायसवाल ने बिलकुल ठीक ही लिखा है- ‘उस समय मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा, जिसे मैं आज जानता हूँ- एक ऐसा आदमी जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्व-व्यापी है, जो पूर्ण रूप से स्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे आप से आप दौड़ पड़ते है, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा, जैसे वह गौतम और ईसा मसीह के पीछे चलता था’. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल के ये उद्गार उस विराट व्यक्तित्व की झलक-भर है. निःसंदेह राहुल संकृत्यायन  भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना है. डॉ. आंबेडकर, महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन जैसे शलाका-पुरुष बीसवीं शताब्दी में विद्यमान थे, अगली शताब्दियों में लोग इस पर आश्चर्य करेंगें. भारतीय संस्कृति के क्षितिज पर आविर्भूत ऐसी विलक्षण विभूति अपनी अगाध विद्वता, अद्भुत मेधा, जाबांज यायावरी, बहु-आयामी कृतित्व आदि गुणों के वैशिष्ट्य से सदियों तक अद्वितीय बनी रहेगी.
               आज महापंडित राहुल सांकृत्यायन का विराट व्यक्तित्व अगाध पांडित्य, ज्ञानाकुल यायावरी और विलक्षण साधना का एक उज्जवल प्रतिमान बन गया है. सांस्कृतिक ध्वज-वाहक तथा मानव-स्वातन्त्र्य के पक्षधर राहुल सांकृत्यायन के जीवन की यात्रा ऋग्वैदिक ‘दिवोदास’ से प्रारंभ होकर प्रज्ञा के पुंज अमिताभ बुद्ध की रश्मि-रंजित भूमि से अंकुरित होकर तथागत बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ के आलोक में बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय के रूप में विकसित हुई दिखती है. अपनी जीवन-यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक, एक मतवाद से दूसरे मतवाद तक, एक भूखंड से दूसरे भूखंड तक, एक भाषा से दूसरी भाषा तक, एक विधा से दूसरी विधा तक दुःख से मनुष्य जाति की मुक्ति के लिए निरंतर संघर्ष तथा ज्ञान की खोज के लिए सतत गतिशील बने रहने वाले महामानव राहुल का स्वयंभूत्व अपने आप में अद्वितीय था. वे सदैव ज्ञान-पिपासु बने रहे. वे अतृप्त हो इधर से उधर घुमक्कड़ी करते रहे. वस्तुतः उनके समस्त चिंतन और लेखन के मूल में जिज्ञासात्मक और प्राणहारक यायावरी केन्द्रित थी, जिसने उन्हें केदार पाण्डेय से रामोदर दास और रामोदर दास से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा दी. उनका सम्पूर्ण जीवन चरैवेति-चरैवेति तथा अत्त दीपो भव का सर्वोत्कृष्ट उदहारण बन गया है.
                वे कहीं रुके नहीं, निरंतर प्रवाहवान ही बने रहे. चाहे वह विचार का प्रवाह हो या आचार का- उनके जीवन के सातत्य को खंडित नहीं कर पाया. दर-दर भटकते हुए वे ऐसे आलोक की खोज में लगे रहे, जिससे मानव के दुखों की मुक्ति सुनिश्चित की जा सके. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को रूपांकित करते हुए रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि राहुल का ध्यान एक ऐसी आत्मा का ध्यान है, जो युग-युगांतर से अन्धकार के बीच आलोक खोजती आ रही है, एक के बाद दूसरी प्राप्तियां उनके पक्ष में आती रही है, किन्तु वे उन्हें पीछे छोड़कर ‘नेति-नेति’ कहते हुए आगे बढ़ जाती है, मानो जो सिद्धि मिली है, वह उसे तृप्ति नहीं दे सकती, मानो जो कुछ वह खोज रही है, वह और अभी आगे है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन उस विराट सांस्कृतिक क्षितिज का नाम है, जिसे समझना जितना आसन है, उसे मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है.
                उनके बहु-मुखी व्यक्तित्व का अनुशीलन विभिन्न अध्येताओं ने वैष्णव साधु, आर्य-समाजी प्रचारक, बौद्ध संस्कृति के उपासक तथा प्रखर चिन्तक आदि के रूप में किया है. वस्तुतः, उनकी नेति-नेति की वृति ने उन्हें वैष्णव, वेदांती, तंत्र-साधक, आर्य-समाजी, गाँधीवादी, कांग्रेसी, समाजवादी-साम्यवादी, आदि भूमिकाओं के बीचो-बीच मानववाद की मंजिल तक पहुँचाया. उनमें एक साथ बहु-मुखी भाषा-विद, महान यायावर, प्रकांड दर्शन-शास्त्री इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता-सेनानी, साम्यवादी चिन्तक, साहित्य-दृष्टा आदि रूपों के समेकित दर्शन होते है. उनका व्यक्तित्व अनेकों में एक था. राहुल सांकृत्यायन जी ने अतीत के खंडहरों में झांककर वर्त्तमान को पाया एवं भविष्य की रुपरेखा तैयार की थी. उनकी जीवन-यात्रा आज की पीढ़ी को एक मिथकीय पात्र की तरह लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. राहुल जी  का दाम्पत्य जीवन भी उतार-चढाव वाला ही रहा. उनकी पहली शादी 1904 में, जब वे 11 वर्ष की बहुत छोटी उम्र के थे, तब रामदुलारी नामक बालिका से हुई. उनके लिए यह एक तमाशा था. समाज के प्रति विद्रोह के बीज पैदा करने में इसने ही पहला काम किया, इस पत्नी को उन्होंने कभी भी दाम्पत्य-भाव से नहीं देखा. उनकी दूसरी शादी लेनिनग्राद में मंगोल विदुषी लोला से 1937 में हुई, जिनसे उन्हें 1938 में ईगोर नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. उनकी तीसरी शादी अधिक उम्र ( 57 ) में नेपाली तरुणी कमला से सन 1950 में हुई. उनसे एक पुत्री जया (1953 ) व एक पुत्र जेता ( 1955 ) का जन्म हुआ. उनके दाम्पत्य जीवन में भावुकता की जगह स्थितियां ज्यादा प्रबल नजर आती है.
                अपनी प्रयोजनमूलक गत्यात्मक जीवन-शैली के कारण  उन्होंने कई बार धर्म बदला, देश बदला, भोजन, वस्त्र और विचार बदले कि इन विविध स्वरूपों से अलग कर के उनको किसी एक स्वरूप में न तो देखा जा सकता है और न ही मूल्यांकित किया जा सकता है. उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा के वैचारिक परिवर्तन के मूल में यथा-निर्दिष्ट बौद्ध सूत्र को अंगीकृत कर लिया था, जब वे कहते है- ‘बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया है, न कि सर पर उठाये फिरने के लिए’ तो उनका वह हर एक परिवर्तन और स्वरूप हमें समझ में आ जाता है. उसमें राहुल सांकृत्यायन बादलों से घिरे आकाश में जैसे चंद्रमा शोभायमान होता है, वैसे ही वे साहित्य-इतिहास के गगन में दैदीप्यमान हो उठते है. सन 1910 में घर छोड़ा और 1916 में उनका बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. फलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओँ को सीख कर उसमें महारथ हासिल की. विश्व-जनिन उथल-पुथल में वे 1917 की रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित हुए. वे भारत में उस विचारधारा के अग्रणी लोगों में गिने जाने लगे और धरातल पर किसानों के आन्दोलनों की अगुवायी भी की. यायावर राहुल एक जगह कहाँ टिकने वाले थे, 1923 से उनका विदेशी यात्राओं का दौर शुरू हुआ, जो मृत्यु-पर्यंत बना रहा. श्रीलंका में जाकर 1930 में उन्होंने बौद्ध-भिक्षु की दीक्षा लेकर चीवर धारण कर लिया, 1937 में लेनिनग्राद जा पहुंचे और चीवर को छोड़ गृहस्थी बसा ली. बिहार के किसान आन्दोलन में प्रमुख भूमिका की वजह से उन्हें एक साल जेल जाना पड़ा. भारत छोडो आन्दोलन में हुंकार का संपादन किया. वे शीर्ष कम्युनिस्ट, शीर्ष कांग्रेसी, शीर्ष समाजवादी सब कुछ रहे. ऐसे कई अनेकानेक रूप किसी अन्य महामानव के देखने और सुनने को नहीं मिलते है. वे विरलों में से विरले पुरुष थे.                   
                एक डाल से दूसरे डाल और एक पात से दूसरे पात अवतिष्ठ होते हुए भी राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट आस्था कभी भी नहीं टूटी. उन्होंने अपना सर्वस्व हिंदी को दिया. जो कुछ हिंदी को दिया. आज वह अपौरुषेय अवदान जैसा लगता है और हिंदी भाषा-साहित्य जगत में वे हिंदी के जनक के रूप में प्रस्थापित हुए. राहुल सांकृत्यायन, इतिहास का एक ऐसा महान व्यक्तित्व, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई, फिर भी मेधा के उच्चतम शिखर पर अवस्थित हुआ. वह न केवल लब्द्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में पहचाना गया, बल्कि इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता एवं बौद्ध दार्शनिक के रूप में भी एक अद्वितीय हस्ताक्षर प्रमाणित और प्रस्थापित हुए, जिसकी अनुगूँज इस देश में और इस देश के बाहर भी सदियों तक सुनाई देती रहेगी. उनके चिंतन में, जहाँ एक ओर बुद्ध की करुणा और प्रज्ञा है, वहीँ साम्यवादी विचारों के आदर्श की सरिणी भी समाहित है. उनकी भाषा यथार्तपरक व्यवहारिक एवं व्यवसाय-कुशलता के साथ ही सरल और सहज गति में अभिव्यक्त हुई है. उनकी रचनायें हर किसी का मन-मष्तिष्क एवं हृद्य का आलोडन-विलोडन किये बिना नहीं रह सकती है. यही उनकी जीवन्तता है. जिस संवेदनशीलता, सहजता, प्रवाह और साक्षी-भाव से उन्होंने अपनी रचनाओं में शब्दों का संयोजन किया है, वह पाठक को झकझोरे बिना रह ही नहीं सकती है और पाठक उनका कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. वस्तुतः उनकी रचनाएँ चिंतन की विविध धाराओं का बखूबी प्रतिनिधित्व कराती है.          
                हिंदी भाषा के जनक माने जाने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य को विपुल भण्डार से परिपूरित किया है. उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के अलोक में उनकी ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खोज, हिंदी प्रदेश की प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओँ-उपभाषाओं का अध्ययन-अनुशीलन, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में धर्म-दर्शन और राजनीति की व्याख्या, बौद्धों की प्रतीत्यसमुत्पादवादी दृष्टि के प्रति सहज आग्रह-शीलता, साम्यवादी चिंतन, राष्ट्रिय आन्दोलनों में सहभागिता आदि में सामान प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए, प्रवास, कारावास और पारिवारिक अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए इस देश और विश्व-जनिन संस्कृति को बहुत कुछ दिया. उनकी 150 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी और बहुत सारा संग्रह अप्रकाशित भी पड़ा है. हिंदी में  विभिन्न विधाओं में उनकी कालजयी कृतियाँ अनुपम है, जिसको बार-बार पढ़ने का मन करता है और हर बार उसमें  नए-नए माणिक्य हस्तगत हुए बिना नहीं रह सकते है. उनके साहित्य सृजन की झलक कहानियों के रूप में- सतमी के बच्चे; वोल्गा से गंगा; बहुरंगी आदि, उपन्यास में- बाईंसवीं सदी; सिंह-सेनापति; जय यौधेय; विस्मृत यात्री; दिवोदास आदि, निबंधों में- साहित्य रत्नावलि; पुरातत्व निबंधावलि; आज की समस्याएं; तुम्हारी क्षय आदि, जीवनी लेखन में- सरदार पृथ्वी सिंह; वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली; नए भारत के नए नेता; स्तालिन; कार्ल मार्क्स; माओ-त्से-तुंग; मेरे असहयोग के साथी आदि, यात्रा वृतांत में तिब्बत में सवा वर्ष; मेरी लद्दाख यात्रा; किन्नर देश; रूस में पच्चीस मास; चीन में क्या देखा; एशिया के दुर्गम भूखंडों में आदि, आत्म-कथा में मेरी जीवन-यात्रा ( 1 से 5 खंड ) तथा लंका, जापान, ईरान, मदुर स्वपन, जीने के लिए, कनैला की कथा, कप्तान लाल, सिंहल के वीर पुरुस, जिनका मैं कृतज्ञ हूँ आदि अद्भुत और अविस्मरणीय है. 
                बौद्ध धर्म और दर्शन पर सुत-पिटक के मज्झिम निकाय, दीघ-निकाय, संयुत-निकाय आदि व विनय-पिटक का अनुवाद, बौद्ध संस्कृति, महा-मानव बुद्ध, बुद्ध-चर्या आदि विलक्षण अवदान है, जिससे हिंदी जगत बुद्ध और बौद्ध धर्म को समझ पाया. बौद्ध-संस्कृति के सन्दर्भ में श्रीलंका, तिब्बत और नेपाल उनके विशेष आकर्षण के केंद्र थे. तिब्बत की उनकी लोमहर्षक यात्राएँ ( सन 1929-30,1934,1936एवं 1938 )सर्वाधिक दुस्साहसपूर्ण,महानियौर सार्थक प्रमाणित हुई और भारत से विलुप्त प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अवशेषों को तिब्बत से प्राप्त कर भारत वासियों को ही नहीं बल्कि समस्त विश्व को अवगत कराया. जिस प्रकार ह्वेनसांग भारतीय ज्ञान-सम्पदा को चीन ले गया था, उसी प्रकार राहुल संकृत्यायन विलुप्त भारतीय ज्ञान-सम्पदा को भारत लौटा लाये. वे बीसवीं सदी के ह्वेनसांग है, एसा कहे तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी. उनकी काल-जयी कृतियों में दर्शन-दिग्दर्शन, ऋग्वैदिक आर्य, मध्य-एशिया का इतिहास ( दो खंड ), अकबर, मानव-समाज, दोहा-कोष आदि कई रचनाएँ शुमार है. उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और विवरण भी लिखे. वे अपनी पुस्तकों का प्रूफ स्वयं देखना पसंद करते थे, लॉ जर्नल प्रेस, नॅशनल हेराल्ड प्रेस, सम्मलेन मुद्रणालय, मोहन प्रेस आदि से उनकी रचनाये निरंतर चापती रही. उनके द्वारा प्रणीत विभिन्न भाषाओँ के व्याकरण और शब्द-कोष अतुलनीय है, जो आज भी प्रकाश-स्तम्भ की तरह अध्येताओं का मार्ग-दर्शन करते है. इसके साथ ही संस्मरण, डायरी, पत्र आदि जो सर्जन है, वह हमें उनके यायावरी, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन-पक्षों का विश्व-व्यापी मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक नजरिया प्रदान करता है और उनके अथाह विराट व्यक्तित्व का अहसास कराता है. इस विराट व्यक्तित्व के साक्षात्कार के बाद विख्यात प्राच्य-विद सिलवां लेवी ने उन में अमिताभ बुद्ध का साक्षात्कार किया था.
                राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा का पूर्वार्द्ध जितनी मस्ती में बीता, भौतिक दृष्टि से उनके जीवन का उत्तरार्द्ध उतना ही कष्टमय बीता. अत्यधिक परिश्रम और व्यैक्तिक चिंताओं ने उन्हें मधुमेह, हृदयरोग, उच्च-रक्तचाप और स्मृति-भ्रंश आदि रोगों का शिकार बना दिया था. जीवन के अंतिम दो वर्षों में उनकी स्मृति-शक्ति लुप्त हो गयी थी. जो नाम, धाम, धर्म, वस्त्र और विचार बार-बार बदलता रहा और अपने जीवन-यात्रा में सतत परिवर्तन का पक्षधर रहा, उसने इसको भी सहज रूप से स्वीकार्य बना दिया था. आवास-प्रवास और कारावास आदि की अस्त-व्यस्तता ने उनके चिंतन और लेखन के कर्म को कभी बाधित नहीं किया था, परन्तु जीवन के अंतिम वर्षों में स्मृति ने ही उनका साथ छोड़ दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा एक गति और एक-लय में लिखा, इस महापंडित ने अपनी कलम को न तो किसी प्रकाशक के अधीन कभी गिरवी रखा और न किसी इनाम या पुरस्कार के खातिर उसको बदला. उन्होंने ता-उम्र अपनी किसी भी कृति को कहीं भी पुरस्कार के लिए भेजा तक नहीं, वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते थे. उनको जो ठीक लगा, ठीक जंचा, उसी को ठीक-ठीक लिखा. बुद्ध के सिद्धांतों को जीवन के यथार्त धरातल पर पुनः उतारने और उकेरने में वे कामयाब हुए परन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध-दर्शन के पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर शंकाओं में घिर गए और बेझिझक उन्हें नकार भी दिया.   
