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Dilbag Virk
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समीक्षा
नवयुग में प्रकाशित समीक्षा **** 
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शिकवा नहीं किया करते ज़माने से
ख़ुशी मिलेगी, ख़ुशियाँ फैलाने से  नहीं मिलती ये किसी को रुलाने से। जैसे हो, वैसा ही मिलेगा मुक़ाम  शिकवा नहीं किया करते ज़माने से।   औरों को समझा सकते हो मगर  ख़ुद को समझाओगे किस बहाने से।   ग़लतियाँ तो ग़लतियाँ ही होती हैं  हो गई हों भले ही अनजाने से।  क्या अच्छा...
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ऊँची इमारतों के बीच, मैं अपना घर ढूँढ़ता हूँ
जिसने चाहा था कभी मुझे, अब वो नज़र ढूँढ़ता हूँ हर महफ़िल में अपना रूठा हुआ हमसफ़र ढूँढ़ता हूँ।    यूँ तो हर मोड़ पर मिले हैं उससे भी हसीं लोग  मगर उसके ही जैसा शख़्स मोतबर ढूँढ़ता हूँ।  तमाज़ते-नफ़रत से झुलस रहे हैं मेरे दिलो-जां  इससे बचने के लिए, चाहतों का शजर ढूँढ़...
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आग की मानिंद फैलती है यहाँ ख़बर
नहीं आता है मुझको जीना , झुकाकर नज़र गर ख़ताबार हूँ मैं , तो काट डालो मेरा सर। मुझ पर भारी पड़ी हैं मेरी लापरवाहियाँ तिनका-तिनका करके गया आशियाना बिखर। अपनी रुसवाई के चर्चे तुम कैसे समेटोगे आग की मानिंद फैलती है यहाँ ख़बर। वक़्त को देता हूँ मौक़ा कि तोड़ डाले म...
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लड़कियों, औरतों के जीवन पर सूक्ष्म नजर रखता कविता-संग्रह
कविता-संग्रह – ये कॉलेज की लड़कियाँ कवयित्री – डॉ. आरती बंसल प्रकाशक – प्रगतिशील प्रकाशन पृष्ठ – 112 कीमत – 150/- प्रगतिशील प्रकाशन से प्रकाशित डॉ. आरती बंसल के कविता-संग्रह ‘ ये कॉलेज की
लडकियाँ ’ में 70 कविताएँ हैं | कवयित्री ने लडकियाँ शीर्षक से दो कविताए...
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दर्दमंद भी होता है, दिल अगर आवारा होता है
जैसे माँ को अपना बच्चा बहुत दुलारा होता है  ऐसे ही अपनों का दिया हर ज़ख़्म प्यारा होता है।  ये सच है, ये यादें जलाती हैं तन-मन को मगर  तन्हाइयों में अक्सर इनका ही सहारा होता है।  क़त्ल करने के बाद दामन पाक नहीं रहता इसलिए  ख़ुद कुछ नहीं करता, सितमगर का इशारा हो...
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अनोखा अंदाज़े-बयां है उनके पास
घटा से गेसू, सुर्ख़ लब, नज़र कमां है उनके पास  देखो तो मेरी मौत का सारा सामां है उनके पास।  ताबिशे-आफ़ताब में रुख़सारों पर मोती-सा पसीना  तुम भी नमूना देख लो, हुस्न रक़्साँ है उनके पास।   चाँद हैं वो आसमां के, चकोरों की उन्हें कमी नहीं  वो हैं सबसे दूर मगर, सार...
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प्रकृति के साथ-साथ विचरण करती हुई कविताएँ
कविता-संग्रह – जब तुम चुप रहती हो कवि – रूप देवगुण प्रकाशक – राज पब्लिशिंग हॉउस , दिल्ली पृष्ठ – 76 कीमत – 80 /- रूप देवगुण जी के कविता-संग्रह “ जब तुम चुप रहती हो ” का प्रकाशन 2004 में
राज पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली द्वारा किया गया | इस संग्रह में 35 कविताएँ ह...
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