                उनकी जीवन यात्रा का अंतिम दशक आर्थिक चिताओं का भी दशक रहा. नयी गृहस्थी का भार, परिवार का आर्थिक भविष्य, चिकित्सा का खर्च आदि सब कुछ उन्हें आर्थिक अनिश्चिंतता के भंवर में डालने वाली एक से बुरी एक परिस्थिति थी. वे चाहते तो राजनेताओं से मदद ले सकते थे, प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्र-पति सर्व-पल्ली राधाकृषण जैसे उनके गुण-ग्राह्य दोस्त थे. वे किसी भी प्रकाशक को कहते तो उन पर अनुकम्पा कर सकता था, वे अपनी किसी भी पुस्तक को किसी पुरस्कार की प्रविष्टि में भेज कर पुरस्कार राशि भी पा सकते थे परन्तु इसे वे अपने आत्म-सम्मान की चेतना के विपरीत समझते थे और आर्थिक तंगी को पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते थे. उन्होंने अपने मित्र पंडित किशोरीलाल वाजपई को 4 नवम्बर 1961 के पत्र में लिखते है- ‘आर्थिक निश्चिन्तता का ख्याल रखना जरुरी है......रुपये के मूल्य को मैं भी समझता हूँ, किन्तु मेरी पाण्डुलिपि कहीं पुरस्कृत होने के लिए न भेजना.’ अंतिम वर्षों में विपन्नताओं और अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए सत्तर वर्ष की अवस्था में संज्ञा-शून्यता की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए रूस भी ले जाया गया पर 14 अप्रैल 1963 को वे भौतिक शारीर से विमुक्त हो गए.
                हर काल और हर युग में राहुल संकृत्यायन जैसी विभूतियों का जन्म होना दुर्लभ है. ऐसी विभूतियाँ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए ही जीती है और अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से दुनिया को विचम्भित कर उन्हें प्रकाश की वे किरणें दे जाती है, जो उनको सदा-सर्वदा प्रकाश देती रहती है. राहुल सांकृत्यायन हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को बेहद पसंद करते थे और वे स्वयं भी हिमालय की तरह प्रखर और प्रभावोत्पादक थे. वे अपना घर भी हिमालय की गोद में ही बसाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने पहले नैनीताल में और बाद में दार्जिलिंग में अपना घर बसाया- उनके शारीर का अंतिम संस्कार भी दार्जिलिंग में ही किया गया. भौतिक शारीर से इस लोक से चले जाने के बाद भी उन पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा और लिखा जाता रहेगा. डॉ. प्रभाकर माचवे ने ( राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), विष्णु चन्द्र शर्मा (राहुल सांकृत्यायन का विरल व्यक्तित्व, 1989 ), भदंत आनंद कौशल्यायन (राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), रत्नसुन्दर शाक्य ( भिक्खु-त्रयी, 1992 ), गुणाकर मुले ( महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वयंभू महापंडित, 1993, राहुल चिंतन, 1994 ) आदि ने उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है. कई संस्थानों और संस्थाओं ने उनके लेखन और चिंतन के विविध आयामों को रेखान्तित करने की कोशिश की है, परन्तु ये सब अभी भी सतत प्रक्रिया के कुछ क्षण भर है, उनकी बहुत-सी रचनाएँ और आयाम अभी भी बाहर  आने है. हम सब उसके अविरल इंतजार में है कि हमें कोई एक ओर राहुल सांकृत्यायन मिल जाय.  ..... इति-यत्नं ! भवतु सब्ब मंगलम !!




बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और सामाजिक-आर्थिक न्याय की संवैधानिक बुनियाद
ताराराम
बौद्ध अध्यन और अनुसन्धान केंद्र,
23/946, चौपासनी हाऊसिंग बोर्ड,
जोधपुर
डॉ अम्बेडकर भारतीय इतिहास-गगन में ऐसे देदीप्यमान प्रकाश पुंज है, जिसकी रोशनी से यह सारा जगत प्रकाशवान हो उठा है! भारत की धरती पर एक साधारण मनुष्य के रूप में जन्म लेकर उन्होने प्रज्ञा के उच्च से उच्चतम सोपान को अपने उद्योग, लगन और मेहनत से प्राप्त किया। नए भारत के निर्माण में संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका निःसंदेह निर्णयकारी थी, अस्तु, उन्हें संविधान का जनक, संविधान का निर्माता, मुख्य शिल्पकार और आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। संविधान निर्माण में उनकी विलक्षण बुद्धि का ही यह परिणाम है कि हमारा संविधान आज भी निर्बाध रूप से गतिशील और जीवंत बना हुआ है।
वे भारत के नए समाज को एक सुसभ्य, समतावादी, कुलीन और प्रगतिशील बनाना चाहते थे, इसलिए आदर्श के रूप में उन्होने हमारे सामने समता, स्वतंत्रता और भाईचारे के महान स्तंभ सुस्थापित किये। राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को याद करते हुए कृतज्ञ राष्ट्र ने 1990 को 'सामाजिक न्याय' को समर्पित करते हुए उनकी जन्म शताब्दि को धूम धाम से मनाया। डॉ अम्बेडकर के सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण को समझने के लिए हमें डॉ अम्बेडकर को शुरू से गंभीरता से समझने की आवश्यकता है। डॉ. अम्बेडकर का जीवन संघर्ष ही उनकी चिंतन की धुरी है। उनके विचार दर्शन का विकास, उनकी संवैधानिक सोच और सामाजिक न्याय का स्वरूप सब कुछ उनके जीवन संघर्ष की महानता है। यह सभी जानते है कि डॉ अम्बेडकर समाज के सबसे निचले पाँयदान से उठ कर महान् बने। वे साधारण से साधारण पुरुष भलेई रहे हो, परंतु उनका हृदय असीम था। मानवता के प्रति उनकी लगन, निष्ठा और ईमानदारी का उनके बराबर आज तक कोई पैदा नहीं हुआ है। जिसने दिन-रात विविध तरह से अथक मेहनत कर दलित, पिछड़े, हाशिये पर पड़े लोगों को, महिलाओं और श्रमिकों को बदहाली से निकाल कर एक खुशहाल और सभ्य जीवन जीने की राह दी। उसने पूरे विश्व इतिहास के चिंतन को नयी दिशा दी, इसलिए विश्व के निर्माताओं में उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है। इस महान् शख्सियत का जन्म 14 अप्रैल 1891 को हिन्दू धर्म की तथाकथित अछूत कही जाने वाली महार जाति में सूबेदार रामजी सकपाल के घर हुआ, जो 15वीं शताब्दी के संत कबीर की गुण-ग्राह्यता और आध्यात्म से परिपूर्ण था। इस होनहार व्यक्तित्व की शिक्षा-दीक्षा न केवल भारत में, बल्कि विश्व के तीन महाद्वीपों के उच्च शिक्षण संस्थानों में हुई। एलफिंस्टन कॉलेज बॉम्बे से स्नातक भीमराव अम्बेडकर बड़ोदा नरेश गायकवाड़ की मदद से अमेरिका में पढ़ने गए और कोलंबिया विश्वविद्यालय से अधिस्नातक और डॉक्टरेट की उपाधी अर्जित की। यूरोप के ख्यातनाम लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस और ग्रे'ज इन् से एम्.एससी. और डी. एससी. की डिग्रियां प्राप्त कर बार एट लॉ, बैरिस्टर कहलाये। वे कुछ समय के लिए बॉन विश्वविद्यालय के भी विद्यार्थी रहे। भारत में वापस आकर बड़ोदा रियासत की उच्च सेवा पायी, पर जात्यभिमानि लोगों के कारण उसे छोड़ना पड़ा। वे कुछ समय के लिए बॉम्बे कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे, वे गवर्नमेंट कॉलेज बॉम्बे में कानून के प्रोफेसर रहे, वे लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल भी रहे, ये सब भी उन्हें परिस्थितिवश छोड़ने पड़े। वे बॉम्बे बार के सिद्ध हस्त एडवोकेट भी रहे।
उन्होनें मूक नायक, बहिस्कृत भारत और प्रबुद्ध भारत जैसे अखबार निकाले। इन सब में उनका व्यक्तित्व और चिंतन कराह रही पीड़ित मानवता और पद-दलित जनता के उद्धार के लिए गतिशील रहा। वे गतिशील व्यक्तित्व के महानायक बने और सामाजिक और राजनीतिक जीवन में एक धुरंधर नेता और प्रबुद्ध समाज सुधारक के रूप में ख्यातनाम हुए। वस्तुतः डॉ अम्बेडकर बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। एक दार्शनिक, राजनैतिक प्रचेता, राजनीतिज्ञ, संविधान विशेषज्ञ, धर्मवेत्ता, नीतिज्ञ, लेखक, चिंतक, दूरदर्शी, मानवतावादी, नीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, करुणा की महामूर्ति... अपने आप में एक बहुत बड़ी संस्था, विशाल हृदय....! ऐसे महामानव के व्यक्तित्व और कृतित्व की थाह पाना सामान्य बुद्धि के परे है, एक सर्व-सुविधा सम्पन्न परिवार में पैदा होकर तो कोई भी उंचाईयों को पा लेता है, पा सकता है, परंतु एक निर्धन, निस्सहाय और बेबस बहिष्कृत समाज में पैदा होकर महानता को प्राप्त करने वाले अकेले डॉ अम्बेडकर ही है, यही उनकी सबसे बड़ी महानता है, यही उन्हें दुनिया के महान् लोगोँ में शुमार करती है। वे उम्र भर मजलूम, गरीब, किसान, श्रमिक, महिला, पिछडे, वंचित और अछूत कहे जाने वाले लोगों को सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और स्वातान्त्रय तथा समता और बंधुत्व पर आधारित न्याय प्राप्ति को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करते रहे और सफल हुए। यह विलक्षणता सिर्फ और सिर्फ डॉ अम्बेडकर में ही देखी जा सकती है, मार्क्स अपने जीते जी सर्वहारा के राज्य को नहीं देख पाया, गांधी अपने राम राज्य को नहीं देख पाया परंतु जो डॉ अम्बेडकर ने जो सपना देखा उसे वे अपने जीवन में फलीभूत कर पाये। यह उनकी अनन्यतम महानता है, यह इसलिए की इतिहास में उनको नेपोलियन ने प्रभावित किया, गौतम बुद्ध ने उन्हें इतिहास के सुनहरे धराताल पर खड़ा किया। ज्योति बा फुले, जॉन डीवी, एम्.जी. रानाडे, कार्ल मार्क्स, एम्.के. गांधी आदि ने उनके संघर्ष को दिशा और ऊर्जा दी। प्रज्ञा की हर पंखुड़ी को उन्होने परिणाम तक पहुंचाया। विभिन्न व्यक्तियों और विचारों के प्रभाव और परिणाम में रहते हुए भी उन्होंने परिस्थितियों को अपने अधीन कर मानव मेधा के उच्चतम शिखर पर अपने को अवस्थित किया और हम सबको वह मार्ग दिखाया।
उनकी सोच और चिंतन बेजोड़ है- मनुष्य चिंतन करता है, यह एक जैविक तथ्य है, परन्तु वह क्या चिंतन करता है, यह सामाजिक तथ्य है! हमारा सीखना, सोचना, आग्रह-पूर्वाग्रह.. आदि सभी ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से अनुबंधित होते है, उन को अनानुबंधित किये वगैर हम विचार का विकास नहीं कर सकते है और विचार के विकास के बिना मानव जाति का विकास नहीं हो सकता है। इसलिए उन्होने हमेशा एक मानव संस्कृति के निर्माण में विचार के विकास पर, विवेक के परिस्फुटन और परिसकरण पर जोर दिया और इसकी राह में जो भी आया, उस की परवाह नहीं की और वे निरंतर उद्यमशील होकर अपने पथ पर चलते रहे-- एक मानव संस्कृति के निर्माण में वे आज तक के शिखर पुरुष है। यही उनकी प्रासंगिकता है। लोकशाही या प्रजातंत्र के वे मुखर नायक थे, महानायक थे, जिसे भारत के संविधान में भली-भांति रेखांकित किया। राजनैतिक सत्ता कभी स्थायी नहीं रहती है, लेकिन समाज हमेंशा बना रहता है। इसलिए उनका जोर इस बात पर रहा कि राजनीतिक प्रजातंत्र से सामाजिक और आर्थिक प्रजातंत्र कैसे प्राप्त करे? अगर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में विषमता बनी रहती है, तो राजनीतिक प्रजातंत्र ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकता है। ऐसी उनकी चेतावनी थी। समाज के रूढ़ और पुराने कानून कायदों की जगह वे संवैधानिक मर्यादा और मूल्यों को स्थापित करना ही प्रजातंत्र के स्थायित्व की कसोटी मानते थे। इसलिए प्रमाण के रूप में उन्होंने शास्त्रों को नकारा और संविधान को प्रमाण का दस्तावेज घोषित किया। शास्त्रों की पवित्र और सनातन रूढ़ि की जगह संविधान को एक गत्यात्मक दस्तावेज के रूप में श्रेष्ठ बनाया। जिसे काल और परिस्थिति के अनुसार बदलने की गुंजाइश है, जो शास्त्रों में नहीं है।
उनका मुख्य ध्येय संविधान की नैतिकता के आधार पर एक मुक्त समाज की रचना करना रहा, न कि परंपरागत मूल्यों के आधार पर समाज को बनाये रखना। वे एक जीवंत और गतिशील समाज का निर्माण चाहते थे। इस बात को सभी स्वीकार करते है। ऐसे समाज के निर्माण में समता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय- ये मजबूत आधार-स्तम्भ घोषित किये। जिस पर सामाजिक न्याय का पूरा ताना-बाना टिका है। उनकी दृष्टि में प्रजातंत्र सामाजिक न्याय का ही एक रूप और जरिया है, क्योंकि प्रजातंत्र स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है और समानता और स्वतंत्रता में एकलयता व समतुल्यता पैदा करता है। कहीं निर्बाध स्वतंत्रता समता का गला नहीं घोट ले, इसलिए वे राजनीतिक प्रजातंत्र की तबदीली आर्थिक और सामाजिक प्रजातंत्र में किया जाना सुनिश्चित करने पर जोर देते रहे। उनका यह मनना था कि सामाजिक और आर्थिक प्रजातंत्र के बिना राजनीतिक प्रजातंत्र बेमानी है। ऐसे प्रजातंत्र का कोई मतलब नहीं है।
डॉ अम्बेडकर की दृष्टि में सामाजिक प्रजातंत्र का मतलब है कि हर एक व्यक्ति को इस योग्य बनाना कि वह अपनी भौतिक जरूरतों की पूर्ति के साथ अपने दिमाग का, मेधा का सर्वांगीण विकास कर सके। यही मनुष्य समाज का ध्येय होना चाहिये। मनुष्य की मेधा का विकास सद्धर्म पर निर्भर करता है, जो प्रज्ञा, शील, करुणा और मैत्री का मिश्रण है। सद्धर्म का सीधा सा अर्थ यही है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच जो भेदभाव है, विषमता है, उसे ख़त्म करना। व्यक्ति को गुणों से जाना जाय, न कि उसके जन्म से। सद्धर्म समता को प्रोन्नत करता है और उसके हृदय को करुणा से परिपूर्ण कर देता है, जो बंधुत्व की भावना का विस्तार करता है। इस प्रकार से डॉ अम्बेडकर की नजर में मनुष्य का जीवन समता, स्वतंत्रता और भाईचारे पर आधारित होना चाहिए और इस प्रकार से सामाजिक प्रजातंत्र पर आधारित सरकार ही सामाजिक न्याय हेतु मील का पत्थर है। उनकी यह दृष्टि संविधान निर्माण में हमेशा मार्ग दर्शक रही है। वे राजनैतिक लोकतंत्र की परिणीति आर्थिक लोकतंत्र में चाहते थे, जिसे उन्होंने संविधान सभा की मसौदा सभा का अध्यक्ष रहते हुए संविधान में लिखित स्वरूप प्रदान किया। इसलिये उनके संविधान निर्माण का कार्य अपने आप में अनूठा है। डॉ अम्बेडकर इसे प्रतिपादित करते हुए कहते है- 'पुराने समय में संविधान निर्माताओं का विश्वास। था कि संवैधानिक कानून का क्षेत्र, विषय और कृत्य समाज के राजनैतिक ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत करना है। उन्होंने कभी एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को महत्व नहीं दिया।‘ डॉ अम्बेडकर की सोच में संविधान में राजनैतिक ढांचे के साथ उसका सामाजिक और आर्थिक ढांचा भी निरूपित होना चाहिए, अस्तु, उन्होंने एक व्यक्ति एक मूल्य पर जोर देते हुए संविधान में आर्थिक ढांचे की रूपरेखा भी अंगीकार करवाई। उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक लोकतंत्र की दृष्टि को हम संविधान में उल्लेखित 'मौलिक अधिकार' और 'नीति-निर्देशक तत्वों' के ताने-बाने में देख सकते है, जो ‘सामाजिक और आर्थिक न्याय’ को सुगम बनाते है। ‘सामाजिक न्याय’ मात्र एक अवधारणा नहीं है, बल्कि समाज में उन मूल्यों और आपसी सम्बन्धों को हक़ीक़ति जामा पहनाना है, जिसे इस देश ने संविधान में अपने आदर्श समाज निर्माण के लिए ध्येय के रूप में सामने रखा है और किसी भी समाज का आदर्श हमेशा उसके वर्तमान से बेहतर ही होता है। इस पृष्ठभूमि में यह बीसवीं शताब्दी की नयी अवधारणा है, जिसके प्रचेता डॉ अम्बेडकर माने जाते है। हमारा प्रजातंत्र एक लोक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना के साथ आगे बढ़ता है, पर 'सामाजिक न्याय' लोक कल्याण की संकल्पना से भी गम्भीर और विस्तृत है,यह उससे भी आगे है। हमारे देश की अदालतों ने यदा-कदा सामाजिक न्याय को परिभाषित करने का प्रयत्न किया है, परंतु यह एक ऐसी अवधारणा है कि उसे किन्ही निश्चित शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है, इसे व्यवहार की संक्रिया में ही देखा और परखा जा सकता है। न्यायमूर्ति एन. एच. भगवति 'मुइर मिल्स क. बनाम सूती मिल्स मजदूर यूनियन' के वाद में इसे संज्ञान में लेते हुए इसे परिभाषित करना दुरूह मानते है। 'प्रकाश कॉटन मिल्स बनाम बॉम्बे' के वाद में न्यायमूर्ति सी.जे. छागला भी इसे शब्दों में अभिव्यक्त करना कठिन मानते हुए यह उद्घोषित करते है कि न्यायालयों की वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या में कितनी ही व्यक्तिगत अवधारणा हो, परन्तु सामाजिक न्याय हमारे संविधान का ध्येय है। यह एक ऐसा बड़ा अस्फुट या अस्पष्ट दायरा है, जो प्रत्येक न्यायालय और न्यायधीश के व्यक्तिगत नजरिये पर निर्भर है, उसका जीवन और समाज के प्रति सोचने का कैसा दृष्टिकोण है, उसी व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर निर्भर है और ध्यान देने वाली बात यह है कि कोई भी कानून समाज के सन्दर्भ के बिना व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। अस्तु सामाजिक न्याय की अवधारणा और व्याख्या भी उसी सन्दर्भ में हो सकती है।
विभिन्न प्रसंगों में सामाजिक न्याय के बारे में बहुत कुछ कहा और सुना जाता है और विभिन्न लोग इसका प्रयोग विभिन्न अर्थों में करते है। कुछ इसे अवसर की समानता के अर्थ में विवेचित करते है, तो कुछ सम्पदा के वितरण या पुनर्वितरण के अर्थ में। ये सभी भ्रामक कसौटियाँ है, क्योकि सभी मनुष्यों में समान क्षमताएँ नहीं होती है, इसलिये मनुष्यों में अवसर सदैव समान नहीं होते है। डॉ अम्बेडकर का मानना था कि मनुष्य समाज में 'योग्यतम की विजय' का सिद्धांत कारगर नहीं बनाया जा सकता है। समाज में निर्बल, बुड्ढे, रोगी, निर्धन, वंचित, असहाय, आदि कई तरह के सदस्य होते है, उन सबके सह-अस्तित्व के लिए न्याय किंवा सामाजिक न्याय का सिद्धांत ही कारगर हो सकता है। यह सिद्धांत कल्याण की भावना पर आधारित है, परंतु कल्याण से अधिक है। वह इसलिए कि इस में न केवल उपकार की भावना है, बल्कि दायित्व बोध इसका महत्वपूर्ण केंद्र है। समाज में इसे सम्भव बनाने के लिए न्याय का वितरण, प्रतिपूरक न्याय आदि कई संकल्पनाओं का विकास हुआ पर वे सभी समता, स्वतन्त्रता और भाईचारे की परिधि में है।
सामाजिक न्याय इस समता, स्वतन्त्रता और भाईचारे को चुनौति देते हुए कानून को सामाजिक परिवर्तन का एक जरिया बना देता है और अधिवक्ता और न्यायधीश को सामाजिक परिवर्तन का इंजीनियर। सामाजिक न्याय के प्रतिपादित में यह सन्निहित है कि कानून और सामाजिक उद्देश्यों में परस्पर क्रिया हो। मानव का जो अविनाशी या जीवंत स्वतंत्रता का सिद्धांत है, उसकी हमारे समय की हालातों और जीवन की बाध्यताओं आदि से परस्पर क्रिया हो। इस अर्थ में यह न्याय के मूलभूत सिद्धान्तों का अनुप्रयोग है। हमारे विषमतावादी, जटिल औद्योगिक और वाणिज्यिक जीवन की परिस्थितियां में यह अपरिहार्य है। यह हमारे भावी समाज के निर्माण के लिए आवश्यक है। जिसकी उद्घोषणा हमारे संविधान की प्रस्तावना में की गयी है। यह हमारे भावी समाज निर्माण की संकल्पना को प्रस्तुत करता है, जिसकी उपलब्धि सामाजिक न्याय के जरिये ही सम्भव है। हमारे संविधान निर्माताओं ने शुद्ध अंतःकरण से संविधान की प्रस्तावना में भावी समाज का खाका रूपांकित किया। जिसको असली जामा पहनाने के लिए जो-जो प्रावधान संविधान में किये गए, उनमें मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व सामाजिक न्याय की सुनिश्चितता को परिभाषित करते है, उन पर अमल कर हम एक समतावादी मुक्त समाज का निर्माण कर सकते है। ये सिद्धांत सामाजिक न्याय के साधन और साध्य है। संविधान की इस संकल्पना में सामाजिक न्याय पर त्रिस्तरीय विचार किया गया है। न्याय- सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक, जिसका हमारे संविधान की प्रस्तावना में उल्लेख है।
सामाजिक और आर्थिक न्याय को नीति-निर्देशक तत्वों के द्वारा प्राप्त किये जाने और सामाजिक और राजनैतिक न्याय को मूल अधिकारों के द्वारा सुरक्षित किया गया है।संविधान की प्रस्तावना में समेकित न्याय का मर्म या सार-तत्व इस बात में सन्निहित है कि हमें सामाजिक और आर्थिक दमन से, शोषण से, गैर-बराबरी से, जाति-भेद से मुक्ति मिले और प्रत्येक व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो, इस संकल्पना को यथार्थ में तब्दील करना ही सामाजिक न्याय का अभिप्रेत है। इनके बिना अर्थात सामाजिक न्याय के बिना न्याय अर्थहीन है। सामाजिक न्याय अमीर लोगोँ को ही न्याय नहीं मुहैया कराता, बल्कि उन लोगों की भी परवाह करता है, जो वंचित है, पिछड़े है, गरीब है, जिनके पास कुछ नहीं है- पद, प्रतिष्ठा, श्रेष्ठता आदि, जो लोग हाशिये पर खड़े है, उन सब को न्याय मुहैया करता है। इस अर्थ में मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निर्देशक तत्व को उद्देश्यपूर्ण और परिणामोन्मुखी बनाना सामाजिक न्याय का अनिवार्य लक्षण बन जाता है। इसके बिना न्याय अर्थहीन और परिणामापेक्षि नहीं रह जाता है।
इन अर्थों में सामाजिक न्याय एक विशद और विस्तृत कलेवर का अनुप्रयोग बन कर व्यवहार का अंग बन जाता है। स्पष्टतः इस में सामाजिक न्याय कुछ भाग्यशाली लोगों तक ही सीमित नहीं होता बल्कि बड़े पैमाने पर वंचित तबकों को अपनी परिधि में ले लेता है। एक ऐसा न्याय जो जाति-प्रजातिगत भेदभाव को ख़त्म करता हो, जो लिंग पर आधारित भेदभाव को ख़त्म करता हो, जो पद या प्रतिष्ठा पर आधारित भेदभाव को ख़त्म करता हो, जो धन-सम्पदा या वैभव पर आधारित भेदभाव को ख़त्म करता हो, और इन सब में उसका पलड़ा वंचित और कमजोर वर्ग के पक्ष में झुका हो, वो ही सामाजिक न्याय है। एक ऐसा न्याय जो समाज में या समुदाय में भौतिक, सामाजिक और राजनैतिक स्रोतों और संसाधनों का न्याय संगत वितरण करता हो। एक ऐसा न्याय जो कानून के नियम को कानून के द्वारा अर्थ पूर्ण बनाता हो। डॉ अम्बेडकर के अनुसार सामाजिक न्याय के लिए ये लाजिम या अनिवार्य है। भारत के संविधान के लक्ष्यों और उद्देश्यों के विषय पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 दिसंबर 1946 को एक प्रस्ताव पेश किया। डॉ अम्बेडकर ने उस की कई खामियों की ओर ध्यान आकर्षित कराया और स्पष्ट किया कि- 'हमारी कठिनाई यह नहीं है कि हमारा भविष्य क्या होगा, बल्कि हमारी कठिनाई तो यह है कि आज की इस विशाल और बेमेल आबादी को किस तरह इस बात पर आमादा करे कि वह मिल जुल कर एक फैसला करें और ऐसा पथ ग्रहण करें कि हम सब एक हो जाये। हमारी कठिनाई 'इति' को लेकर नहीं बल्कि 'अथ' को लेकर है।'
प्रस्तावना का जो सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय से संबंधित हिस्सा था, उस पर वे कहते है- 'प्रस्ताव में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय की व्यवस्था रखी गयी है। इसमें कोई सच्चाई है और दूसरी सच्चाई पर मुझे कोई भी शक नहीं है...........मैं यह उम्मीद करता हूँ कि इसमें कुछ ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए थी, जिससे राज्य के लिए यह सम्भव हो जाता कि वह सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान कर सकता है और इसी विचार से मैं इस बात की आशा करता कि प्रस्ताव साफ-साफ शब्दों में कहता ताकि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान किया जा सके। देश के उद्योग धंधों का और भूमि का राष्ट्रीयकरण किया जायेगा। मेरी समझ में नहीं आता कि जहाँ तक देश की अर्थ नीति समाजवादी नहीं होगी, किसी भी भावी हुकूमत के लिए यह कैसे सम्भव होगा कि वह सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय प्रदान कर सके। अतः व्यक्तिगत रूप से इन सिद्धांतों के सन्निहित किये जाने पर कोई आपत्ति नहीं है, फिर भी प्रस्ताव मेरे लिए निराशाजनक है।' इससे यह स्पष्ट है कि डॉ अम्बेडकर द्वारा यह उद्बोधन वंचित लोगों को ध्यान में रखकर ही किया गया था। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उनकी दृष्टि में सामाजिक और आर्थिक न्याय की सुनिश्चितता के लिए उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण होना जरूरी है। डॉ अम्बेडकर के विचार में सामाजिक न्याय ही सामाजिक समता और सामाजिक स्थायित्व पैदा कर सकता है। सामाजिक न्याय ही राष्ट्र प्रेम पैदा कर सकता है। इसी हेतु उन्होने शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो का उद्घघोष किया। संविधान में समानता और भाईचारे के उपबंध मूल अधिकारोँ में शामिल कर लिया जाना वे अपर्याप्त मानते थे। क्योंकि शक्तिशाली वर्ग इनका उपभोग करने में बाधा पैदा कर सकता है, अतः उनको सामाजिक न्याय के लिहाज से कारगर बनाने हेतु उसके सुरक्षा उपाय भी प्रावधित किये, जिसे संविधान के आर्टिकल 15(4), 16(4), 29(2) व 335 आदि में देखा जा सकता है। संविधान-प्रदत्त मौलिक अधिकार और उनके सुरक्षा उपाय रक्षात्मक या अनुकम्पात्मक है, जिनमें तीन महत्वपूर्ण वरियताएं है- पदों या सेवाऒं में आरक्षण सुनिश्चित करना, यथा, विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में। ऐसे कार्यक्रमों में व्यय को प्रावधित करना यथा, छात्रवृति, गारंटी, हेल्थ केयर, लीगल ऐड आदि और शिक्षा और सेव्आओं में पिछड़ों को रिहायतें देना।
डॉ अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक समानता की प्राप्ति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका थी, जिसे सुरक्षित कर सामाजिक न्याय को सुनिश्चित किया। डॉ अम्बेडकर के अनुसार पुराने समय में संविधान निर्माताओं का विश्वास था कि संवैधानिक कानून का क्षेत्र, विषय और कृत्य समाज के राजनैतिक ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत करना रहा है। उन्होंने कभी भी एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को महत्व नहीं दिया। संविधान निर्माण में डॉ अम्बेडकर की स्थापना ‘एक व्यक्ति-एक मूल्य’ पर रही और इस स्थापना के साथ संविधान में आर्थिक ढांचे की रूपरेखा को तैयार करना भी महत्वपूर्ण मानते थे। अस्तु, इस लिहाज से भी नीति-निर्देशक सिद्धांतों को संविधान में समाहित करना अनिवार्य था।
नीति-निर्देशक तत्व सामाजिक और आर्थिक न्याय का एक पैमाना है।आर्थिक न्याय को प्राप्त करने के को नीति-निर्देशक तत्वों के अंतर्गत भावी सरकारों पर छोड़ दिया गया। डॉ अम्बेडकर भारत के भावी समाज को एक समतावादी समाज के रूप में देखते है- एक जाति-विहीन, वर्ग-विहीन, समतावादी समाज, जिसमें न कोई अल्पसंख्यक रहता और न कोई बहुसंख्यक। जिसके सभी नागरिक प्रथमतः भारतीय है और अंततः भारतीय है। जब ऐसा संभव हो जायेगा तो किन्हीं सुरक्षा उपायों की भी जरुरत नहीं रह जाती है।
संविधान सभा में 19 नवंबर 1948 को डॉ अम्बेडकर कहते है- 'राजनैतिक जनतंत्र को प्रतिष्ठित करते हुए हमारी यह भी इच्छा है कि आर्थिक जनतंत्र को आदर्श स्वरूप प्रतिपादित किया जाना चाहिये।'... नीति-निर्देशक सिद्धांतों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए वे कहते है- 'संविधान के प्रारूप में मौलिक अधिकारों के बाद निर्देशक सिद्धांत आते है। संसदीय जनतंत्र के लिए बनाये गए संविधान का यह अनूठा फीचर है।.... यह कहा जाता है कि ये सिद्धांत पवित्र घोषणाओं के सिवा कुछ नहीं है। इनमेँ बाध्यकारी शक्ति नहीं है, यह आलोचना बिल्कुल बेहूदा है।....... निर्देशक सिद्धांतों के पीछे क़ानूनी शक्ति नहीं है। मैं इस बात से सहमत हूँ, परंतु मैं यह मानने को तैयार नहीं हूँ कि इनमें बाध्यकारी शक्ति बिल्कुल नहीं है, और न ही मैं यह मान सकता कि क्योंकि इनमें बाध्य कारी शक्ति नहीं है, अतः ये व्यर्थ है।....ये लिखित हिदायतों का दूसरा नाम ही निर्देशक सिद्धांत है।' ..... ये निर्देशक सिद्धांत केवल पवित्र घोषणाऐं नहीं है। संविधान सभा का इरादा यह है कि विधान मंडल और कार्यपालिका इन सिद्धांतों के प्रति जबानी जमा ख़र्च नहीं करे, बल्कि इस देश के प्रशासन संबंधित या सिद्धांत कार्यकारिणी और विधान मंडलों की सभी कृत्यों का आधार हो।' यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि नीति-निर्देशक तत्व राज्य यानि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को स्पष्ट आदेश है कि वह इस तरह से कार्य करे कि सामाजिक न्याय वास्तविक बनाया जा सके। ये हमारे मूल्य है, निर्देशक है- भावी समाज के निर्माण के लिए। डॉ अम्बेडकर यह मानते है कि मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों में एक स्वभाविक विरोध है, इस विरोध को दूर करना और मौलिक सिद्धांतों को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का सहायक बनाना संसद का कर्तव्य है। इस प्रकार से डॉ अम्बेडकर मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक सिद्धांतों के बल पर संविधान के माध्यम से भारत के भावी समाज को हमारे सामने रेखांकित करते है। विभिन्न बाध्यताओं और कठिनाइयों के बावजूद भी शनैः शनैः हम उस ओर बढ़ रहे है, यही डॉ अम्बेडकर का अहसास और उनकी प्रासंगिकता है!


Rahul sankrityayan... Tararam
अगर मुझे राहुल ना मिले होते .... 
                                        ताराराम
                                           निदेशक,
                                   बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र ,                                                                               जोधपुर 
    बाबा साहेब डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म का नाम मैंने बचपन में अपने पिताजी से सुन रखा था. जब वे द्वितीय विश्व-युद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना के एक सिपाही के नाते जापान सीमा पर लड़ने गए तो वहां उनका बौद्ध धर्मानुयायी सैनिकों से परिचय हुआ और रंगून आदि कुछ जगहों के बौद्ध मठों के बारे में भी उन्हें कुछ जानकारी थी. द्वितीय विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर उनका पद-स्थापन कलकता में हो गया. जहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर और गाँधी नाम के दो शख्सियत के बारे में जानकारी मिली थी. जिसे वे यदा-कदा हम लोगों को बताया करते थे. प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी और 14 अप्रैल को वे हमारे घर में पकवान बनवाते थे और वे आजादी की लडाई और विभिन्न युद्धों में अपने खुद के अनुभव को लोगों में साझा करते थे. वे बड़े उत्साह से विभिन्न लड़ाईयों के सजीव वर्णन और उसके महत्त्व को बताते थे. हमारी स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में वे सदैव अपने शौर्य-पदकों के साथ  विशेष पोशाक धारण कर सभा में उपस्थित होते थे. पूरे गाँव में भारत के विभिन्न युद्धों में भारत की ओर से लड़ने वाले वे अकेले ही शख्स थे, जो ऐसे कार्यक्रमों में सरिक होते थे. ऐसे अवसरों पर हमको  उनसे आंबेडकर और बुद्ध का नाम तो सुनने को मिला था, परन्तु महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम नहीं सुना था. सन 1975 में उन्होंने गाँव में पहली बार डॉ. आंबेडकर जयंती मनाई और मुझे विश्व-विद्यालय में दाखिला दिलाने साथ आये, जहाँ पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध के परम अनुयायी एच. आर. जोधा से मुलाकात हुई. श्री एच. आर. जोधा के मुहं से ही मुझे पहली बार महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम सुनने को मिला. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम के साथ ही उनका साहित्य भी पहली बार पढ़ने को मिला. पिताजी ने वृहद-स्तर पर 1978-79 में गांव में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर कार्यक्रम रखा तो  कौसल्यायन जी को आमंत्रित करने के पीछे भी राहुल जी के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही था.
              अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक आंदोलनों की स्थिति से वाकिफ था और हमारे क्षेत्र में शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में किये जाने वाले छोटे-बड़े आन्दोलनों में हमारे पिताजी की भूमिका के कारण ऐसे अन्दोलनों में सक्रीय रहना एक नियति-सी बन गयी थी. जोधपुर में एच.आर. जोधा अम्बेडकरी मिशन के जुझारू और निष्ठावान कर्ता-धर्ता थे और अकसर वे हमारे छात्रावास में आते रहते थे. हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक विषय पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी. आपात-काल के इस समय में विद्यार्थी वर्ग में भी असंतोष था और विद्यार्थियों के छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहते थे. मैं अपने आपको उनसे भी अलग नहीं रख सका. एक दिन जोधा साहब ने मुझे राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक पढ़ने को दी, जिसका नाम था- “तुम्हारी क्षय”. उस पुस्तक को बिना विराम के जब तक मैंने पूरा नहीं पढ़ा, तब तक सोया नहीं. पुस्तक बड़ी सहज और सरल शब्दों में थी, साथ ही वह हमारी ज्वलन्त समस्याओं को लेकर ही थी, उस पहली पुस्तक को पढ़ने के बाद राहुल सांकृत्यायन जी के बारे में और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र हो गयी और विचार पक्का कर लिया कि उनके पूरे लेखन को पढ़ लिया जाय. उस समय जोधपुर में दो पुस्तक विक्रेता थे जो राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य रखा करते थे, जोधा साहब ने मेरा उनसे परिचय कराया और उसके बाद राहुल जी की जब भी कोई नयी कृति आती उसे खरीदकर पढ़ ही लेता. उस पुस्तक विक्रेता से स्तालिन, कार्ल मार्क्स आदि पढने के बाद मुझे उनका ग्रन्थ दर्शन-दिग्दर्शन भी पढ़ने को मिला. उसको पढ़कर लगा कि राहुल सांकृत्यायन जैसा महापुरुष, जिसने ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो मत, दुनिया को बदल डालो’ जैसी सरल कृतियों का सृजन किया है, जिसकी भाषा आम बोल-चल की भाषा है, जो सम-सामयिक विषयों पर सहज और सरल शब्दों में लिखता है, दर्शन जैसे क्लिष्ट और नीरस विषय को भी उतने ही सरल शब्दों में लोगों के लिए ज्ञेय बना सकता है. मैंने इसको एच. आर. जोधा से जानना चाहा, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इनका लेखक एक ही है- महओंडित राहुल सांकृत्यायन! फिर तो उनका विविध-रूपा साहित्य पढ़ने के बाद वे मेरे जीवन के वे एक आदर्श पुरुष बन गए. उनके अधिकांश साहित्य को मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया. मेरे जीवन में राहुल जी के साहित्य ने बौद्ध धर्म को गंभीरता से समझने और आत्मसात करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर मेरे को वह साहित्य पढ़ने को नहीं मिलता तो कदाचित मैं बौद्ध धर्म को ठीक ढंग से नहीं समझ पाता और साथ ही उस समय जो विद्यार्थी-असंतोष की ज्वाला थी, उसमें कहीं बह गया होता परन्तु राहुल जी की जब “भागो मत, दुनिया बदल डालो” रचना पढ़ी तो नजरिया ही बदल गया. अगर राहुल जी नहीं मिलते तो यह समझ भी मुझ में नहीं होती, ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बौद्धिक विरासत और साहित्यिक सम्पदा हमारे लिए बड़े गौरव की अमूल्य निधि है. अस्तांचल की दहलीज पर जाती हुई 19वीं शताब्दी में उनका जन्म हुआ, उन्होंने 20वीं शती की भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगा और 22वीं शती की परिकल्पना कर उसने अपने को युग-दृष्टा होने की बात प्रमाणित कर दी.                                       विश्व-विद्यालय के स्नातक कोर्स में मैंने मनोविज्ञान, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र जैसे दुरूह विषयों को लेकर पढाई शुरू की तो दर्शन की दुरूह गलियों में भारतीय दर्शनों को और बौद्ध-दर्शन के अंतर्भूत सिद्धांतों को समझने में राहुल सांकृत्यायन जी की अनुपम कृतियों ने सदैव मेरा मार्ग-दर्शन किया. हर एक विषय को समझाने की उनकी शैली बेजोड़ है. एक लुप्तप्रायः धर्म को साहित्य के प्राण-पयोधर से सिंचित कर उन्होंने उस बगीचे को हरा-भरा कर दिया. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के स्वयंभू धनी थे. वे स्वयंभू महापंडित थे- अद्भुत, आश्चर्य-चकित करने वाला व्यक्तित्व !
               भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य के पुनरुत्थान में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का अतुलनीय योगदान है. बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व के धनि तथा बौद्ध-वाड्मय के पुरस्कर्ता को आधुनिक भारतीय संस्कृति का निर्माता कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के वे शिखर-पुरुष है. पराधीन भारत में 9 अप्रैल 1893 को उत्तर-प्रदेश के एक छोटे से गाँव पन्दाहा के सनातनी सरयूपारीण ब्राहमण के घर में उनका जन्म हुआ. बचपन में केदार पाण्डेय के नाम से जाना जाने वाला यह बालक घर-बार छोड़कर भाग जाता है और कलकता की मिलो में मजदूरी करने लग जाता है. वहां भी उसे स्थिरता कहाँ, वह इधर से उधर, एक से दूसरी टोह लेते हुए यायावरी का जीवन जीता है. घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता भागने वाला यही बालक बड़ा होकर दुनिया को कहता है कि भागो मत, दुनिया को बदल डालो ! कोई सपने में भी यह नहीं सोच सकता कि भागने वाला यह बालक, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पायी, एक दिन विश्व की 36 भाषाओँ में पारंगत हो जायेगा और एक दिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का व्यक्तित्व बनेगा. उसका बहु-आयामी लेखन पर आधिपत्य होगा, त्रिपिटकाचार्य, साहित्यवाचस्पति, पद्म-भूषण आदि उपाधियों के साथ देश-विदेश में विख्यात होगा और जब 33 साल बाद अपने जन्म-स्थान के घर लौटेगा तो महापंडित से विभूषित होकर अपने पूरे आभा-मंडल के साथ, सबके आदर्श का पात्र होगा.   
         आश्चर्य-चकित करने वाले उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बहु-आयामी विकास के बारे में उनके एक अनन्य मित्र डॉ काशीप्रसाद जायसवाल ने बिलकुल ठीक ही लिखा है- ‘उस समय मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा, जिसे मैं आज जानता हूँ- एक ऐसा आदमी जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्व-व्यापी है, जो पूर्ण रूप से स्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे आप से आप दौड़ पड़ते है, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा, जैसे वह गौतम और ईसा मसीह के पीछे चलता था’. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल के ये उद्गार उस विराट व्यक्तित्व की झलक-भर है. निःसंदेह राहुल संकृत्यायन  भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना है. डॉ. आंबेडकर, महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन जैसे शलाका-पुरुष बीसवीं शताब्दी में विद्यमान थे, अगली शताब्दियों में लोग इस पर आश्चर्य करेंगें. भारतीय संस्कृति के क्षितिज पर आविर्भूत ऐसी विलक्षण विभूति अपनी अगाध विद्वता, अद्भुत मेधा, जाबांज यायावरी, बहु-आयामी कृतित्व आदि गुणों के वैशिष्ट्य से सदियों तक अद्वितीय बनी रहेगी.
               आज महापंडित राहुल सांकृत्यायन का विराट व्यक्तित्व अगाध पांडित्य, ज्ञानाकुल यायावरी और विलक्षण साधना का एक उज्जवल प्रतिमान बन गया है. सांस्कृतिक ध्वज-वाहक तथा मानव-स्वातन्त्र्य के पक्षधर राहुल सांकृत्यायन के जीवन की यात्रा ऋग्वैदिक ‘दिवोदास’ से प्रारंभ होकर प्रज्ञा के पुंज अमिताभ बुद्ध की रश्मि-रंजित भूमि से अंकुरित होकर तथागत बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ के आलोक में बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय के रूप में विकसित हुई दिखती है. अपनी जीवन-यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक, एक मतवाद से दूसरे मतवाद तक, एक भूखंड से दूसरे भूखंड तक, एक भाषा से दूसरी भाषा तक, एक विधा से दूसरी विधा तक दुःख से मनुष्य जाति की मुक्ति के लिए निरंतर संघर्ष तथा ज्ञान की खोज के लिए सतत गतिशील बने रहने वाले महामानव राहुल का स्वयंभूत्व अपने आप में अद्वितीय था. वे सदैव ज्ञान-पिपासु बने रहे. वे अतृप्त हो इधर से उधर घुमक्कड़ी करते रहे. वस्तुतः उनके समस्त चिंतन और लेखन के मूल में जिज्ञासात्मक और प्राणहारक यायावरी केन्द्रित थी, जिसने उन्हें केदार पाण्डेय से रामोदर दास और रामोदर दास से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा दी. उनका सम्पूर्ण जीवन चरैवेति-चरैवेति तथा अत्त दीपो भव का सर्वोत्कृष्ट उदहारण बन गया है.
                वे कहीं रुके नहीं, निरंतर प्रवाहवान ही बने रहे. चाहे वह विचार का प्रवाह हो या आचार का- उनके जीवन के सातत्य को खंडित नहीं कर पाया. दर-दर भटकते हुए वे ऐसे आलोक की खोज में लगे रहे, जिससे मानव के दुखों की मुक्ति सुनिश्चित की जा सके. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को रूपांकित करते हुए रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि राहुल का ध्यान एक ऐसी आत्मा का ध्यान है, जो युग-युगांतर से अन्धकार के बीच आलोक खोजती आ रही है, एक के बाद दूसरी प्राप्तियां उनके पक्ष में आती रही है, किन्तु वे उन्हें पीछे छोड़कर ‘नेति-नेति’ कहते हुए आगे बढ़ जाती है, मानो जो सिद्धि मिली है, वह उसे तृप्ति नहीं दे सकती, मानो जो कुछ वह खोज रही है, वह और अभी आगे है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन उस विराट सांस्कृतिक क्षितिज का नाम है, जिसे समझना जितना आसन है, उसे मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है.
                उनके बहु-मुखी व्यक्तित्व का अनुशीलन विभिन्न अध्येताओं ने वैष्णव साधु, आर्य-समाजी प्रचारक, बौद्ध संस्कृति के उपासक तथा प्रखर चिन्तक आदि के रूप में किया है. वस्तुतः, उनकी नेति-नेति की वृति ने उन्हें वैष्णव, वेदांती, तंत्र-साधक, आर्य-समाजी, गाँधीवादी, कांग्रेसी, समाजवादी-साम्यवादी, आदि भूमिकाओं के बीचो-बीच मानववाद की मंजिल तक पहुँचाया. उनमें एक साथ बहु-मुखी भाषा-विद, महान यायावर, प्रकांड दर्शन-शास्त्री इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता-सेनानी, साम्यवादी चिन्तक, साहित्य-दृष्टा आदि रूपों के समेकित दर्शन होते है. उनका व्यक्तित्व अनेकों में एक था. राहुल सांकृत्यायन जी ने अतीत के खंडहरों में झांककर वर्त्तमान को पाया एवं भविष्य की रुपरेखा तैयार की थी. उनकी जीवन-यात्रा आज की पीढ़ी को एक मिथकीय पात्र की तरह लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. राहुल जी  का दाम्पत्य जीवन भी उतार-चढाव वाला ही रहा. उनकी पहली शादी 1904 में, जब वे 11 वर्ष की बहुत छोटी उम्र के थे, तब रामदुलारी नामक बालिका से हुई. उनके लिए यह एक तमाशा था. समाज के प्रति विद्रोह के बीज पैदा करने में इसने ही पहला काम किया, इस पत्नी को उन्होंने कभी भी दाम्पत्य-भाव से नहीं देखा. उनकी दूसरी शादी लेनिनग्राद में मंगोल विदुषी लोला से 1937 में हुई, जिनसे उन्हें 1938 में ईगोर नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. उनकी तीसरी शादी अधिक उम्र ( 57 ) में नेपाली तरुणी कमला से सन 1950 में हुई. उनसे एक पुत्री जया (1953 ) व एक पुत्र जेता ( 1955 ) का जन्म हुआ. उनके दाम्पत्य जीवन में भावुकता की जगह स्थितियां ज्यादा प्रबल नजर आती है.
                अपनी प्रयोजनमूलक गत्यात्मक जीवन-शैली के कारण  उन्होंने कई बार धर्म बदला, देश बदला, भोजन, वस्त्र और विचार बदले कि इन विविध स्वरूपों से अलग कर के उनको किसी एक स्वरूप में न तो देखा जा सकता है और न ही मूल्यांकित किया जा सकता है. उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा के वैचारिक परिवर्तन के मूल में यथा-निर्दिष्ट बौद्ध सूत्र को अंगीकृत कर लिया था, जब वे कहते है- ‘बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया है, न कि सर पर उठाये फिरने के लिए’ तो उनका वह हर एक परिवर्तन और स्वरूप हमें समझ में आ जाता है. उसमें राहुल सांकृत्यायन बादलों से घिरे आकाश में जैसे चंद्रमा शोभायमान होता है, वैसे ही वे साहित्य-इतिहास के गगन में दैदीप्यमान हो उठते है. सन 1910 में घर छोड़ा और 1916 में उनका बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. फलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओँ को सीख कर उसमें महारथ हासिल की. विश्व-जनिन उथल-पुथल में वे 1917 की रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित हुए. वे भारत में उस विचारधारा के अग्रणी लोगों में गिने जाने लगे और धरातल पर किसानों के आन्दोलनों की अगुवायी भी की. यायावर राहुल एक जगह कहाँ टिकने वाले थे, 1923 से उनका विदेशी यात्राओं का दौर शुरू हुआ, जो मृत्यु-पर्यंत बना रहा. श्रीलंका में जाकर 1930 में उन्होंने बौद्ध-भिक्षु की दीक्षा लेकर चीवर धारण कर लिया, 1937 में लेनिनग्राद जा पहुंचे और चीवर को छोड़ गृहस्थी बसा ली. बिहार के किसान आन्दोलन में प्रमुख भूमिका की वजह से उन्हें एक साल जेल जाना पड़ा. भारत छोडो आन्दोलन में हुंकार का संपादन किया. वे शीर्ष कम्युनिस्ट, शीर्ष कांग्रेसी, शीर्ष समाजवादी सब कुछ रहे. ऐसे कई अनेकानेक रूप किसी अन्य महामानव के देखने और सुनने को नहीं मिलते है. वे विरलों में से विरले पुरुष थे.                   
                एक डाल से दूसरे डाल और एक पात से दूसरे पात अवतिष्ठ होते हुए भी राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट आस्था कभी भी नहीं टूटी. उन्होंने अपना सर्वस्व हिंदी को दिया. जो कुछ हिंदी को दिया. आज वह अपौरुषेय अवदान जैसा लगता है और हिंदी भाषा-साहित्य जगत में वे हिंदी के जनक के रूप में प्रस्थापित हुए. राहुल सांकृत्यायन, इतिहास का एक ऐसा महान व्यक्तित्व, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई, फिर भी मेधा के उच्चतम शिखर पर अवस्थित हुआ. वह न केवल लब्द्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में पहचाना गया, बल्कि इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता एवं बौद्ध दार्शनिक के रूप में भी एक अद्वितीय हस्ताक्षर प्रमाणित और प्रस्थापित हुए, जिसकी अनुगूँज इस देश में और इस देश के बाहर भी सदियों तक सुनाई देती रहेगी. उनके चिंतन में, जहाँ एक ओर बुद्ध की करुणा और प्रज्ञा है, वहीँ साम्यवादी विचारों के आदर्श की सरिणी भी समाहित है. उनकी भाषा यथार्तपरक व्यवहारिक एवं व्यवसाय-कुशलता के साथ ही सरल और सहज गति में अभिव्यक्त हुई है. उनकी रचनायें हर किसी का मन-मष्तिष्क एवं हृद्य का आलोडन-विलोडन किये बिना नहीं रह सकती है. यही उनकी जीवन्तता है. जिस संवेदनशीलता, सहजता, प्रवाह और साक्षी-भाव से उन्होंने अपनी रचनाओं में शब्दों का संयोजन किया है, वह पाठक को झकझोरे बिना रह ही नहीं सकती है और पाठक उनका कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. वस्तुतः उनकी रचनाएँ चिंतन की विविध धाराओं का बखूबी प्रतिनिधित्व कराती है.          
                हिंदी भाषा के जनक माने जाने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य को विपुल भण्डार से परिपूरित किया है. उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के अलोक में उनकी ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खोज, हिंदी प्रदेश की प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओँ-उपभाषाओं का अध्ययन-अनुशीलन, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में धर्म-दर्शन और राजनीति की व्याख्या, बौद्धों की प्रतीत्यसमुत्पादवादी दृष्टि के प्रति सहज आग्रह-शीलता, साम्यवादी चिंतन, राष्ट्रिय आन्दोलनों में सहभागिता आदि में सामान प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए, प्रवास, कारावास और पारिवारिक अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए इस देश और विश्व-जनिन संस्कृति को बहुत कुछ दिया. उनकी 150 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी और बहुत सारा संग्रह अप्रकाशित भी पड़ा है. हिंदी में  विभिन्न विधाओं में उनकी कालजयी कृतियाँ अनुपम है, जिसको बार-बार पढ़ने का मन करता है और हर बार उसमें  नए-नए माणिक्य हस्तगत हुए बिना नहीं रह सकते है. उनके साहित्य सृजन की झलक कहानियों के रूप में- सतमी के बच्चे; वोल्गा से गंगा; बहुरंगी आदि, उपन्यास में- बाईंसवीं सदी; सिंह-सेनापति; जय यौधेय; विस्मृत यात्री; दिवोदास आदि, निबंधों में- साहित्य रत्नावलि; पुरातत्व निबंधावलि; आज की समस्याएं; तुम्हारी क्षय आदि, जीवनी लेखन में- सरदार पृथ्वी सिंह; वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली; नए भारत के नए नेता; स्तालिन; कार्ल मार्क्स; माओ-त्से-तुंग; मेरे असहयोग के साथी आदि, यात्रा वृतांत में तिब्बत में सवा वर्ष; मेरी लद्दाख यात्रा; किन्नर देश; रूस में पच्चीस मास; चीन में क्या देखा; एशिया के दुर्गम भूखंडों में आदि, आत्म-कथा में मेरी जीवन-यात्रा ( 1 से 5 खंड ) तथा लंका, जापान, ईरान, मदुर स्वपन, जीने के लिए, कनैला की कथा, कप्तान लाल, सिंहल के वीर पुरुस, जिनका मैं कृतज्ञ हूँ आदि अद्भुत और अविस्मरणीय है. 
                बौद्ध धर्म और दर्शन पर सुत-पिटक के मज्झिम निकाय, दीघ-निकाय, संयुत-निकाय आदि व विनय-पिटक का अनुवाद, बौद्ध संस्कृति, महा-मानव बुद्ध, बुद्ध-चर्या आदि विलक्षण अवदान है, जिससे हिंदी जगत बुद्ध और बौद्ध धर्म को समझ पाया. बौद्ध-संस्कृति के सन्दर्भ में श्रीलंका, तिब्बत और नेपाल उनके विशेष आकर्षण के केंद्र थे. तिब्बत की उनकी लोमहर्षक यात्राएँ ( सन 1929-30,1934,1936एवं 1938 )सर्वाधिक दुस्साहसपूर्ण,महानियौर सार्थक प्रमाणित हुई और भारत से विलुप्त प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अवशेषों को तिब्बत से प्राप्त कर भारत वासियों को ही नहीं बल्कि समस्त विश्व को अवगत कराया. जिस प्रकार ह्वेनसांग भारतीय ज्ञान-सम्पदा को चीन ले गया था, उसी प्रकार राहुल संकृत्यायन विलुप्त भारतीय ज्ञान-सम्पदा को भारत लौटा लाये. वे बीसवीं सदी के ह्वेनसांग है, एसा कहे तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी. उनकी काल-जयी कृतियों में दर्शन-दिग्दर्शन, ऋग्वैदिक आर्य, मध्य-एशिया का इतिहास ( दो खंड ), अकबर, मानव-समाज, दोहा-कोष आदि कई रचनाएँ शुमार है. उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और विवरण भी लिखे. वे अपनी पुस्तकों का प्रूफ स्वयं देखना पसंद करते थे, लॉ जर्नल प्रेस, नॅशनल हेराल्ड प्रेस, सम्मलेन मुद्रणालय, मोहन प्रेस आदि से उनकी रचनाये निरंतर चापती रही. उनके द्वारा प्रणीत विभिन्न भाषाओँ के व्याकरण और शब्द-कोष अतुलनीय है, जो आज भी प्रकाश-स्तम्भ की तरह अध्येताओं का मार्ग-दर्शन करते है. इसके साथ ही संस्मरण, डायरी, पत्र आदि जो सर्जन है, वह हमें उनके यायावरी, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन-पक्षों का विश्व-व्यापी मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक नजरिया प्रदान करता है और उनके अथाह विराट व्यक्तित्व का अहसास कराता है. इस विराट व्यक्तित्व के साक्षात्कार के बाद विख्यात प्राच्य-विद सिलवां लेवी ने उन में अमिताभ बुद्ध का साक्षात्कार किया था.
                राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा का पूर्वार्द्ध जितनी मस्ती में बीता, भौतिक दृष्टि से उनके जीवन का उत्तरार्द्ध उतना ही कष्टमय बीता. अत्यधिक परिश्रम और व्यैक्तिक चिंताओं ने उन्हें मधुमेह, हृदयरोग, उच्च-रक्तचाप और स्मृति-भ्रंश आदि रोगों का शिकार बना दिया था. जीवन के अंतिम दो वर्षों में उनकी स्मृति-शक्ति लुप्त हो गयी थी. जो नाम, धाम, धर्म, वस्त्र और विचार बार-बार बदलता रहा और अपने जीवन-यात्रा में सतत परिवर्तन का पक्षधर रहा, उसने इसको भी सहज रूप से स्वीकार्य बना दिया था. आवास-प्रवास और कारावास आदि की अस्त-व्यस्तता ने उनके चिंतन और लेखन के कर्म को कभी बाधित नहीं किया था, परन्तु जीवन के अंतिम वर्षों में स्मृति ने ही उनका साथ छोड़ दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा एक गति और एक-लय में लिखा, इस महापंडित ने अपनी कलम को न तो किसी प्रकाशक के अधीन कभी गिरवी रखा और न किसी इनाम या पुरस्कार के खातिर उसको बदला. उन्होंने ता-उम्र अपनी किसी भी कृति को कहीं भी पुरस्कार के लिए भेजा तक नहीं, वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते थे. उनको जो ठीक लगा, ठीक जंचा, उसी को ठीक-ठीक लिखा. बुद्ध के सिद्धांतों को जीवन के यथार्त धरातल पर पुनः उतारने और उकेरने में वे कामयाब हुए परन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध-दर्शन के पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर शंकाओं में घिर गए और बेझिझक उन्हें नकार भी दिया.   
                उनकी जीवन यात्रा का अंतिम दशक आर्थिक चिताओं का भी दशक रहा. नयी गृहस्थी का भार, परिवार का आर्थिक भविष्य, चिकित्सा का खर्च आदि सब कुछ उन्हें आर्थिक अनिश्चिंतता के भंवर में डालने वाली एक से बुरी एक परिस्थिति थी. वे चाहते तो राजनेताओं से मदद ले सकते थे, प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्र-पति सर्व-पल्ली राधाकृषण जैसे उनके गुण-ग्राह्य दोस्त थे. वे किसी भी प्रकाशक को कहते तो उन पर अनुकम्पा कर सकता था, वे अपनी किसी भी पुस्तक को किसी पुरस्कार की प्रविष्टि में भेज कर पुरस्कार राशि भी पा सकते थे परन्तु इसे वे अपने आत्म-सम्मान की चेतना के विपरीत समझते थे और आर्थिक तंगी को पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते थे. उन्होंने अपने मित्र पंडित किशोरीलाल वाजपई को 4 नवम्बर 1961 के पत्र में लिखते है- ‘आर्थिक निश्चिन्तता का ख्याल रखना जरुरी है......रुपये के मूल्य को मैं भी समझता हूँ, किन्तु मेरी पाण्डुलिपि कहीं पुरस्कृत होने के लिए न भेजना.’ अंतिम वर्षों में विपन्नताओं और अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए सत्तर वर्ष की अवस्था में संज्ञा-शून्यता की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए रूस भी ले जाया गया पर 14 अप्रैल 1963 को वे भौतिक शारीर से विमुक्त हो गए.
                हर काल और हर युग में राहुल संकृत्यायन जैसी विभूतियों का जन्म होना दुर्लभ है. ऐसी विभूतियाँ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए ही जीती है और अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से दुनिया को विचम्भित कर उन्हें प्रकाश की वे किरणें दे जाती है, जो उनको सदा-सर्वदा प्रकाश देती रहती है. राहुल सांकृत्यायन हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को बेहद पसंद करते थे और वे स्वयं भी हिमालय की तरह प्रखर और प्रभावोत्पादक थे. वे अपना घर भी हिमालय की गोद में ही बसाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने पहले नैनीताल में और बाद में दार्जिलिंग में अपना घर बसाया- उनके शारीर का अंतिम संस्कार भी दार्जिलिंग में ही किया गया. भौतिक शारीर से इस लोक से चले जाने के बाद भी उन पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा और लिखा जाता रहेगा. डॉ. प्रभाकर माचवे ने ( राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), विष्णु चन्द्र शर्मा (राहुल सांकृत्यायन का विरल व्यक्तित्व, 1989 ), भदंत आनंद कौशल्यायन (राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), रत्नसुन्दर शाक्य ( भिक्खु-त्रयी, 1992 ), गुणाकर मुले ( महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वयंभू महापंडित, 1993, राहुल चिंतन, 1994 ) आदि ने उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है. कई संस्थानों और संस्थाओं ने उनके लेखन और चिंतन के विविध आयामों को रेखान्तित करने की कोशिश की है, परन्तु ये सब अभी भी सतत प्रक्रिया के कुछ क्षण भर है, उनकी बहुत-सी रचनाएँ और आयाम अभी भी बाहर  आने है. हम सब उसके अविरल इंतजार में है कि हमें कोई एक ओर राहुल सांकृत्यायन मिल जाय.  ..... इति-यत्नं ! भवतु सब्ब मंगलम !!

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Rahul Saankrityayan : A Visionary legend!
अगर मुझे राहुल ना मिले होते ....
ताराराम
निदेशक,
बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र , जोधपुर
बाबा साहेब डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म का नाम मैंने बचपन में अपने पिताजी से सुन रखा था. जब वे द्वितीय विश्व-युद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना के एक सिपाही के नाते जापान सीमा पर लड़ने गए तो वहां उनका बौद्ध धर्मानुयायी सैनिकों से परिचय हुआ और रंगून आदि कुछ जगहों के बौद्ध मठों के बारे में भी उन्हें कुछ जानकारी थी. द्वितीय विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर उनका पद-स्थापन कलकता में हो गया. जहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर और गाँधी नाम के दो शख्सियत के बारे में जानकारी मिली थी. जिसे वे यदा-कदा हम लोगों को बताया करते थे. प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी और 14 अप्रैल को वे हमारे घर में पकवान बनवाते थे और वे आजादी की लडाई और विभिन्न युद्धों में अपने खुद के अनुभव को लोगों में साझा करते थे. वे बड़े उत्साह से विभिन्न लड़ाईयों के सजीव वर्णन और उसके महत्त्व को बताते थे. हमारी स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में वे सदैव अपने शौर्य-पदकों के साथ विशेष पोशाक धारण कर सभा में उपस्थित होते थे. पूरे गाँव में भारत के विभिन्न युद्धों में भारत की ओर से लड़ने वाले वे अकेले ही शख्स थे, जो ऐसे कार्यक्रमों में सरिक होते थे. ऐसे अवसरों पर हमको उनसे आंबेडकर और बुद्ध का नाम तो सुनने को मिला था, परन्तु महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम नहीं सुना था. सन 1975 में उन्होंने गाँव में पहली बार डॉ. आंबेडकर जयंती मनाई और मुझे विश्व-विद्यालय में दाखिला दिलाने साथ आये, जहाँ पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध के परम अनुयायी एच. आर. जोधा से मुलाकात हुई. श्री एच. आर. जोधा के मुहं से ही मुझे पहली बार महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम सुनने को मिला. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम के साथ ही उनका साहित्य भी पहली बार पढ़ने को मिला. पिताजी ने वृहद-स्तर पर 1978-79 में गांव में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर कार्यक्रम रखा तो कौसल्यायन जी को आमंत्रित करने के पीछे भी राहुल जी के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही था.
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक आंदोलनों की स्थिति से वाकिफ था और हमारे क्षेत्र में शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में किये जाने वाले छोटे-बड़े आन्दोलनों में हमारे पिताजी की भूमिका के कारण ऐसे अन्दोलनों में सक्रीय रहना एक नियति-सी बन गयी थी. जोधपुर में एच.आर. जोधा अम्बेडकरी मिशन के जुझारू और निष्ठावान कर्ता-धर्ता थे और अकसर वे हमारे छात्रावास में आते रहते थे. हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक विषय पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी. आपात-काल के इस समय में विद्यार्थी वर्ग में भी असंतोष था और विद्यार्थियों के छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहते थे. मैं अपने आपको उनसे भी अलग नहीं रख सका. एक दिन जोधा साहब ने मुझे राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक पढ़ने को दी, जिसका नाम था- “तुम्हारी क्षय”. उस पुस्तक को बिना विराम के जब तक मैंने पूरा नहीं पढ़ा, तब तक सोया नहीं. पुस्तक बड़ी सहज और सरल शब्दों में थी, साथ ही वह हमारी ज्वलन्त समस्याओं को लेकर ही थी, उस पहली पुस्तक को पढ़ने के बाद राहुल सांकृत्यायन जी के बारे में और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र हो गयी और विचार पक्का कर लिया कि उनके पूरे लेखन को पढ़ लिया जाय. उस समय जोधपुर में दो पुस्तक विक्रेता थे जो राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य रखा करते थे, जोधा साहब ने मेरा उनसे परिचय कराया और उसके बाद राहुल जी की जब भी कोई नयी कृति आती उसे खरीदकर पढ़ ही लेता. उस पुस्तक विक्रेता से स्तालिन, कार्ल मार्क्स आदि पढने के बाद मुझे उनका ग्रन्थ दर्शन-दिग्दर्शन भी पढ़ने को मिला. उसको पढ़कर लगा कि राहुल सांकृत्यायन जैसा महापुरुष, जिसने ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो मत, दुनिया को बदल डालो’ जैसी सरल कृतियों का सृजन किया है, जिसकी भाषा आम बोल-चल की भाषा है, जो सम-सामयिक विषयों पर सहज और सरल शब्दों में लिखता है, दर्शन जैसे क्लिष्ट और नीरस विषय को भी उतने ही सरल शब्दों में लोगों के लिए ज्ञेय बना सकता है. मैंने इसको एच. आर. जोधा से जानना चाहा, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इनका लेखक एक ही है- महओंडित राहुल सांकृत्यायन! फिर तो उनका विविध-रूपा साहित्य पढ़ने के बाद वे मेरे जीवन के वे एक आदर्श पुरुष बन गए. उनके अधिकांश साहित्य को मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया. मेरे जीवन में राहुल जी के साहित्य ने बौद्ध धर्म को गंभीरता से समझने और आत्मसात करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर मेरे को वह साहित्य पढ़ने को नहीं मिलता तो कदाचित मैं बौद्ध धर्म को ठीक ढंग से नहीं समझ पाता और साथ ही उस समय जो विद्यार्थी-असंतोष की ज्वाला थी, उसमें कहीं बह गया होता परन्तु राहुल जी की जब “भागो मत, दुनिया बदल डालो” रचना पढ़ी तो नजरिया ही बदल गया. अगर राहुल जी नहीं मिलते तो यह समझ भी मुझ में नहीं होती, ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बौद्धिक विरासत और साहित्यिक सम्पदा हमारे लिए बड़े गौरव की अमूल्य निधि है. अस्तांचल की दहलीज पर जाती हुई 19वीं शताब्दी में उनका जन्म हुआ, उन्होंने 20वीं शती की भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगा और 22वीं शती की परिकल्पना कर उसने अपने को युग-दृष्टा होने की बात प्रमाणित कर दी. विश्व-विद्यालय के स्नातक कोर्स में मैंने मनोविज्ञान, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र जैसे दुरूह विषयों को लेकर पढाई शुरू की तो दर्शन की दुरूह गलियों में भारतीय दर्शनों को और बौद्ध-दर्शन के अंतर्भूत सिद्धांतों को समझने में राहुल सांकृत्यायन जी की अनुपम कृतियों ने सदैव मेरा मार्ग-दर्शन किया. हर एक विषय को समझाने की उनकी शैली बेजोड़ है. एक लुप्तप्रायः धर्म को साहित्य के प्राण-पयोधर से सिंचित कर उन्होंने उस बगीचे को हरा-भरा कर दिया. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के स्वयंभू धनी थे. वे स्वयंभू महापंडित थे- अद्भुत, आश्चर्य-चकित करने वाला व्यक्तित्व !
भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य के पुनरुत्थान में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का अतुलनीय योगदान है. बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व के धनि तथा बौद्ध-वाड्मय के पुरस्कर्ता को आधुनिक भारतीय संस्कृति का निर्माता कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के वे शिखर-पुरुष है. पराधीन भारत में 9 अप्रैल 1893 को उत्तर-प्रदेश के एक छोटे से गाँव पन्दाहा के सनातनी सरयूपारीण ब्राहमण के घर में उनका जन्म हुआ. बचपन में केदार पाण्डेय के नाम से जाना जाने वाला यह बालक घर-बार छोड़कर भाग जाता है और कलकता की मिलो में मजदूरी करने लग जाता है. वहां भी उसे स्थिरता कहाँ, वह इधर से उधर, एक से दूसरी टोह लेते हुए यायावरी का जीवन जीता है. घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता भागने वाला यही बालक बड़ा होकर दुनिया को कहता है कि भागो मत, दुनिया को बदल डालो ! कोई सपने में भी यह नहीं सोच सकता कि भागने वाला यह बालक, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पायी, एक दिन विश्व की 36 भाषाओँ में पारंगत हो जायेगा और एक दिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का व्यक्तित्व बनेगा. उसका बहु-आयामी लेखन पर आधिपत्य होगा, त्रिपिटकाचार्य, साहित्यवाचस्पति, पद्म-भूषण आदि उपाधियों के साथ देश-विदेश में विख्यात होगा और जब 33 साल बाद अपने जन्म-स्थान के घर लौटेगा तो महापंडित से विभूषित होकर अपने पूरे आभा-मंडल के साथ, सबके आदर्श का पात्र होगा.
आश्चर्य-चकित करने वाले उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बहु-आयामी विकास के बारे में उनके एक अनन्य मित्र डॉ काशीप्रसाद जायसवाल ने बिलकुल ठीक ही लिखा है- ‘उस समय मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा, जिसे मैं आज जानता हूँ- एक ऐसा आदमी जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्व-व्यापी है, जो पूर्ण रूप से स्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे आप से आप दौड़ पड़ते है, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा, जैसे वह गौतम और ईसा मसीह के पीछे चलता था’. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल के ये उद्गार उस विराट व्यक्तित्व की झलक-भर है. निःसंदेह राहुल संकृत्यायन भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना है. डॉ. आंबेडकर, महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन जैसे शलाका-पुरुष बीसवीं शताब्दी में विद्यमान थे, अगली शताब्दियों में लोग इस पर आश्चर्य करेंगें. भारतीय संस्कृति के क्षितिज पर आविर्भूत ऐसी विलक्षण विभूति अपनी अगाध विद्वता, अद्भुत मेधा, जाबांज यायावरी, बहु-आयामी कृतित्व आदि गुणों के वैशिष्ट्य से सदियों तक अद्वितीय बनी रहेगी.
आज महापंडित राहुल सांकृत्यायन का विराट व्यक्तित्व अगाध पांडित्य, ज्ञानाकुल यायावरी और विलक्षण साधना का एक उज्जवल प्रतिमान बन गया है. सांस्कृतिक ध्वज-वाहक तथा मानव-स्वातन्त्र्य के पक्षधर राहुल सांकृत्यायन के जीवन की यात्रा ऋग्वैदिक ‘दिवोदास’ से प्रारंभ होकर प्रज्ञा के पुंज अमिताभ बुद्ध की रश्मि-रंजित भूमि से अंकुरित होकर तथागत बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ के आलोक में बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय के रूप में विकसित हुई दिखती है. अपनी जीवन-यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक, एक मतवाद से दूसरे मतवाद तक, एक भूखंड से दूसरे भूखंड तक, एक भाषा से दूसरी भाषा तक, एक विधा से दूसरी विधा तक दुःख से मनुष्य जाति की मुक्ति के लिए निरंतर संघर्ष तथा ज्ञान की खोज के लिए सतत गतिशील बने रहने वाले महामानव राहुल का स्वयंभूत्व अपने आप में अद्वितीय था. वे सदैव ज्ञान-पिपासु बने रहे. वे अतृप्त हो इधर से उधर घुमक्कड़ी करते रहे. वस्तुतः उनके समस्त चिंतन और लेखन के मूल में जिज्ञासात्मक और प्राणहारक यायावरी केन्द्रित थी, जिसने उन्हें केदार पाण्डेय से रामोदर दास और रामोदर दास से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा दी. उनका सम्पूर्ण जीवन चरैवेति-चरैवेति तथा अत्त दीपो भव का सर्वोत्कृष्ट उदहारण बन गया है.
वे कहीं रुके नहीं, निरंतर प्रवाहवान ही बने रहे. चाहे वह विचार का प्रवाह हो या आचार का- उनके जीवन के सातत्य को खंडित नहीं कर पाया. दर-दर भटकते हुए वे ऐसे आलोक की खोज में लगे रहे, जिससे मानव के दुखों की मुक्ति सुनिश्चित की जा सके. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को रूपांकित करते हुए रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि राहुल का ध्यान एक ऐसी आत्मा का ध्यान है, जो युग-युगांतर से अन्धकार के बीच आलोक खोजती आ रही है, एक के बाद दूसरी प्राप्तियां उनके पक्ष में आती रही है, किन्तु वे उन्हें पीछे छोड़कर ‘नेति-नेति’ कहते हुए आगे बढ़ जाती है, मानो जो सिद्धि मिली है, वह उसे तृप्ति नहीं दे सकती, मानो जो कुछ वह खोज रही है, वह और अभी आगे है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन उस विराट सांस्कृतिक क्षितिज का नाम है, जिसे समझना जितना आसन है, उसे मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है.
उनके बहु-मुखी व्यक्तित्व का अनुशीलन विभिन्न अध्येताओं ने वैष्णव साधु, आर्य-समाजी प्रचारक, बौद्ध संस्कृति के उपासक तथा प्रखर चिन्तक आदि के रूप में किया है. वस्तुतः, उनकी नेति-नेति की वृति ने उन्हें वैष्णव, वेदांती, तंत्र-साधक, आर्य-समाजी, गाँधीवादी, कांग्रेसी, समाजवादी-साम्यवादी, आदि भूमिकाओं के बीचो-बीच मानववाद की मंजिल तक पहुँचाया. उनमें एक साथ बहु-मुखी भाषा-विद, महान यायावर, प्रकांड दर्शन-शास्त्री इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता-सेनानी, साम्यवादी चिन्तक, साहित्य-दृष्टा आदि रूपों के समेकित दर्शन होते है. उनका व्यक्तित्व अनेकों में एक था. राहुल सांकृत्यायन जी ने अतीत के खंडहरों में झांककर वर्त्तमान को पाया एवं भविष्य की रुपरेखा तैयार की थी. उनकी जीवन-यात्रा आज की पीढ़ी को एक मिथकीय पात्र की तरह लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. राहुल जी का दाम्पत्य जीवन भी उतार-चढाव वाला ही रहा. उनकी पहली शादी 1904 में, जब वे 11 वर्ष की बहुत छोटी उम्र के थे, तब रामदुलारी नामक बालिका से हुई. उनके लिए यह एक तमाशा था. समाज के प्रति विद्रोह के बीज पैदा करने में इसने ही पहला काम किया, इस पत्नी को उन्होंने कभी भी दाम्पत्य-भाव से नहीं देखा. उनकी दूसरी शादी लेनिनग्राद में मंगोल विदुषी लोला से 1937 में हुई, जिनसे उन्हें 1938 में ईगोर नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. उनकी तीसरी शादी अधिक उम्र ( 57 ) में नेपाली तरुणी कमला से सन 1950 में हुई. उनसे एक पुत्री जया (1953 ) व एक पुत्र जेता ( 1955 ) का जन्म हुआ. उनके दाम्पत्य जीवन में भावुकता की जगह स्थितियां ज्यादा प्रबल नजर आती है.
अपनी प्रयोजनमूलक गत्यात्मक जीवन-शैली के कारण उन्होंने कई बार धर्म बदला, देश बदला, भोजन, वस्त्र और विचार बदले कि इन विविध स्वरूपों से अलग कर के उनको किसी एक स्वरूप में न तो देखा जा सकता है और न ही मूल्यांकित किया जा सकता है. उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा के वैचारिक परिवर्तन के मूल में यथा-निर्दिष्ट बौद्ध सूत्र को अंगीकृत कर लिया था, जब वे कहते है- ‘बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया है, न कि सर पर उठाये फिरने के लिए’ तो उनका वह हर एक परिवर्तन और स्वरूप हमें समझ में आ जाता है. उसमें राहुल सांकृत्यायन बादलों से घिरे आकाश में जैसे चंद्रमा शोभायमान होता है, वैसे ही वे साहित्य-इतिहास के गगन में दैदीप्यमान हो उठते है. सन 1910 में घर छोड़ा और 1916 में उनका बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. फलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओँ को सीख कर उसमें महारथ हासिल की. विश्व-जनिन उथल-पुथल में वे 1917 की रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित हुए. वे भारत में उस विचारधारा के अग्रणी लोगों में गिने जाने लगे और धरातल पर किसानों के आन्दोलनों की अगुवायी भी की. यायावर राहुल एक जगह कहाँ टिकने वाले थे, 1923 से उनका विदेशी यात्राओं का दौर शुरू हुआ, जो मृत्यु-पर्यंत बना रहा. श्रीलंका में जाकर 1930 में उन्होंने बौद्ध-भिक्षु की दीक्षा लेकर चीवर धारण कर लिया, 1937 में लेनिनग्राद जा पहुंचे और चीवर को छोड़ गृहस्थी बसा ली. बिहार के किसान आन्दोलन में प्रमुख भूमिका की वजह से उन्हें एक साल जेल जाना पड़ा. भारत छोडो आन्दोलन में हुंकार का संपादन किया. वे शीर्ष कम्युनिस्ट, शीर्ष कांग्रेसी, शीर्ष समाजवादी सब कुछ रहे. ऐसे कई अनेकानेक रूप किसी अन्य महामानव के देखने और सुनने को नहीं मिलते है. वे विरलों में से विरले पुरुष थे.
एक डाल से दूसरे डाल और एक पात से दूसरे पात अवतिष्ठ होते हुए भी राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट आस्था कभी भी नहीं टूटी. उन्होंने अपना सर्वस्व हिंदी को दिया. जो कुछ हिंदी को दिया. आज वह अपौरुषेय अवदान जैसा लगता है और हिंदी भाषा-साहित्य जगत में वे हिंदी के जनक के रूप में प्रस्थापित हुए. राहुल सांकृत्यायन, इतिहास का एक ऐसा महान व्यक्तित्व, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई, फिर भी मेधा के उच्चतम शिखर पर अवस्थित हुआ. वह न केवल लब्द्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में पहचाना गया, बल्कि इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता एवं बौद्ध दार्शनिक के रूप में भी एक अद्वितीय हस्ताक्षर प्रमाणित और प्रस्थापित हुए, जिसकी अनुगूँज इस देश में और इस देश के बाहर भी सदियों तक सुनाई देती रहेगी. उनके चिंतन में, जहाँ एक ओर बुद्ध की करुणा और प्रज्ञा है, वहीँ साम्यवादी विचारों के आदर्श की सरिणी भी समाहित है. उनकी भाषा यथार्तपरक व्यवहारिक एवं व्यवसाय-कुशलता के साथ ही सरल और सहज गति में अभिव्यक्त हुई है. उनकी रचनायें हर किसी का मन-मष्तिष्क एवं हृद्य का आलोडन-विलोडन किये बिना नहीं रह सकती है. यही उनकी जीवन्तता है. जिस संवेदनशीलता, सहजता, प्रवाह और साक्षी-भाव से उन्होंने अपनी रचनाओं में शब्दों का संयोजन किया है, वह पाठक को झकझोरे बिना रह ही नहीं सकती है और पाठक उनका कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. वस्तुतः उनकी रचनाएँ चिंतन की विविध धाराओं का बखूबी प्रतिनिधित्व कराती है.
हिंदी भाषा के जनक माने जाने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य को विपुल भण्डार से परिपूरित किया है. उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के अलोक में उनकी ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खोज, हिंदी प्रदेश की प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओँ-उपभाषाओं का अध्ययन-अनुशीलन, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में धर्म-दर्शन और राजनीति की व्याख्या, बौद्धों की प्रतीत्यसमुत्पादवादी दृष्टि के प्रति सहज आग्रह-शीलता, साम्यवादी चिंतन, राष्ट्रिय आन्दोलनों में सहभागिता आदि में सामान प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए, प्रवास, कारावास और पारिवारिक अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए इस देश और विश्व-जनिन संस्कृति को बहुत कुछ दिया. उनकी 150 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी और बहुत सारा संग्रह अप्रकाशित भी पड़ा है. हिंदी में विभिन्न विधाओं में उनकी कालजयी कृतियाँ अनुपम है, जिसको बार-बार पढ़ने का मन करता है और हर बार उसमें नए-नए माणिक्य हस्तगत हुए बिना नहीं रह सकते है. उनके साहित्य सृजन की झलक कहानियों के रूप में- सतमी के बच्चे; वोल्गा से गंगा; बहुरंगी आदि, उपन्यास में- बाईंसवीं सदी; सिंह-सेनापति; जय यौधेय; विस्मृत यात्री; दिवोदास आदि, निबंधों में- साहित्य रत्नावलि; पुरातत्व निबंधावलि; आज की समस्याएं; तुम्हारी क्षय आदि, जीवनी लेखन में- सरदार पृथ्वी सिंह; वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली; नए भारत के नए नेता; स्तालिन; कार्ल मार्क्स; माओ-त्से-तुंग; मेरे असहयोग के साथी आदि, यात्रा वृतांत में तिब्बत में सवा वर्ष; मेरी लद्दाख यात्रा; किन्नर देश; रूस में पच्चीस मास; चीन में क्या देखा; एशिया के दुर्गम भूखंडों में आदि, आत्म-कथा में मेरी जीवन-यात्रा ( 1 से 5 खंड ) तथा लंका, जापान, ईरान, मदुर स्वपन, जीने के लिए, कनैला की कथा, कप्तान लाल, सिंहल के वीर पुरुस, जिनका मैं कृतज्ञ हूँ आदि अद्भुत और अविस्मरणीय है.
बौद्ध धर्म और दर्शन पर सुत-पिटक के मज्झिम निकाय, दीघ-निकाय, संयुत-निकाय आदि व विनय-पिटक का अनुवाद, बौद्ध संस्कृति, महा-मानव बुद्ध, बुद्ध-चर्या आदि विलक्षण अवदान है, जिससे हिंदी जगत बुद्ध और बौद्ध धर्म को समझ पाया. बौद्ध-संस्कृति के सन्दर्भ में श्रीलंका, तिब्बत और नेपाल उनके विशेष आकर्षण के केंद्र थे. तिब्बत की उनकी लोमहर्षक यात्राएँ ( सन 1929-30,1934,1936एवं 1938 )सर्वाधिक दुस्साहसपूर्ण,महानियौर सार्थक प्रमाणित हुई और भारत से विलुप्त प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अवशेषों को तिब्बत से प्राप्त कर भारत वासियों को ही नहीं बल्कि समस्त विश्व को अवगत कराया. जिस प्रकार ह्वेनसांग भारतीय ज्ञान-सम्पदा को चीन ले गया था, उसी प्रकार राहुल संकृत्यायन विलुप्त भारतीय ज्ञान-सम्पदा को भारत लौटा लाये. वे बीसवीं सदी के ह्वेनसांग है, एसा कहे तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी. उनकी काल-जयी कृतियों में दर्शन-दिग्दर्शन, ऋग्वैदिक आर्य, मध्य-एशिया का इतिहास ( दो खंड ), अकबर, मानव-समाज, दोहा-कोष आदि कई रचनाएँ शुमार है. उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और विवरण भी लिखे. वे अपनी पुस्तकों का प्रूफ स्वयं देखना पसंद करते थे, लॉ जर्नल प्रेस, नॅशनल हेराल्ड प्रेस, सम्मलेन मुद्रणालय, मोहन प्रेस आदि से उनकी रचनाये निरंतर चापती रही. उनके द्वारा प्रणीत विभिन्न भाषाओँ के व्याकरण और शब्द-कोष अतुलनीय है, जो आज भी प्रकाश-स्तम्भ की तरह अध्येताओं का मार्ग-दर्शन करते है. इसके साथ ही संस्मरण, डायरी, पत्र आदि जो सर्जन है, वह हमें उनके यायावरी, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन-पक्षों का विश्व-व्यापी मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक नजरिया प्रदान करता है और उनके अथाह विराट व्यक्तित्व का अहसास कराता है. इस विराट व्यक्तित्व के साक्षात्कार के बाद विख्यात प्राच्य-विद सिलवां लेवी ने उन में अमिताभ बुद्ध का साक्षात्कार किया था.
राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा का पूर्वार्द्ध जितनी मस्ती में बीता, भौतिक दृष्टि से उनके जीवन का उत्तरार्द्ध उतना ही कष्टमय बीता. अत्यधिक परिश्रम और व्यैक्तिक चिंताओं ने उन्हें मधुमेह, हृदयरोग, उच्च-रक्तचाप और स्मृति-भ्रंश आदि रोगों का शिकार बना दिया था. जीवन के अंतिम दो वर्षों में उनकी स्मृति-शक्ति लुप्त हो गयी थी. जो नाम, धाम, धर्म, वस्त्र और विचार बार-बार बदलता रहा और अपने जीवन-यात्रा में सतत परिवर्तन का पक्षधर रहा, उसने इसको भी सहज रूप से स्वीकार्य बना दिया था. आवास-प्रवास और कारावास आदि की अस्त-व्यस्तता ने उनके चिंतन और लेखन के कर्म को कभी बाधित नहीं किया था, परन्तु जीवन के अंतिम वर्षों में स्मृति ने ही उनका साथ छोड़ दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा एक गति और एक-लय में लिखा, इस महापंडित ने अपनी कलम को न तो किसी प्रकाशक के अधीन कभी गिरवी रखा और न किसी इनाम या पुरस्कार के खातिर उसको बदला. उन्होंने ता-उम्र अपनी किसी भी कृति को कहीं भी पुरस्कार के लिए भेजा तक नहीं, वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते थे. उनको जो ठीक लगा, ठीक जंचा, उसी को ठीक-ठीक लिखा. बुद्ध के सिद्धांतों को जीवन के यथार्त धरातल पर पुनः उतारने और उकेरने में वे कामयाब हुए परन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध-दर्शन के पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर शंकाओं में घिर गए और बेझिझक उन्हें नकार भी दिया.
उनकी जीवन यात्रा का अंतिम दशक आर्थिक चिताओं का भी दशक रहा. नयी गृहस्थी का भार, परिवार का आर्थिक भविष्य, चिकित्सा का खर्च आदि सब कुछ उन्हें आर्थिक अनिश्चिंतता के भंवर में डालने वाली एक से बुरी एक परिस्थिति थी. वे चाहते तो राजनेताओं से मदद ले सकते थे, प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्र-पति सर्व-पल्ली राधाकृषण जैसे उनके गुण-ग्राह्य दोस्त थे. वे किसी भी प्रकाशक को कहते तो उन पर अनुकम्पा कर सकता था, वे अपनी किसी भी पुस्तक को किसी पुरस्कार की प्रविष्टि में भेज कर पुरस्कार राशि भी पा सकते थे परन्तु इसे वे अपने आत्म-सम्मान की चेतना के विपरीत समझते थे और आर्थिक तंगी को पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते थे. उन्होंने अपने मित्र पंडित किशोरीलाल वाजपई को 4 नवम्बर 1961 के पत्र में लिखते है- ‘आर्थिक निश्चिन्तता का ख्याल रखना जरुरी है......रुपये के मूल्य को मैं भी समझता हूँ, किन्तु मेरी पाण्डुलिपि कहीं पुरस्कृत होने के लिए न भेजना.’ अंतिम वर्षों में विपन्नताओं और अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए सत्तर वर्ष की अवस्था में संज्ञा-शून्यता की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए रूस भी ले जाया गया पर 14 अप्रैल 1963 को वे भौतिक शारीर से विमुक्त हो गए.
हर काल और हर युग में राहुल संकृत्यायन जैसी विभूतियों का जन्म होना दुर्लभ है. ऐसी विभूतियाँ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए ही जीती है और अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से दुनिया को विचम्भित कर उन्हें प्रकाश की वे किरणें दे जाती है, जो उनको सदा-सर्वदा प्रकाश देती रहती है. राहुल सांकृत्यायन हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को बेहद पसंद करते थे और वे स्वयं भी हिमालय की तरह प्रखर और प्रभावोत्पादक थे. वे अपना घर भी हिमालय की गोद में ही बसाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने पहले नैनीताल में और बाद में दार्जिलिंग में अपना घर बसाया- उनके शारीर का अंतिम संस्कार भी दार्जिलिंग में ही किया गया. भौतिक शारीर से इस लोक से चले जाने के बाद भी उन पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा और लिखा जाता रहेगा. डॉ. प्रभाकर माचवे ने ( राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), विष्णु चन्द्र शर्मा (राहुल सांकृत्यायन का विरल व्यक्तित्व, 1989 ), भदंत आनंद कौशल्यायन (राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), रत्नसुन्दर शाक्य ( भिक्खु-त्रयी, 1992 ), गुणाकर मुले ( महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वयंभू महापंडित, 1993, राहुल चिंतन, 1994 ) आदि ने उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है. कई संस्थानों और संस्थाओं ने उनके लेखन और चिंतन के विविध आयामों को रेखान्तित करने की कोशिश की है, परन्तु ये सब अभी भी सतत प्रक्रिया के कुछ क्षण भर है, उनकी बहुत-सी रचनाएँ और आयाम अभी भी बाहर आने है. हम सब उसके अविरल इंतजार में है कि हमें कोई एक ओर राहुल सांकृत्यायन मिल जाय. ..... इति-यत्नं ! भवतु सब्ब मंगलम !!
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अगर मुझे राहुल ना मिले होते ....
ताराराम
निदेशक,
बौद्ध अध्ययन और अनुसन्धान केंद्र , जोधपुर
बाबा साहेब डॉ आंबेडकर और बौद्ध धर्म का नाम मैंने बचपन में अपने पिताजी से सुन रखा था. जब वे द्वितीय विश्व-युद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना के एक सिपाही के नाते जापान सीमा पर लड़ने गए तो वहां उनका बौद्ध धर्मानुयायी सैनिकों से परिचय हुआ और रंगून आदि कुछ जगहों के बौद्ध मठों के बारे में भी उन्हें कुछ जानकारी थी. द्वितीय विश्व-युद्ध के समाप्त होने पर उनका पद-स्थापन कलकता में हो गया. जहाँ उन्हें डॉ. आंबेडकर और गाँधी नाम के दो शख्सियत के बारे में जानकारी मिली थी. जिसे वे यदा-कदा हम लोगों को बताया करते थे. प्रतिवर्ष 15 अगस्त, 26 जनवरी और 14 अप्रैल को वे हमारे घर में पकवान बनवाते थे और वे आजादी की लडाई और विभिन्न युद्धों में अपने खुद के अनुभव को लोगों में साझा करते थे. वे बड़े उत्साह से विभिन्न लड़ाईयों के सजीव वर्णन और उसके महत्त्व को बताते थे. हमारी स्कूल में 15 अगस्त और 26 जनवरी को होने वाले कार्यक्रमों में वे सदैव अपने शौर्य-पदकों के साथ विशेष पोशाक धारण कर सभा में उपस्थित होते थे. पूरे गाँव में भारत के विभिन्न युद्धों में भारत की ओर से लड़ने वाले वे अकेले ही शख्स थे, जो ऐसे कार्यक्रमों में सरिक होते थे. ऐसे अवसरों पर हमको उनसे आंबेडकर और बुद्ध का नाम तो सुनने को मिला था, परन्तु महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम नहीं सुना था. सन 1975 में उन्होंने गाँव में पहली बार डॉ. आंबेडकर जयंती मनाई और मुझे विश्व-विद्यालय में दाखिला दिलाने साथ आये, जहाँ पर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर और बुद्ध के परम अनुयायी एच. आर. जोधा से मुलाकात हुई. श्री एच. आर. जोधा के मुहं से ही मुझे पहली बार महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम सुनने को मिला. डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन और महापंडित राहुल सांकृत्यायन के नाम के साथ ही उनका साहित्य भी पहली बार पढ़ने को मिला. पिताजी ने वृहद-स्तर पर 1978-79 में गांव में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर पर कार्यक्रम रखा तो कौसल्यायन जी को आमंत्रित करने के पीछे भी राहुल जी के बारे में जानकारी प्राप्त करना ही था.
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण सामाजिक आंदोलनों की स्थिति से वाकिफ था और हमारे क्षेत्र में शोषण और गैर-बराबरी के विरोध में किये जाने वाले छोटे-बड़े आन्दोलनों में हमारे पिताजी की भूमिका के कारण ऐसे अन्दोलनों में सक्रीय रहना एक नियति-सी बन गयी थी. जोधपुर में एच.आर. जोधा अम्बेडकरी मिशन के जुझारू और निष्ठावान कर्ता-धर्ता थे और अकसर वे हमारे छात्रावास में आते रहते थे. हर बार किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक विषय पर उनसे चर्चा हो जाया करती थी. आपात-काल के इस समय में विद्यार्थी वर्ग में भी असंतोष था और विद्यार्थियों के छोटे-बड़े आन्दोलन होते रहते थे. मैं अपने आपको उनसे भी अलग नहीं रख सका. एक दिन जोधा साहब ने मुझे राहुल सांकृत्यायन की एक पुस्तक पढ़ने को दी, जिसका नाम था- “तुम्हारी क्षय”. उस पुस्तक को बिना विराम के जब तक मैंने पूरा नहीं पढ़ा, तब तक सोया नहीं. पुस्तक बड़ी सहज और सरल शब्दों में थी, साथ ही वह हमारी ज्वलन्त समस्याओं को लेकर ही थी, उस पहली पुस्तक को पढ़ने के बाद राहुल सांकृत्यायन जी के बारे में और अधिक जानने की मेरी इच्छा तीव्र हो गयी और विचार पक्का कर लिया कि उनके पूरे लेखन को पढ़ लिया जाय. उस समय जोधपुर में दो पुस्तक विक्रेता थे जो राहुल सांकृत्यायन जी का साहित्य रखा करते थे, जोधा साहब ने मेरा उनसे परिचय कराया और उसके बाद राहुल जी की जब भी कोई नयी कृति आती उसे खरीदकर पढ़ ही लेता. उस पुस्तक विक्रेता से स्तालिन, कार्ल मार्क्स आदि पढने के बाद मुझे उनका ग्रन्थ दर्शन-दिग्दर्शन भी पढ़ने को मिला. उसको पढ़कर लगा कि राहुल सांकृत्यायन जैसा महापुरुष, जिसने ‘तुम्हारी क्षय’ और ‘भागो मत, दुनिया को बदल डालो’ जैसी सरल कृतियों का सृजन किया है, जिसकी भाषा आम बोल-चल की भाषा है, जो सम-सामयिक विषयों पर सहज और सरल शब्दों में लिखता है, दर्शन जैसे क्लिष्ट और नीरस विषय को भी उतने ही सरल शब्दों में लोगों के लिए ज्ञेय बना सकता है. मैंने इसको एच. आर. जोधा से जानना चाहा, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इनका लेखक एक ही है- महओंडित राहुल सांकृत्यायन! फिर तो उनका विविध-रूपा साहित्य पढ़ने के बाद वे मेरे जीवन के वे एक आदर्श पुरुष बन गए. उनके अधिकांश साहित्य को मैंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही पढ़ लिया. मेरे जीवन में राहुल जी के साहित्य ने बौद्ध धर्म को गंभीरता से समझने और आत्मसात करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, अगर मेरे को वह साहित्य पढ़ने को नहीं मिलता तो कदाचित मैं बौद्ध धर्म को ठीक ढंग से नहीं समझ पाता और साथ ही उस समय जो विद्यार्थी-असंतोष की ज्वाला थी, उसमें कहीं बह गया होता परन्तु राहुल जी की जब “भागो मत, दुनिया बदल डालो” रचना पढ़ी तो नजरिया ही बदल गया. अगर राहुल जी नहीं मिलते तो यह समझ भी मुझ में नहीं होती, ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की बौद्धिक विरासत और साहित्यिक सम्पदा हमारे लिए बड़े गौरव की अमूल्य निधि है. अस्तांचल की दहलीज पर जाती हुई 19वीं शताब्दी में उनका जन्म हुआ, उन्होंने 20वीं शती की भौतिक सुख-सुविधाओं को भोगा और 22वीं शती की परिकल्पना कर उसने अपने को युग-दृष्टा होने की बात प्रमाणित कर दी. विश्व-विद्यालय के स्नातक कोर्स में मैंने मनोविज्ञान, संस्कृत और दर्शन-शास्त्र जैसे दुरूह विषयों को लेकर पढाई शुरू की तो दर्शन की दुरूह गलियों में भारतीय दर्शनों को और बौद्ध-दर्शन के अंतर्भूत सिद्धांतों को समझने में राहुल सांकृत्यायन जी की अनुपम कृतियों ने सदैव मेरा मार्ग-दर्शन किया. हर एक विषय को समझाने की उनकी शैली बेजोड़ है. एक लुप्तप्रायः धर्म को साहित्य के प्राण-पयोधर से सिंचित कर उन्होंने उस बगीचे को हरा-भरा कर दिया. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के स्वयंभू धनी थे. वे स्वयंभू महापंडित थे- अद्भुत, आश्चर्य-चकित करने वाला व्यक्तित्व !
भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य के पुनरुत्थान में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का अतुलनीय योगदान है. बहु-आयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्त्व के धनि तथा बौद्ध-वाड्मय के पुरस्कर्ता को आधुनिक भारतीय संस्कृति का निर्माता कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. भारत के सांस्कृतिक इतिहास के वे शिखर-पुरुष है. पराधीन भारत में 9 अप्रैल 1893 को उत्तर-प्रदेश के एक छोटे से गाँव पन्दाहा के सनातनी सरयूपारीण ब्राहमण के घर में उनका जन्म हुआ. बचपन में केदार पाण्डेय के नाम से जाना जाने वाला यह बालक घर-बार छोड़कर भाग जाता है और कलकता की मिलो में मजदूरी करने लग जाता है. वहां भी उसे स्थिरता कहाँ, वह इधर से उधर, एक से दूसरी टोह लेते हुए यायावरी का जीवन जीता है. घुमक्कड़ शास्त्र का प्रणेता भागने वाला यही बालक बड़ा होकर दुनिया को कहता है कि भागो मत, दुनिया को बदल डालो ! कोई सपने में भी यह नहीं सोच सकता कि भागने वाला यह बालक, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पायी, एक दिन विश्व की 36 भाषाओँ में पारंगत हो जायेगा और एक दिन राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का व्यक्तित्व बनेगा. उसका बहु-आयामी लेखन पर आधिपत्य होगा, त्रिपिटकाचार्य, साहित्यवाचस्पति, पद्म-भूषण आदि उपाधियों के साथ देश-विदेश में विख्यात होगा और जब 33 साल बाद अपने जन्म-स्थान के घर लौटेगा तो महापंडित से विभूषित होकर अपने पूरे आभा-मंडल के साथ, सबके आदर्श का पात्र होगा.
आश्चर्य-चकित करने वाले उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बहु-आयामी विकास के बारे में उनके एक अनन्य मित्र डॉ काशीप्रसाद जायसवाल ने बिलकुल ठीक ही लिखा है- ‘उस समय मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था कि इसी आदमी का विकास उस राहुल सांकृत्यायन के रूप में होगा, जिसे मैं आज जानता हूँ- एक ऐसा आदमी जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्व-व्यापी है, जो पूर्ण रूप से स्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे आप से आप दौड़ पड़ते है, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे उसी प्रकार चल पड़ेगा, जैसे वह गौतम और ईसा मसीह के पीछे चलता था’. डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल के ये उद्गार उस विराट व्यक्तित्व की झलक-भर है. निःसंदेह राहुल संकृत्यायन भारत के इतिहास की एक अद्भुत घटना है. डॉ. आंबेडकर, महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन जैसे शलाका-पुरुष बीसवीं शताब्दी में विद्यमान थे, अगली शताब्दियों में लोग इस पर आश्चर्य करेंगें. भारतीय संस्कृति के क्षितिज पर आविर्भूत ऐसी विलक्षण विभूति अपनी अगाध विद्वता, अद्भुत मेधा, जाबांज यायावरी, बहु-आयामी कृतित्व आदि गुणों के वैशिष्ट्य से सदियों तक अद्वितीय बनी रहेगी.
आज महापंडित राहुल सांकृत्यायन का विराट व्यक्तित्व अगाध पांडित्य, ज्ञानाकुल यायावरी और विलक्षण साधना का एक उज्जवल प्रतिमान बन गया है. सांस्कृतिक ध्वज-वाहक तथा मानव-स्वातन्त्र्य के पक्षधर राहुल सांकृत्यायन के जीवन की यात्रा ऋग्वैदिक ‘दिवोदास’ से प्रारंभ होकर प्रज्ञा के पुंज अमिताभ बुद्ध की रश्मि-रंजित भूमि से अंकुरित होकर तथागत बुद्ध के ‘अत्त दीपो भव’ के आलोक में बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय के रूप में विकसित हुई दिखती है. अपनी जीवन-यात्रा के एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक, एक मतवाद से दूसरे मतवाद तक, एक भूखंड से दूसरे भूखंड तक, एक भाषा से दूसरी भाषा तक, एक विधा से दूसरी विधा तक दुःख से मनुष्य जाति की मुक्ति के लिए निरंतर संघर्ष तथा ज्ञान की खोज के लिए सतत गतिशील बने रहने वाले महामानव राहुल का स्वयंभूत्व अपने आप में अद्वितीय था. वे सदैव ज्ञान-पिपासु बने रहे. वे अतृप्त हो इधर से उधर घुमक्कड़ी करते रहे. वस्तुतः उनके समस्त चिंतन और लेखन के मूल में जिज्ञासात्मक और प्राणहारक यायावरी केन्द्रित थी, जिसने उन्हें केदार पाण्डेय से रामोदर दास और रामोदर दास से महापंडित राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा दी. उनका सम्पूर्ण जीवन चरैवेति-चरैवेति तथा अत्त दीपो भव का सर्वोत्कृष्ट उदहारण बन गया है.
वे कहीं रुके नहीं, निरंतर प्रवाहवान ही बने रहे. चाहे वह विचार का प्रवाह हो या आचार का- उनके जीवन के सातत्य को खंडित नहीं कर पाया. दर-दर भटकते हुए वे ऐसे आलोक की खोज में लगे रहे, जिससे मानव के दुखों की मुक्ति सुनिश्चित की जा सके. ऐसे विलक्षण व्यक्तित्व को रूपांकित करते हुए रामधारी सिंह दिनकर कहते है कि राहुल का ध्यान एक ऐसी आत्मा का ध्यान है, जो युग-युगांतर से अन्धकार के बीच आलोक खोजती आ रही है, एक के बाद दूसरी प्राप्तियां उनके पक्ष में आती रही है, किन्तु वे उन्हें पीछे छोड़कर ‘नेति-नेति’ कहते हुए आगे बढ़ जाती है, मानो जो सिद्धि मिली है, वह उसे तृप्ति नहीं दे सकती, मानो जो कुछ वह खोज रही है, वह और अभी आगे है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन उस विराट सांस्कृतिक क्षितिज का नाम है, जिसे समझना जितना आसन है, उसे मूल्यांकित करना उतना ही कठिन है.
उनके बहु-मुखी व्यक्तित्व का अनुशीलन विभिन्न अध्येताओं ने वैष्णव साधु, आर्य-समाजी प्रचारक, बौद्ध संस्कृति के उपासक तथा प्रखर चिन्तक आदि के रूप में किया है. वस्तुतः, उनकी नेति-नेति की वृति ने उन्हें वैष्णव, वेदांती, तंत्र-साधक, आर्य-समाजी, गाँधीवादी, कांग्रेसी, समाजवादी-साम्यवादी, आदि भूमिकाओं के बीचो-बीच मानववाद की मंजिल तक पहुँचाया. उनमें एक साथ बहु-मुखी भाषा-विद, महान यायावर, प्रकांड दर्शन-शास्त्री इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता, राजनीतिज्ञ, स्वतंत्रता-सेनानी, साम्यवादी चिन्तक, साहित्य-दृष्टा आदि रूपों के समेकित दर्शन होते है. उनका व्यक्तित्व अनेकों में एक था. राहुल सांकृत्यायन जी ने अतीत के खंडहरों में झांककर वर्त्तमान को पाया एवं भविष्य की रुपरेखा तैयार की थी. उनकी जीवन-यात्रा आज की पीढ़ी को एक मिथकीय पात्र की तरह लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. राहुल जी का दाम्पत्य जीवन भी उतार-चढाव वाला ही रहा. उनकी पहली शादी 1904 में, जब वे 11 वर्ष की बहुत छोटी उम्र के थे, तब रामदुलारी नामक बालिका से हुई. उनके लिए यह एक तमाशा था. समाज के प्रति विद्रोह के बीज पैदा करने में इसने ही पहला काम किया, इस पत्नी को उन्होंने कभी भी दाम्पत्य-भाव से नहीं देखा. उनकी दूसरी शादी लेनिनग्राद में मंगोल विदुषी लोला से 1937 में हुई, जिनसे उन्हें 1938 में ईगोर नामक पुत्र की प्राप्ति हुई. उनकी तीसरी शादी अधिक उम्र ( 57 ) में नेपाली तरुणी कमला से सन 1950 में हुई. उनसे एक पुत्री जया (1953 ) व एक पुत्र जेता ( 1955 ) का जन्म हुआ. उनके दाम्पत्य जीवन में भावुकता की जगह स्थितियां ज्यादा प्रबल नजर आती है.
अपनी प्रयोजनमूलक गत्यात्मक जीवन-शैली के कारण उन्होंने कई बार धर्म बदला, देश बदला, भोजन, वस्त्र और विचार बदले कि इन विविध स्वरूपों से अलग कर के उनको किसी एक स्वरूप में न तो देखा जा सकता है और न ही मूल्यांकित किया जा सकता है. उन्होंने अपनी जीवन-यात्रा के वैचारिक परिवर्तन के मूल में यथा-निर्दिष्ट बौद्ध सूत्र को अंगीकृत कर लिया था, जब वे कहते है- ‘बेड़े की तरह पार उतरने के लिए मैंने विचारों को स्वीकार किया है, न कि सर पर उठाये फिरने के लिए’ तो उनका वह हर एक परिवर्तन और स्वरूप हमें समझ में आ जाता है. उसमें राहुल सांकृत्यायन बादलों से घिरे आकाश में जैसे चंद्रमा शोभायमान होता है, वैसे ही वे साहित्य-इतिहास के गगन में दैदीप्यमान हो उठते है. सन 1910 में घर छोड़ा और 1916 में उनका बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. फलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओँ को सीख कर उसमें महारथ हासिल की. विश्व-जनिन उथल-पुथल में वे 1917 की रूस की क्रांति से बहुत प्रभावित हुए. वे भारत में उस विचारधारा के अग्रणी लोगों में गिने जाने लगे और धरातल पर किसानों के आन्दोलनों की अगुवायी भी की. यायावर राहुल एक जगह कहाँ टिकने वाले थे, 1923 से उनका विदेशी यात्राओं का दौर शुरू हुआ, जो मृत्यु-पर्यंत बना रहा. श्रीलंका में जाकर 1930 में उन्होंने बौद्ध-भिक्षु की दीक्षा लेकर चीवर धारण कर लिया, 1937 में लेनिनग्राद जा पहुंचे और चीवर को छोड़ गृहस्थी बसा ली. बिहार के किसान आन्दोलन में प्रमुख भूमिका की वजह से उन्हें एक साल जेल जाना पड़ा. भारत छोडो आन्दोलन में हुंकार का संपादन किया. वे शीर्ष कम्युनिस्ट, शीर्ष कांग्रेसी, शीर्ष समाजवादी सब कुछ रहे. ऐसे कई अनेकानेक रूप किसी अन्य महामानव के देखने और सुनने को नहीं मिलते है. वे विरलों में से विरले पुरुष थे.
एक डाल से दूसरे डाल और एक पात से दूसरे पात अवतिष्ठ होते हुए भी राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रति उनकी अटूट आस्था कभी भी नहीं टूटी. उन्होंने अपना सर्वस्व हिंदी को दिया. जो कुछ हिंदी को दिया. आज वह अपौरुषेय अवदान जैसा लगता है और हिंदी भाषा-साहित्य जगत में वे हिंदी के जनक के रूप में प्रस्थापित हुए. राहुल सांकृत्यायन, इतिहास का एक ऐसा महान व्यक्तित्व, जिसने कोई व्यवस्थित शिक्षा नहीं पाई, फिर भी मेधा के उच्चतम शिखर पर अवस्थित हुआ. वह न केवल लब्द्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में पहचाना गया, बल्कि इतिहासकार, पुरातत्ववेत्ता एवं बौद्ध दार्शनिक के रूप में भी एक अद्वितीय हस्ताक्षर प्रमाणित और प्रस्थापित हुए, जिसकी अनुगूँज इस देश में और इस देश के बाहर भी सदियों तक सुनाई देती रहेगी. उनके चिंतन में, जहाँ एक ओर बुद्ध की करुणा और प्रज्ञा है, वहीँ साम्यवादी विचारों के आदर्श की सरिणी भी समाहित है. उनकी भाषा यथार्तपरक व्यवहारिक एवं व्यवसाय-कुशलता के साथ ही सरल और सहज गति में अभिव्यक्त हुई है. उनकी रचनायें हर किसी का मन-मष्तिष्क एवं हृद्य का आलोडन-विलोडन किये बिना नहीं रह सकती है. यही उनकी जीवन्तता है. जिस संवेदनशीलता, सहजता, प्रवाह और साक्षी-भाव से उन्होंने अपनी रचनाओं में शब्दों का संयोजन किया है, वह पाठक को झकझोरे बिना रह ही नहीं सकती है और पाठक उनका कायल हुए बिना नहीं रह सकता है. वस्तुतः उनकी रचनाएँ चिंतन की विविध धाराओं का बखूबी प्रतिनिधित्व कराती है.
हिंदी भाषा के जनक माने जाने वाले राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य को विपुल भण्डार से परिपूरित किया है. उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के अलोक में उनकी ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक खोज, हिंदी प्रदेश की प्राचीन एवं आधुनिक भाषाओँ-उपभाषाओं का अध्ययन-अनुशीलन, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में धर्म-दर्शन और राजनीति की व्याख्या, बौद्धों की प्रतीत्यसमुत्पादवादी दृष्टि के प्रति सहज आग्रह-शीलता, साम्यवादी चिंतन, राष्ट्रिय आन्दोलनों में सहभागिता आदि में सामान प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए, प्रवास, कारावास और पारिवारिक अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए इस देश और विश्व-जनिन संस्कृति को बहुत कुछ दिया. उनकी 150 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी और बहुत सारा संग्रह अप्रकाशित भी पड़ा है. हिंदी में विभिन्न विधाओं में उनकी कालजयी कृतियाँ अनुपम है, जिसको बार-बार पढ़ने का मन करता है और हर बार उसमें नए-नए माणिक्य हस्तगत हुए बिना नहीं रह सकते है. उनके साहित्य सृजन की झलक कहानियों के रूप में- सतमी के बच्चे; वोल्गा से गंगा; बहुरंगी आदि, उपन्यास में- बाईंसवीं सदी; सिंह-सेनापति; जय यौधेय; विस्मृत यात्री; दिवोदास आदि, निबंधों में- साहित्य रत्नावलि; पुरातत्व निबंधावलि; आज की समस्याएं; तुम्हारी क्षय आदि, जीवनी लेखन में- सरदार पृथ्वी सिंह; वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली; नए भारत के नए नेता; स्तालिन; कार्ल मार्क्स; माओ-त्से-तुंग; मेरे असहयोग के साथी आदि, यात्रा वृतांत में तिब्बत में सवा वर्ष; मेरी लद्दाख यात्रा; किन्नर देश; रूस में पच्चीस मास; चीन में क्या देखा; एशिया के दुर्गम भूखंडों में आदि, आत्म-कथा में मेरी जीवन-यात्रा ( 1 से 5 खंड ) तथा लंका, जापान, ईरान, मदुर स्वपन, जीने के लिए, कनैला की कथा, कप्तान लाल, सिंहल के वीर पुरुस, जिनका मैं कृतज्ञ हूँ आदि अद्भुत और अविस्मरणीय है.
बौद्ध धर्म और दर्शन पर सुत-पिटक के मज्झिम निकाय, दीघ-निकाय, संयुत-निकाय आदि व विनय-पिटक का अनुवाद, बौद्ध संस्कृति, महा-मानव बुद्ध, बुद्ध-चर्या आदि विलक्षण अवदान है, जिससे हिंदी जगत बुद्ध और बौद्ध धर्म को समझ पाया. बौद्ध-संस्कृति के सन्दर्भ में श्रीलंका, तिब्बत और नेपाल उनके विशेष आकर्षण के केंद्र थे. तिब्बत की उनकी लोमहर्षक यात्राएँ ( सन 1929-30,1934,1936एवं 1938 )सर्वाधिक दुस्साहसपूर्ण,महानियौर सार्थक प्रमाणित हुई और भारत से विलुप्त प्राचीन साहित्य एवं संस्कृति के अवशेषों को तिब्बत से प्राप्त कर भारत वासियों को ही नहीं बल्कि समस्त विश्व को अवगत कराया. जिस प्रकार ह्वेनसांग भारतीय ज्ञान-सम्पदा को चीन ले गया था, उसी प्रकार राहुल संकृत्यायन विलुप्त भारतीय ज्ञान-सम्पदा को भारत लौटा लाये. वे बीसवीं सदी के ह्वेनसांग है, एसा कहे तो कोई अवास्तविक बात नहीं होगी. उनकी काल-जयी कृतियों में दर्शन-दिग्दर्शन, ऋग्वैदिक आर्य, मध्य-एशिया का इतिहास ( दो खंड ), अकबर, मानव-समाज, दोहा-कोष आदि कई रचनाएँ शुमार है. उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई लेख और विवरण भी लिखे. वे अपनी पुस्तकों का प्रूफ स्वयं देखना पसंद करते थे, लॉ जर्नल प्रेस, नॅशनल हेराल्ड प्रेस, सम्मलेन मुद्रणालय, मोहन प्रेस आदि से उनकी रचनाये निरंतर चापती रही. उनके द्वारा प्रणीत विभिन्न भाषाओँ के व्याकरण और शब्द-कोष अतुलनीय है, जो आज भी प्रकाश-स्तम्भ की तरह अध्येताओं का मार्ग-दर्शन करते है. इसके साथ ही संस्मरण, डायरी, पत्र आदि जो सर्जन है, वह हमें उनके यायावरी, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन-पक्षों का विश्व-व्यापी मानवतावादी दृष्टिकोण का व्यापक नजरिया प्रदान करता है और उनके अथाह विराट व्यक्तित्व का अहसास कराता है. इस विराट व्यक्तित्व के साक्षात्कार के बाद विख्यात प्राच्य-विद सिलवां लेवी ने उन में अमिताभ बुद्ध का साक्षात्कार किया था.
राहुल सांकृत्यायन की जीवन यात्रा का पूर्वार्द्ध जितनी मस्ती में बीता, भौतिक दृष्टि से उनके जीवन का उत्तरार्द्ध उतना ही कष्टमय बीता. अत्यधिक परिश्रम और व्यैक्तिक चिंताओं ने उन्हें मधुमेह, हृदयरोग, उच्च-रक्तचाप और स्मृति-भ्रंश आदि रोगों का शिकार बना दिया था. जीवन के अंतिम दो वर्षों में उनकी स्मृति-शक्ति लुप्त हो गयी थी. जो नाम, धाम, धर्म, वस्त्र और विचार बार-बार बदलता रहा और अपने जीवन-यात्रा में सतत परिवर्तन का पक्षधर रहा, उसने इसको भी सहज रूप से स्वीकार्य बना दिया था. आवास-प्रवास और कारावास आदि की अस्त-व्यस्तता ने उनके चिंतन और लेखन के कर्म को कभी बाधित नहीं किया था, परन्तु जीवन के अंतिम वर्षों में स्मृति ने ही उनका साथ छोड़ दिया. उन्होंने जो कुछ लिखा एक गति और एक-लय में लिखा, इस महापंडित ने अपनी कलम को न तो किसी प्रकाशक के अधीन कभी गिरवी रखा और न किसी इनाम या पुरस्कार के खातिर उसको बदला. उन्होंने ता-उम्र अपनी किसी भी कृति को कहीं भी पुरस्कार के लिए भेजा तक नहीं, वे इसे अपने स्वाभिमान के खिलाफ समझते थे. उनको जो ठीक लगा, ठीक जंचा, उसी को ठीक-ठीक लिखा. बुद्ध के सिद्धांतों को जीवन के यथार्त धरातल पर पुनः उतारने और उकेरने में वे कामयाब हुए परन्तु अपने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध-दर्शन के पुनर्जन्म और निर्वाण को लेकर शंकाओं में घिर गए और बेझिझक उन्हें नकार भी दिया.
उनकी जीवन यात्रा का अंतिम दशक आर्थिक चिताओं का भी दशक रहा. नयी गृहस्थी का भार, परिवार का आर्थिक भविष्य, चिकित्सा का खर्च आदि सब कुछ उन्हें आर्थिक अनिश्चिंतता के भंवर में डालने वाली एक से बुरी एक परिस्थिति थी. वे चाहते तो राजनेताओं से मदद ले सकते थे, प्रधान-मंत्री जवाहरलाल नेहरु और राष्ट्र-पति सर्व-पल्ली राधाकृषण जैसे उनके गुण-ग्राह्य दोस्त थे. वे किसी भी प्रकाशक को कहते तो उन पर अनुकम्पा कर सकता था, वे अपनी किसी भी पुस्तक को किसी पुरस्कार की प्रविष्टि में भेज कर पुरस्कार राशि भी पा सकते थे परन्तु इसे वे अपने आत्म-सम्मान की चेतना के विपरीत समझते थे और आर्थिक तंगी को पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते थे. उन्होंने अपने मित्र पंडित किशोरीलाल वाजपई को 4 नवम्बर 1961 के पत्र में लिखते है- ‘आर्थिक निश्चिन्तता का ख्याल रखना जरुरी है......रुपये के मूल्य को मैं भी समझता हूँ, किन्तु मेरी पाण्डुलिपि कहीं पुरस्कृत होने के लिए न भेजना.’ अंतिम वर्षों में विपन्नताओं और अस्त-व्यस्ताओं को झेलते हुए सत्तर वर्ष की अवस्था में संज्ञा-शून्यता की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए रूस भी ले जाया गया पर 14 अप्रैल 1963 को वे भौतिक शारीर से विमुक्त हो गए.
हर काल और हर युग में राहुल संकृत्यायन जैसी विभूतियों का जन्म होना दुर्लभ है. ऐसी विभूतियाँ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए ही जीती है और अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से दुनिया को विचम्भित कर उन्हें प्रकाश की वे किरणें दे जाती है, जो उनको सदा-सर्वदा प्रकाश देती रहती है. राहुल सांकृत्यायन हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को बेहद पसंद करते थे और वे स्वयं भी हिमालय की तरह प्रखर और प्रभावोत्पादक थे. वे अपना घर भी हिमालय की गोद में ही बसाना चाहते थे. लिहाजा उन्होंने पहले नैनीताल में और बाद में दार्जिलिंग में अपना घर बसाया- उनके शारीर का अंतिम संस्कार भी दार्जिलिंग में ही किया गया. भौतिक शारीर से इस लोक से चले जाने के बाद भी उन पर बहुत कुछ लिखा जाता रहा और लिखा जाता रहेगा. डॉ. प्रभाकर माचवे ने ( राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), विष्णु चन्द्र शर्मा (राहुल सांकृत्यायन का विरल व्यक्तित्व, 1989 ), भदंत आनंद कौशल्यायन (राहुल सांकृत्यायन, 1979 ), रत्नसुन्दर शाक्य ( भिक्खु-त्रयी, 1992 ), गुणाकर मुले ( महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वयंभू महापंडित, 1993, राहुल चिंतन, 1994 ) आदि ने उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को मूल्यांकित करने का प्रयास किया है. कई संस्थानों और संस्थाओं ने उनके लेखन और चिंतन के विविध आयामों को रेखान्तित करने की कोशिश की है, परन्तु ये सब अभी भी सतत प्रक्रिया के कुछ क्षण भर है, उनकी बहुत-सी रचनाएँ और आयाम अभी भी बाहर आने है. हम सब उसके अविरल इंतजार में है कि हमें कोई एक ओर राहुल सांकृत्यायन मिल जाय. ..... इति-यत्नं ! भवतु सब्ब मंगलम !!
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Tararam Gautam commented on a post on Blogger.
Thank you sir. Very very rremarkable comment!

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Meghendra and 'Megh' - मेघेंद्र और 'मेघ'
जब
मैंने श्री मुंशीराम की पुस्तक '' मेघ - माला '' पढ़ी
थी तब इस बात से मैं सहमत था
कि कई कबीलों के नाम प्राकृतिक
शक्तियों के नाम पर भी रखे गए
हैं . हालाँकि
मध्य एशिया में ' कबीला (Tribe)' शब्द
का पर्यायवाची शब्द ' मेघ (Megh)' उपलब्ध
है . तथापि , प्राचीन
शब्...
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